Wednesday, January 23, 2013

मन की.........

स्वीकारोक्ति : यह लेख लम्बा हो गया है:
गर्मी ने जोरदार धमकी दे दी है। पता नहीं इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग के लिए कथित रूप से जिम्मेवार "चतुर रामालिंगम" का हाथ है या नहीं लेकिन इस बार की गर्मी दहशतनाक होगी। तय है। 

आप जब भी इस पेज को खोलोगे मुझे प्रायः यहाँ अडिग खड़ा मौजूद पाओगे; तुम्हारे प्यार और सहभागिता के लिए..., (प्रायः ; अक्सर इसलिए कि रिज़क भी कमाना होता है, अतः हमेशा, सदा, सर्वदा जैसे वादे नहीं कर सकता)...........
मैं शब्दों के संसार में विचारने वाला स्वछन्द प्राणी हूँ, किसी भी ख़ास समुदाय, ग्रुप के तानाशाही बंधन, पाबंदी, नियम और शर्तों से परे, ...आज़ाद! ...हो सकता है मेरी ये आज़ादी आपको या किसी और को और नहीं तो औरों को नागवार और अ-संस्कृत लगे और मुझे ले डूबे! लेकिन बेझिझक-बेहिचक "एकला चोलो रे" _मेरी नीयति है, मैं इसे नहीं बदल सकता। पर, मैं लम्पट नहीं। मैं अभद्र नहीं। मैं कायर नहीं। देशप्रेम के ज़ज्बे से भरपूर! दोस्ती के ज़ज्बे से भरपूर! भाईचारे के ज़ज्बे से भरपूर। और प्यार दुलार से मजबूर.....।
अगर किसी को मुझसे दुर्गन्ध की धमकी मिलती हो, या मेरे साथ डूब जाने का खतरा सताता हो तो सबसे पहले वही मैदान छोड़ेगा, मैं नहीं।
सबसे पहले वही मुझे Unfriend करेगा, मैं नहीं।
सबसे पहले वही मुझे Unsubscribe करेगा, मैं नहीं।
मुझे शब्दों से न हटा सकोगे मित्रां! मैं तो इतना प्यारा हूँ कि प्यार से ही मर जावांगा।
"यारां नाल बहारां मेले मित्तरां दे"-पे में कुर्बान भी हो जाऊं तो कोई गम नहीं।

अंग्रेजी ज्ञान पर होती हिंदी की उपेक्षा के सन्दर्भ में मैंने पिछले दिनों अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किये थे; जिनमे आज कुछ नये शब्द जोड़ रहा हूँ: मुझे झेल सकते हो झेलो __ वर्ना कोई बंधन नहीं।

मुझे हैरत है इन नामोंनिहाद, मशहूर-ओ-आम शुद्ध भारतीय सुपर स्टार्स से,चाहे वो किसी भी क्षेत्र के हों, की अंग्रेजी-प्रेम और हिंदी की उपेक्षा पर! कई ऐसे लोग जो खाते तो हिंदी का हैं पर गाते हैं अंग्रेजी का, अंग्रेजी बोल कर। हिंदी में सवाल करो वो अंग्रेजी में उत्तर देते हैं। फिल्मों की नगरी में सिवाय अमित जी, जो स्वयं हिंदी के बड़े विद्वान् फ़िल्मी हस्ती हैं, धरम पा जी और दिलीप साब (जो बड़ी उम्दा उर्दू बोलते हैं) और कुछ अन्य लोगों की तरह जो अपनी मातृभाषा की खूब कद्र जानते और करते हैं को छोड़ कर, बाकी के सारे के सारे हिन्दुस्तानी नामचीन हस्ती जो हिंदी क्षेत्र  के हैं पता नहीं क्यों अंग्रेजी के भूत से इतना डरते हैं कि उसकी गुलामी करने और उसका मैला चाटने से बाज़ नहीं आते। फिल्म 'कहानी'(विद्या बालन वाली) की पार्टी के विडियो में भोजपुरी फिल्म के एक सुपरस्टार ने फिल्म की तारीफ़ अंग्रेजी में यूँ करते नज़र आते हैं जैसे अब उन्हें बिहारीपन से मुक्ति मिल गई हो और अंग्रेजी बोलकर वे जताना चाह रहे हों कि -'हे बॉलीवुड भगवान् मैंने तुम्हारे लिए ही तो भोजपुरी को माध्यम बनाया था, अब तो मेरी तरफ अपनी नज़रें ईनायत करने की कृपा करो, देखो अब तो मैं भी फर्ल-फर्ल अंग्रेजी बोलने लगा!!" जबकि इस फिल्म के निर्देशक सुजॉय घोष बिना हिचके अपने बंगाली होने के बावजूद कभी हिंदी में भी बोलते दिखे। भोजपुरी लोक गीतों की एक गायिका ने नाम-मशहूरियत-दौलत से मालामाल होने के बाद जब अपना पहला इंटरव्यू दिया तो कैमरे को देखते ही उनकी भंगिमा बदल गई, जैसे शिकायत कर रहीं हों कि मरदूद अभी तक कहाँ क्या कर रहा था! फिर जब सवाल पूछे गए तो उनके मुँह से अंग्रेजी की धार फूट पड़ी, यूँ बोलीं जैसे मडोना को मुँह चिढा रहीं हों। _हैं न अंग्रेजी की महीमा?

 इसी महिमा की रोग से ग्रसित मैं खुद भी हूँ। जब आप मेरे पोस्ट्स पढ़ रहे होते हैं तो उनमे मेरी अभिव्यक्ति में आपको हिंदी फ़ॉन्ट्स में इंग्लिश के शब्द मिलते हैं, उर्दू और एकाध बार पंजाबी के शब्द भी मिलेंगे। वो इसलिए कि पढने-लिखने की रुचि के सन्दर्भ में मैं जैसे लेखकों को पढता हूँ उनमे सबसे सर्वोत्तम अभिव्यक्ति- अंदाजेबयां की शैली श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक सर की है, जिनके 'सुनील'/'विमल'-सीरिज़ में चार भाषाओं की स्वादिष्ट चासनी होती है। सुनील सीरिज़ में रमाकांत की वजह से जो पंजाबी है, और जिसकी हिंदी थोड़ी कमजोर है लेकिन हँसी-ख़ुशी के जो फव्वारे फूटते हैं वह शाश्वत (सच्ची/निर्मल) प्रसन्नता बिखेरती हैं। इसी क्रम में 'विमल सीरिज़' में खुद विमल जो असलियत में सरदार है, सिक्ख है, की वजह से पंजाबी और गुरुवाणी पढने को मिलते है। मेरी पुस्तकों की अलमारी में आपको पाठक सर के उपन्यासों की बहुलता के बीच -सिडनी शेल्डन, डैन ब्राउन, जेम्स पीटरसन, और स्टीफन किंग, डेविड बाल्डाक्की की किताबें भी दिखेंगी। जिनमे सिडनी शेल्डन की प्रकाशित सभी सतरहों (17) उपन्यास मैंने पढ़े हैं। डैन ब्राउन की अभी तक प्रकाशित पाँचों उपन्यास मैंने पढ़ी है। जेम्स पीटरसन की कहानियों पर हॉलीवुड में फिल्मे भी बनी हैं लेकिन खेद है उनकी लेखन शैली में मुझे मज़ा नहीं आया। दाम वसूलने की जिद में किसी तरह इन्हें झेला। और स्टीफन किंग साहब से मैं विनम्रता से माफ़ी चाहूँगा,.....1-2 चैप्टर से ज्यादा मुझसे नहीं पढ़ा गया, क्यों? भई ज़रा-सा भी कुछ समझ में ही नहीं आया। जबकि हॉलीवुड के ये बड़े दुलारे "हॉरर" लेखक हैं। उनके 2-उपन्यास अभी भी नये के नये यूँ ही पड़े हुए हैं। इसी तरह अमिताभ बच्चन का प्रशंसक होने के बावजूद मैं उनके ब्लॉग को नहीं पढ़ पाता, _बड़ी भारी अंग्रेजी लिखते है। यदि अमित जी अपने ब्लॉग पर हिंदी में लिखें तो इंग्लिश का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर हिंदी का बहुत कुछ संवर जाएगा। डैन ब्राउन के लेखन में गज़ब की कशिश है! इन्ही साहब की लिखी 'रॉबर्ट लैंगडन' सीरिज़ की सभी तीन उपन्यासों पर हॉलीवुड में फिल्मे बनी, अलबत्ता तीसरी 'दी लॉस्ट सिंबल' अभी प्रदर्शित नहीं हुई है। इनके छठे उपन्यास के लिए इनके विश्व व्यापक फैंस में भारी बेचैनी है। सिडनी शेल्डन की 17-हों उपन्यास मुझे पसंद आईं। और अपनी पसंद मैं रिपीट कर पढता ही रहता हूँ। जिनमे सबसे ज्यादा मुझे मेरी अपनी मातृभाषा हिंदी में पाठक सर को मैं रोज़ पढता ही रहता हूँ। इसी वजह से मेरी भाषा में कहीं-कहीं पाठक साहब का प्रभाव है। और इसपे मुझे फक्र है। ये पाठक सर की लेखनी का ही ज़हूरा है कि बचपन की फंतासी (तिलस्मी) दुनिया से बाहर निकलकर मुझे यथार्थ के धरातल पर आना नसीब हुआ, 'मीना मर्डर केस' नामक सुनील सिरीज़ का उपन्यास जब मैंने पढ़ा था तब आवाक रह गया था। इसी उपन्यास के कारण मैं पाठक सर का मुरीद बना। इस उपन्यास के कथानक ने मुझे ऐसा झिंझोड़ा झकझोरा जिसके वजह से हिंदी क्राइम फिक्शन नोवेल्स पढने के मेरे सारे कांसेप्ट को बदल कर रख दिया। साहबान, वो दिन है और आज 'सीक्रेट एजेंट' का दिन पाठक सर के अलावे हिंदी क्राइम फिक्शन के किसी दुसरे लेखक के उपन्यास को मैंने छुआ तक नहीं, और आइन्दा आगे ऐसा होगा भी नहीं।

समय के साथ-साथ मुझे कई विषयों में रूचि हुई जिसके अनुसार मेरे पास ग्रंथों के अम्बार जमा होने लगे। आध्यात्म में रूचि हुई तो उस सन्दर्भ के ग्रंथों की संगत हुई। कई 'पुराण', 'श्रीमद्भागवतगीता' की कई टीकाएँ, 'श्रीशुकसुधासागर', 'महाभारत', 'वाल्मीकि रामायण', 'आध्यात्म रामायण', तुलसीदास जी की 'रामचरिमानस', तुलसी साहित्य की 'मानस रहस्य' और अनेक तुलिदासविरचित रचनाएं, और भी कई प्रकार के गीताप्रेस की किताबें मैंने पढ़ी। साहित्य के लिए मुंशी प्रेमचंद जी की 'गबन', 'गोदान' तथा और भी कई कहानी संग्रह पढ़े, रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' अभी भी पढता हूँ, बच्चन जी की कालजयी 'मधुशाला' भी जब मन करे पढने लगता हूँ।

आप पूछ सकते हैं कि जब मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो तक़रीबन 25-30 इंग्लिश के उपन्यास मैंने कैसे पढ़ डाले? जबाब है_ 1. रूचि, 2. उत्सुकता। और मेरी पहली रुचि के पीछे मेरे पुत्र प्रितीश हाथ है। जब मैं एकबार हॉलीवुड की फिल्म "दी डा विन्ची कोड" हिंदी में (डब) देख रहा था तब उसने कहा था कि वो इस फिल्म की मूल कहानी जिसपे ये फिल्म बनाई गई है उसकी पढ़ी हुई है। मैंने कोई ध्यान नहीं दिया था। इंजीनियरिंग में उसके सिलेक्शन के बाद काउंसलिंग के लिए उसे लेकर 2009 अगस्त में जब मैं कोलकाता गया था, तब लौटने के क्रम में कोलकाता ट्रेन स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर रात के वक़्त हम अपनी ट्रेन लेट होने की मजबूरी में वक़्तगुजारी के लिहाज़ से एक बुक स्टाल पर जा खड़े हुए। मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि मुझे पाठक सर की लिखी नई पुस्तक 'प्यादा' मिल गई थी।  तभी प्रितीश (जिम्मी) ने मुझसे कुछ पैसे मांगे, मैंने पूछ क्यों, तो वो मेरा हाथ पकड़कर वापस बुक स्टाल तक ले गया। उसने मुझे इंग्लिश की एक उपन्यास दिखाई और बोला कि वो इसे खरीदना चाहता है। मैंने उसे वो उपन्यास ले लेने दिया। वो था डैन ब्राउन का लिखा "ऐजेल्स & डीमन्स"! उसने उसी वक़्त मुझसे कहा कि मैं उसे पढूं। मैंने कहा -'बेत्त! हमरा बुझैतई?' उसने कहा -'आप पढ़िए तो!" मैंने कोशिश की, जिसका परिणाम ये हुआ कि पूरे सफ़र में मैं उससे पूछता रहा कि उसका पढना पूरा हुआ या नहीं!? ताकि मैं पढ़ सकूँ! बचपन से ही सस्पेंस, थ्रिलर और रहस्य कथाओं का रसिक हूँ। डैन ब्राउन ने बड़ी ही सरल और सहज ही समझ में आने लायक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग किया है। और यह उनके सभी उपन्यासों में है। उनकी लेखन शैली मुझे खूब भाई। उनके उपन्यासों में 'डिसेप्शन पॉइंट' मुझे अलग से पसंद है क्योंकि 'इस उम्र' में मेरी धड़कन फिर से धक्-धक्' हुई थी, सस्पेंस से!! इसी प्रकार सिडनी शेल्डन भी सरल इंग्लिश लिखते थे। हिंदी लेखकों ने इनकी कहानियों के कई सीन अपने उपन्यासों में सेम-टू-सेम (पात्रों और स्थान का नाम बदलकर) उसे अपनी सोच के मुताबिक कॉपी किया है। दुःख है 2005 में उनका निधन हो चुका है। क्राइम क्वीन अगाथा क्रिस्टी की 'हरक्युल पोइरोट' सिरीज़ के 4 ही उपन्यास मैंने पढ़े हैं। अगाथा क्रिस्टी के बारे में विख्यात है कि ससार में अब तक बाइबल के बाद सबसे ज्यादा इन्हीं के उपन्यासों की बिक्री हुई है जो एक रिकार्ड है। इसके बावजूद -धन्य हो देवता!- मुझे अंग्रेजी लिखना-बोलना नहीं आया और आइंदे शायद आएगा भी नहीं।

अंग्रेजी जानना और बोलना कतई बुरी बात नहीं, न ही मैं इसके खिआफ़ किसी प्रकार का जिहाद कर रहा हूँ। खुद मेरे अपने बच्चे, और नाते रिश्ते के कई लोग इंग्लिश माध्यम के छात्र रहे हैं जिन्हें कभी-कभी हिंदी की शब्दावली ज्यादा भारी लगती है। मेरी भांजी रिम्पी(प्रियंका) के पति मेरे दामाद उदयन जी बंगाली हैं फिर भी उन्हें हिंदी तो क्या बंगाली पढने में भी दिक्कत होती है, जिसके लिए उन्हें अफ़सोस है कि वे मेरे पोस्ट्स नहीं पढ़ पाते। पर वे हिंदी को नीची निगाह से नहीं देखते। न समझने पर उत्सुकता से मतलब पूछ लेते हैं। अभी हाल ही में मैंने प्रितीश को अपना लिखा लेख 'सूरज और प्रहरी' पढ़कर उसपर कमेंट करने को कहा। उसने खूब मन लगाकर पढ़ा। मैंने पूछा -'कैसा लगा?' उसने कहा -'बढ़िया! लगता है जैसे कोई सुरेन्द्रमोहन पाठक के बहुत "दीवाने" फैन ने लिखा है।' मैं खुश हो गया। थोड़ी ही देर उसने बड़ी मासूमियत से पूछा -'ये "प्रहरी" क्या होता है?' अब आप ही सोचिये कि मेरी क्या हालत हुई होगी। ये परिणाम है अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का! उसकी अभिव्यक्ति इंग्लिश है, वो उसकी ख़ुशी। मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम हिंदी है, मेरी ख़ुशी।

मुझे गर्व है की मैं हिंदी भाषी हूँ। हिन्दुस्तानी हूँ, हिंदी बोलता हूँ, हिंदी पढता हूँ, हिंदी लिखता हूँ।

मैं एक बेहद मामूली आम आदमी हूँ, मैंने अपनी शिक्षा के माध्यम से कोई भी गौरव हासिल नहीं किया है। इस हिसाब से मैं खुद को एक अशिक्षित [uneducated] ही कहूँगा। अतः क्या मुझे डर के मारे अपना मुँह लपेट कर किनारे जा बैठना चाहिए!? न बोलूं, लिक्खूं, न किसी तरह का प्रतिवाद करूँ, न ज़ुल्म की मुखालफत करूँ, न अपनी बात कहूँ, न अपनी पसंद-नापसंद को ज़ाहिर करूँ! क्या ये ठीक रहेगा? एकबार एक बन्दे ने इंग्लिश में कई शब्दों को एक साथ जमा करके मुझे कोसा, मेरी निंदा की और खूब अपनी भड़ास निकाली और ऐसा कर उन्होंने खुद अपनी पीठ थपथपाई। वो "निन्दीय निंदा" अभी भी मेरे पास है, मेरी बहुमूल्य संपत्ति की तरह। यह मेरी सबसे बड़ी कमाई है, क्योंकि 'निंदक नियरे राखिये' पर मेरी श्रद्धा है। पर क्या फायदा? इंग्लिश तो मुझे आती ही नहीं! और इन शब्दों के मतलब डिक्शनरी में खोजते फिरने की किसे फुर्सत है!? आज भी कभी उस पृष्ठ को देखता हूँ तो सोचता हूँ लिखकर पोस्ट करते वक़्त ये ज़नाब कितने खुश, और स्वाभिमान से भरे होंगे। उनकी ये ख़ुशी बनी रहे। पर उस पन्ने पर उस बन्दे की लिखावट का मतलब समझने के लिए मैं तो अब अंग्रेजी सीखने से रहा।

आप बाज़ार से कोई सामान खरीदते हैं तो अपनी जेब से उसका मूल्य चुकाते हैं। सामान पसंद आती है तो उसकी तारीफ़ करते हैं, नहीं पसंद आती तो शिकायत करते हैं। और ये मेरा हक है कि मैं अपनी नापसंदगी खुलकर ज़ाहिर करूँ। ऐसा करने वाला क्या इस सृष्टि पर मैं अकेला व्यक्ति हूँ? अमिताभ बच्चन सदी के महानायक हैं। इससे किसको इनकार है! मेरा परिवार, मेरा पूरा जीवन इस बात का साक्षी है कि अमित जी मेरे लिए क्या हैं। पर मैं यह कहने और मानने से पीछे नहीं हटूंगा कि उन्होंने भी फ्लॉप फ़िल्में दीं हैं। कुली फिल्म के फाईट सीन को फिल्माते वक़्त वे घायल न हो गए होते तो आप ईमानदारी से सच बोलिए - कहिये उसमे ऐसा क्या था जो पसंद के लायक था। सिर्फ एक चीज़ अच्छी थी। अमित जी की शानदार पर्सनालिटी। उसके बाद क्या ये सच नहीं है की उनकी फ़िल्में लगातार फ्लॉप होती चली गयीं? इससे क्या हम सुखी हो गए थे? जी नहीं। खून के आठ-आठ आँसू रोते थे, और कामना करते थे कि अब...अब...अब अमिताभ फिर दहादेंगे। पर कुली से शुरू हुई उनकी फिल्मों की क्वालिटी की गिरावट सन 2000 ही में संभली। तबतक जवानी की कई बहारें वो गंवा चुके थे। अगर यह झूठ है तो साबित कीजिये। क्योंकि मैंने पहले ही इसी ब्लॉग के शुरूआती पृष्ठों में अपनी कही बात को साबित किया हुआ है। खोलो WIKIPEDIA! देखो उसमे अमित जी की फिल्मोग्राफी! हर साल के साथ उनकी प्रदर्शित फिल्मों की कहानी छापी हुई है। और जैसे-जैसे उनकी फ़िल्में प्रदर्शित होतीं गईं अपनी उम्र और कक्षा के साथ हम भी बड़े होते गए। ये सारी हिस्ट्री मैंने विस्तार से "अमिताभ बच्चन और मैं" शीर्षक के अंतर्गत लिखा हुआ है जो इसी ब्लॉग पर अभी भी मौजूद है। कौन हिट, कौन फ्लॉप, सब सामने आ जाएगा। सबसे बड़ा सुबूत तो अमित जी स्वयं हैं जो अनेको बार उन्होंने खुद ये बात स्वीकार की है। पर क्या उन्होंने उसमे मेहनत और लगन से काम नहीं किया था!? क्या वो 'नेम-फेम-मनी' के मारे बौरा गए थे? जी नहीं! ऐसा उनकी उस वक़्त की बदकिस्मती के सिवाय और कुछ नहीं था। 'सिलसिला' के बाद स्वर्गीय यश जी ने भी अमित जी के साथ कोई फिल्म नहीं की। जो 'दीवार', 'कभी-कभी', 'त्रिशूल', 'काल पत्थर' जैसी वो फ़िल्में दीं जिनमे 'विजय' बने अमिताभ के किरदार भुला पाना असंभव है। क्या ऐसी सफलता अमित जी ने फिर कभी रिपीट करी? की हो तो बताओ! मैं आपको चुनौती देता हूँ। ...पर खेद है ऐसा है ही नहीं कि मैं मेरी बात झूठी हो जाय। 'सलीम-जावेद' की जोड़ी टूट गई थी। बदकिस्मती से कोई दूसरा कहानीकार, डायलाग लेखक वो काम कर के न दे सका, जो शोले। दीवार।डॉन। त्रिशूल। काल पत्थर। खून-पसीना। जैसी कामयाबी को दुहरा पाता। न मनमोहन देसाई और न ही प्रकाश महरा ने अमित जी की सफलता को बनाए रखा। 'मर्द' में आपको क्या भाया था? 'गंगा जमुना सरस्वती' में आपको क्या भाया था? 'जादूगर' में आपको क्या भाया था? 'तूफ़ान' में आपको क्या भाया था? 'लाल बादशाह' में  क्या भाया था? नथिंग! सभी फ्लॉप हो गए। न ढंग की कहानी थीं, न ढंग का निर्देशन! अतः नतीजा खराब हुआ। वर्ना व्यक्तिगत तौर पर आज अमित जी जितने प्यारे हैं इससे कहीं ज्यादा "तब" प्यारे थे। महान इंसान जिस शिद्दत से कामयाबी कमाता है, उसी शिद्दत से नाकामयाबी को मंज़ूर भी करता है। और अमित जी स्वयं इस बात की बेमिसाल 'मिसाल' हैं।  इसीलिए उन्हें बारम्बार मेरा सलाम है। ठीक इसी प्रकार ये मेरा हक है कि अगर मुझे सुरेन्द्रमोहन पाठक की कोई रचना पसंद नहीं आती तो अपनी नापसंदगी खुल कर जाहिर करूँ। पर ऐसा नहीं है। पाठक सर ने अभी तक जो रचा वो हिंदी क्राइम फिक्शन का इतिहास बन गया जिसमे हर उपन्यास एक मील के पत्थर की तरह अडिग खड़ा है। इसके लिए पाठक सर को मेरा सलाम।

मुझे खेद है की "अमिताभ बच्चन और मैं" की रचना करते वक़्त मेरे पास इस ब्लॉग की उपलब्धता नहीं थी, जिसके कारण मुझे रोमन फोंट्स में हिंदी लिखनी पड़ी। पर मैं कोशिश करूंगा की उन्हें देवनागरी में तब्दील कर सकूँ।

मैं सिर्फ अपने 'नायकों', भले चाहे वो किसी भी फील्ड के हों, सिर्फ ये गुजारिश करना चाहता हूँ कि वो हिंदी की नाकद्री और उपेक्षा बंद करें। इसी विषय पर मैंने कुछ लिखा है; जिसे मैंने "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"/facebook  के साथ शेयर किया, जिसे सराहा गया  :>> 
  "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे" 
"जो लोग अंग्रेजी बोलने से खुद को विद्वान मानते हैं और हिन्दी में अपनी तौहीनी समझते हैं........वो ये जान लें कि अंग्रेज मुल्कों में Toilet साफ करने वाला भी अंग्रेजी बोलता है, अतः भाषा से किसी की विद्वता परिभाषित नही होती....

मात्रभाषा हिन्दी ही हमारी पहचान है॥जय हिन्द!".....<यह मेरी नहीं क्रांतिकारी सोच की वाणी है।
मैंने जो कहा है वो निम्नलिखित है: 

यहाँ >>> आगे मेरे विचार हैं : पढ़िए :>>>

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"________श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र।

 ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!? अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर बाबू जिम्मेवार हैं उनका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन। नमस्ते महोदय !! अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे। सबसे अच्छी भाषा वही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है। ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable); अछूतपन का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है। मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है। अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

 जय हिन्द। 

_श्री.