Tuesday, September 17, 2013

DILIP KUMAR : बेअदब! जान लेकर ही मानोगे क्या?

दिलीप साहब अस्वस्थ हैं!
दिलीप साहब को सांस लेने में तकलीफ हो रही है!
दिलीप साहब अस्पताल में भर्ती हैं!
दिलीप साहब की हालत स्थिर बनी हुई है!
हम प्रार्थना कर रहे हैं!
साब जी!
ओवरडोज़ हो गया है प्रार्थनाओं का!
वे मेरे हैं!
वे हमारे हैं!
हम दुआ नहीं मांगेंगे तो और कौन मांगेगा!?
ठीक बात है!
पर, साब जी! ओवरडोज़ ? ठीक होगा??
अति सर्वत्र वर्ज्ययेत !
थोडा सा भी भगवान् को सोचने की कभी फुर्सत है ??
वृद्धावस्था का ईलाज होता तो राज राजेश्वर महाराज दशरथ पुत्रकामेष्टि यज्ञ को कभी प्रेरित ही नहीं होते और विष्णु को रामावतार के लिए कोई और बहाना या कोई और रावण पैदा करना पड़ता!
मुझे उनसे लगाव है! प्रीती, प्यार और स्नेह है! वे मेरे घर के बुजुर्ग हैं! उनके साथ रहने की आदत हो गई है! मेरी अलमारी में उनकी सभी फ़िल्में हैं, पर इस फेसबुकियन की "हथौड़े की लगातार मार जैसी - प्रार्थना" से दर्द होने लगा है! और उनसे परे रहने का मन करता है! डर से उनकी तरफ ताकते थर्रा रहा हूँ! मृत्यु का प्रचार पहले से ही किया जाना इस तकनीकी आंधी में एक फैशन बन गया है! likes & comments के खेल की प्रतियोगिता हो रही है!
तो सट्टेबाजी भी शुरू कर ही दी गई होगी?
जिया तो इतना! मरा तो ईतना!!
टीवी के समाचार चैन्ल्स भी देखना आफत हो गई है! जिसे देखो वही उनकी हिस्ट्री गा रहा है! ये कैसी रवायत है कि किसी की निश्चित मौत की घोषणा सी प्रतीत हो रही है, दुआ की जगह बददुआ सी लग रही है!??
उनके बिना मैं जी नहीं पाउँगा!_ऐसा उदघोष कोई करेगा? किसी और के क्या ये खुद मेरे ही मुँह की ये वाणी रही है! फिर भी जीए जा रहा हूँ, बढे जा रहा हूँ उसी अनंत को ओर जिधर सभी गए और बाकियों ने जाना है!
इसीलिए मैं आज और अभी ही रो लेता हूँ! मेरे आंसू न आपको दिखेंगे, ना ही मेरा दर्द आपको महसूस होगा! पर वक़्त पर काम आनेवाला एक मजबूत कन्धा तो तैयार जरूर रहेगा! उनको वापस घर लाने के लिए!
क्योंकि कल के बाद फिर कल और हमेशा जब वे हमें फिर से हँसायेंगे तो इसी मुँह से ही ना हँसना पड़ेगा!?
मेरे ख्याल से सच्ची प्रार्थना ये है कि हम ये दुआ मांगें कि उन्हें कोई कष्ट, और दर्द न हो!
उनकी बातें, उनकी फ़िल्में, उनके गाने, उनकी तस्वीरें, दिनरात सुबह शाम लगातार देखते देखते डर हो गया है कि :
बेअदब! जान लेकर ही मानोगे क्या?