Wednesday, December 19, 2012

दिल्ली में घटी गैंग रेप की ताज़ा पाशविक घटना

दिल्ली में घटी गैंग रेप की ताज़ा घटना का समाचार जैसे ही मुझ तक पंहुचा मुझे "जहाज का पंछी + खबरदार शहरी + मौत का रास्ता = विमल !!" }-श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का ही स्मरण हुआ। सबकुछ लगता है वैसे ही हुआ है जैसा की इन उपन्यासों में लिखा गया है। फर्क (सिर्फ) ये है कि यहाँ "ओवरकोट-धारी खबरदार शहरी" कोई नहीं है। कल्पना और यथार्थ का ये फर्क पौराणिक सत्य है। जिसके वजह से रावण को हर साल मारते ही वो फिर जीवित हो उठता है।

मेरा भी खून खौला जैसे कि श्री Rajesh Parasharजी का खौला है। जबसे यह भयानक और अत्यंत दुखदाई और इंसानियत को शर्मसार करने वाली दुर्घटना सार्वजानिक हुई है समूचे देश में आक्रोश की जो ज्वाला धधकी है उसमे आहुति दिए बगैर इस युद्ध को नहीं जीता जा सकता। सवाल हो सकता है कि इस युद्ध को जीतने के लिए कौन, कब, कैसे, किसकी आहुति देगा।

जब कोई हादसा हो जाता है तभी सुरक्षा का विषय बहस का मुद्दा बन जाता है। ऐसा जघन्य अपराध करने वाले कोई भी हो सकते हैं। पहचानना मुश्किल है। किस-किस से सावधान रहें हम !? रेप के लिए फांसी की सजा तय करने के लिए बात ने फिर तूल पकड़ लिया है। न्यूज़ चैनल्स पर आज दिन भर से इसी केस के समाचार और बातें हो रही हैं।

पाठक सर के उपरोक्त उपन्यास प्रमाण हैं कि ऐसी पाशविक घटना कोई नई बात नहीं है। 

यह समस्या बड़ी भयानक है। लेकिन कड़े फैसले लेने से ही इस समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा। आदम जात को अपने भीटर के राक्षस से जीतना होगा।

 "_पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहीं ते नर न घनेरे_", खुद आगे आये बगैर कारवाँ बनने की सोचना भूल होगी। जो जैसा जिस ताक़त और हैसियत का है उसे इस युद्ध में मन, वचन और कर्म से इसमें अपना योगदान देना होगा। हमारी लड़ाई हमें खुद लड़नी होगी, हमारे लिए कोई दूसरा नहीं लड़ने वाला। अपने सुरक्षा के इंतज़ाम हमें खुद करने होंगे। 

इन्सान अपने कर्तव्य : 'अपने पर आश्रित अपने परवार की जिम्मेवारी' की बोझ से ऐसा दबा हुआ है कि विवश होकर सिर्फ दाँत किटकिटा कर भर रह जाता है। ये दबाव हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। इससे उबार पाना बहुत-बहुत कठिन है। और इसी का फायदा शोहदों को मिलता है। जिससे मिली ताक़त का वो बेधड़क प्रयोग कर कहर ढाने में कामयाब हो जाते हैं। 

सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल जैसे हालत वाले दिलेर, व्यक्ति या व्यक्तियों का निश्चय ही कहीं-न-कहीं वजूद ज़रूर है। या ऐसी मासिकता के साथ निर्भीक हो कर आगे आने वाले मर्द असंख्य भी हो सकते है, पर कुछ बंदिशों का अंकुश उन्हें फंक्शन करने से रोके हुए होगा, _हो सकता है। 

क्या ये कहना अच्छा लगता है कि जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता ये सिर्फ उसके भर के लिए ठीक है?

बहुत ही दुःख हुआ है।