Saturday, December 29, 2012

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा -तीसरा दिन

23-12-2012 रविवार ; जगन्नाथ पुरी 

...आज की मेरी शुरुआत हुई बीच पर उदीयमान सूर्य के दर्शन और वाक से। मैं, कमल और लड्डू बीच पर गये, बाकी कोई उठाये न उठा।

बीच पर का भोर का नज़ारा और उसका अलौकिक वातावरण मेरे लिए अवर्णनीय है, मैं स्वयं को इसके काबिल नहीं पाता कि इसके सम्बन्ध में कुछ कसीदे पढूं या लिख सकूँ। बस यही कह सकता हूँ : अदभुत ! विहंगम ! भब्य ! विशाल ! आदि ! अगाध ! अबाध ! अनंत ! प्रलयंकारी ! जीवदायिनी ! शांत ! एक कविता ! एक गाथा ! एक पूरा महाकाव्य ! और सम्पूर्ण जीवन का सार ! समुद्र, महासमुद्र ...दुस्तर, दुर्गम, अपार ..........!!

हम बीच पर खूब दूर तक अपने हाथ में अपने जूते थामे नंगे पाँव सुबह की नर्म रेत पर घूमते-टहलते भोर की ताज़ी हवा में सांस लेते-छोड़ते काफी दूर तक चले गये। दूर समुद्र के गहरे पानी में तैरते मछुवारों और मलाहों के मेहनत-मशक्कत को निहारते हमें नई अनुभूति का आनंद मिल रहा था। अपने जाल, जिसे मछुवारों और मलाहों ने रात की मेहनत से डाला था अब उसे वो कई जने आपस में मिलकर उसे खींच रहे थे। यूँ समेटी गई जाल में कई तरह के समुद्री जलीय जीव-जंतु, मछलियाँ, केंकड़े, झींगे, सीप, शंख, मूंगे, मोती मिले जिसे हम देख कर हैरान भी हुए और हर्ष भी हुआ। मैंने एक गंभीर शब्द करने वाला कंटीला शंख खरीदा। फिर वहीँ बीच पर चाय का लुत्फ़ उठाया। लौटने पर मैंने डुग्गु के सामने बैठ कर जोर से शंख बजाया, मारे डर के डुग्गु रोने-चीखने लगा।

आज हमने चिलिका झील की सैर को निकल पड़े। हमारा ड्राईवर "चेरू" बड़ा ही दक्ष ड्राईवर था, और पुरी का चप्पा-चप्पा जानता था। उसने हमें रास्ते में पड़ने वाले कई और दर्शनीय स्थलों, मंदिरों को दिखाया। इस दरम्यान रास्ते  चेरू ड्राईवर हमें एक मंदिर में ले गया, जिसके दर्शन के बाद जब हम चिलिका जाने के लिए जैसे ही गाडी में बैठे वीणा की तबियत अचानक बिगड़ गई। आधे घंटे हम परेशान रहे। वीणा जब संभली तो उसे याद भी नहीं था कि उसके साथ क्या बीती थी ! यहाँ तक कि उसे सुबह मुझसे हुई अनेक और बातें भी याद नहीं थी!! ............!!!

हम चिलिका पहुंचे। खाने-पीने का सामन ख़रीदा। बोट की टिकट कटाई और एक बोट पर सवार होकर हमने पूरे 5-घंटे झील में बोटिंग करते गुजारा। एक जगह, काफी इंतज़ार के बाद हमें पानी में हलचल होती दिखी, डोल्फिने पानी के नीचे से ऊपर नहीं आ रहीं थी। आज उनका मिजाज़ बहार आने का नहीं था, फिर भी पानी के नीचे से डाइव मरते एक डोल्फिन की दुम दिखी और हम हर्ष से यूँ चिल्लाये जैसे वो हमारी गोद में आ बैठी हो। काफी देर हो चुकी थी, सबको भूख भी सता रही थी। आते वक़्त रास्ते में हमने चेरू के बतलाये एक रेस्टुरेंट में पहले ही खाने का आर्डर दिया हुआ था। खाना हमें तैयार मिला। भोजन के बाद हम वापस पुरी लौट आये और सी-बीच पर लगे मेले में घूमने लगे। मेरा एक बढ़िया वाला, खूब ज़ोरदार आवाज़ करने वाला, भारी, चिकना असली समुद्री शंख लेने का बहुत मन था, इसे सभी शुरू से जानते थे, सो सबने वहाँ लगे बाज़ार में शंख ढूंढना शुरू किया, जब कोई पसंद आता तो उसकी कीमत सुन कर मन उतर जाता था, क्योंकि मोल-मोलाई बाद भी जो रकम तय होती वो भी हमसे चुकाया न जा सकता था। यूँ ही बीच पर ही कुछ खाया। किसी का खाना खाने का मन नहीं था। अत: हम होटल वापस आ गए। और बिस्तर के हवाले हो गये।

गुड नाईट,
जय जगन्नाथ!
_श्रीकांत .
...................................................................................................जारी