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Saturday, April 28, 2012

सचिन तेंदुलकर का राजनितिक निर्णय; हैरतपूर्ण !!!

सचिन तेंदुलकर का राजनितिक निर्णय; हैरतपूर्ण !!!
२८ अप्रैल, २०१२          थाना टोली           लोहरदगा

NEWS FLASH ! सचिन तेंदुलकर "राज्य-सभा" के सदस्य मनोनित! 

सचिन तेंदुलकर पर सारी दुनिया यूँ ही नेयौछावर नहीं है. उनकी काबिलियत को सबने सलाम किया, और मैंने भी. सचिन एक INDIVIDUAL (=एक अदद, एक व्यक्ति) न होकर अपनी एक निष्पक्ष और देश के लिए निष्ठावान सर्वमान्य, सर्वसम्मानित, सार्वजनिक व्यक्तित्व है, क्योंकि वे एकनिष्ठ भाव से देश का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके लिए "भारत-रत्न" के सम्मान की अभिलाषा पुरे देश की जनता का निर्णय है, जिसे पूरा न कर पाने के लिए सरकार को नियमो में फेर-बदल करने की सलाह दी जा रही है. सचिन जैसा व्यक्तित्व INDIVIDUAL हो ही नहीं सकता, ...फिर भी उनके समस्त योगदान के बावजूद उनकी अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी है जिसके लिए वे स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं, और वो निर्णय लेने के लिए वे आज़ाद हैं और उस निर्णय के नफे-नुकसान के लिए जिम्मेवार भी, जैसे की हम और आप. ऐसे में उनके किसी निर्णय से हैरानी नहीं होनी चाहिए, ...फिर भी हैरानी है. मैं हैरान हूँ कि उन्होंने इतनी जल्दी ये निर्णय लिया! 

सचिन वोट तो ज़रूर देते होंगे?
हाँ न! 
किस पार्टी को? ...

पहले ये सवाल नहीं उठा, पर उनके अब के निर्णय ने ये बहस, ये सस्पेंस खत्म कर दिया है. सचिन के POLITICAL VIEW से अब तक हम अनजान थे. अब जान गए है. और सवाल का जवाब भी मिल गया है कि सचिन कांग्रेसी हैं. कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने सचिन तेंदुलकर का नाम राज्य-सभा के सदस्य के लिए सचिन के सामने प्रस्ताव रखा जिसे सचिन ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. फिर बाद में सचिन तेंदुलकर का नाम राज्य-सभा के लिए (भारत के राष्ट्रपति द्वारा) मनोनित कर दिया गया. आनन्-फानन लिया गया ये निर्णय हैरतपूर्ण है, क्योंकि नामित या मानोनित सदस्य को राष्ट्रपति के लिए वोट करने का प्रावधान नहीं है! और मुझे हैरानी है.

सचिन कांग्रेसी हैं, ये कहने से ऐसा लगता है जैसे उन्हें किसी ख़ास 'जात' का आदमी बना दिया गया हो.
ऐसी बातें दिल को चोट पहुंचती हैं. लगता है जैसे सचिन अब हमारे अपने नहीं रहे, ...वो सचिन जिसे मैं अपने 'तिरंगे' का एक 'रंग' समझता रहा हूँ. अब वे किसी और के ख़ास हो गए! ...ये बात मुझे हैरान करती है. क्योंकि अब देश के अलावे अब उन्हें पार्टी के हित के लिए भी सोचना होगा. विभिन्न मुद्दों पर संकट के समय पार्टी को पार्टी के लिए पार्टी के तरफदार की भूमिका निभानी पड़ेगी जिसकी आलोचना की जाएगी, क्योंकि आज कांग्रेस खुद अपने वजूद के लिए लड़ रही है. ये एक पोलिटिकल चाल है कि सचिन को कांग्रेस पार्टी में लाने से पार्टी का जनाधार सुधरेगा! क्या सचिन कांग्रेस की डूबती नैया को अपने बल-बूते पर पार लगावेंगे, जबकि कांग्रेसी आलाकमान खुद ही संशयग्रस्त है? आज पूरे देश में कांग्रेस की फजीहत हो रही है. क्या गारंटी है कि कांग्रेस सचिन को अपने प्यादे (PAWN) के रूप में इस्तेमाल नहीं करेगी? क्या सचिन को कांग्रेसी हुक्म का "जो आज्ञा" कह कर सबकुछ क़ुबूल होगा? या फिर वे एक निष्पक्ष सदस्य मात्र बने रहेंगे. तब कांग्रेस का उनके प्रति क्या रूख होगा? कभी अमिताभ बच्चन ने भी समाजवादी पार्टी के प्रचार कार्यक्रम में मुलायम सिंह को अपने "पिता सामान" की संज्ञा दे दी थी ...ये नैतिक पतन है, और ...मुझे हैरानी होती है कि अमित जी जैसे मकबूल शख्शियत के आदमी ऐसा भी कर सकते हैं, बचपन से जिनमे हम अपना अक्स देखते बड़े हुए हैं! लानत है ऐसी राजनीति पर!! सचिन के कांग्रेस ज्वाइन करने पर मैं उतना हैरान नहीं हूँ जितना कि "पोलिटिक्स" ज्वाइन करने पर!! सचिन किसी और दूसरी पार्टी को भी ज्वाइन करते तो मुझे इसी प्रकार की हैरानी होती. हैरानी ही होती "ऐतराज़" नहीं, क्योंकि ये सचिन का व्यक्तिगत मामला है. 

पर हमारे लिए नहीं.

अब तक किसी और दूसरी राजनितिक पार्टी ने सचिन को अपनी पार्टी की मेम्बरशिप क्यों नहीं ऑफर किया? पहले के अनेक क्रिकेटर आजकल या तो कमेंट्री करते हैं या पोलिटिक्स, इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ा. लेकिन सचिन की बात दूसरी है. क्योंकि अभी हम सचिन को उतना 'बूढा' नहीं मानते कि वे क्रिकेट के अलावे पोलिटिक्स जैसे कार्यक्षेत्र में कूद पड़ें. इसलिए मुझे हैरानी है. अभी इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी इसलिए मुझे हैरानी है. क्रिकेट की कैप और हेलमेट की जगह सचीन अब सफ़ेद गाँधी टोपी पहनेंगे! किसने सचिन को प्रेरित किया? क्या राहुल गाँधी ने? ...मुझे हैरानी है.





अभी सचिन राज्य-सभा के लिए मनोनीत हुए हैं, पर आगे क्या? क्या आगे चल कर सचिन "लोक-सभा" का चुनाव लड़ेंगे? 


सचिन अभी क्रिकेट के साथ ही बने रहें तो सबका भला रहेगा. सचिन को पोलिटिक्स ही ज्वाइन करना है तो थोडा ठहर कर करें. अभी कोई वक़्त नहीं हुआ है. अभी उनमे बहुत क्षमता है. सचिन क्रिकेट ही खेलें.

लता मंगेशकर ने उन्हें शुभकामना दी है और कहा है की सचिन ने क्रिकेट के मैदान में अच्छा किया है वे राज्य-सभा में भी अच्छा प्रदर्शन करेंगे. इसे ममता में डूबी भावनात्मक नजरिया ही समझता हूँ, कोई ताक़तवर तर्क नहीं.

नवजोत सिंह सिद्धू तो इस समाचार से इतने प्रसन्न हो गये कि क्या कहना! उनका कहना है कि कांगेस में अब तक चोर-उच्चक्के भरे पड़े थे, अब जा कर एक सच्चा इसान उनमे शामिल हुआ है! जी हाँ! जी हाँ!!

इस विषय में अमिताभ बच्चन की कोई प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है. न TWITTER  पे न उनके BLOG पे!! अमिताभ बच्चन खुश हैं कि जोहरा सहगल ने १०० वर्ष की उम्र निरोग पार कर ली. अमिताभ बच्चन ने शायद जानबूझ कर सचिन के पोलिटिक्स ज्वाइन करने पर कमेन्ट नहीं किया, (इसके बावजूद कि सचिन तेंदुलकर को अमित जी आपसे, मुझसे ज्यादा जानते और मानते हैं), क्योंकि जया जी समाजवादी पार्टी के तरफ से राज्य-सभा सांसद हैं. मुझे कोई हैरानी नहीं.

यहाँ मैं एक प्रश्न खुद से और आपलोगों से भी पूछना चाहूँगा: सचिन जैसे सच्चे लोगों को पोलिटिक्स क्यों नहीं ज्वाइन करना चाहिए? क्यों न सचिन आगे चल कर प्रधान-मंत्री बने?


-श्रीकांत तिवारी 
 
 

 

Sunday, April 22, 2012

किताबें झांकती हैं ...

किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनो अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामे इनकी सोहबत में कटा करती थीं 
अब अक्सर...
गुजर जाती है कंप्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहतीं हैं किताबें...

इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गयी है
बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जुबान पर जयका आता था जो सफहें पलटने का 
अब ऊँगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह - बा - तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती 'राबता' था, कट गया है


कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे 
कभी गोदी में लेते थे 
कभी घुटनों को अपने 'रिहल' की सूरत बना कर 
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से 
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के 
किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने 
रिश्ते बनते थे
उनका अब क्या होगा
वो शायद अब नहीं होंगे !! 
                                                                _____ गुलजार

कोई माने न समझे मगर मैं मेरे आंसू
पोंछता हूँ अब भी 
उन्ही किताबिं से जो
बड़ी हसरत से ताकती हैं, बंद अलमारी के शीशों से...
                                                                 _____मैं
श्रीकांत तिवारी
    
        

Tuesday, April 17, 2012

ओह ! प्रभात खबर !

ओह ! प्रभात खबर ! कर दी न गड़बड़ !!

प्रभात खबर के रांची संस्करण में मेरी कल पोस्ट की गई और E.mail किये गए पत्र का वो "हिस्सा" मात्र प्रकाशित किया गया है जिसे पढने पर ये प्रतीत होता है कि मैंने वो पत्र निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा के हक में , पक्ष में लिखा है !! जो कि कदापि सत्य नहीं. 

मैं किसी भी दृष्टिकोण से इस तथाकथित निर्मल बाबा के पक्ष में नहीं हूँ. लेकिन प्रभात खबर में इसे यूँ छपा गया है जैसे मैं ही एक मात्र निर्मल बाबा का पक्षधर हूँ. ऐसा समझना मेरे प्रति ठीक नहीं. मैं इस तरह की पत्रकारिता का विरोध करता हूँ. प्रभात खबर को चाहिए कि वो मेरे द्वारा पोस्ट कि गयी मेरी प्रतिक्रिया को आद्योपांत छापे जिससे पूरी बात स्पष्ट हो.  यूँ भ्रामकता फैलाना सच्ची पत्रकारिता नहीं.

कल से आज तक में निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा के विरुद्ध कुछ कड़े कदम जनता द्वारा उठए गए. जिससे लगता है "शुरुआत" हो गयी. आगाज़ हो गया. अब अंजाम देखना है.  

आश्चर्य है की "निर्मल दरबार" में सम्मिलित बाबा के भक्त जो टीवी पर उनसे लाभान्वित होने की बात बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में स्वीकारते थे वे अब कहाँ हैं!? वे क्यों सामने नहीं आते!? क्यों सामने नहीं आ कर "बाबा" का समर्थन करते!? अभी तक सिर्फ बाबा के विरोध में ही लोग आगे आये हैं. उन्हें किस बात का डर है? अब तक या आज ही सुबह टीवी पर दिखये गए बाबा के प्रचार कार्यक्रम में जो लोग बाबा से लाभान्वित होने की बात "निर्मल दरबार"में स्वीकार किये वे पिछले १ सप्ताह से कहाँ गायब हो गए? क्या वो झूठे लोग थे जिन्होंने बाबा से पैसे खा कर बाबा के समर्थन में टीवी पर जो कहने को सिखाया गया वो बोल दिया!!??? अब तक एक भी बाबा का समर्थक अपनी मर्ज़ी से खुलेआम सामने नहीं आया है. और ये बात "निर्मल दरबार" और "निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा" को और गहरे शक के घेरे में घेरने के लिए काफी है. 

जनता क्यूँ इतनी अंधी हुई? समझ से परे है. अब सब कुछ लुटा कर चेते तो क्या चेते. पर आने वाली नस्लें ये जान लें कि जब कोई व्यक्ति ये दावा करता है कि उसके बताये हुए "टोटके" आजमाने से उसका भला हो जायेगा तो वो कपटी है. और उससे जितनी जल्दी हो किनारा कर सिर्फ और सिर्फ अपने पुरुषार्थ पर विश्वास कर के अपना काम करे. क्योंकि नीयति तो अटल है. किसीको भी हक से ज्यादा और तकदीर से पहले न मिला है न मिलेगा.



-श्रीकांत तिवारी   -१७ अप्रैल २०१२   -लोहरदगा.



 

Monday, April 16, 2012

प्रभात खबर पर निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा की पोल !!!

आद्योपांत पढ़िए: 
निम्नलिखित पत्र मेरी प्रतिक्रिया है जिसे मैं दिए प्रभात कबर पर दिए गए इ.मेल पर भेज रहा हूँ.
Sent to E.mail: vijay.pathak@prabhatkhabar.in
सन्दर्भ: प्रभात खबर पर निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ़ "निर्मल बाबा" की "पोल" !?
मेरी प्रतिक्रिया :
निर्मलजीत सिंह उर्फ़ "निर्मल बाबा" के विरुद्ध आपके द्वारा छेड़े गए अभियान को काफी बारीकी और गंभीरता से पढ़ा-समझा जा रहा है. आपके समाचार-पत्र में पढने से पहले मैं स्वयं इन "बाबा जी" के बारे में कुछ नहीं जनता था. लेकिन घर में इनकी चर्चा होती रहती थी और इन "बाबा जी" के द्वारा बताये गए "टोटके" आजमाने शुरू किये जा चुके थे.

प्रभात खबर में निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा से सम्बंधित समाचारों ने जो हलचल मचाई उससे "निर्मल बाबा" उर्फ़ निर्मलजीत सिंह को पहले से ज्यादा देखा जा रहा है. हाँ! मैं मानता हूँ कि जो धन निर्मलजीत सिंह को "भक्तों" द्वारा दिए जा रहे थे/हैं  उसमे गिरावट आई है. उनकी लोकप्रियता सदेह के घेरे में आ गई है. लेकिन इसके साथ-साथ ही टीवी-चैनलों पर प्रसारित होने वाले निर्मलजीत सिंह के "प्रचार-कार्यक्रमों" को जयादा देखा जाने लगा है. बाबा जी के प्रोग्राम की टी.आर.पी. बढ़ी ही है. आपके मार्फ़त "बाबा जी" का प्रचार-प्रसार ही हुआ है, जिसके कारण नहीं मानने वाले भी अब उत्सुकता के साथ निर्मलजीत सिंह के कार्यक्रमों को देख-सुन रहे हैं. आपके मकसद को अभी वो कामयाबी नहीं मिली है जिस अपेक्षा से आपने निर्मलजीत सिंह के विरुद्ध अपना अभियान छेड़ा था.


निर्मल दरबार में उपस्थित जनता की भीड़ यूँ ही नहीं जुट गयी. निर्मलजीत सिंह से लोगों को जरुर फायदा हुआ होगा. क्यों लोग अमरनाथ, वैष्णव देवी, बद्रीनाथ की यात्रा करते नहीं थक रहे? इसीलिए न कि वो धार्मिक स्थल हमारी आस्थाओं जे जुड़े हैं, निश्चित रूप से भक्तों को लाभ हो रहा है! उनके (निर्मलजीत सिंह के) दरबार में उपस्थित लोग जो बूढ़े हैं, यतीम हैं, लाचार हैं क्या वे सभी के सभी एक्टर और ऐक्ट्रेस हैं? कुछ तो सच्चाई है जो इतने लोग जा कर सम्मिलित ही नहीं होरहे बल्कि धन भी समर्पित कर रहे है. इस तरह से प्राप्त धन को लूट तो नहीं कहा जा सकता! अगर ये लूट है तो साबित कीजिये, साबित हो जायेगा तो जनता खुद समझ जाएगी कि निर्मलजीत सिंह से बड़ा डकैत अभी दूसरा कोई नहीं. निर्मलजीत सिंह सामान या वस्तु नहीं बेचता, संकटग्रस्त लोगों को संकट से उबरने का उपाय मात्र बतलाता है. वो उपाय सस्ते और महंगे दोनों हो सकते हैं जिसका कोई आर्थिक लाभ सीधे निर्मलजीत सिंह को नहीं होता होगा. अगर ऐसा है तो आप पता लगाकर उसकी पोल खोलिए, सारी जनता की निगाहें आपके और हैं.


क्या निर्मलजीत सिंह ने किसी कि बाँह मरोड़ कर उसे अपनी भक्ति करने पर और प्रचार करने पर मजबूर किया है? लोगों को फायदा हुआ और यूँ स्वयं ही निर्मलजीत सिंह का मौखिक प्रचार होता गया होगा. ये निर्मलजीत सिंह कि तकदीर है कि आज वो अपनी किसी चतुराई से, न कि किसी चमत्कार से, अकूत धन-सम्पदा का मालिक बन गया है. क्या इस तरह धन कमाना (जिस तरीके से निर्मलजीत सिंह ने धन कमाया है, जैसे भक्तों से प्राप्त धनराशी वगैरह) गैर-कानूनी है? कुछ ही वर्षों पहले ये निर्मलजीत सिंह अपने जीजा श्री इन्दर सिंह नामधारी (माननीय संसद, लोक सभा) के घर से शून्य से शरुआत करता है और मात्र १०-१२ वर्षों में अरबों कि विशाल संम्पत्ति का मालिक बन जाता है. ये किसी फिल्म की कहानी में हो सकता है, हकीक़त में नहीं! १०-१२ वर्षों में ही इस कदर धन कमा लेना ही निर्मलजीत सिंह को शक के घेरे में ला खड़ा कर देता है. ऐसे चमत्कार सिर्फ किस्से कहानियों और फिल्मों में ही होते हैं. फिर भी अपने टीवी पर साक्षात्कार में जिस दृढ़ता से ये सवालों के जबाब दे रहा है वो अचरज में दल देने वाली बात है. हम जनता जब तक चमत्कार नहीं देखते उस पर विश्वास नहीं करते. निर्मलजीत सिंह से "निर्मल बाबा" तक का सफ़र चमत्कारिक है!! और, देश के लिए तहकीकात का!!!


ये बात किसी के लिए भी इर्ष्या का विषय है. खास कर उस व्यक्ति के लिए जिसके घर रह कर निर्मलजीत सिंह ने "निर्मल बाबा" तक का अपना सफ़र शुरू किया था! इंसानी फितरत है जनाब! कि क्यूँ कर एक हरवाहा/चाकर सामान व्यक्ति मात्र १०-१२ वर्षों में अरबपति हो गया!!! कल तक जो नौकर था आज मालिक कैसे बन गया!!!??? अब वो ही व्यक्ति अपनी कामयाबी को "शक्ति कि कृपा" बतलाता है तो कोई विश्वास नहीं करता. लोग उसके दरबार में रू २०००/- ३०००/- ले कर भेज रहे हैं, कि उन्हें भी "उस" शक्ति कि कृपा मिल जाय! निर्मलजीत सिंह ऐसे लोगों को जुबानी उपाय बतलाता है. लोग विश्वास करते हैं. आप क्या कर लेंगे?? कुछ ऐसा साबित कीजिये कि ये विश्वास टूटे.


निर्मलजीत सिंह ने एक ही गलती की है जो उनके सारे किये कराये पर सवाल ही नहीं खड़ा करता बल्कि पानी फेर दे रहा है_ वो है धन माँगना, अपने दरबार में शामिल होने की फीस हजारों में ऐंठना! और उस धन से जनकल्याण न कर के अपनी प्रभुता बढ़ाना, प्रोपर्टी खरीदना, अपने आप को ईश्वर सदृश प्रस्तुत कर के अपनी दुकानदारी बढ़ाना और भक्तों से मिले पैसे से ऐश करना!! ऐसा शख्श "पूज्यनीय बाबा" कदापि नहीं हो सकता.

कुछ ऐसा कीजिये कि ये निर्मलजीत सिंह अपनी इस टोटके 'बेचने' की दुकानदारी को बंद करे.  ये शख्श काफी चालाक है. जिसे निश्चित रूप से कानूनी सलाह हासिल है. इसके विदेशी संबंधों का पता लगाइए, विदेशों से प्राप्त धन के आंकड़े खोज निकालिए और हम जनता को इससे अवगत कराईये, अगर ये निर्मलजीत सिंह भक्तों से प्राप्त धन को विदेशों में इन्वेस्ट कर रहा है तो वो भी पता लगाइए. ये आपका फ़र्ज़ है और अब जिम्मेवारी है. पहले इस आदमी ने गरीबी झेली है, अब रईस बन कर अपनी धाक ज़माने से इसे कौन रोक सकता है!? इसने व्यक्तिगत रूप से किसी का कुछ नुकसान किया हो तो खोजी पत्रकारिता की मिसाल पेश कीजिये और इसकी पोल खोलिए. ये आदमी, निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा, किसी से छिप नहीं रहा बल्कि दृढ़ता से सबका सामना कर रहा है, ये हमें अचरज में डालता है. इसके पासपोर्ट, वीसा जैसी चीजों और विदेश कि यात्राओं पर निगाह रखिये. कहीं ये  भाग गया तो फिर कागज़ ही काले होंगे.


अफ़सोस है कि आपके अभियान से इसका कुछ नहीं बिगड़ा, बल्कि ये और सशक्त हो गया है. आपके समाचर-पत्र में छपने केलिए अब इस निर्मलजीत सिंह के बारे में कुछ नहीं बचा. अब निर्मलजीत सिंह मुख्य खबर नहीं है.. इसका दरबार निर्विघ्न जारी है. आपने सिर्फ इस निर्मलजीत सिंह के पिछले जीवन की कहानी मात्र कही है, जिसमे कुछ नहीं रखा. गड़े मुर्दे उखाड़ कर आपने ये तो बतलाया कि निर्मलजीत सिंह ने पिछले दिनों का मकान भाडा तक नहीं चुकाया, पर ये समाचार निर्मलजीत सिंह के प्रति हमारी उत्सुकता को बढ़ता है कि देखो कितना मुश्किल भरा दौर इसने झेला है. आज निर्मलजीत सिंह को धन की कमी नहीं, वह माकन मालिक ब्याज समेत अपना किराया वसूल ले कौन रोकता है! हाँ! निर्मलजीत सिंह को चाहिए कि वो ब्याज समेत अपने पुराने मकान मालिक का किराया चूका दे. नहीं चुकता तो ये निर्मलजीत सिंह की कृतघ्नता होगी. 

सबसे बड़ा सवाल ये है कि ऐसा क्या हो गया जो ख़ास कर प्रभात खबर ही निर्मलजीत सिंह के पीछे पड़ गया? किसी और दुसरे समाचार पात्र ने निर्मलजीत सिंह उर्फ़ निर्मल बाबा में प्रभात खबर के सामान रूचि क्यों नहीं दिखाई? क्या आपको किसी ने उकसाया या भड़काया है? हमारा आप पर भरोसा है कि ऐसा न है न होगा. फिर भी सिर्फ आपके द्वारा लिखे जाने से आम ये सवाल उठ रहा है कि आपको किसी ने उकसाया तो नहीं! किसी ने निर्मलजीत सिंह से खुंदक खा कर आपके कान भरे हों और आपने इसे मुद्दा बना लिया. जरूर ही ये बे-बुनियाद बात है. आपके बारे में तो ऐसा सोचना भी महापाप है. फिर भी बता दीजिये कि "हिंदुस्तान", दैनिक जागरण", "दैनिक भास्कर", इंग्लिश न्यूज़ पपेर्स में पिछले ६ दिनों में निर्मल बाबा मुख्य खबर क्यों नहीं!!!? क्या इसलिए कि सिर्फ आपको ही एक्स्क्लुसिव टिप आसानी से हासिल है!!!? सिर्फ आप ही मात्र के हो-हल्ले ने टीवी वालों को निर्मलजीत सिंह का इंटरव्यू लेने को भेजा. जनता ने देखा सुना, पर समझा कुछ नहीं. कुछ नहीं हुआ. सिर्फ आपके अखबार कि बिक्री बढ़ गयी. 
आइन्दा दिनों में ये सबके लिए कौतुहल का विषय होगा की निर्मलजीत सिंह उर्फ़ "निर्मल बाबा" का या आपके उत्तम "प्रयास" का क्या अंजाम सामने आएगा.  

हम जनता संशय में हैं. अपने विवेक से काम ले रहे हैं तभी तो आपसे सम्मुख हैं. अब आपकी जिम्मेवारी है कि हमारे सभी संशय दूर करें. 
 

        भवदीय,
- श्रीकांत तिवारी,
थाना रोड, लोहरदगा.
  Some points Printed by the news paper on dt: 17,APR`2012 in Ranchi edition.







Sunday, April 8, 2012

बाबूजी के शब्द :

बाबूजी के शब्द :

शर्ट : कमीज़, "मिरजई" या "बुशर्ट" कहते थे. 
नाभि : "ढोंडी"
सरसों तेल : "कडुआ तेल"
लोटा : "टुइयां", या "घूटी"
मछरदानी : "मुसहरी", "सिरकी"
सादी रोटी"फुलकी रोटी" या "फुटेहरी" 
थाली : "थरिया"
औकात  : "आकबत"
पेन : "कलम"
पेंसिल : "रूल"
कॉपी : "बही" 
स्कूल बैग : "बस्ता" 
पतलून : "फुलपैंट"
कंघी : "कंकही" 
घोसला : "खोंता" 
इंग्लिश : "अंगरेजी" 
तंग (परेशान) करना : "दिक् करना" 
पतंग (KITE) : "गुड्डी" या "तिलंगी"  


ऐसा नहीं है की बाबूजी ऐसी ही जुबान बोलते थे, उपरोक्त शब्द वे सिर्फ हमें और लोगों को हँसाने के मकसद से बोलते थे. हमारे बाबूजी पटना बी.एन. कॉलेज से स्नातक थे, जिनकी "अंगरेजी" काफी अच्छी थी. वे बहुत ही अच्छे पत्र-लेखक भी थे.
जब उन्हें जम्हाई आती थी तो नि:स्वाश ले कर कहते थे : "हे प्रभु हे दीनानाथ...!"
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श्रीकांत  बेटा : "बबुआ" 
    
 
 
 
  

AMITABH AUR HUM

अमिताभ बच्चन ने अब तक जितनी फिल्मो में काम किया उतने ही जन्म उन्होंने जिया. और उनकी फिल्मो के माध्यम से हमने भी एक युग जिया है. अभी भी अगर कोई 'DON' देखे, 'दीवार' देखे, या 'शोले' देखे तो उसे स्वतः अपनी उम्र की उस अवस्था की याद आये बिना नहीं रहेगी. वो उम्र जब हममें निश्छल उत्साह और उल्लास के अलावे और कुछ नहीं था. सच कहूँ तो वो ही उम्र फिर जीने की ललक ने ही हमें आज-कल की विषमताओं में जिन्दा रखा है.

श्रीकांत 

MOST DISASTROUS WORDS IN HUMANITY & FRATERNITY:

No.1> DEATH
No.2> VENDETTA
No.3> SEPARATION 
No.4> POVERTY
No.5> DISEASE
No.6> WAR

EVERYONE SHOULD GET RID OF THESE.
...BUT CAN WE?

OF COURSE WITH SOMEONE OF THE ABOVE.

No.1> DEATH IS NATURAL. AGONIZING WHEN IT OCCURS UNNATURALLY.
No.2> VENDETTA! OF COURSE WE CAN.
No.3> SEPARATION! OF COURSE WE CAN.
No.4> POVERTY ??? only God can help. -&- Never by the politicians.
No.4> DISEASE! WE ARE FIGHTING AGAINST IT...
No.5> OF COURSE WE CAN.







SHRIKANT

AMITABH

अमित जी से कौन प्रभावित और अभिभूत नहीं है? ये आदमी उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो आज सफलता के पायेदान पर आसमान की बुलंदियों पे खड़े आम आदमी को संघर्ष करने से नहीं घबरा कर लगातार अपने काम में लगन से जुड़े रहने की प्रेरणा देते रहते हैं !


श्रीकांत

Friday, April 6, 2012

VANSH KA JANM: वंश का जन्म, प्रणव के रूप में

०५ अप्रैल २०१२     लोहरदगा     ०३:२५ दोपहर
 वंश का जन्म, प्रणव के रूप में 
कमल का बेटा 
'वंश', ये नाम गुनगुन ने सुझाया, कैसे!? मम्म ...शायद रूपा को कहते सूनी होगी.  वंश का जन्म ०५ अप्रैल, २०१२ दिन बुधवार को सायं ०४:४५ बजे हुई.  मैं लोहरदगा से रांची वीणा के साथ पहुँचते 'देबुका नर्सिंग होम', लालपुर रांची में रूपा को देखने गया,. मालूम हुआ रूपा लेबर रूम में है, दावा वगैरह दी जा रही है. माँ वहीँ थी. वीणा को वहां कमल के साथ छोड़ कर घर आ गया. खाना खा कर किताब पढ्त-पढ़ते सो गया. अचानक पौने पांच बजे शाम को गुनगुन ने मुझे झिंझोड़ कर ख़ुशी से चीखते हुए कहा ...'बाबूजी जागिये, बाबु का जनम हो गया चलिए.....'. मैं कूद कर उट्ठा, झट-पट तैयार हुआ और माँ के साथ नर्सिंग होम पहुंचा और अपने "वंश" का दर्शनं पाया. 





मैंने अभी बालक का नाम नहीं सोचा है, कुछ विष्णुसहस्रनाम से प्रेरणा मिली है, यदि सबकी सम्मति होगी तो वोही नाम रखा जायेगा.
वंश और गुनगुन का बाबूजी... 
श्रीकांत तिवारी
 

Thursday, March 29, 2012

RAJYA SABHA ELECTION & PRBHAT KHABAR

लोहरदगा, थाना टोली,     ०२:२५ PM      २९ मार्च २०१२
झारखण्ड में राज्य-सभा चुनाव! और 'प्रभात खबर' की मुहीम!!
वाह! 
आज कई दिनों से प्रभात खबर(अखबार)लगातार ये छपे जा रहा है कि अबकी बार राज्य सभा का चुनाव बिना किसी भ्रष्टाचार, कदाचार के संपन्न हो. नेता बिकें नहीं. 
मात्र २ सीट है और ५ उम्मीदवार मैदान में हैं. ऐसे में क्या होगा? ३ को तो निश्चित हारना होगा. क्या वो यूँ ही हार जायेंगे? क्या वो ये बात नहीं जानते या अपनी औकात नहीं पहचानते? प्रमुख राजनीतिक दलों के रुख रहस्यमय बने हुए हैं! जनता की इसमें कुछ नहीं चलने वाली. ये शक्तिशाली अति-संपन्न व्यक्तियों के जीवन का संघर्ष है, जिसके लिए वो आज तक जिंदा हैं, सिर्फ अपने-अपने स्वार्थ के लिए न की जनता और देश के लिए! जो हारेंगे उनकी भी झोली खाली नहीं रहेगी. जो जीतेंगे वो तो विजयी कहलायेंगे ही. "प्रभात खबर" चाहे अपनी बात स्याही से छापे या फिर खून से! प्रभात खबर की मुहीम जब तक जनता की मुहीम, जन-आन्दोलन, जन-जन की अपनी लड़ाई न बन जाये प्रभात खबर के सामान निष्पक्षता का सन्देश फैलाते रहना होगा.
पुनश्च:
 चौकन्ने प्रशाशन की हालिया २.१५ कड़ोड़ नगदी जब्त करना ऐसी ही निष्पक्ष मुस्तादी और कुशल प्रशाशन की सफलता है.
०२ अप्रैल २०१२
कौन कहता है की आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो ज़रा दिल से उछालो यारो!!!
.....श्री सुएंद्र मोहन पाठक के उपन्यास से.

_श्रीकांत तिवारी.

" प्रणव आ रहा है! "

What is Om? [PRANNAV]

It is the smallest mantra (मंत्र; mantraa). It is also called pranav-mantra. Probably 'pranav' (प्रणव; praNNav) means primordial (मूल; mool).
A mantra is a word or a phrase used for meditation and chanting.
A shloka (श्‍लोक; shlok) is a verse. Generally people use the words - 'mantra' and 'shloka' as synonyms!(पर्याय,समनार्थक)
Sacred ancient Indian texts like Vedas (वेद; ved), are collections of shlokas. Some of these shlokas are used as mantras.
It is a common practice to begin other mantras with 'Om'. E.g. 'Om Namah Shivaya' (ॐ नमः शिवाय; Om namah shivaaya), 'Om Shanti Shanti' (ओम शांति शांति; Om shaanti shaanti).
Jainism, Buddhism and Sikhism originated from India after Hinduism. These religions adopted lots of Hindu philosophies and practices. These religions have their own form and understanding of 'Om'. Religious minded Hindus believe that 'Om' is the ultimate, hyper or super-natural sound!
Using DevaNagari alphabet, this word can be written as 'ओम्' or 'ओम'. It is general practice in DevaNagari to drop the last 'halant' (i.e. ''). So 'ओम' is generally preferred over 'ओम्'.
Generally the spelling 'ओम' is used in literature (as noun); while the sign/symbol 'ॐ' is used for religious purposes.

The Meaning of Om or AUM

Some of us are not yet very sure of the precise meaning of the word 'Om'! It is certainly related to the God/Heaven!
Twelve verses of ved collectively called 'माण्डूक्य उपनिषद' (maandookya Upanishad) tries to explain this sacred word Om or 'AUm' (अ-उ-म्).
As per the Sanskrit/Hindi grammar ('vyaakaraNN'; व्याकरण) the vowel 'O' (ओ) is sometimes substituted for two consecutive vowels 'A' (अ) and 'U' (उ); Generaly public too prefer 'Om' instead of AUM ('AUm')!
Gayatri Mantra (गायत्री मंत्र; gaayatree maNtra) like many other vedik shlokas starts with Om. That's why I assumed that Om (ओम) means 'My Lord' or 'Oh, our God' ('हे परमेश्वर'); I may be wrong.
Some people say there is a relation between the words 'Om' and 'Amen'; others doubt it!

The Om symbol - ओंकार

An 'Om symbol' is a sign (glyph, shape) to write (scribe, represent) the 'Om' sound.
'Om symbol' is called 'Omkar' (ओम्-कार; Omkaar) or 'Onkar' (ओंकार; ONkaar). ओंकार can be written as ओँकार (ONnkaar).
As discussed earlier, the 'Om' sound can be written as 'ओम' in DevaNagari. So 'ॐ' is a kind of short cut of the word 'ओम' in DevaNagari and other Indic scripts.
People use this sign/symbol for meditation and worship.
Om symbol is drawn mostly as in the picture below i.e. as 'ॐ'.
Om Symbol
If you want a bigger picture of the 'Om symbol', click the above picture.

Is Om a religious symbol?

YES. It is main religious symbol for Hindus and Buddhists (Bauddh; बौद्ध). Sikhs have a derived form called 'एक ओंकार' ('Ek ONkaar').
In Hindi and Sanskrit,
shape = AAkaar (आकार) or AAkRIti (आकृति)
glyph = AkShar (अ‍क्षर) or AkSharaakRiti (अ‍क्षराकृति)
indicate = saNket (संकेत)
symbol = saNket + AkShar (संकेत-अक्षर)
saNket + AkShar = saNketaakShar (संकेताक्षर)
sign = chihna (चिह्न)
In Hindi 'dharma' means religion. So it is mainly a religious symbol (dhaarmik chihn; धार्मिक चिह्न).

What is ओ३म् (O3m)?

Maharshi Dayanand Saraswati (महर्षि दयानन्द सरस्वती; maharShi dayaanand sarasvatee) was founder of the 'Arya Samaj'. He used to write 'ओ३म्' instead of 'ओम'. The '३' (DevaNagari digit 3) between 'O' and 'm' is called 'ploot' (प्लूत). Dayanand used 'ploot' to emphasize long pronunciation of 'O'. Only followers of Dayanand Saraswati (members of 'Arya Samaj') write 'ओ३म्' instead of '‍ॐ'.
The syllable that is prior to a ploot is pronounced for a longer time/period (more than double). So 'ओ३म' is to be pronounced as OOOm (o..m).
O3m Symbol

Is Om the most powerful symbol?

There is no scientific study to prove that ॐ is better or more powerful than any other symbol or letter for meditation etc. No symbol can really bring good luck, wealth or power. This symbol is sometimes misused by greedy preachers/god-man. How about using this symbol for peace!

Can Om symbol help you in meditation?

If a dark circle (or a point) can help you in meditation then the Om symbol will also help.

Proper Use of Om

Someone wrote that a reverse (flipped) Om brings bad luck. Luckily most Hindus do not believe in such nonsense. If you care for sentiments of Hindus (who are mostly peace-loving), avoid drawing this symbol on footwear, near dirty places, etc. If you want to make tattoos including this symbol, please try to maintain the shape and avoid tattooing it on leg, thigh, etc.
Om using Deeyas/s
_HIS BABUJI,
SHRIKANT TIWARI

Wednesday, April 6, 2011

" अखबारोक्ति" उदगार और हकीकत !!!

"अखबारोक्ति" ०४, अप्रेल`२०११  {दैनिक जागरण, प्रकाशन ५/४/२०११}
रांची _
 झारखण्ड हाई-कोर्ट उवाच: " शहर के अन्दर खटाल संचालित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. इससे तमाम तरह की समस्याएं आती हैं. खटाल वाले शहर से बहार जा कर इसे संचालित करें. ...चंडीगढ़ प्रशाशन ने राजभवन को भी गाय रखने की अनुमति नहीं दी थी. किसी भी परिस्थिति में शहर की अमन और शांति भंग करने की इज़ाजत नहीं दी जा सकती.   अदालत ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा  क़ि _ झारखण्ड में सबकुछ है. इस राज्य की जनता जिस दिन जग जाएगी बेईमानों को लैम्प-पोस्ट पर टांग देगी. अदालत तो जनता को जगाने का एक छोटा सा प्रयास कर रही है. आमजन यदि खामोश है तो इसे तूफ़ान के पहले की शांति मानकर सरकार को संभल जाना चाहिये." 
....फिर, ५ अप्रेल को रांची में दंगा हो गया ! पुलिस और जनता आपस में  भिड़ गयी ! लाठी-गोली सब चले ! जाने गयीं ! लोग घायल हुए. सांसद सुबोधकांत ये कहते हुए जेल गए कि '...वे जब तक जिंदा रहेंगे, अतिक्रमण को नहीं हटाने देंगे !!!' ....इस्लामनगर में  और रांची के  अन्य ईलाको में भरी गड़बड़ी के मद्देनज़र कर्फ्यू लगानी पड़ी.  ७/८ अप्रेल को झारखण्ड बंद रखने का एलान " जनता" ने किया है !! 
...और राज्य के मुख्य मंत्री श्री अर्जुन मुंडा विदेश भ्रमण को गए हुए है. इसलिए जनता उनका 'पुतला' दहन करेगी. 
वाह! अदालत!! वाह! जनता!!! वाह! नेता!! वाह! सरकार!!  ____________________________________

इस विश्व-विजय का क्या कहना!!!

इस विश्व-विजय का क्या कहना !
जय-जय-जय 
जय हो...!!!
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Sunday, March 27, 2011

(POEM) Khoob Ladi Mardani Woh To Jhansi Wali Rani Thi...

 खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी...  

 

Story of Laxmi Bai, (born Nov.19, 1835) the Queen of Jhansi is unparalleled in the history of India. She was only 18 years old when her husband Gangadhar Rao, the king of Jhansi died. As the first born child of Rani had died, the couple was childless. They adopted a child whom the English refused to accept as the legal heir to the throne of Jhansi. Instead the English offered her a pension of Rs. 60,000 per year and ordered her to leave the fort of Jhansi. Rani however refused and decided to fight for her rights. She raised a volunteer army where both men and women were recruited. In March 1858, English army laid siege to the fort of Jhansi and took Jhansi after fighting for two weeks. Rani escaped in guise of a man with few of her supporters, riding a horse with her son tied behind her back and a sword in her hand. She regrouped her forces in Kalpi, about 100 miles from Jhansi and advanced into Gwalior. Three weeks later on June 18, 1858 she was martyred by bullets of the English army in a combat battle. Super human courage, convictions and velour displayed by such a young girl in nineteenth century India to take up English army in armed combat and to give up her life fighting for her rights, became a source of inspiration for generations of Indians in their fight for independence

(Khoob Ladi Mardani Woh To Jhansi Wali Rani Thi..)


खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी...
"झाँसी की रानी"

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
 
द्वारा : सुभद्रा कुमारी चौहान

School poems that I can't forget

Shakti aur Kshama (Strength and Mercy)

Poet: Ramdhari Singh "Dinkar"

Kshama, daya, tap, tyaag, manobal
Sabka liya sahara
Par nar vyagh Suyodhan tumse
Kaho kahan kab haara?

Kshamasheel ho rrpu-saksham
Tum huye vineet jitna hi
Dusht Kauravon ne tumko
Kaayar samjha utna hi

Atyachar sahan karne ka
Kufal yahi hota hai
Paurush ka aatank manuj
Komal hokar khota hai

Kshama shobhti us bhujang ko
Jiske paas garal hai
Uska kya jo dantheen
Vishrahit vineet saral hai

Teen divas tak panth mangte
Raghupati sindhu kinare
Baithey padhtey rahey chhand
Anunay ke pyaare pyaare

Uttar mein jab ek naad bhi
Utha nahi saagar se
Uthi adheer dhadhak paurush ki
Aag raam ke shar se

Sindhu deh dhar trahi-trahi
Karta aa gira sharan mein
Charan pooj daasta grrhan ki
Bandha moodh bandhan mein

Sach poochho to shar mein hi
Basti hai deepti vinay ki
Sandhivachan sampoojya usika
Jisme shakti vijay ki

Sahansheelta, kshama, daya ko
Tabhi poojta jag hai
Bal ka darp chamakta uskey
Peechhey jab jagmag hai
Translation: The Maverick

Mercy, resolve, tact, tolerance
You've tried everything and some
But o my king of men
When did Suyodhan succumb?

The more forgiving you were
In your humane compassion
The more these rouge Kauravas
Pegged you as cowardly ashen

This is the consequence
Of tolerating atrocities
The awe of machismo is lost
When one's gentle n kindly

Forgiveness is becoming of
The serpent that's got venom
None cares for the toothless,
Poisonless, kind, gentle one

For three days Lord Raam kept
Asking the ocean for a passage
Sitting there he petitioned
Using the sweetest words to engage

When in response there was
Not a whisper from the sea
A raging fire of endeavor
Rose from Raam's body

The ocean took human-form
'N supplicated to Raam
Touched his feet, was subservient
A slave he had become

Truth be told, it's in the quiver
That lies the gleam of modesty
Only his peace-talk is reputable
Who is capable of victory

Tolerance, forgiveness and clemency
Are respected by the world
Only when the glow of strength
From behind it is unfurled

                                                  कविवर : श्री रामधारी सिंह जी "दिनकर"

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो कहाँ कब हारा?

क्षमाशील हो ॠपु-सक्षम
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल है
उसका क्या जो दंतहीन
विषरहित विनीत सरल है

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिंधु किनारे
बैठे पढते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे प्यारे

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नही सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से

सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता गृहण की
बंधा मूढ़ बन्धन में

सच पूछो तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
संधिवचन सम्पूज्य उसीका
जिसमे शक्ति विजय की

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है  
***********************************************
श्रीकांत तिवारी , लोहरदगा.  
२७,मार्च`२०११

Thursday, March 3, 2011

CRIME FICTION

सिडनी शेल्डन की किताबें पुरानी शराब के जैसी हैं,  जो जितना पुराना होता जायेगा, मजेदार होता जायेगा !
 इनसे भरपूर मनोरंजन की गारंटी है. ससुरा कभी-कभी थोड़ा बहक जाता है और "...inside her ..." 'थोड़ा '  फैला कर लिख देता है!! बाकी  कहानी खूब मजेदार और सस्पेंस भरा लगता है जो सिडनी की हरेक किताब का आकर्षण है. सिडनी की किताबों में तीन ख़ास ingradients निश्चयात्मक रूप से शामिल मिलते हैं वो हैं ; glamour , inirtigue और sex !!!
आज सिडनी शेलडन जीवित नहीं हैं, लेकिन उनकी कृति जिंदा है. 
" IF TOMORROW COMES " _मुझे ख़ास पसंद है. 

श्रीकांत 







Monday, February 28, 2011

२४, नवम्बर'२०१० से ०३, मार्च'२०११ तक

२४, नवम्बर'२०१० से ०३, मार्च'२०११ तक 
 ...वीणा का हाथ ठीक नहीं हुआ है...

Thursday, December 16, 2010

सोनी की तलाश !!! # 01

आखिरकार वो शुभ घडी आई और मेरे सौरभ की शादी ०८/ दिसम्बर/२०१० को अमृता(सोनी) के साथ संपन्न हो गई.

     सौरभ के लिए उसके परिवार और उसके खुद के मन-माफिक लड़की की तलाश की कहानी कम दिलचस्प नहीं है ! मेरे बड़े जीजाजी (श्री शम्भुनाथ ओझा) और मेरी दीदी इस विषय में काफी चिंतित और उद्विग्न रहते थे. उनके बड़े बेटे, मेरे बड़े भांजे सुशील की शादी डेढ़ साल पहले मेरी पत्नी के एक रिश्तेदार की बेटी कंचन (जो रिश्ते में मेरी साली लगती है) से हमहीं-दोनों ने तय करवाया था. जीजाजी के अपने प्रयास अब काम नहीं आ रहे थे, उन्होंने समाचार-पत्रों के वैवाहिक कोलुम्न्स में "add " भी दिए लेकिन जबाबों से उनकी तसल्ली नहीं हुई. उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी से भी किसी लड़की का पता लगाने को कह रखा था. लेकिन इस मामले में हमारी कोई विशेषता नहीं है, और अनुभव तो है ही नहीं ! अत: मैंने वीणा (मेरी पत्नी) से कहा भी था की यूँ लोहरदगा में बैठे-बैठे हम उनकी पसंद और जरुरत को माफिक आने वाली लड़की का कैसे पता लगायें ? फिर पिछली शादी (सुशील की) तो एक संयोग था, इश्वर की मर्जी थी जिसमे हम निमित्त-मात्र बन गए थे. आगे कहीं ऐसा न हो क़ि हम जोश खा कर अपनी सुख-शान्ति बर्बाद कर लें ! अगर हमारे प्रयास से कोई दूसरी लड़की मिल भी गई और उनके उम्मीदों पर खरी ना उतरी तो बे-फ़ालतू में हमें ना-जायज़ उलाहने सुनने पड़ेंगे, सो हमें शांत ही रहना चाहिये. लेकिन दुःख की घडी में जब हम जीजाजी के यहाँ गए थे तब मेरी भांजी शिल्पी ने बिलखते हुए मुझसे कहा था कि "_मामा कुछ भी कर के भैया (सुशील) के शादी करवा द ना तअ ई लोग (दीदी-जीजाजी) ना बच्बथुं !" मुझे शिल्पी का वो क्रंदन आज भी जब याद आता है मैं सिहर-सिहर उठता हूँ, ..फिर मेरे मन में ये ख्वाहिश और -और प्रबल होती चली गई कि मैं इस मामले में जीजाजी के परिवार का पूरा साथ दूंगा. और आखिरकार सुशील कि शादी कंचन के साथ संपन्न हुई.
     सुशील की शादी के कुछ ही महीनो बाद कंचन के मायके से सौरभ के लिए रिश्ता आया, जिसे जीजाजी ने जांचा-परखा तो वो उनकी उम्मीदों के मुताबिक न लगा. लेकिन रिश्तेदार के भरोसे और fake_computer _manufactured _Photograph के झांसे में आ गए और छेका करने की पूरी तैयारी के साथ लड़की वालों के यहाँ जाने की गंभीर गलती कर बैठे, अत: "...बाद में सोच-विचार कर जवाब देंगे", ऐसा कहने पर लड़की वाले क्रोधित और आक्रामक हो कर उदंडता पर उतर आए, और अनेक प्रकार से इन्हें धमकाने लगे कि छेका कर के ही जाना होगा!!! ...अन्तत: छेका नहीं होना था सो नहीं हुआ और दीदी-जीजाजी किसी तरह वहां से बच कर वापस आ गए. लेकिन काफी दिनों तक उन लड़की वालों के फ़ोन धमकाने वाले अंदाज़ में आते रहे और जीजाजी और उनका परिवार त्रस्त और आशंकित रहा. आखिरकार काफी दिनों बाद हमें इन बातों की जानकारी मिली तो मैंने अपना सर पीट लिया. ...हाय रे खोटी अक्कल !!! किसी ऐसे को साथ ले जाना था जो सही तरीके से बातचीत कर सकता ! ...लेकिन, ...ओह!! ...इसके बाद ही मैंने सौरभ की शादी के बारे में गंभीरता से ही नहीं बल्कि दृढ़ता से सोचना शुरू किया.

     ...सौरभ के लिए हम-दोनों की भी पूरी इच्छा थी, दिल से ये तमन्ना थी कि उसके लिए उसकी मन-माफिक दुल्हन, दीदी-जीजाजी के लिए 'उनके' मन-माफिक छोटी बहु, तथा सुशील-कंचन के साथ तालमेल निभा सकने वाली लड़की मिले. ...पर ...कहाँ लोहरदगा...! ...और कहाँ मुजफ्फरपुर...! ...और अपने सभी नजदीकी रिश्तेदारों से दूर _हम !! ...जिन्हें इन बातों का कोई अनुभव नहीं. हम तो ऐसा कुछ भी नहीं जानते जो उनके ख़ास काम आ सके. ...यूँ ही समय बीतता गया. 

     मेरे बेटे जिम्मी के इंजीनियरिंग में select हो जाने और admission वगैरह का लोन पास हो जाने के बाद मैंने अपने लोहरदगा डेरे पर "भगवान सत्यनारायण" की कथा का आयोजन किया था. जिसकी पूजा का प्रसाद ग्रहण करने के लिए आमंत्रित मेहमानों में श्री लखपति साहू जी (मास्टर साहेब) भी शाम में हमारे यहाँ आये थे. बातों-बातों में ही मैंने उनसे विस्तार से श्री शम्भू जीजाजी के घर-परिवार और सौरभ के लिए दुल्हन की तलाश की बात कही, और उनसे कहा कि वो हमारे घर-परिवार और हमारे परवारिक परिवेश को खूब अच्छी तरह से जानते हैं, सो अपने जानकारी के दायरे में सौरभ के लिए उपयुक्त लड़की का पता लगा कर मुझे बताएं.

     जीवन की घोर कठिनाईयों को मेरे (शम्भू) जीजाजी के परिवार ने बड़ी बुरी तरह से भुगता है, कुछ इस तरह कि उनके अपने ही लोग "अब" उनकी कोई सहायता नहीं करना चाहते थे. कैसी विडम्बना है कि पीड़ित को ही आतताई समझ कर एक भ्रान्ति का शिकार हो कर अपने पूज्यनीय से ही लोग परहेज करने लगते हैं !!! 

     बहरहाल, श्री लखपति मास्टर साहेब ने मेरी बातें सुनी, और अपनी तरफ से जरुरी सवाल पूछे, जिसका मैंने उन्हें संतोषप्रद जवाब दिया. समझ-बूझ चुकने के तत्काल बाद, तुरंत उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और एक काल लगाईं, पर वांछित उत्तर नहीं मिला. लेकिन मास्टर साहेब ने मुझे बताया कि "एक लड़की है. और वो ...लोहरदगा में ही है !!!" [बगल में छोरा नगर ढिंढोरा !] ...लड़की के बारे में उन्होंने कहा कि वे उसे उसके बचपन से जानते हैं, जो [ जब लखपति मास्टर साहेब हमारे मकान में किराये पे रहते थे तब ] अपने स्कूल के दिनों में (वो) लड़की मास्टर साहेब की बेटी के साथ ही स्कूल जाया करती थी और हमारे मकान में अक्सर आया-जाया करती थी!!! [...मेरी नज़र इस लड़की पर क्यों नहीं पड़ी...!? ] ...फिलहाल आजकल बी. ए. (स्नातक) कर चुकने के बाद "हमारे मकान के निकट कस्तूरबा हाई स्कूल में ही कंप्यूटर ओपेरटर है!" और रोजीना हमारे मकान के सामने से सड़क पर गुजरती है ! [ हे भगवान् ! अर्रे मेरी नजर इस पर अब तक क्यों नहीं पड़ी ...!? ] लखपति मास्टर साहेब ने हमारा भी बचपन देखा है और मुझसे उनका विशेष स्नेह है जो मेरे स्वभाव, व्यक्तित्व, प्रकृति और पसंद-नापसंद को खूब अच्छी तरह से जानते हैं. लड़की के रूप-रंग, शिक्षा-दीक्षा के मामले में मास्टर साहेब ने मुझे जो बतलाया और आश्वासन दिया उससे मैं बहुत ही उत्सुक हो उठा! लखपति मास्टर साहेब ने कहा क़ि ...वो ब्राम्हण तो हैं लेकिन वो हमारी जाती (गौढ़ ब्राम्हण), और गोत्र के हैं या नहीं सो उन्हें मालूम नहीं. मैंने उन्हें सौरभ के बारे में सारी जरुरी जानकारी बतला दी और लड़की को देखने की अपनी (-प्रबल-) इच्छा जताई कि वो कोई जतन कर के unofficially, अनौपचारिक रूप से कहीं भी चाहे उनके अपने (लखपति मास्टर साहेब के) घर पर ही मुझे दिखलाने का प्रबंध करें _    "अगर मुझे पसंद आ गई तो" मैं उसका विवाह अपने भांजे सौरभ से अवश्य ही करवा दूंगा _ ये मैंने उन्हें पक्का आश्वासन दिया. लखपति मास्टर साहेब ने एक सप्ताह का समय माँगा और फिर भगवान "श्रीसत्यनारायणजी" का प्रसाद ग्रहण कर चले गए. इस दौरान जीजाजी की लगातार मुझसे बातें होती थी और वो मुझसे पूरा प्रयास करते रहने को कहते थे, तभी एक बार मैंने उनसे लखपति मास्टर साहेब वाली बात की जानकारी दी जिससे जीजाजी की उम्मीद प्रबल हुई.
 
     इस बीच रूपा [कमल क़ि पत्नी] के बहनोई ने भी एक लड़की का पता "सिंदरी" में लगा कर हमें बतलाया था, जो कि जीजाजी के ही गोत्र की होने कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी, फिर भी  लड़की वाले ये सम्बन्ध करना चाहते थे, लेकिन लड़की देखने, दिखलाने की लड़की के बाप की शर्त थी कि लड़की देखने के बाद "मुझे ही" सारी जिम्मेवारी झेलनी होगी ! ...तौबा ! दुर्र फिटे मूँ !!!
 
     एक सप्ताह के बाद लखपति मास्टर साहेब का मेरे पास फ़ोन आया और उन्होंने उत्साहित हो कर मुझे जानकारी दी कि लड़की वाले गौढ़-ब्राम्हण ही हैं, और उनका गोत्र भी जीजाजी के गोत्र से भिन्न है ! उन्होंने मुझसे सौरभ की एक तस्वीर और बायोडाटा मंगवाने को कहा. मैंने ये बात आगे जीजाजी और सौरभ को उसी शाम फ़ोन द्वारा बतला दिया, सौरभ ने अपनी एक तस्वीर और बायोडाटा डाक से मुझे भेज दिया. जो मुझे मिलते ही मैंने लखपति मास्टर साहेब को तत्काल सूचित किया.
   
     दो दिन बाद मास्टर साहेब का फ़ोन आया कि लड़की के पिता उनके घर बातचीत करने के लिए आये हुए है, सो मैं भी सौरभ की तस्वीर और बायोडाटा ले कर वहीँ आ जाऊं. मैं उस समय अपने ऑफिस (गद्दी) में व्यस्त था अत: मैंने उनसे आग्रह किया कि वो ही लोग मेरे यहाँ (थाना टोली) आने का कष्ट करे. उन्होंने सहमती जताई और मेरे घर पधारे. तब पहली बार मैंने श्री सत्येन्द्र शुक्ला जी (स्कूल टीचर; मास्टर साहेब) को देखा और उनका परिचय पाया. मास्टर साहेब ने अपनी लड़की का नाम "अमृता "[nickname : सोनी] बताया. ये जान कर मुझे ताज्जुब हुआ कि वो (शुक्ला जी) मेरे इसी घर में पहले आ चुके हैं, और मेरे स्व. पूज्य बाबूजी की पुण्य-तिथि पर भजन-कीर्तन में शामिल होकर हारमोनियम बजा चुके हैं ! मेरे इसरार करने पर उन्होंने मुझे अपनी बिटिया की तस्वीर (जिसे वो अपनी motorcycle की डिक्की-बॉक्स में रखे हुए थे) लाकर दिखलाई! ...मैंने स्टूडियो फोटो के flap को खोला और उसमे चिपके लड़की की तस्वीर पर एक-क्षण-वाली "संकोचपूर्ण" नज़र डाली. तस्वीर की एक हलकी झलक में लड़की का मुखड़ा देखते ही मैं (अपनी हडबडाहट को जबरन छिपाते हुए) फोटो के flap को बंद कर उठ खडा हुआ और तुरंत रसोई में वीणा के पास गया और उसे वो तस्वीर दिखाई, वीणा ने तस्वीर को बड़े मनोयोग से देखा और प्रसन्नता से कहा कि "...अच्छी तो है, इस लड़की को देखा जा सकता है."  फिर मैंने माँ को भी वो तस्वीर दिखाई, माँ ने भी प्रभावित हो कर आगे बात करने की इज़ाज़त दी. मैं तस्वीर के साथ वापस अपने मेहमानों के पास आया. मैंने लड़की को देखने की अपनी इच्छा जताई कि वो (शुक्ला जी) मुझे अनौपचारिक तरीके से ही कहीं भी, चाहें तो लखपति मास्टर साहेब के यहाँ ही, लड़की को दिखलाने का कष्ट करें, जिसे उन्होंने बे-हिचक, सहर्ष, (स-शर्त_कि मुझ पर कोई दबाव नहीं आएगा) अनुमति प्रदान की. शुक्ला जी से जब मैंने उनके पारिवारिक-सामाजिक समाचार की जानकारी के लिए पूछा तो उन्होंने बतलाया कि वो "गया" जिले के 'देवकुली' गाँव के रहने वाले हैं, लोहरदगा में वो 'कुजरा' में स्कूल-टीचर हैं, और जिले में पिछले २१-२२ वर्षों से कार्यरत हैं. [...अब तक कहाँ छिपे थे भाई ? हम पहले क्यों न मिले !?] लखपति मास्टर साहेब से वो तभी (शुरू) से वाकिफ हैं. [लखपति मास्टर साहेब की गठरी में अभी और कितना 'माल ' है, पता करना पड़ेगा !] बातचीत में उन्होंने (शुक्ला जी ने) अगला नया रेफेरेंस जो दिया उस से मुझे विश्वास हो गया कि ये सम्बन्ध तय है. उन्होंने मुझे बताया कि मेरे ऑफिस (गद्दी) में मेरे साथ ही कार्यरत श्री मनोज कुमार सिन्हा (मनोज भैया) उन्हीं के गाँव के रहने वाले हैं! और स्कूल के दिनों में वो दोनों एक ही स्कूल में एक कक्षा आगे-पीछे पढ़ते थे !! {वाह !!!}  मनोज भैया से मेरा भाईचारे का शुरू से ही अद्भुत नाता रहा है. स्व. पूज्य बाबूजी भी मनोज भैया को बहुत मानते थे. उसी समय से हमारे में प्रेम, सहयोग और भाईचारा रहा है. हमारे घर की औरतें अब तक कभी भी (संयोगवश) नहीं मिलीं थीं. मनोज भैया का रेफेरेंस पा कर मैंने काफी राहत महसूस किया. मुझे विश्वास था कि मनोज भैया के मार्फ़त मुझे समूची, सच्ची और सम्पूर्ण जानकारी तो मिलेगी ही ये बात भी पुरजोर तरीके स्थापित हो जायेगी कि ये सम्बब्ध करना चाहिए या नहीं! मनोज भैया से बात हो जाने तक का समय मैंने माँगा और अपने मेहमानों को विदा किया.
_श्रीकांत तिवारी. 

जारी ...सोनी की तलाश !!! # 02

Wednesday, November 24, 2010

इस वर्ष का पवन-पर्व "छठ" ! वरदान या श्राप ???

इस वर्ष का पावन-पर्व "छठ" ! वरदान या श्राप ???








 इस पवित्र कतार से वीणा को बाहर करने के पीछे भगवान् की क्या मर्जी है ?
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आखिर क्यों ???
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