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Saturday, May 11, 2013

DECEPTION POINT by DAN DROWN (part 1)

मित्रों! DAN BROWN की इस किताब -"Deception Point'_ की वेवेचना, विश्लेषण, रिव्यु लिखना बहुत ही मुश्किल काम है! क्योंकि यह इन बातों का मोहताज़ नहीं! अत्यंत ही सरलता और बारीकी से लिखी गई यह विलक्षण उपन्यास कम्पलीट विश्लेषण ही है! फिर भी मैंने एक कोशिश की है ... मैंने अब तक जितना लिखा है उसे PART-ONE मानना चाहिए! क्योंकि समस्त उपन्यास की कहानी संक्षेप में कहना मेरे लिए मुश्किल है! जितना लिखा उसे पोस्ट कर रहा हूँ! इस गुजारिश के साथ कि आप इस नोवेल को अवश्य पढ़ें!
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पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव (NORTH POLE) के घातक चुम्बकत्व से थोडा परे आर्कटिक (द्वीप समूह) सर्किल की सैर नहीं। ...पर "राजनीति, कूटनीति, ज्ञान-विज्ञान जनित षड्यंत्र, छल, रहस्य, रोमांच, ...और मौत !!" "आर्कटिक सर्किल" पर तैरते महाकाय "मिल्न (Milne Ice Shelf)" पर कुछ हो रहा है, ...जो रहस्यमय है! 'Milne Ice Shelf'' इतना विशाल और मोटा बर्फ का "तैरता चट्टान" है कि जिसपर आराम से ["बुर्ज़-अल-खलीफा; बुर्ज़-दुबई : the Tallest Skyscraper of the World"] एक Skyscraper खड़ा किया जा सकता है! ...किसी भी सस्पेंस-थ्रिलर उपन्यास का पूरा मजा (सात्विक, शाश्वत आनंद) लेने से पहले यह जरुरी है क़ि किताब (उपन्यास) के पीछे के कवर पर, और किताब के भीतर मूल कहानी प्रारंभ करने से पहले लेखक, प्रकाशक द्वारा उपन्यास की रचना के विषय में दी गई जानकारियों को समझना और उसे आत्मसात करना। यह जानकारी कई बार अत्यंत ही मानीखेज और ज्ञान से परिपूर्ण होतीं हैं! DECEPTION POINT के रचयिता DAN BROWN साहब की सभी किताबों में ऐसी जानकारियां बहुत ही संक्षेप में _'भरपूर' होतीं हैं! DAN BROWN ने DECEPTION POINT में भी ऐसी ही कुछ जानकारी बहुत ही अल्प शब्दों में दीं हैं; जो पाठक को उत्सुकता, उत्कंठा और जिज्ञासा से भर देता है ! : -ACKNOWLEDGEMENT- में धन्यवाद प्रस्तावना में ही इन्होनें कई संकेत छोड़े हैं, जैसे : "...the National Security Archive!" "...NASA-(PRO)!" "...National Security Agency (NSA)!" "...Glaciologist...", "...U.S.Intelligence Policy Documentation Project!" "...Institute of Oceanography!" "...Micron Electronics!" "..National Air and Space Museum!" "...Federation of American Scientist!", "...& inside the novel 'Cutting-Age-Spy-Technology....!"

AUTHOR'S NOTE : The Delta Force, the National Reconnaissance Office (NRO), and the Space Frontier Foundation (SFF) are real organizations. All technologies described in this novel exist.
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"If this discovery is confirmed, it will surely be one of the most stunning insights into our universe that science has ever uncovered. Its implications are as far-reaching and awe-inspiring as can be imagined. Even as it promises still others even more fundamental." __President Bill Clinton, in a press conference following a discovery known as ALH84001 __on August 7, 1996 _ये किताब में भी छापी गई है! और इस -ALH84001- डिस्कवरी का इस कहानी में गहरा दख्ल है!
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कहानी शरू : PROLOGUE _ उत्तर दिशा में ईतनी दूर!!! ...बर्फीले बियावान में मौत अनगिनत रूपों में आ सकती है, लेकिन उस तरह नहीं जैसे जियोलोजिस्ट (Geologist) Charls Brophy को आई! उसके Sled को खींचने वाले कुत्ते रूककर आसमान को देखते हैं! Twin-rotor transport helicopter बर्फ के कंकडों को उड़ाता हुआ लैंड करता है जिसमे से सफ़ेद वेदर-सूट से पूरी तरह ढके दो 'आर्म्ड' आदमी उतरते हैं, और चार्ल्स ब्रोफी को उसके नाम से पुकारते हैं और उसे अपना "रेडियो" निकलने का आदेश देते हैं! इस तरह के रेडियो द्वारा 'रेडियो-सिग्नल्स' और संदेसे भेजे भी जा सकते हैं! वे लोग ब्रोफी को गन-पॉइंट पर आर्डर देते हैं कि "Take out your radio please." _"I am sorry?" _"just do it." ...Bewildered, Brophy pulled his radio from his parka. "We need you to transmit an emergency communique. Decrease your frequency to one hundred kilohertz." "ONE HUNDRED KILOHERTZ?" Brophy felt utterly lost. ("...Nobody can receive anything that law." Brophy thought.) _लेकिन जान की धमकी से आखिरकार वो उनलोगों की बातों को मानकर वह सब कुछ करता है जो वे चाहते थे! "Transmit this message now." एक आदमी उसे एक कागज़ थमाता है, और उसपर अंकित सन्देश प्रसारित करने को कहता है, जिसकी इबारत पढ़कर ब्रोफी कुछ समझ नहीं पाता :"I don't understand. This information is incorrect. I didn't__" ...पर जबरन उसके द्वारा वह रहस्यमय सन्देश प्रसारित करवाया जाता है! ...फिर हैलीकॉप्टर उन्हें लेकर उड़ता है और 4000 फुट की ऊँचाई से ब्रोफी को उसके Sled, कुत्तों और सभी साजो-सामान सहित मौत की गहराईयोँ में फेंक दिया जाता है....!
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Rachel Sexton अपने पिता Senator Sedgwick Sexton से पूर्वनिर्धारित मुलाक़ात के लिए वाशिंगटन के एक मशहूर रेस्तरां में आती है! Senator Sedgwick Sexton अति-अतैव-महत्वाकान्छी व्यक्ति हैं, जो नेक्स्ट USA प्रेसिडेंशियल इलेक्शन के सबसे बड़े, सबसे आगे, सबसे लोकप्रिय हस्ती, एवं नामज़द उमीदवार हैं! Most Powerful Political Animal! और इन्हें इस बात का भान ही नहीं, गुमान भी है! रशेल सेक्सटन को यह पूरा-पूरा अहसास है कि 'पिताजी' का नाश्ते के लिए निमंत्रण बे-मकसद नहीं है! पिता-पुत्री के बीच वार्तालाप से स्पष्ट होता है कि उनके बीच वैचारिक मतभेद ही नहीं रिश्ते तल्ख़ भी है। सिनेटर सेजविक सेक्सटन अपनी बेटी से चाहते हैं कि वह उनके लिए, उनके पक्ष में काम करे न कि मौजूदा राष्ट्रपति के। क्योंकि रशेल एक सरकारी नौकरी करती है जो Intelligence विभाग, विभिन्न तरीकों से वर्तमान राष्ट्रपति का ही है, अतः सिनेटर सेजविक सेक्सटन के Campaign के लिए यह बुरा है और वह इसके लिए अपनी बेटी को मनाना चाहता है। जबकि हक़ीक़तन एक साधारण कर्मचारी महिला के नाते Rachel Sexton को सिर्फ अपने काम से मतलब है और वो न व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति को जानती है, और न ही कभी उनसे मिली है। ...पिता-पुत्री की बहस के बीच एक रिपोर्टर आकर सिनेटर से इंटरव्यू लेने लगता है, सिनेटर उसे खुश करने के लिए जबरन मुस्कुराते हुए इंटरव्यू देने लगते हैं! ...तभी रशेल का पेज़र बजता है, ...15 मिनट में उसे एक ख़ास सन्देश मिलेगा! ...प्रेस रिपोर्टर पिता-पुत्री के तल्ख़ संबंधों पर कुछ चर्चा कर प्रश्न पूछता है, जिसका खुशनुमा (झूठा) पहलू सिनेटर पेश कर रिपोर्टर को खुश और बेटी को नाखुश करते हैं! ...तभी रशेल का बीपर इनकमिंग मेसेज का सिग्नल देता है, रशेल मेसेज पढ़ती है : " -RPRT DIRNRO STAT- " रशेल तत्काल मेसेज समझ जाती है। लेकिन यह अप्रत्याशित था! और बुरा था! रशेल जल्दीबाजी में क्षमा याचना के साथ वहां से निकल जाती है! उसके जाने के क्रम में रिपोर्टर उसे टोक कर पूछता है कि :"क्या यह सच है कि वह नौकरी छोड़कर अपने पिता के हक में उनके Campaign में हिस्सा ले रही है, -जिसकी घोषणा के लिए ही- यह मीटिंग थी?" रशेल काफी चकित और नाराज होती है, वह रिपोर्टर को बढियां डांट पिलाती है और पिताश्री के साथ एक बिगडैल बहस कर निकल जाती है!
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यह DAN BROWN के खुद के शब्द हैं: क्योंकि इसकी विवेचना मेरे लिए संभव नहीं, क्योंकि निम्नलिखित किसी विवेचना, विश्लेषण या समीक्षा का कतई मोहताज़ नहीं!.... कृपया पढ़िए :
The three men sat in silence inside their ThermaTech storm tent. Outside, an icy wind buffeted the shelter, threatening to tear it from its moorings. None of the men took notice; each had seen situations far more threatening than this one.     their tent was stark white, pitched in a shallow depression, out of sight. Their communication devices, transport, and weapons were all state-of-the-art. The group leader was code-named Delta-One. He was muscular and lithe with eyes as desolate as the topography on which he was stationed.     The military chronograph on Delta-One's wrist emitted a sharp beep. The sound coincided in perfect unison with beeps emitted from the chronographs worn by the other two men.     Another thirty minutes had passed.     It was time. Again.     Reflexively, Delta-One left his two partners and stepped outside into the darkness and pounding wind. He scanned moonlit horizon with infrared binoculars, As always, he focused on the structure. It was 1000 meters away - an enormous and unlikely edifice rising from the barren terrain. He and his team had been watching it for ten days now, since its construction. Delta-One had no doubt that the information inside would change the world. Lives already had been lost to protect it.     At the moment, everything looked quiet outside the structure.     The true test, however, was what happening inside.     Delta-One reentered the tent and addressed his two fellow soldiers. "Time for a flyby."     Both men nodded. The taller of them, Delta-Two, opened a laptop computer and turned it on. Positioning himself in front of the screen, Delta-Two placed his hand on a mechanical joystick and gave it a short jerk. A thousand meters away, hidden deep within the building; a surveillance robot the size of a mosquito received his transmission and sprang to life.
 {_का पढ़ीन भईया!? मच्छर जितना बड़ा रोबोट! the micro-robot is capable & enable enough to fly, broadcast and transmit both audio and visuals LIVE in satisfactory resolution ! इसे विडियो गेम के खेल की तरह समझें! [हालांकि यह इतना आसन नहीं है!] आपके हाथ में Joystick है, आप उसे हाथ से पकडिये और स्क्रीन को देखते हुए दसों-दिशाओं में घुमाइये "वह मच्छर" आपके मनःस्थिति, और आदेश के मुताबिक उड़ेगा, आपके हाथ की एक्सपर्ट जुम्बिश से वो आपके पास लौट भी आएगा! उसके द्वारा प्रसारित हरेक Audio/Video को (टेप)रिकार्ड भी किया जा सकता है! मच्छर-नुमा यह '-माईक्रोबोट-' तेज़-धीमे किसी भी गति से उड़ सकता है, हवा में still खड़ा/झूलता हुआ ही सभी प्रसारण जारी रख सकता है! आपको यह भी बता दूं की इसे उर्जा कैसे मिलती है : "सूर्य की किरणों से" या simply किसी भी बल्ब की तेज़ रौशनी से ! यह Recharge होने के लिए अपने wings फैला लेता है! ..फिर भी यह एक मच्छर जितना ही है! और इसकी तेज़ गति की उड़ान के मध्य, भूल से यदि आपकी आँख आ गई तो _ फोड़कर घुस जायेगा !! इसके और भी कई कारनामें इस उपन्यास में आप पढेंगें! अब आप बताइये यह कहानी सुन कर ख़ुशी और रोमांच से किलकारियां मारते बच्चे खिल उठेंगे कि नहीं!? _पर इसका इस्तेमाल कितना घातक किया गया है वह DAN BROWN की इस नायब किताब में पढ़िए। _श्री .}
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 इधर ...रशेल सेक्सटन...संसार में इकलौते रिश्तेदार अपने पिता के व्यवहार से नाराज़, अतीत की कुछ कड़वीं यादों में विचारमग्न अपने ऑफिस की ओर कार से जा रही है कि उसका पेज़र फिर बोल पड़ता है। वही मेसेज! " -RPRT DIRNRO STAT- " फिर से! -'Report to the director of NRO stat'-. I'm coming, for God's sake! रशेल कार और थोडा तेज़ चलने लगती है! रोजीना की कभी न चूकने वाली, रूटीनी, बहुत ही उच्चस्तरीय जांच-क्रम से गुजरते कार सहित वह अपने कार्यालय on outside D.C. in Fairfax, Virginia. की ईमारत में दाखिल होती है! इस अत्याधुनिक इमारत के आकार-प्रकार और विशेषता विलक्षण हैं! रशेल अपनी कार वहां पार्क करती है जहाँ ग्रेनाईट पत्थर पर अक्षर : NATIONAL RECONNAISSANCE OFFICE (NRO) उकेरे गए हैं! अपने मेसेज के जबाब में अपने ही ऑफिस में हर दिन की भाँति दाखिले में रशेल को कई प्रकार के निहायत आवश्यक सुरक्षा-जांच से गुजरना पड़ता है; इस परिसर में अपने मुकाम तक जब आप पहुंचेंगे तो चंद मिनटों में ही आपका DNA Test तक कन्फ़र्म कर कंप्यूटर और सुरक्षा गार्ड आपको आगे जाने का मार्ग क्लियर कर देंगे! ! NRO और इसकी विशद "सुरक्षा-जांच" की चर्चा और गुणवत्ता किताब में पढ़ें! आखिरकार वह वहां पहुँच ही रही होती है कि तीसरी बार उसका पेज़र बजता है!!! ...फिर वह वहां पहुँचती है जहाँ उसका इन्तजार हो रहा था! रशेल NRO के एक ऐसे पोस्ट पर काम करती है जिसके बारे सिर्फ मैं सिर्फ इतना ही बतलाऊंगा कि "प्रेसिडेंट ऑफ़ दी यूनाइटेड स्टेट" रशेल द्वारा फिल्टर्ड ब्रिफिंग्स के अनुसार ही अपने रोजमर्रा के भाषणों या OVAL OFFICE में अपना काम विश्वशनीय ढंग से (चैन से) करते हैं!
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NRO के डायरेक्टर Williaam Pickring (A Brilliant Strategist)  जो प्रेसिडेंट को किसी भी वक़त सोये से जगाकर भी बात करने के लिए अधिकृत था, से रशेल की मुलाकात होती है! चिंतित, विलियम पिकेरिंग तत्काल मुद्दे पर आता है! पिकेरिंग बतलाता है कि 'प्रेसिडेन्ट ऑफ़ दी यूनाइटेड स्टेट', रशेल से -अभी -तुरंत -इसी वक़्त -तत्काल -तत्क्षण मिलना चाहते हैं! जिसके लिए वाइट-हाउस का "बेहद अत्याधुनिक तकनीक वाला" सैनिक हैलीकॉप्टर बाहर लॉन में उसी के इन्तेजार में खड़ा है, पंखा डोला रहा है! [चिंतित की चिंता यह कि रशेल विरोधी पक्ष के नेता की बेटी है; अतः राजनीति की कुछ बातें होतीं हैं! पिकेरिंग रशेल को सावधान करता है कि संभव है राष्ट्रपति, रशेल को उसके बाप के खिलाफ प्यादे की तरह इस्तेमाल करे, सो, एकदम मना कर देना है, लेकिन रशेल सोचती उल्टा है! ...अतः सलाह है :"meet with him, Commit nothing." _समय नहीं है, ...कुछ न समझ में आने वाले हालात में रशेल को कोई साफ़ जबाब तक नहीं मिलता कि आखिरकार प्रेसिडेंट रशेल से इस तरह "क्यों" मिलना चाहते हैं!? ...हैलीकॉप्टर रशेल को ले उड़ता है।
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Delta Force Team अपने नए खिलौने (घातक शास्त्र The Ultimate surveillance tool) से खतरनाक खेल रहा है! 'Micro Electro Mechanical Systems (MEMS) -microbote- were the newest tool in high-tech surveillance - fly on the wall technology', They called it.(बीच में मेरी बात : फिल्म 3idiots में हमने इसकी संभावना देखि हुई है। लेकिन यह मन बहलाने के लिए अच्छा है, जिस "माइक्रोबोट" की चर्चा और इस्तेमाल इस नोवेल में है उसकी असीम संभावनाएं,खरी उम्मीदें, और उपयोग/दुरुपयोग हैं! यह माइक्रोबोट 'स्वीमर' भी है! both flying & swimming models, the swimmers - "nano-subs" the size of salt grains! The flying -microbots- designed by NASA!) व्यापक ज्ञान के लिए यह किताब पढ़ें! B.Tech के छात्रों के लिए शानदार entertaining study material! The PH2 model Delta-Two was currently flying was only one centimeter long - the size of a mosquito -...! इस तकनीक का व्यापक खुलासा मज़ा भी है और रोमांचक भी! डेल्टा फ़ोर्स के ये तीन सदस्य अपने मशीनी मच्छर के माध्यम से रहस्यमयी -पाराबोलिक _-"ईमारत !"-_ के भीतर वैज्ञानिकों का वार्तालाप सुन रहे हैं, देख रहे हैं! वैज्ञानिक बतिया रहे है :"....मुझे तो अब भी यकीन नहीं होता!"  ".... कभी तुमने सोचा था कि ऐसी ...के तुम गवाह भी बनोगे?" ...". "..Never !" डेल्टा-टू अपने एक सप्ताह से एक्टिव 'मच्छर को वापस उसके छिपने के स्थान पर लैंड करा देता है! बगल में एक Electric जेनेरेटर चल रहा है! The PH2 power cells immediately began recharging for next mission.
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रशेल को लेकर PaveHawk हैलीकॉप्टर विष्मयात्मक ढंग से --वाइट हाउस -- के बदले एक अनजान एयरबेस [WALLOPS ISLAND] पर पहुँचती है! ...जहाँ PRESIDENT OF THE UNITED STATE का मशहूर और दुनिया का सबसे ज्यादा सुरक्षित अत्याधुनिक तकनीकों की बेमिसाल -'मिसाल,' और STAR-WARS के लिए भी सक्षम (VC-25-A) Boeing 747-200B series aircraft, -"AIR FORCE ONE"-खड़ा है! यह हवाईजहाज़, राष्ट्रपति का 'उड़ता-फिरता और खड़ा -वाइट हाउस / ओवल ऑफिस Most Powerful Political Office of the World है ! इस प्लेन की कई अनसुनी, कई अनजानी चकित कर देने वाली खासुसियतों को जानने के लिए किताब पढ़िए! कई सुरक्षा जांच के बाद आश्चर्यचकित रशेल PLANE में दाखिल होती है! जहाँ उसकी मुलाकात राष्ट्रपति Zachary Herney से होती है! जहाँ कोई अवांछित राजनीती नहीं होती! राष्ट्रपति के आर्डर पर रशेल को कहीं जाना है .....जहाँ उसकी, उसके गुणों की आवश्यकता है और मामला MATTER OF NATIONAL SECURITY का है!
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NASA के कई महत्वपूर्ण अभियानों की असफलता के कारण वह विवादों में है और विपक्ष चाहता है कि NASA के बजट को कंट्रोल किया जाय, घटाया जाय या पब्लिक सेक्टर्स के हवाले कर दिया जाय! निःसंदेह रशेल के पिता के हाथ यह बड़ा मुद्दा लग गया है जिसे वह हाथ से निकलने नहीं देना चाहता कि वर्तमान राष्ट्रपति के NASA प्रति नम्र रवैया और ओवर-बजट के कारण राष्ट्र को गंभीर आर्थिक क्षति, और बदनामी हुई है, फिर भी राष्ट्रपति NASA को कंट्रोल नहीं कर रहे हैं, जो रशेल के पिता के लिए घर बैठे एक बड़ा मौका हाथ लग गया है कि वह राष्ट्रपति को बदनाम कर सके। सिनेटर सेजविक सेक्सटन की 24-वर्षीय, विश्वशनीय BLACK सेक्रेटरी Gabriell Ashe (Looks like Halle Berry) a few years ago...& finally seducing her right there in the office!...सिनेटर की हमराज, और सहायक भी है! जो वाइट हाउस के भीतर की कई महत्वपूर्ण जानकारियों को सिनेटर की सेवा में पेश कर चुकी है! NASA के ओवर-बजट के मुद्दे को और हवा देने, और उग्र बनाने के लिए कई संसथान, और कई धन-कुबेर सिनेटर सेजविक सेक्सटन को उसके Campaign में सहायक हैं! फाइनांस करते हैं .....जो दरअसल रिश्वत है! सिनेटर सेजविक सेक्सटन गुप्त रूप से एक पार्किंग एरिया में किसी से गोपनीय मुलाकात करता है, और उनके बीच वार्तालाप और वस्तुओं का आदान-प्रदान किसी की निगाह में है!!
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राष्ट्रपति को पूरा अहसास है कि Space Agency NASA ने कई भूलें कीं हैं (हमारी हेरोइन कल्पना चावला की याद दिलाने वाली एक दुर्घटना का जिक्र पढ़िए!) लेकिन अभी काफी उम्मीदें हैं। AIR FORCE ONE के भीतर राष्ट्रपति के साथ कॉफी पीती रशेल ध्यान से राष्ट्रपति की चिंता सुनती है लेकिन अभी भी उसकी समझ में यह नहीं आया है कि उसे किस उद्देश्य की पूर्ती के लिए बुलाया गया है! राष्ट्रपति रशेल को NASA की एक नयी डिस्कवरी की जानकारी देते हैं! सिर्फ इतना बोलते हैं कि NASA ने एक ऐसी नयी डिस्कवरी की है जो इतिहास बदल देगा!...लेकिन राष्ट्रपति उस डिस्कवरी को सार्वजनिक करने से पहले हर तरह से संतुष्ट होना चाहते हैं! जनता को और दुनियां को इस अद्भुद ख़ोज, एक चौंका देने वाले रहस्य और सदियों पुराने प्रश्न का उत्तर देने वाले इस नायब खोज के विषय में बताने से पहले राष्ट्रपति चाहते है कि "लोकप्रिय गैर-सरकारी वैज्ञानिक और एक्सपर्ट्स" इसकी स्वयं जांचकर पुष्टि करें! लेकिन उससे पहले हर तरह से पूरे तौर पर संतुष्ट हो लें! उनके मुताबिक अन्य चार वैज्ञानिक - four civilian scientists - जो विभिन्न विषयों के जानकार, विशेषज्ञ और सेलेब्रिटी पब्लिक फिगर हैं, जिनकी बात सभी मानेंगे, पहले ही वहां पहुँछे हुए हैं! रशेल को उन्हें ज्वाइन कर उनके टीम में शामिल होना है, जिसकी सूचना NASA के एडमिनिस्ट्रेटर को दी जा चुकी है! आगे की जानकारी NASA के एडमिनिस्ट्रेटर से मिलेगी जो रशेल का इन्तजार कर रहा है! अभी तुरंत रशेल को उससे मिलने और अपनी जिम्मेवारी निभाने जाना है जिसका वक़्त हो चुका है! ...Rachel could only imagine that a discovery of that magnitude would only center on one thing __ the holy grail of NASA __ contact with extraterrestrial life. राष्ट्रपति आज रात ठीक 08:00PM बजे इस खोज के विषय में दुनिया को TV पर अवगत करायेंगे! और सिविलियन वज्ञानिक इस खोज की पुष्टि करेंगे इसके हेतु वे एक लाइव कार्यक्रम प्रसारित करेंगे! ...अतः रशेल को शीघ्रता करनी है! राष्ट्रपति इसके बाद रशेल को good luck विश करके विदा कर देते हैं! रशेल की समझ में अभी भी कई सवाल हैं जिनमे सबसे प्रमुख है कि आखिर उसे करना क्या है? आखिर NASA ने ऐसा क्या खोज निकाला है, जिसका यश और लाभ NASA एवं राष्ट्रपति सहित मानव सभ्यता को भी होने वाला है?? ...AIR FORCE ONE से रशेल नीचे आती है तो एक सैनिक उसे गार्ड करता हुआ एक "हैंगर" की तरफ ले जाता है, और अन्दर जाने का ईशारा कर कहता है कि NASA एडमिनिस्ट्रेटर उसका इन्तजार कर रहे हैं! रशेल यहाँ के बाद अकेली अन्दर जाती है जहाँ अँधेरा है! सहमी हुई रशेल को एक मरीन-कमांडर पाइलट रिसीव करता है जिसके मुताबिक वह उसे एक प्लेन के जरिये NASA एडमिनिस्ट्रेटर तक पहुंचाएगा! "F-14 Tomcat-Jet" प्लेन का आकर, डिजाइन रशेल के लिए तिलास्मिक है! पाइलट के मुताबिक एडमिनिस्ट्रेटर तक पहुँचने में 4-घंटे लगेंगे! ...कहाँ? ....रशेल एक खास थर्मल-सूट और ओक्सिजन-मास्क युक्त हेलमेट पहन कर अपने लगातार चौंकते और धड़कते दिल को काबू में रखे हुए प्लेन में सवार होती है! पायलट के पीछे वाली सीट प् बैठती है! प्लेन तत्काल रशेल को ले उड़ता है! इस प्लेन की उड़ान और तेज़ गति से रशेल को लगता है जैसे क्षण भर में धरती कहीं नीचे चली गई हो! आसमान में प्लेन ठहर जाता है ...रशेल सोच रही है कि अभी अपने पिता के साथ कॉफी पी रही थी और अब एक अजीबोगरीब प्लेन में सवार किसी अनजान मंजिल पर अनजान मिशन पर जा रही है,...पायलट को 'अब-अभी' उसके गंतव्य की जानकारी मिलती है! वह रशेल को बतलाता है की उन्हें उत्तर दिशा में 3000-Miles जाना है! ...और उत्तर दिशा की ओर प्लेन का मुंह कर प्लेन को गति दे देता है! इस गति की कल्पना भी किसी के लिए आसन नहीं। प्लेन NORTH POLE के लिए उड़ चूका है!
......फिर क्या होता है?
यदि जानना चाहें तो मुझे आज्ञा दें अथवा किताब खरीदकर पढ़ लें!
सधन्यवाद,
_श्री .







































































































































































































































































Stat - from the Latin statim, is a medical term meaning "immediately" or, in more recent history, someone has come up with the acronym: Sooner Than Already There. Example: "Hand me the scalpel Sooner Than Already There." At an even higher level of urgency, medical orders in life-threatening situations are sometimes denoted "stat and now".

Source(s):


Tuesday, May 7, 2013

एक बालक की बाल कथा :

पेश है! फ्रेश है!
इस साल जनवरी के पहले सप्ताह में मैंने मुंडन करवाया था (क्यों?_वो छोडिये!)। मैं नए उगने वाले बालों के बारे में तरह-तरह के विचारों से जूझ रहा था। घर से बाहर निकलने में लाज आती थी! '...ऊंहूं..बेई, कोई देखतई तो का बोलतई ..!' गनीमत यह थी की सीजन जाड़े का था, जिसमें टोपी के इस्तेमाल से लाज-लगाने वाली बात को छिपाया जा सकता था। फ़ौरन उनी टोपी ने मेरे कंटीले चाँद पर अपना मुकाम बना लिया, और शक्ल को एक समझौता के लायक फ्रेम प्रदान किया! बाबूजी हमेशा कहा करते थे कि :'..बबुआ के ललाट बड़ी ऊँच बा!' अभी देखते तो यही कहते कि '...अंतहीन बा!!' ...अबकी बार लम्बे बाल रखने का खूब मन है। सच्ची!! अनुपम सिन्हा सर के जैसा! सो बाल शीघ्र उगाने वाले कई नुस्खों पर गौर फरमाया गया। कोई नहीं जंचा। अतः राम-कृष्ण-अल्लाह-वाहेगुरु-जीजस का नाम लेकर माँ प्रकृति के हवाले इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया गया। और मूँछ उगाने की ठान ली! शकल पर कहीं तो बाल दिखाना चाहिए कि नहीं? सो मूंछ उगाई गई! औए अतीत को याद करने लगे जैसे इम्तिहान से पहले सबक याद किया करते थे,.....

"...सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था!"_देव आनंद की हेयर स्टाइल की क्या बात! वैसे ही "काकुल" तो बाबूजी भी बनाया करते थे! "...अरे हो ! जिया ओ जिया कुछ बोल दो !!!" कुछ दिनों बाद मैंने बाबूजी के बाल देखे तो भौंचक्का रह गया! बाबूजी अशोक कुमार दिख रहे थे और गुनगुना रहे थे :"...चल-चल रे नौजवान!" नया दौर में दिलीप साहब के बाल देखे थे न, कैसे बिना हिलाये भी उनकी भहों तक उनके 'ललाट' को अपनी सुरक्षा में रखते थे! तिलक लगाने के लिए जिन्हें कंघी से वापस ऊपर समेटना पड़ जाता था! ...जब तांगा हांकते थे तो कैसे इठलाते उड़ते थे! ...उनकी तारीफ़ में बैजयंती माला ने कितने अनुराग से गीत गाये थे! .'...उड़े जब-जब जुल्फें तेरी,...कवांरियों का दिल मचले जिंद -मेरिये !.और दिलीप साहब के बाल हवा में कैसे उड़-उड़कर इस तारीफ़ को कुबूल कर रहे थे! ..और दिलीप साहब के चेहरे का नूर! वाह! ..और उनके हँसते हुए खुले मुँह को एक शानदार फ्रेम प्रदान कर रहे थे!! "ओ..ओह:!!"  "..और फिर अमिताभ बच्चन की हेयर स्टाइल का कौन दीवाना नहीं भला !? "उनको भगवद्कृपा से क्या नहीं प्राप्त है!!!" _जिसमे से अगर बालों को हटा दिया जाय तो... सोचकर ही डर लगता है!! ...याद है न वह ज़माना, ..जब आईने के सामने खड़े होकर नाकाफी बाल को भी काफी बनाने की ज़द्दोज़हद में स्कूल में रोजीना लेट पंहुचते थे, ...और मा'-साब भर-मुट्ठी 'झोंटा' पकड़कर झंकझोरते थे! ...वाह! वो भी क्या दिन थे! "45-इंच" मोहरी वाली बेलबौटम जिसने नहीं पहनी वह क्या खाकर अमिताभ या धर्मेन्द्र बनेगा!! घर से निकलने से पहले आईने में खुद को निहार कर बाल को कंघी से संवारना लाजिमी होता था! ...बड़ी झुंझलाहट होती थी, ...किसी कोने से भी अमिताभ नहीं दिखाई पड़ते थे! पर दिल कहता _वो रहे, सामने ही तो खड़े हैं !! उन्हें आइनें में ढूँढने के लिए कितनी कोशिशें कीं, कितने पोज़ बनाते हमने, आपने और न जाने न जाने कितनों ने कितने ही समय यूँ ही, प्रयासरत, आईने के सामने बिता दिए हैं! ..एक-आध बार लगता था कि '...अइस्स्स !' ...लेकिन तुरंत वह छवि गायब हो जाती थी, और बाल उड़-मुड़ कर फिर घूंघर बन जाते थे! कभी फोटो खीचाने का अवसर आने को होता था तो उसके लिए बालों को अभी से ही संजोना समेंटना शुरू कर देते थे! स्टूडियो वाला कंघी-पाउडर के लिए जो वक़्त देता था वह सिर्फ बालों को "विजय" की तरह सोंट कर झुकाने में और संतुष्ट होने में हमें ईतना देर लगता था कि स्टूडियो वाला तब तक तीन-चार ग्राहक निपटा लेता था! जब वो थोडा बेचैन होकर आता तो '..बस, और एक मिनट!' की गुजारिश वो खूब समझता था, इसीलिए अपने हाथों से एक मिनट में ही मुझे 'विजय' बना दिया करता था, और फोटो खीचने के लिए मेज पर बैठने को कहता! कई स्टैंडों पर कसी, कई आकार की अल्युमिनियम की (लाउड स्पीकर जैसे शक्ल वाली) लाइटें सेट करता, अन्वाश्यक बत्तियां बुझाता! और स्टैंड वाली सभी लाइट्स को ऑन करता! जिसके 'GLAIR -!' से हमारी आँखें चुंधियाती! जलन सी होती! हम आँखें मींचते! आँखों से आंसू ढलकर गालों के पाउडर को धो देते! स्प्रे से सोंट कर और ड्रायर से सुखाकर और झुका कर सेट की गई महीनों की तपस्या से प्राप्त 'विजय' स्टाइल बाल और मुँह और स्टूडियो वाले द्वारा फिनिशिंग टच दिए बाल का स्टाइल किसी अनजान स्टाइल के शेप में आ जाता! लाइट की गर्मी से सूख कर फिर से घुँघर बनने की धमकी देने लगता! हमारी सारी सोच और सपने मरते हए से प्रतीत होते! फिर भी 'विजय' बने रहने की जिद्द में हम यह सारा टॉर्चर सहते! आंसू भरी आखों को किच्मिचाते खुली रखने की अदम्य साहस 'विजय' होने के जोश को और दुगुना कर देती! हम फिर डट जाते! और 'विजय' की उस शक्ल को याद करते कि वो कब, कहाँ, कैसे, कितना ..सबसे ज्यादा खुबसूरत लगा था! और निश्चय करने से पहले ही स्टूडियो वाला हाथ में अपना ऐतिहासिक पौराणिक कैमरा लेकर हाज़िर होकर कुछ खुद हड़बड़ाता और हमें भी हड़बड़ा देता! हमारे जेहन से 'विजय' गायब हो जाता! हमें "काला-पत्थर वाले चश्मा धारी संजीव कुमार दीखने लगते! मैं भगवन-भगवन कह 'विजय' को याद करता! तभी त्रिपाद पर खड़े कैमरे में से झांकता स्टूडियो वाला हमारे पास आता और हमारे चेहरे को पकड़कर इस तरह हिलाता-डुलाता जैसे हंडिया के ढक्कन की चूड़ी सेट कर रहा हो! फिर वैसे ही हमारे कंधे को टर्न देता, ट्विस्ट देता, दाए-बायं एडजस्ट कर तसल्ली करता 'हाँ! अब "घईलवा " नईं लुढ़कतई!' वो -हिलना मत- की हिदायत देता फुर्ती से वापस कैमरे में से झाँक मुझे देखता और इशारे से सर थोडा और ऊपर, थोडा नीचे करवाता! "स्माइल प्लीज़" बोलता! मैं 'विजय' हूँ ! मुस्काता हूँ! तो सेठ धरमदयाल तेजा की शक्ल दिखी! स्टूडियो वाले ने फाइनली कहा "रेडी...!" 'पसीने ले लथपथ विजय' ने चीखा :"कमीने!!!!!" -_झमाक्क_-!! खीच गई फोटो ! हफ़्तों इन्तजार के बाद जब फोटो मिला तो हमने 'विजय' को देखा! वो -फिर से- 'विजय' नहीं था! मैं नहीं था! कोई नहीं था! पर लगता तो कोई मनुष्य का बच्चा ही था! जिसकी कोई पहचान नहीं थी! पर 'विजय' बने रहने की लत्त्त जैसे खून में घुस गई है! ...ज्यादा दिन भी नहीं बीता था कि फिर सनक गए! और उपाय सोचने लगे!

अब एक ही उपाय था! हजामत बनवायेंगे ही नहीं, कम-से-कम छः महीने तक तो बिलकुल नहीं! केश बढ़ें! बढ़ते जाएँ! और शनैः-शनैः हम उसे 'विजय-शेप' में ढालते जाएँ! और रोजीना सुबह की पहली नमाज़ सुनते ही हम शुरू हो जायेंगे! फिर हेयर ड्रायर तो है ही, गरमा-गरम हवा, हर घुँघर को सीधी कर देगी! ...अगले कुछ ही दिनों बाद स्कूल में खाली पिरियड के बीच जब ग्राउंड पर जाते तो खेलते कम, अपनी 'परछाईं के सर' को ज्यादा घूरते! ;(मन हीं मन मुदित होलकर सोचते)'...हाँ! अखनी अमिताभ दिखलऊ रे, भाय!'  ...तभी किसी ने फिर भर-मुट्ठी बालों को भींचा, पलटकर देखा तो जान सूख गई! हेडमास्टर साहब ने कड़क कर अलंकारिक भाषा व्यवहार का नमूना पेश करते झट एक कैंची जेब से निकली और मुट्ठी भर जकड़े हुए बालों को कुतर कर फेंक दिया!! हम हक्के-बक्के, दुक्के-चौंके-खड़े रह गए!! हैडमास्टर साहब गरजे :"...`~!@#$%^&* इमरजेंसी का टाइम है, इंदिरा जी के हुकम है कि ईस्कूल में लम्बा बाल नइ रखना है, हम बोले थे ना?_फिर काहे रखा रे .*&^#@!" और दो थाप दिए! फिर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ! उनकी नज़र "45-इंची" मोहरी वाली स्कूल-ड्रेस के रंग वाली "बेलबौटम" पर पड़ी, :"...ई बोरा पएँध के ईस्कूल आया है!?और उनकी कैंची ने इस बार बेलबौटम की भी जान निकाल दी! उन्होंने ये किया क्यों की इंदिरा जी ने उन्हें अधिकृत किया था! इस फटी बेलबौटम को पहने हुए चलते वक़्त मर्दानी टांगें जब जांघ तक की झलक झलकातीं थीं तो मारे शर्म के मरने को भी मन नहीं करता था! हेड मास्टर मुझे "सामंत" दीखता! 'विजय' की तरह दांत किटकिटाते, छिपते-छिपाते मेन रोड के बदले पतली गलियों से गुजरते धीमे-धीमे से चलते, अपना बस्ता कनपटी से सटाय, चुपके से घर में घुसे, बस्ता फेंका, एक गमछे से सिर ढके आईने में अमिताभ को देखा ...अमिताभ नहीं थे! न 'विजय' था! न मैं था! ..फिर कोई अजनबी बालक था!! जिसके सर के बालों की हजामत और अजीबोंगीब कतरब्योंत का कौशल देखकर "नउवा" के सम्मान में "तत्काल प्राप्त भाषा व्यवहार ज्ञान" का एक सुन्दर सा नमूना मेरे मुँह से निकला गया! सुन कर त्योरियां चढ़ाए बाबूजी कमरे से निकले और दो चमेंटा लगा दिए! ("...अमिताभ उर्फ़ 'विजय' की यह दुर्दशा!"...एक दिन में चार चमेंटा! उफ़ !) जब उनकी नजरें मेरे बालों पर पड़ी तो वे समझ गये कि 'बबुआ' ने कांग्रेस के इमेजेंसी यज्ञ में अपने बालों की भी आहुति दे दी है! "..अर्रेह !! पैन्टवो के!?"...वे मुझे पैन्ट बदलवा कर उसी वक़्त सैलून में ले गए! ठाकुर को बोले कि तुरंत इसकी अच्छी हजामत करो,.. हम आते हैं! वे लौटे तो उनके इतजार में बैठे, उंघते और सुबक-सुबक कर रोते मेरी नजर उनपर पड़ी और उनकी नजर मुझपर, ...पर वे उपेक्षा से दूसरी तरफ देखने लगे!! मुझे पहचाना ही नहीं! मैं बेंच पर से उठकर सुबकते-सुड़कते उनके पास आ ही रहा था कि उन्होंने ठाकुर से पूछा :"बबुआ केने गइलन?" ठाकुर ने हैरानी से उन्हें देखा, और मेरी ओर इशारा किया! बाबूजी :""..आएँ! ..ई का? हो! एकर "बेल" कहे मूंड दिए?" ठाकुर ने कहा :"कौनो जग्घे नैय हलई 'तवेरे बबा'(तिवारी बाबा), केने से कैचिया लगैतिलई ! एहे लास्ट उपाय रहई!" ...बाबूजी मुझे पुचकारते, अपने (नए) "चाँद" के टुकड़े को सहलाते हुए घर ले आये और हर वह वादा किया जिससे बालक का मन बहल जाय! लेकिन अमिताभ का गुस्सा शांत नहीं हुआ! वह -विजय- बुरी तरह फुनफुनाया हुआ ही रहा ..

...आज भी अमिताभ मीन्स "_विजय_" का गुस्सा वैसे ही भड़का हुआ है! गुस्सा है पर 'विजय' और अमिताभ नहीं,...है तो ये मूँछ वाला जो आईने से मुझे घूरता कोई उदण्ड और जिद्दी, बज्र-बुद्धि, "गर्दभ"-स्वर वाला, ढीठ अहिर दिख रहा है, जिसका तम्बाकू के दुर्गन्ध युक्त मैला गमछा भी धुलने से मना करता है, यानि सच्चा साथी है! अस्तु, चाँद की रौशनी बिखर कर बर्बाद हो रही है!

 _ऐसा क्यों ? आगे पढ़िए ...

....और ..26-जनवरी`2013आते तक इतने बाल उग चुके थे कि अब काँटों की तरह चुभते नहीं थे। हाथ फेरने पर एक मखमली अहसास होता था। लेकिन आईने में प्रत्याशित चेहरा नज़र नहीं आया। मैं रोज़ कल्पना करता कि इस बार बालों के फ्रेम में जड़ी मेरी सूरत कुछ तो गज़ब जरूर ढायेगी ! लेकिन सिरफल (बिल्व फल अर्थात बेल) सिरफल ही दिखता था, जिसपर बरसाती चिकते पड़े दीखते थे, निराशा होती थी, लेकिन आशा नहीं टूटती थी। ...उगेगा...उगेगा ! दिन-हपते-महीने गुजर गये, कंघी जिसे हाथ लगाय महीनें बीत चुके, जनवरी से मई आ गया पर वह तिरस्कृत भिखार की भांति सूख कर अपना लावण्य खो चुका है ! ...तब एक ख़याल मन में आया! चलो थोड़ी दिनों के लिए अमिताभ नहीं, "आमिर" ही सही, मूँछ उगा ली जाय, कहीं तो बाल दिखने ही चाहिए! हाल ही में फिल्म "तलाश" में पहली बार खाखी वर्दीधारी पुलिस इंस्पेक्टर की और उसकी शानदार मूँछ की याद आई और 'चन्देल' के भीतर -CFL- ( C. A. Fail ) रौशन हो गया! ...लेकिन मूँछ की पहली "शो" ही पिट गई! मेरे बेटे ने मुझे मेसेज किया ;'OH1..god11..clear your mustache, nOw! "आमिर तुरन 'धूम' मचने भाग गया! आखिर हमउम्र है! ...लेकिन विजय कहीं न कहीं से अभी भी मुझे आश्वासन दे रहा है! मन ने कहा 'घर की खेती है, दुसरे का क्या जाता है, अपनी सुनो - अपनी करो! तो मूँछ कायम रही! सोचा शादी-व्याह का सीजन है, दो-दो शादियाँ हैं, क्यों न इसी गेटउप में यह शादी-सीजन पार कर दिया जाय! दो सप्ताह में मूँछ के बाल इतने बड़े अरज में बढ़ गए थे कि अब उन्हें शेप-&-साइज़ दिया जा सकता था! कार्यालय का हरेक कर्मचारी साथी अब एक नए विषद राय-विचार में मग्न हो गए! पहले वाली बात एक हपते में ही हवा हो गई! कोई बोलता बोलता रुक गया! कोई दैनिक अभिवादन भूल गया! कोई मुँह फेरकर हंसा! किसी ने मुँह भी नहीं बिचकाया! कोई आँखें फाड़े देखता रहा! कोई सोच में डूबा हुआ! तो कहीं खुसर-फुसर! इस जोरदार धीमे झटके से जब वे उबरे _२-हपतों में बेशुमार राय-विचार मेरे पास जमा हो गए! लेकिन किसी के भी विचार को मैं क्यों मानूं, आखिर मेरी भी तो कोई सोच है, मूँछ मेरी है या उनकी? सबके विचारों को तिलांजलि देकर मोबाईल से नाइ को फोनकर घर आने को कहा! उसने कहा :"ढेरे भीड़ हई भईया अखनी नै आवे पारेंगे! एक-आध घंटा बाद आते हैं! वइसे आप हियें सैलुनवे में आइये ना तुरते काम हो जाएगा!" मैंने कहा :"नहीं भाई, घर पर ही आइये!" और नाइ का इंतजार करने लगा! आखिरकार खूब कलपाकर नाइ आया, तो मैंने उसे एक-दो DVD चलाकर, हीरो के ख़ास पोज़ को still कर दिखलाया! Less than 1-CM मेरी लम्बी बालों को दिखलाकर बोला :"बाल अईसन, ओर मोंछ अईसन होखे के चाहीं!" पुराने जमाने के मशहूर "खिजाब" ने विभिन्न रंगों के "डाइज़"/"मेहंदी" का रूप ले लिया है, मैंने नाइ से बालों और नई-नवेली मूँछ को कलर कर देने को कहा! (आखिर सादी-बियाह के समय हई !). नाइ ने सेवा पूरी की और मुझे आईना देखकर तसल्ली करने को कहा! मैंने आईने में झाँका ...न अमिताभ रुपी विजय, न आमीर, दिलीप साब तो बड़े दूर की बात है, यहाँ तो खुद मैं ही नहीं हूँ! कोई खूंखार शक्ल वाला असामाजिक तत्व खड़ा है .."रंगे हुए मूँछ और नन्हें बालो वाला शेट्टी!!" _क्या ऐसा सचमुच संभव है? है। तभी तो असलियत सामने है! लेकिन मैं तो बढियां आदमी हूँ यार! हे भगवान!.... क्या से क्या हो गया! आदमी यूँ भी कहीं बदलता है भला! फिर मैंने खुद को तसल्ली दी और कई तरह के सवालों के कई तरह के एक्सपलेनेशंस सोचने लगा! डर सिर्फ दो जनों से था! पहले वाइफ से! दुसरे बॉस से!! ...फिर मैंने पुनः अपने को तसल्ली दी '...अभी कोई है कहाँ!' "हम जइयई, भईया?" _नाइ ने टोका। "हाँ ..हाँ! जा!" ..और अपने ख्यालों में फिर खो गया! नाइ ने फिर टोक दिया। "अरे हाँ रे, जाहिन ना !" नाइ हिचकिचाया : "उ.. भ..भईया पइसवा .."  मुझे खेद हुआ, मैंने उसे राजी-ख़ुशी कर विदा कर दिया। उसपर बिगड़ने का क्या मतलब? जो कहा गया उसे उसने किया! करनी तो मेरी थी, जिसे भुगतनी भी मुझे ही होगी! मैं झुंझलाया (:"...आखिर बेल काहे ला मुंडवइले हलियई, कितना अच्छा बाल रहई जिके मुंडवा के अब पछताईत हियई, के जाने ई बरिस में समूचा जमबो करतई की नईं!?)...और मूँछ भी अभी ताज़ा-ताज़ा काला रंगा हुआ भयानक लग रहा है! यूँ जैसे कोई -उपरी जिलों- का कुरता पहने अहिर हो जिसका लाल गमछा, वस्त्र का एक अनिवार्य वस्तु, जिसकी लाठी जैसी ताक़त की पहचान स्थापित है, जो हमेशा उसके कंधे पर या मुण्डे हुए बेल पर शोभायमान रहती है, और सेम-टू -सेम यही वेष-भूषा होती है जो आदमी आईने से मेरी और मेरी आँखों में झाँक रहा है, जो ढिठई से पेश आता हैं, पान-गुटखा-तम्बाकू-खैनी-गांजा-भांग-दारु-सिगरेट-बीड़ी का नित्य सेवन और पालन सनातन धर्म की तरह समझकर करता हैं; जिसकी आँखें हमेशा लाल रहतीं है! जो हर उम्र की महिला को सर्फ एक ही निगाह से देखता है! जो हर भीड़ में आपको धकियाता है! जो हर गाडी में जबरन सीट लूटता है! जो सिनेमा की टिकटों की ब्लैक-मार्केटिंग करता है! जिसके आचार-व्यवहार बोली और मंत्रोच्चार भी में माँ-बहन (वो चाहे उन्हीं की माँ-बहन क्यों न हो !) गाली-गलौज युक्त वाक्य होते हैं जिसके प्रयोग के बिना वो अपना दुखड़ा तक नहीं सुना सकता! जो अब बसें धोने वाला खलासी नहीं है, बस का कंडक्टर नहीं है, बस अड्डे पर बसों के टिकटों की एजेंटी भी अब यह नहीं करता, पेट्रोल पम्प का नोज़ल मैन भी नहीं है, _अब यह हाई-वे पेट्रोल पम्प का मालिक है!! यह नेताजी हैं!! यह नेताजी के ख़ास चमचा हैं! जो नेताजी की लालबत्ती वाली सफ़ेद, कई झंडे फ़ुनगे लगे, एक्स्ट्रा लाइट्स लगी -बोलेरो- में बिना हॉर्न बजाय 'उलटी दिशा से ', वन-वे में दनदनाते फिरते हैं! सोसाइटी के नासूर......!" फिर भी हिम्मत करके उपरी जिलों के सफ़र को निकल गए!

वाइफ से पहले घर के मर्दों और गुंजन से मुलाकात हुई, मैंने आशीर्वाद देने से पहले पूछा :"कैसा लग रहा हूँ? गुंजन :"एकदम झकास!" तभी वाइफ पधारीं :"ई डाकू जइसन मोंछ का जाने काहे ला बढ़ा लिए हैं, छेह!' माँ :"ठीक त लागतआ" मैंने सफाई दी और ढिठाई में ही पनाह ढूंढी :"रे !आखिर सार के बियाह बा!" फिर किसी को मेरी मूँछ से मतलब नहीं रहा! आते वक़्त गाँधी सेतु पर मैंने नयी मूँछ और कुर्ते में फोटो खिंचवाई थी! कैमरा में उन्हें देखने लगा _मुझे वही असभ्य मुस्टंडा, गुंडा मुझे घूरता हुआ दिखा! जो कभी-कभार मस्तकपर लम्बा लाल टीका लगाए औए हाथों में लाल धागे और कड़े भी पहनता है! मैंने कैमरा बंद कर दिया! अब तो किसी तरह यह यज्ञ पूरा हो, घर पहुंचूं फिर ...तभी वाइफ़ ने सवाल शुरू किया :"मोंछ काहे बढ़ा लिए हैं?" जबाब :"मुंडवाने के लिए।" सवाल : मुंडवाना ही था तो बढाए काहे?" जबाब : "मुंडवाने के लिए!"

सफ़र से लौटने के साथ ही यह निर्णय ले लिया गया कि मूँछ की कुर्बानी हर हाल में दी जायेगी! लेकिन ख़ास मौके पर! आप मेरी मूँछ मुंडन संस्कार में सादर आमंत्रित होइएगा!

जाते-जाते कृष्ण चन्दर जी की किताब "एक गधे की आत्म कथा" में शुमार एक शेर शायद यहाँ भी फिट लगे!
 "बनाकर गधों का हम भेस 'ग़ालिब'l"
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैंll"

बेलम !
बौटम !!
बौड़म !!!
भह :
_श्री .

Sunday, May 5, 2013

दो कलियाँ !! (1968)

दो कलियाँ !! (1968)

बचपन की एक और मीठी याद !!
जब हमने इस फिल्म को पहली दफा देखा था तब हम "बेबी सोनियां' (रणवीर कपूर की माताश्री) से भी छोटे थे!
पहले सिनेमा घरों में आगामी फिल्म का ट्रेलर दिखाना एक व्यावसायिक आवश्यकता थी, और एक फैशन भी! फिल्म्स मनोरंजन का एक एकलौता और सबसे सस्ता माध्यम हुआ करता था! दर्शकों को 'अभी देख रही फिल्म' से ज्यादा मज़ा और रूचि प्रत्याशित 'ट्रेलर' को देखने में होती थी! दोस्तों से सुनकर की चालु फिल्म के मध्यांतर में फलाना-फलाना फिल्मों का ट्रेलर दिखया जा रहा है, ......दो-दो , तीन-तीन ट्रेलरर्स दिखाए जा रहे हैं'!!__सुनकर 'चालु' वाहियात फिल्म को देखने केलिए भी अच्छी-खासी भीड़ हो जाया करती थी जो ट्रेलर पेश होने पर उसकी घोषणा करने वाली वाली प्रमाण-पत्र की स्लाइड देखते ही यूँ हर्षित होकर जोश से हो-हल्ला करते, सीटियाँ मारते और तालियाँ पीटते थे जैसे वाहियात फिल्म की टिकट का पैसा वसूल हो गया हो! कभी-कभी तो सुपर हिट फिल्म के बीच दिखाई गई वाहियात फिल्म के ट्रेलर से भी वही शोर शराबा और हर्ष ध्वनी होती थी! ये क्रेज़ था ट्रेल्लर्स का !! हमने भी किसी अच्छी या वाहियात फिल्म में "दो कलियाँ" का ट्रेलर देखा था, और फैसला हो गया था कि इसे नहीं छोड़ेंगे! "...महमुदवा के देखना हउ जी, मामू मुरुख=(खूब) हंसईले हउ "नउवा" (हज्जाम) बइन के !! लास्ट में तो मार-पीट भी हई ईयार!!" जब फिल्म लग जाती तो (फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखने की स्वतंत्रता नहीं थी !) योजनायें बनने लगतीं! सिर्फ बच्चों और नौजवानों की ही नहीं बल्कि घर के मुखियाओं का या बुद्धिजीवी वर्ग के मुखियाओं के भी बैठकें यूँ लगतीं जैसे किसी गंभीर सामजिक मुद्दे के उचित निर्णय पर पहुँचने में बहस हो रही हो, और जिसमे शिरकत करना हर बच्चे-बूढ़े और जवान का नैतिक दायित्व हो! _कब देखना है? _कौन सा शो देखना है? _किस 'क्लास' में बैठकर देखना है? _फिल्म की टिकट कौन कटाएगा? __<< ये सबसे अहम् बात होती थी! घर की लड़कियां, महिलायें, सहेलियां कैसा श्रृंगार करूँ?_कौन सी ड्रेस पहनूं जैसे प्रश्नों को सुलझाने हफ़्तों लगा देती थीं! उन दिनों सिनेमा के बुकिंग क्लर्क्स की शान ये थी कि उसकी एक 'पहचानती नज़र'; एक 'टच !'_के लिए लोग, फिल्म के हीरो से जादा उसमे दिलचस्पी लेते थे! उससे जान-पहचान में सबसे बड़ी शान होती थी! वह सोसाइटी के हाई क्लास के वर्ग का सम्मानित सदस्य हुआ करता था! जहाँ बैठता, उसके चारों तरफ मजमां-सा लग जाता था! झूठ तो झूठ ही सही, कई लोग तो उससे अपनी दोस्ती और रिश्तेदारी तक के किस्से सुनाकर रौब गांठा करते थे! बुकिंग विंडो से टिकट कटा पाने में सफल होने वाले लोगों की भी एक ख़ास जामात हुआ करती थी, जिसने कटा लिया सबकी इर्ष्य भरी नज़रों का पात्र बन जाता, लेकिन अपनी मित्र मंडली में हाँफते हुए और अपनी उंखड़ी साँसों पर काबू पाते वो रौब से छाती फुलाता, अपनी नुची-चुथी बाल, बदन और कमीज़ की सिलवटें झाड़ता और कड़क कर पान वाले से अपन पान मांगता, और यूँ चबाकर थूकता जैसे सिकंदर ने अभी-अभी दिलावर को पीट दिया हो !! .....यह फिल्म उस ज़मानें की हैं जब मुफलिसी की भी खासी इज्ज़त हुआ करती थी! ..और आज !! वही टिकट कलर्क जिंदा तो है पर यह शहर उसे नहीं पचानता! बल्कि वह अब अपनी खो चुकी पुरानी पहचान के लिए सबको देख रहा है, "...ये वही तो है जो हर बार मेरे घर के बाहर खड़ा रहकर पैसे देने को सदैव तैयार ताकि उसे टिकट विंडो की मारा-मारी से न गुजरना पड़े, और जो लोगों को बता सके "..अरे हाँह:! मामू टिकट नई रखतई, जानई नई हई का बेट्टा हमरा?" लेकिन अब कोई उसे उपेक्षा से भी देखने को राज़ी नहीं!  .......
Do Kaliyan is 1968 film directed by R. Krishnan and S. Panju. It stars Mala Sinha, Biswajeet, Mehmood and Neetu Singh.

Do Kaliyaan

Cast

    Mala Sinha as Kiran
    Biswajeet as Shekhar (as Biswajit)
    Mehmood as Mahesh
    Om Prakash as Kiran's Father
    Nigar Sultana as Kiran's mother
    Gitanjali (as Githanjali)
    Manorama as Madhumati
    Hiralal
    Umesh Sharma
    Shabnam
    Bharathi
    Sujatha
    Neetu Singh as Ganga / Jamuna (as Baby Sonia)
____________
Directed by     R. Krishnan
S. Panju
Produced by     Mukhram Sharma(dialogue)
Jawar N. Sitaram (Screenplay/Story)
____________
Music by     Ravi
Cinematography     S. Maruthi Rao
Editing by     S. Panjabi
R. Vittal
Release date(s)     1968
Country     India
Language     Hindi
खुबसूरत गानों, और अच्छी कहानी युक्त यह सुन्दर फिल्म पूरी-की-पूरी YouTube पर उपलब्ध है!
_श्री .

ओस की बूँद - राही मासूम रजा

"ओस की बूँद"
लेखक _ राही मासूम रजा
मैंने अभी कुछ दिनों पहले (यात्रा के पहले ही दिन यानी 25-अप्रैल को ही गाडी में पूरा पढ़ लिया था!) ही पूर्ण किया!
कैसा लगा?
यह एक स्वाभाविक प्रश्न है जिसे हरेक मित्र पूछना चाहेंगे; जिन्होनें मुझे इस किताब को पढने की प्रेरणा दी, और पहले इसे ही पढने को प्रेरित किया! __अगर साफगोई से काम लूँ और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को निष्पक्ष, निश्छल, और निर्मल मन से सच और सिर्फ सच बोलूं तो ये बोलूँगा :



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क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः 
च चा चि ची चु चू चे चै चो चौ चं चः 
ह हा हि ही हु हू हे है हो हौ हं  .......................................
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 
 

A B C D 
E F G H 
I J K L 
M N O P
Q R S T 
U V W X 
Y Z
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10........................................................



“GIVE ME SOME SUN SHINE, GIVE ME SOME RAYS,…..GIVE ME ANOTHER CHANCE  _I WANNA GROWN UP ONCE AGAIN………….!” 

किसी की शझ में कुछ नहीं आया तो मैं क्या करूँ ! ऐएं!!?
 

Saturday, May 4, 2013

आँखें (1968)

आँखें (1968)
ankhen (The Eyes) ! A DIAMOND JUBILEE HIT !!

The best of the best espionage movie ever made in India !
A great creation of the legendary Producer Director Late Ramanand Sagar & his all SAGAR family !
The movie's disc cover proudly proclaims :
1."ACCLAIMED UNANIMOUSLY BY PRESS"
2. "INTRINSICALLY INTERESTING STORY, DIALOGUE IS CRISP AND MEANINGFUL, LYRICS ARE HIGHLY POETIC" __Times of India Bombay
3. "BEST SPY FILM OF TYE YEAR (मैं तो कहूँगा :"...the BEST of the era !!") SUPERB SHOWMANSHIP" __Biltz Weekly, Bombay.
4. "BEAUTIFULLY CONCEIVED...., MASTERLY EXECUTED...., LIVELIEST ENTERTAINMENT...., MAGNUM OPUS...., RICH PURPOSE"__Amrit Bazar Patika - Calcutta
5. "SPECTACULAR SIGNIFICANT AND DYNAMIC"__Cine Advance - Calcutta
6. "FASCINATING FOREIGN LOCATIONS"      __FimFare - Bombay            
7. "Celebrated Diamond Jubilee"
8. "Shown at Film Festival MOSCOW"
9. "Celebrated 25 Silver jubilee Weeks over 12 Stations"
10 "Winner of FilmFare Awards : Best Director _ Ramanand Sagar ; Best Cinematographer _ G. Singh"
11."100 Days at over 25 Stations !"
12. "ALL TIME RECORDS AT 50 STATIONS"
13. "ALL TIME RELEVANT"
14. "the SHRIKANT TIWARI LIKES THIS MOST FROM HIS CHILDHOOD & the story goes like this"::::>>>
Please read........
सन 1972 में हमारे शहर में पहला सिनेमा घर (हॉल) बना! छोटे शहरों में नई फ़िल्में लगना उस ज़माने में किसी चमत्कार से कम नहीं था! ...कोई चमत्कार न होना था, न हुआ ! अतः 1974 में जब यह फिल्म मैंने पहली बार "W.T." देखि थी तब मेरी उम्र छोटी-सी, नन्हीं-सी थी!...और मैं अपने बाबूजी की गोद में रहता था! ईतनी-सी उम्र (8 Yrs.) में ही मैंने इस फिल्म का भरपूर आनंद लिया था!
ब्लैक & वाइट में --"समाचार"-- समाप्त होते ही (रंगीन) फिल्म शुरू होती है और रफ़ी साहब की बुलंद आवाज़ गूंजती है :" उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, ...जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं ऑंखें!" ...इतने में ही रोमांच हो आता है और हॉल का शोर शांत हो जाता है, सभी दर्शकों की "आँखें" अब स्क्रीन पर है..,
कहानी एक Sabotage से शुरू होती है! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए इस आतंकवादी हमले पर सरकार के बयान हैं कि इसमें दुश्मन मुल्कों का हाथ है! जिसके तत्काल बाद एक गोपनीय इमरजेंसी मीटिंग होती है! यह मीटिंग एक गैर-सरकारी देशभक्त लोगों की है जिन्होनें नेताजी सुभाषचंद्र बोष से तालीम पाई थी, और उनकी सेना "आज़ाद हिन्द फ़ौज" के वीर सेनानी थे! इस गोपनीय ग्रुप के लीडर हैं बुजुर्ग मेज़र दीवानचंद मेहरा! इस "गैर-सरकारी ग्रुप" को सरकार से सहमती और सहूलियतें प्राप्त हैं, यह ग्रुप अत्यंत गोपनीय हैं, जो किसी की नज़रों में नहीं हैं! मेजर साहब का पुत्र सुनील भी इसी ग्रुप का एक सदस्य है! इस मीटिंग में यह तय पाया गया कि निःसंदेह हिन्दुस्तान में जासूसी और तोड़-फोड़ की सभी कुकृत्यों के पीछे दुश्मन मुल्कों का हाथ है! ग्रुप मेंबर अशफाक साहब का छोटा बेटा अनवर भी (पहली बार) इस मीटिंग में शामिल है जो मेजर साहब से सहमत नहीं है, और जिसकी "ऑंखें" कुछ और बयां करतीं हैं! मेज़र साहब एक गोपनीय जानकारी सभी सदस्यों से शेयर करते हैं कि मेजर साहब के दोस्त और अशफाक साहब के बड़े बेटे सलीम, जो गुप्त मिशन पर बाहर है, ने कुछ ख़ास जानकारियाँ दीं हैं!! दुश्मनों द्वारा स्मगलिंग के मार्फ़त हिन्दुस्तान में घातक हथियार और गोला-बारूद चुपके से लाया जा रहा है !! सलीम ने उनका पता पा लिया है और वह भी उसी शिप पर "ऑंखें" सजग रखते हुए समुद्री यात्रा कर रहा है! उसे अब सिर्फ हथियारों के खेप का पता लगाकर और उनपर गुप्त निशान लगाकर मेजर साहब को सूचित करना है !!  

समुद्री यात्रा में शिप पर मौजूद दुश्मनों के -इंडिया में सक्रीय- डॉक्टर/कमांडर का मैसेज आता है जो शिप पर 'उसकी टीम' के "कैप्टन" को बतलाता है कि उनके पीछे एक हिन्दुतानी जासूस लगा हुआ है ...... इनमें मंत्रणा होती है, और "उस हिंदुस्तानी" जासूस से निपटने की रणनीति तय होती है!

दुश्मन मुल्कों के तरफ से हिन्दुस्तान में एक अत्यंत ही गुप्त स्थान पर वेष-भूषा बदले, छद्म रूप में सक्रीय कमांडर और उसके सदस्यों, प्यादों और उनके "डैन", सीक्रेट अड्डे के भेद को देखकर वास्तविक रोमांच होता है!! कमांडर वह हर पैंतरा जानता और आजमाता है जिससे गद्दार पैदा किये जाते हैं जो उसकी नापाक मंसूबों में सहायक होते हैं, जो अगर पकडे भी जाएँ तो उनसे कोई खतरा न हो !

'शिप' पर सलीम हथियारों की पेटियों पर गुप्त निशान लगता है, जिसे दुश्मनों की "ऑंखें" देख रही हैं, लेकिन वे अभी उसे नहीं पकड़ते! सलीम ट्रांसमीटर पर मेजर साहब को इन सारी बातों की जानकारी देता है! और अपना शक जाहीर करता है कि शायद उसे पहचान लिया गया है !! मेजर साहब सलीम को सावधान रहने को कहते हैं, और हिदायत देते हैं कि संभव है दुश्मन बीच समुद्र में ही हथियारों की पेटियां उतार दे !!

इस -45 साल पुरानी- फिल्म में _घरों में गुप्त रूप छिपाए गए ट्रांसमीटरों का ईतना शानदार और रोमांचक और सटीक प्रस्तुतिकरण है कि आज भी देखकर लोमहर्षक रोमांच होता है! वास्तव में इस ख़ास बात को इसी शानदार तरीके से फिर कभी नहीं दिखाया जा सका है! ट्रांसमीटर की "टु टु....टू टू टू...बीप-बीप-बीप" की आवाज़ के साथ कंट्रोल पैनल पर लगे कई रंगों के लाइट्स का जलना-बुझना जादुई असर डालने में अभी भी कामयाब है जो रहस्य को और भी रोमांचक बनाता है! समूची फिल्म ही विभिन्न प्रकार के ट्रांसमीटरों के साथ आगे बढती है! ऑपरेशन द्वारा -अंगों में- छिपे "माइक्रो ट्रांसमीटर्स" की चर्चा और उपयोग इस फिल्म को वास्तविक Espionage Movie का दर्ज देती है! रह-रहकर कई तरह के ट्रांसमीटर्स से हमारा ताल्लुक व तआर्रुफ़ करवाया जाता है, और हॉल में 'अईस्स...-अईस्स...' की ध्वनि मजा और बढ़ा देती है! इस फिल्म की कहानी यानि -जासूसी- की "लय" कभी नहीं टूटती, कभी नहीं बहकती! "एक सच्ची और सम्पूर्ण जासूसी Espionage फिल्म_!!" इस कहानी का जासूस हीरो सिर्फ जासूस है! यह गाना नहीं गाता! यह डांस नहीं करता! हलांकि हसीनाएं इसपे रीझती और मोहित होती हैं लेकिन सुनील को सिर्फ अपने कर्तव्य और मिशन का ही ध्यान रहता है! हरेक कलाकार अपनी भूमिका में खूब जमा हुआ है! शानदार एक्टिंग और जानदार डायलॉग्स और चिल्लिंग इवेंट्स + थ्रिल्लिंग एक्शनस आपको चनाचूर खाने और पानी तक नहीं पीने देंगे! इसीलिए भर पेट खा-पीकर इसे देखिएगा! देख चुके हैं तो फिर से देखिये, खाना मेरे यहाँ आ कर खाइये!! ट्रांसमीटर्स के -सदुपयोग और दुरुपयोग- का ईतना वृहद्, विषद और विहंगम परफोर्मेंस फिर दुबारा कभी नहीं देखा !! आज के ''''-आधुनिक साइबर दुनिया-'''' में ट्रांसमीटर्स के मार्फ़त घात-प्रतिघात का ऐसा मुजाहिरा बॉलीवुड दुबारा नहीं दे सका, न ही कोई और शानदार Espionage फिल्म पेश कर सका ! यदि "ऐसी ही कशिश" वाली इसके मुकाबिले, इसके समकक्ष "कोई दूसरी Espionage हिंदी फिल्म" आपलोगों ने देखी है तो बताइये ताकि उसे मैं भी देख लूं!

[जीतेंद्र भाई की 'फ़र्ज़' as a spy thriller का नाम न लीजियेगा, क्योंकि वह 1st Indian Espionage Movie of India है भी या नहीं मुझे नहीं मालूम, फिर भी जीतू भाई के लिए और उसके गानों के लिए मैं उसकी इज्ज़त करता हूँ, लेकिन वह the Best नहीं है! मिथुन as Gun Master G9 मुझे कभी भी पसंद नहीं, सॉरी]

BEST of THE BEST ये है! _"ऑंखें !!" जो रीयली "ऑंखें" खोलती है! आगे पढ़िए....

.....मेजर साहब के बेटे सुनील से उसकी बहन 'जापानी लड़की' की कहानी सुनती है! इसमें भी, यानि जापान जाने में भी सुनील का मकसद उसका कर्तव्य ही है, लेकिन किसी 'मिशन' पर नहीं! जापान में सुनील की मुलाकात मिनाक्षी से हुई थी, जो सुनील से प्रेम करने लगती है! मिनाक्षी के दिवंगत पिता सुनील के पिताजी मेजर साहब के दोस्त और आज़ाद हिन्द फ़ौज के सेनानी थे! एक शानदार और यादगार और सदाबहार गाना यहाँ है: "...मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत कभी, कभी...!" एक और बात शेयर कर लूं : 'इस फिल्म को देखने के बाद "बोटिंग" मेरे लिए किसी Fantasy से कम न थी! आज तक जब भी मौका लगा और बोटिंग का चांस मिला मुझे यही गाना याद आता रहता है, सही है, कुछ बातें आपके व्यक्तित्व का ही नहीं, वरण अस्तित्व का अंग बन जातीं हैं...!'

....सलीम जो दुश्मनों के बीच है,......अपने मिशन को अंजाम देते हुए मारा जाता है !!! ...जिसकी मौत की खबर सुनते ही मेजर साहब की ".....सलीईईइम!!" की चीख से सारा स्क्रीन लाल खूनी रक्तमय हो जाता है!

कैप्टन, जो 'शिप' द्वारा हिन्दुस्तान में छिपे देश के दुश्मनों के लिए आर्म्स & अम्युनेशन ला रहा था, बड़े ही रहस्यमय तरीके से कमांडर के पास आता है! (किस रहस्यमय तरीके से? जिन्होंने नहीं देखा, अवश्य देखिये।) कैप्टन का आना, उसका कमांडर से मिलना, गुप्त अड्डे की सैर, ...जो सुरक्षा के अत्याधुनिक साधनों और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल्ड यंत्र, उपकरण self destruction, by pushing a only button के लिए भी well equipped है, और trespassing controlled laser signals से लैस और सुरक्षित है, मस्त लगता है!! और कमांडर द्वारा अपने मंसूबों की व्याख्या __इन दृश्यों को रामानंद सागर साहब ने फिल्माने में लगता है अपनी पूरी क्षमता लगा दी थी! किन शब्दों में इसकी तारीफ करूँ समझ में नहीं आता! कमांडर द्वारा उसके अपने मंसूबों की व्याख्या को सुनने में ऐसा लगता है जैसे वह ""_अभी के, तत्काल के_"" हालातों को बयाँ कर रहा हो ! यही इस फिल्म को ALL TIME RELEVANT, सर्वकालीन प्रासंगिक के विशेषण को इज्ज़त दिलाता है, जो Breathtaking है! Very Exciting, Very Surprising or Impressive है!! -और जो सच में सच है!-  और जो देश और हमारे लिए अफ़सोस और चिंता की बात है!
 .......इधर हताश मेजर साहब सुनील को कहते हैं : "...अब तुम्हें -बेरुत- जाना होगा !!" _मिशन है: देश से बाहर देश के दुश्मनों को धता बताते हुए यह पता लगाना कि हिन्दुस्तान में दुश्मनों का "सदर मुकाम" कहाँ है? _मुल्क के अन्दर मुल्क के दुश्मन कौन हैं?? _यहाँ से सुनील की एक्शन में इंट्री होती है ! मेजर साहब सुनील को बेरुत में पहले ही पहुँच चुके अन्य ग्रुप मेम्बर्स और स्थानीय सहायक नदीम की तस्वीरें दिखाते हैं! सुनील मिनाक्षी की तस्वीर देखकर हैरान रह जाता है, कि वह भी इसी ग्रुप की सक्रीय सदस्या है, जो बेरुत में एक डांसिंग ट्रूप की शक्ल में मौजूद हैं! ...दिल थाम कर हम सुनील के साथ बेरुत जाते हैं ...! वहाँ सुनील की मुलाक़ात मिस्टर नदीम से होती है जो सुनील को बेरुत में सहायता और सहूलियतों के साथ ख़ास सूचनाएं देकर सुनील के गुप्त मिशन को सफल होने में मदद करेगा! ख़ास और ज्यादा गुप्त बात यह है कि नादिम को भी यह बात नहीं मालूम कि बेरुत में सुनील के कोई और साथी भी हैं !! नादिम सुनील को जिस होटल में ठहराता है वहां की तलाशी लेते वक़्त सुनील को कई जगह से जानबूझ कर छिपाए गए ट्रांसमीटर्स मिलते हैं !! और (हम) दर्शक सन्न रह जाते हैं ! बेरुत में मिनाक्षी को Indian Embassy से एक ख़त मिलता है, जिससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान से कोई एजेंट इस मिशन को अंजाम देने के लिए आ रहा है, जिसकी उन्हें पूरी सहायता करनी होगी और जो मिशन का इंचार्ज होगा! चिट्ठी पर लगी पोस्टेज स्टाम्प को एक ख़ास लिक्विड से भिगोकर उखाड़ने पर दो स्टैम्प्स के नीचे छिपे दो "माइक्रो फिल्म" मिलते हैं जिसमे से एक में कोडेड मेसेज है और दुसरे में हिन्दुस्तान से आने वाले एजेंट की तस्वीर...!  बेरुत में छिपते-छुपाते, नदीम से भी बचकर अपने साथियों तक सुनील किस तरीके से पहुँचता है ...फिल्म में देखिये !! यहाँ दुश्मनों द्वारा ट्रांसमीटर्स का इस्तेमाल यूँ है जैसे आज का मोबाइल फ़ोन हो, और भविष्य दिखला रहे हो !! (जेम्स बांड की फिल्म You Only Live Twice की याद दिलाती है!!) सुनील की मुलाकात अपने ग्रुप मेंबर्स और मिनाक्षी से होती है! मिनाक्षी और ग्रुप के दो ख़ास सदस्य "महमूद" और "स्टूडियो ओनर" भी कोई कम नहीं हैं! उन्होंने भी अपना मुकाम ऐसा गोपनीय बनाया है जो सुनील को खूब भाता है! सुनील, नदीम पर अपना शक ज़ाहिर करता है..., फिर जब मिशन शुरू होता है,...सांस लेने की भी जैसे फुर्सत नहीं मिलती...! कर्णप्रिय गाने के दरम्यान भी स्टंटमय जासूसी !!  ">>>"गैरों पे करम अपनों पे सितम ??" ...काहे हो ? मिनाक्षी का 'विग' समूचे स्क्रीन को कवर कर लेता है (हा हा !!)! इस पार्टी में, जो नादिम के जन्म दिन की ख़ुशी में है, सुनील की मुलाक़ात शाहजादी ज़ेनब से होती है, जो पहली नज़र में सुनील पर फ़िदा हो जाती है।.....

दुश्मन को जानकारी है कि मेजर साहब को रोके बिना उनके मनसूबे पूरे नहीं होंगे! अतः वह घात लगते हैं! मेजर साहब के नवासे का अपहरण कर लेते हैं! जिसमें एक गद्दार उनका साथ देता है!

फिर सांस लेने को तभी फुर्सत मिलती है जब इंटरवल के बाद सुनील की बहन भगवान् के सामने दुखद गाना गाती है! शायद यह गाना इंटरवल के बाद इसलिए डाला गया होगा ताकि सभी दर्शक आराम से हलके होकर अपना चनाचूर या पॉपकॉर्न खाते हुए बढियां से सैटल-डाउन हो लें! ...लेकिन जैसे ही गाना समाप्त होता है दुश्मन अपनी चाल चल देते हैं! कमांडर अपने दल की सदस्या "मैडम" को एक षड्यंत्र रच कर मेजर साहब के घर में घुसा देता है! मेजर साहब को बस इतना पता है कि यह "बुढ़िया" उनकी बेटी के पति की सगी मौसी हैं!! और फिर सांसें रोक देने वाली घटनाएं छद्म वेष-भूषा, फेस-मास्क और ट्रांसमीटर्स के गज़ब के खेल, खतरनाक खेल शुरू हो जाते हैं!... बेरुत से सुनील का मेसेज _by the interception of enemy radio signals_ बुढ़िया 'मैडम' कमांडर को भेजती है, कमांडर इस मेसेज को वापस बेरुत में अपने पार्टनर को देता है, बेरुत में बैठा हिंदुस्तान का दुश्मन सुनील पे जिसकी शरू से ही ""ऑंखें"" लगीं हैं फिर घातक घात करते हैं ...और सुनील क़ैद हो जाता है! ...ट्रांसमीटर्स के सहयोग से ही मीनाक्षी, महमूद और 'स्टूडियो ओनर' मिलकर भिखारियों जैसा वेष धारण कर सुनील का पता लगाने में बेरुत की गलियों की ख़ाक तक छान देते हैं लेकिन सुनील का पता नहीं मिलता .....वे दुश्मनों के बीच हैं ...... और मिलकर नाच-गा रहे हैं "... तुझको रक्खें राम तुझको अल्लाह रक्खे ....इंटरनेशनल फकीर आये हैं .... अरे कहाँ छुप गया है तू कठोर ........!!"  कॉमेडी, कॉमेडी ही लगती है जो निर्मल हास्य पैदा करती है कोई फूहड़ता नहीं!  .....अंततः बेरुत में सफलता मिलती भी है या कोई जान से जाता है? नदीम में क्या भेद था? ज़ेनब नाम की रहस्यमयी किरदार ने (जो असलियत में दुश्मन की जासूस है!) सुनील पर रीझ कर जिसकी जान लेनी थी, क्या करती है? क्या सुनील को बेरुत में सफलता मिलती है या ......

हॉल में खुशनुमा हंसी, ठहाके, तालियाँ, शोर, हल्ला, गालियों, कोसनों और जूत-पूजार ने नवाजी जा रही बुढ़िया 'मैडम' को  मेजर साहब जब हुमच कर मारते हैं तब गज़ब का माहौल बन जाता है, Gun Fire, Suspense & Horror से हमारी हालत भी पतली होती है!! ...लेकिन "मैडम" सायनाइड खाकर जान दे देती है !! ऐसी शानदार अदाकारी दुर्लभ ही देखने को मिलती है!! अफ़सोस से गर्दन हिलाते मेजर साहब का संवाद आज भी मुझे रोमांचित कर देता है _: "इसकी मौत हमारी शिकश्त है!"

फिल्म की खासियत है "ऑंखें" ! हर किसी की "ऑंखें"!! और आँखों की भंगिमाएं! जैसे आँखों से ही संवाद अदायगी कर रहे हों ! और रामानंद सागर साहब इसमें पूर्णतः सफल रहे है! मैंने उन्हें सेल्यूट करता हूँ!
_जय हिन्द!

मित्रों, उपरोक्त में मैंने कहीं भी किसी भी कलाकार का नाम नहीं लिया है, फिल्म में जिसकी जो भूमिका है वही लिखा है! वो बाकी अब यहाँ --पेस्ट-- किये देता हूँ :
Directed by Ramanand Sagar
Produced by Ramanand Sagar
Written by Ramanand Sagar



Music by Ravi
Cinematography G. Singh
Editing by Lachhmandass
Release date(s) 1968
Country India
Language Hindi

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Cast:

  • Mala Sinha ... Meenakshi Mehta
  • Dharmendra ... Sunil
  • Kumkum ... Sunil's Sister
  • Sujit Kumar ... Nadeem
  • Mehmood ... Mehmood
  • Lalita Pawar ... Madam / fake Mousi
  • Daisy Irani ... Lily
  • Zeb Rehman ... Princess Zehnab
  • Madhumati ... Madhu
  • Neelam
  • Sujata
  • Nazir Hussain ... Diwan Chand aka Major Saab
  • Jeevan ... Doctor
  • Amarnath
  • Madan Puri ... Captain
  • Dhumal ... Studio Owner
  • Sajjan ... Boss in Beirut
  • Master Ratan ... Babloo
  • Hiralal
  • Parduman
  • A. A. Khan
  • Jagdish Kanwal
  • Narbada Shankar
  • Ram Tipnis
  • Lachhmandass
  • M. B. Shetty ... Guard who gets arrested with the Diamond Dealer
  • Kailash Advani
  • Ishar Singh
  • Shafi
  • Lalit Kumar
  • Ramlal
  • Mohammed Ali
  • Sheru
  • Qamar
  • Vishnu
  • Bismillah
  • & श्रीकांत तिवारी : AS दर्शक & प्रशंशक  

 


























Friday, May 3, 2013

स्वर्गीय शहीद सरबजीत जी

भाइयों !
स्वर्गीय शहीद सरबजीत जी को आज देश का बच्चा-बच्चा जान गया! उसपे हुए हर ज़ुल्म को जान गया! लेकिन उसकी दुखद और खौफनाक कहानी स्कूलों में नहीं पढ़ाई जायेगी! देश के झंडे को सरबजीत के शोक में नहीं झुकाया जाएगा! दूसरी तरफ चीन अपने नापाक इरादे दिखला रहा है! प्रधान मंत्री जी और अन्य नेता लोग बयानबाजी का मैच खेलने में व्यस्त हैं! कैसे बेदर्द और -spineless- गवर्नमेंट है हमारी??
यह संकट की घडी है!
यारों ! कुछ तो सोचो!
क्या सरबजीत मी मौत बेकार चली जायेगी!? ...और हम इन्टरनेट पर बैठकर गप्पें मारें!?
क्या हम तीन दिन के लिए इससे (इन्टरनेट/ facebook वगैरह से) परहेज नहीं रख सकते!?
""">>>क्या तीन दिन का मौन रखने से हमारे कर्तव्य-कर्म पूरे हो जायेंगे!!??........नहीं।<<<"""
तो?
अपना चेहरा मत छुपाओ !!
सामने रहो !!
लड़ो !
आवाज़ लगाओ !!
वह माध्यम चाहे जो भी हो ! हिलाओ और झकझोरो इस कमज़ोर सरकार को !!
AC चैम्बर में बैठे रहने से, और 'बतकूचन' करने से अच्छा होगा, यदि हम सरबजीत के परिवार के प्रति संवेदनशील हो सकें, और अपनी भावनाओं और गुस्से से इस लचर सरकार को अवगत करा सकें! वरना तुम्हारे आंसू कभी भी नहीं सूखेंगे!

तो फिर उठिए .......
भारतीय सेना से मुखातिब होइये!
अपने देश के वीर सपूतों की थोड़ी संगत कीजिये।
और उनके विचार जानिये, और अपनी भावनाओं से उन्हें अवगत कराकर उनका मनोबल बढ़ाइए ........
कहिये की हम सदैव उनके साथ हैं .........

Thursday, May 2, 2013

STORY OF AN ABANDONED CHILD!

एक त्यागा हुआ बच्चा!
बच्चे के जन्म के चंद महीनों बाद ही बच्चे की माँ की असामयिक, आकस्मिक मृत्यु .....!!
बाप ने नहीं पूछा, दूसरी शादी रचा ली  .......!
चाची-चचाओं ने नहीं पूछा, अपनी दुनियाओं में खो गये  .......!!
दादा-दादी ने नहीं पूछा, आखिरकार इतना बड़ा "कुटुम"(कुटुंब) है!!
...बस दादी कभी रो लेती थी ....!
और चचेरी बहन रो-रोकर सूनी-सूनी-सी हो गई!
आखिरकार किसी ने पूछा।
बच्चे की नानी ने!
नानी के बड़े भाई  ने इस त्यागे हुए बच्चे को अपना लिया !!
यह बच्चा जिसे इसका "पूर्ण-नव-पत्नी-व्रता" पिता अपना नाम तो क्या अपना एक दस्तखत तक देने को राज़ी नहीं...! जो भाई कभी अपनी वीणा दीदी का दुलारा खिलौना था, "..बउआ था !!", ...वीणा से दूर रहते हुए भी सदा उसके दिल में रहा! अपनी दादी से बच्चे की चचेरी दीदी (वीणा) हमेशा पूछा करती थी :"ए, ईया! ई बउवा कब ले आई?"...पर दादी खुद कुछ जानती तो बताती न !! बहन, अपने भाई के उसके नाना के यहाँ चले जाने से अकेली रह गई थी, उसे याद कर रोती रहती ...!!

मेरी मुलाकात इस बालक से इनके दादाजी की म्रत्यु-परांत के कर्मकांड के दौरान हुई! उसी समय मैंने इसकी बचपन की कहानी सुनी! तभी से यह बालक मेरा दोस्त बन गया! बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के इस बालक ने CAT  Indian Institutes of Managementपास किया और BIT (Birla Institute of Technology, MESRA, RANCHI JH.) से MBA की पढ़ाई, शानदार तरीके से पूरी की!! और आज यह खुबसूरत गबरू नौजवान दिल्ली में एक बड़ी कंपनी के मैनेजमेंट विभाग में कार्यरत है! रांची में अपनी MBA की पढ़ाई के दरम्यान इसने दो (2) वर्ष [होस्टल में रहते हुए भी] हमारे साथ गुजारे। इस दौरान हमारे पारस्परिक सम्बन्ध और और और प्रगाढ़ हुए! बहन ने बचपन से लेकर अबतक की जैसे सभी राखियाँ अपने भाई की कलाई पर बाँधी! बहन-भाई का पुनर्मिलन हो गया!

a real DABANGG !! की शादी !
बहन 21 अप्रैल को ही 'तिलक' में सम्मिलित होने के लिए चली गयी थी! कार्यालय की व्यस्तता और मुझे अभी मालिकान की इजाज़त भी लेनी थी, अतः मुझे छुट्टी मिलते ही यात्रा की तैयारी शुरू हो गई!

25/04/2013
सबकी जिद्द थी कि 'इतने' लम्बे सफ़र में "-मैं-" गाडी नहीं चलाऊं! 500KM से ज्यादा की दूरी, अव्यवहारिक, अव्यवस्थित ट्रैफिक और रैश ड्राइविंग को 'कंपीट' करने का मेरा भी कोई इरादा नहीं था। ऐसे मौके पर अभी मुझे कलीम की भारी कमी सता रही है! कलीम मेरा favourite (all time) ड्राईवर है, मेरे बेटे की उम्र का है, लेकिन, चूंकि मैं ड्राईवर की रेगुलर और दैनिक सेवा नहीं चाहता, न जरूरत होती है; अतः कलीम अपना और अपने बीवी बच्चों का पेट पालने के लिए किसी और की नौकरी करता है! और उसका मालिक रोजीना अपनी गाडी भाड़े/सट्टे पे कमाई के लिए चलवाता है, जो कलीम को छुट्टी देने को राजी नहीं! कलीम एक दक्ष ड्राईवर है जिसे कई राज्यों के कई कई रास्तों की बड़ी अच्छी जानकारी है! मैंने जब-जब उसे अपने ड्राईवर के तौर पर रखा किसी भी सफ़र में उसे मैंने गाडी रोककर राहगीरों, या लोकल दुकानदारों से सही रास्ते की जानकारी के लिए पूछताछ करते नहीं देखा कि : "... अंऐं भैया एहे रस्तवा नि पटना जईतई?" कलीम हमेशा मुझसे कहा करता है कि 'सर, ए गो बढियां गाडी लीजिये ना, हम बराबर साथे रहेंगे, गाडी भाड़ा में चलेगा, उसी से कमा कर लोन भी चूका देंगे!' ......मगर अफ़सोस अभी मेरी दशा ऐसी नहीं! ...अब कलीम की जगह रमेश जा रहा है! ये हमारे कर्मक्षेत्र के नाईट गार्ड का बेटा है, मुझे भरोसा दिलाया गया है कि इससे आपको निराशा नहीं होगी। और वाकई मुझे कोई निराशा नहीं हुई!

सो, हम सुबह सवेरे गौरी-गणेश-महेश को मना कर निकल पड़े! अभी हमारे यहाँ [लोहरदगा, (झारखण्ड)] में एक हलके चादर वाला गुलाबी जाड़े का मौसम है! लेकिन जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए गर्मी का प्रकोप बढ़ता गया! लोहरदगा से चतरा तक का सफ़र ठीक-ठाक ही नहीं आनंददायक रहा, शक हुआ कि झारखण्ड सरकार बिहार सरकार से कुछ सीखकर सड़कें ठीक करवा रही है! "गया" पहुँचते ही लगा जैसे हम चूल्हे पर चढ़े किसी कूकर में बंद हैं! चतरा के बाद आखिरी मुकाम -(बिहार)-...डोभी, गया, जहानाबाद,पटना, गाँधी सेतु, हाजीपुर फिर मुजफ्फरपुर तक सड़ी हुई गर्मी, और पिछले "--15 वर्षों से लगातार निर्माणाधीन--" सड़कें अभी भी अपने फूटे करम पर रो रहीं हैं और उससे भी कहीं ज्यादा हमें रुला रही है! कभी भी, कहीं भी चैन नहीं मिला! खूब हिचकोले खाते, गेंद की तरह उछलते, गिरते, लुढ़कते माँ के कोसनों, और (घर की दाई) कलवातिया-'दी' के "भाँड-बिसर" गारी सुनते, पसीना पोंछते, गर्म पानी पीते, और मेरी पुरानी बिमारी Coccydynia [Coccydynia is a medical term meaning pain in the coccyx or tailbone area, usually brought on by sitting too abruptly.] जो फिर धमका रही है, का दर्द सहते 03:30PM बजे हम मुजफ्फरपुर पहुँच गए! भगवानपुर चौक पर पिंटू भाई जी हमारे इन्तजार में खड़े थे! उनसे मिलन हुआ! वे हमें मुजफ्फरपुर निवास पर ले गए जहाँ हमने 2 घंटे से ज्यादा विश्राम किया! इसी बीच पिंटू जी ने शादी सम्बंधित कुछ वैवाहिक सामग्रियों की शौपिंग कर ली। फिर हमारी गाड़ी से ही वे हमें गाँव रूपनारायण-पुर लिवा ले गये! जहाँ बड़े-बुजुर्गों सहित इस एपिसोड के हमारे "हीरो" से हमारी मुलाकात हुई! रूपनारायण-पुर! ...गाँव!

"गाँव !" .... मेरे हीरो का गाँव! जब हम पहुंचे तब भगवान सत्यनारायण जी की कथा-पूजा हो रही थी। मंत्रोच्चार से वातावरण पवित्र हो रहा था। मैंने देखा ...मवेशियों के खाने वाली चारे की नांदें! ...मिटटी के घर और फूस की छत! इलेक्ट्रिक पोल पर रोता कलपता मरियल बल्ब कराह कर अपनी मजबूरी जताने की कोशिश कर क्षमा माँगा रहा है! ...अनाज रखने वाली मिटटी की गोल-गोल 'कोठियां' और फूस से बनी उनकी उलटे cone जैसी छत! अधिकाँश दीवालों पर ठोके हुवे गोबर के गोइंठे! गाँव का सबसे सस्ता ईंधन!! ...खुला-खुला वातावरण! चारों तरफ फैली हरियाली ही हरियाली! हरेक प्रकार के वृक्ष, पेड़, पौधे, लताएँ, फूलों के अनेक प्रकार के रंग! आम, कटहल, केले, महुआ, पीपल, नींबू , शरीफा, अमरूद, बेशुमार लीचियों के पेड़ों पर नन्हें बल्ब की तरह टिमटिमाते लीचीयों से लदे पेड़, ताड़-तरकुल-खजूर और साबूदाने के पेड़, और इन सबके मुखिया सामान अतिविशाल जटाधारी बरगद जो न जानें कितना बूढा है और जो न जानें इस गाँव के कई परिवारों की कई कई पुश्तें देख चूका है  !!...  जैसे इस छोटी-सी आबादी के एक अंग हों, एक साथ मिलकर मन को मोहे ले रहे हैं! मेरे हीरो के घर का दालान! 'खटिया' पर बिछावन डालकर लेटे, बैठे कई लोग, कई बुजुर्ग, आपस में धर्मचर्चा में मगन,...कोई भाव-भंगिमा बनाते "रुद्राष्टक" सूना कर गर्व से फूले जा रहे हैं; "...प्रचंडं प्रकृष्टम् प्रगल्भं परेशं, अखंडं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ..." तो कोई "देवी कवच" की महिमा बखान रहे हैं! ...एक तरफ नवनिर्मित घर! घर के सामने और एक बगल में लगे चापाकल! एक तरफ एक बड़ा प्रांगण वाला मंदिर और परमात्मा को नमस्ते करता उठा हुआ लम्बा गुम्बद! तीन तरफ से घिरे बीच की ज़मीन इतनी बड़ी कि किसी बड़े शहर में जिसकी कीमत का हिसाब लगाना कठिन है लेकिन किसी भी बिल्डर ताइकून के लिए मानीखेज ...., पर यहाँ इसे "बढ़नी" (झाडु) से बुहारकर, और बिना गोबर के घोल का इस्तेमाल किये हाथ से ही सिर्फ पानी के द्वारा लीपा गया है ...जिसपर लीपने वाली दाई की उँगलियों से चारों ओर अर्धचन्द्राकार आकृतियाँ और वातावरण की खुशबु मुझे मेरे बचपन और बाबूजी की स्नेहिल उपस्थिति की याद दिला रहा है! ...और यहाँ आकर ख़ुशी से मेरी आँखें नम हो रही हैं! '..और मन में 'धरम पा-जी' (धर्मेन्द्र)का चेहरा सामने है, जो गा रहे हैं '.......दिल कहे रुक जा रे रुक जा....यहीं पे कहीं,...जो बात, ...जो बात इस जगह है, कहीं पर नहीं........' रात्रि भोज में दक्ष हलवाइयों द्वारा बनाए खाने का लुत्फ़ उठाते समस्त ग्रामवासी!! सभी से हमारा मिलन हुआ! सही है, असली सभ्यता मिटटी में ही है, कंक्रीट में नहीं!!

नहीं थे तो सिर्फ वो लोग जिनके खानदान का यह बच्चा है! नहीं था तो वह शख्श जिसके बीज से इस बच्चे ने जनम लिया! लानत है उनकी तताकथित विद्वता पर! कितने झूठे हैं वे? और कितनी झूठी है उनकी मर्दानगी और शान, कितना व्यर्थ और शापित है उनका जीवन!

26 -तारीख को मैंने कुछ रस्में देखीं! ऐसी अनोखी रस्में, जिन्हें मैंने पहले कभी देखा सुना नहीं था! हमारे यहाँ बालकों का जब यज्ञोपवीत संस्कार (जनेउ) होता है, लगभग आधी वैवाहिक मांगलिक कार्यक्रम तभी पूरे हो जाते है! बचपन में ही इस बच्चे ने कई जानलेवा बीमारियों को झेला है! इसकी नानी ने बच्चे के स्वास्थ्य लाभ के लिए जितनी मन्नतें मांगीं थीं वह सभी पूरी की जा रहीं थीं! नानी के बड़े भाई जिन्होंने इस बच्चे को गोद लिया है, काफी बूढ़े हो चुके हैं! नेत्र विकार के कारण अब अंधे हो चुके हैं। जिन्हें हीरो 'नाना' कहता है और इनकी पत्नी (वृद्धा नानी) को प्यार से "माई" बुलाता है! सभी ने, यहाँ तक कि 'बहन' ने भी तीन दिनों का उपवास रखा है, रस्में निभाई जा रहीं हैं! आपको जानकार कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि ये सभी रस्में ब्रम्हा के चतुर्थ वर्ण के सपूतों --(शूद्रों)-- द्वारा निभाई जा रहीं हैं! जिसमे एक प्रधान पुजारी है, एक सहायक, एक रसोइया, और दो-तीन जने हैं, और सब मिलकर एक गायक मण्डली भी हैं!! इन्होने केले के थम, और केले के फल सहित केले के पेड़ (कदली/कदरी) के प्रयोग से बीच की ज़मीन पर घर के प्रवेश द्वार के सामने केले के थम से ही बहुत ही खूबसूरत चारदीवारी और बीच में मंडप बना दिया है! जिसमे बांस के बने खिलौने-जैसे धनुष-बाण, तीर-कमान, रंगीन झंडे लगाए हैं! एक लम्बे बांस को रंगीन कागजों से पूरा लपेट कर उसके सिरे पर एक ध्वजा बांधकर उसे मंडप के मध्य में खड़ा कर दिया गया जिसके ध्वजा के बंधन से बंधे कई लारियां चारों तरफ तान दी गईं हैं, जिनपर रंगीन कागजी झंडे लहरा रहे हैं! मण्डली के सभी सदस्यों को "भगत जी" के सम्मानित नाम से बुलाते हैं! इन्हें ख़ास रस्म के समय पीले रंग में रंगी नई धोती, और पीली नई बनियान, दान कर पहनाई गई! इनके गायन और मृदंग के वादन के तारतम्य के साथ मनभावन नृत्य की व्यख्या मेरे लिए कठिन है! लोकगीतों को गाते इनके सभी गाने सृष्टि निर्माता भगवान ब्रम्हा, पालक "श्री"युक्त विष्णु, और उमापति महादेव सहित भगवान् श्रीगणेश जी, हनुमान जी, और सभी प्रधान मातृ-शक्तियों को समर्पित हैं! मृदंग बजाते मुक्त कंठ से गाते और मृदंग को लिए-लिए झूम-झूम कर नाचते भगतन के शानदार परफोर्मेंस को देख मैं मंत्रमुग्ध हो गया! गायन-वादन का लय और तारतम्य, मृदंग की गूँज शांत हो इससे पहले ही गूंजते मृदंग सहित नर्तक हवा में उछलकर एक चक्कर घूम जाता है!! पीतल की थाली के कोर पर दोनों पाँव रखकर मृदंग बजाते नाचते हुए एक भगत जी ने पूरे मंडप की परिक्रमा पूरी की तो हीरो की बहन के मुँह से वाह! निकल गई! जिन्होनें उपवास रखा था सभी ने मंडप की परिक्रमा की! इन्हीं भगतन ने सभी वैवाहिक मांगलिक कार्य पूरे करवाए ! भगत जी लोगों के समस्त कार्यक्रम आत्यन्त मनभावन लगे! मैं अपने Handycam को अभी बहुत miss कर रहा हूँ, जिसका charger पिछली बार बोकारो छूट गया है! सो, still camera से ही संतोष करना पड़ा! पर कई ख़ास मौकों की तस्वीरें नहीं ले सका!

27-तारीख को बरात रवाना हुई! बारात अपने गंतव्य 'नवीनगर'(औरंगाबाद) पहुंची! परंपरागत तरीके से बारात सजी! निकली! द्वार पूजन हुआ! जयमाला की रस्म हुई! इसके बाद डिनर हुआ! मैं हीरो के साथ वापस जनवासे आ गया! उधर "गुरहथी" की रस्म हुई! गुरहथी, को कन्या निरिक्षण भी कहते हैं, लेकिन निरिक्षण वाली कोई बात नहीं होती! यहीं पर दूल्हा का ज्येष्ठ भाई दुल्हन को गहने चढाता है! यही रस्म गुरहथी कहलाती है! ज्येष्ठ भाई यूँ "भसुर" बन जाता है, जिससे दुल्हन सदैव परदा करती है! और घर में घुसते वक़्त भसुर महाशय को खोंख-खंखार की आवाज़ के साथ अन्दर आना पड़ता है! पिंटू जी ने यह रस्म पूरी की! 

...आगे की कहानी थोड़ी फ़िल्मी जरूर है, पर सच्ची!!; बहुत ही महत्वपूर्ण है, कदाचित भावुक भी! ........रात के 02:15AM बजे मुझे हीरो ने जगाया :"जीजाजी उठिए! शादी के लिए बुलाहटा आया है!" मैंने नींद से बोझिल होकर मना किया, लेकिन हीरो ने फिर कहा :"मेरी शादी देखने का मन नहीं है क्या?" ...मैं जागा! देखा सभी प्रधान लोग सोये हुये हैं! बुजुर्ग बीमार नाना भी! मैंने पूछा :"क्या ये लोग नहीं चलेंगे?" गुंजन ने कहा सभी थके हुए हैं! बाकी पिए हुए हैं! आप चलिए! हीरो के कुछ दोस्तों के साथ उसे लिए मैं लड़की के घर पहुँचा! बड़े सत्कार के साथ हमें विवाह मंडप में ले जाया गया! 12 हो या 72, मैंने जितनी भी शादियाँ अपने रिश्तेदारों की अटेंड कीं हैं, सभी में मेरी भूमिका एक फोटोग्राफर की ही होती है! यहाँ भी मुझे यही करना था! मैंने प्रोफेशनल विडियो शूट करने वालों के बीच अपना मुकाम बनाया और एक कुर्सी की गुजारिश की जो तत्काल पेश हुई, मैं उस पर बैठकर चाय सिप करते, जम्हाई रोक-रोक कर फोटो खींचने लगा! पंडित जी ने विधि-विधान के अनुसार वेद मन्त्रों का उच्चारण शुरू किया! और दुल्हे से बिभिन्न प्रकार के पूजा करवाने लगे!

 "...लड़के के पिताजी को बुलवाइये!" _अचानक पंडित जी की यह आवाज़ सुनकर मैं चौंका!! 

क्षण भर में ही कई तरह के भाव मेरे मन में उथल-पुथल मचाने लगे! शायद यह भगवन के नाम से पुकारे जाने वाले का षड्यंत्र था! हीरो की सामाजिक अवस्था से भली-भाँति परिचित होकर भी इस प्रकार के पुकार का मतलब मैंने सिर्फ यही समझा कि शायद पंडित जी इन बातों से अनजान हैं! मैं चुप रहा! तभी लकड़ी का बना और सनमाइका जड़ा एक बड़ा-सा पीढ़ा आया उसपर सिली हुई एक आसनी रखी गई, पंडित जी ने उस पर अभिमंत्रित अक्षत की बौछार की और बोले : "हाँ, भाई समाधी जी के बोलाइये!"...मैंने सोचा नाना क्यों नहीं आये ......तभी मैंने देखा एक व्यक्ति, जो दोनों घरानों से सम्बंधित हैं, ने पंडित जी से कुछ कहा, पंडित जी ने मुझे इशारा किया _कहा :"बाबू, आप यहाँ आइये!" पीछे से मेरे एक रिश्तेदार की आवाज़ आई :"उठअ हो सिरकांतजी, आगे बढ़अ !!" ...मैं अभी भी बात नहीं समझा था, ...शरमाते-सकुचाते मैं मंडप के भीतर गया, आशंकित भाव से पंडित जी को देखा जैसे पूछना चाहता हूँ कि :"_क्या?" पंडित जी ने मुझसे कहा कि मैं "इस" आसन पर बैठूं!! ......शायद कभी किसी ने मुझे "यशश्वी भवः" का आशीष दिया होगा जो आज फलित हुआ! मैंने 'ऊपर वाले' के "गेम" को समझ लिया! नाम आँखों से हीरो को निहारते, और गर्व से छाती तान कर मैं उस आसन पर विराजमान हो गया! मंत्रोच्चार में हीरो के (रक्त)खानदानी बाप-दादाओं के नाम के शुमार से मुझे कतई कोई ऐतराज़ नहीं हुआ! लेकिन कभी भी हीरो ने अपने मुँह से अपने बाप का नाम नहीं लिया! एक छोटे से शंख और अक्षत द्वारा पंडित जी ने मुझसे कुछ पूजा करवाई! फिर लड़की को बुलाया गया! लड़की के माता-पिता भी आये और विवाह शुरू हुआ! लड़की के पिता ने एक समधी के रूप में मेरा सत्कार किया! हमने एक दुसरे को जनेउ पहनाया! एक दूसरे की छति पर दही और तिलाक-युक्त पान चिपकाए, और गले मिले! मैंने हीरो के पिता के रूप में सभी वैवाहिक मंगलाचार पूरे किये! फिर कन्यादान के वक़्त भी लड़की के पिता ने कन्यादान कर वर के हाथ में अपनी बिटिया का हाथ दे दिया, उस पर वही शंख रखा गया जिससे पंडित जी ने मुझसे पूजा करवाई थी, लड़की के दो भाइयों ने शंख पर तैलधारावत जल प्रवाहित करना शुरू किया, जो एक पीतल के बड़े-से कड़ाह में जमा होता गया, पंडित जी ने लगातार वैदिक मंत्रों का जप जारी रखा ...फिर वर-वधु का हाथ मेरे हाथों में सौंप दिया गया! फिर "लावा" (धान) मेराई! ...फिर भँवर! ...फिर सिंदूरदान! ...फिर चुमावन! ...फिर कोहबर! सारी रात महिलाओं द्वारा छेड़खानी भरी "गारी-युक्त" गीतों का मधुर गायन होता रहा! ...सुबह "मथझका" के वक़्त मैंने नाना को बुलवा लिया और उन्हीं से संपन्न करवाया! फिर मंडप (मड़वा) में ही सभी प्रमुख लोगों का भोजन हुआ! फिर मेहमानों की बिदाई हुई! 'समधी-मिलन' हुआ! कुछ रस्में पूरी कर मैं अपनी "बहु" को लेकर हीरो की बहिनिया के पास जाने को निकल पड़ा!

रास्ते में तीसरी बार "गंगा माई" के दर्शन हुए! महात्मा गाँधी सेतु! मैंने अपनी जेब कुछ सिक्के निकाले! नेपाली ड्राईवर को मैंने गाडी रोकने को कहा! मेरे बताये स्थान पर उसने गाडी खड़ी की! मैंने अपने पास के सभी सिक्के बहु के हाथ में देकर मंगलकामना और प्रार्थना करने को कहा! फिर वे सिक्के बहु से ले कर वर-वधु दोनों को "_नियुंछ कर_" वह सभी सिक्के गंगा माई को अर्पण कर दोनों को आशीर्वाद दिया! ....फिर हम घर (गाँव) पहुँच गए! 

28-तारीख को विदा होने से पहले बहु (प्रियंका nickname : छोटी) को जब मैंने आशीष दिया तो उसने कहा :"...अब तो आप ही मेरे पापा हैं न?" ....................................................................!'

30 अप्रैल, 2013 लोहरदगा वापस!

इस यात्रा में मेरी कुछ भूमिका रही हो, कुछ उपलब्धियां रहीं हो ....लेकिन मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि वहां की बच्चा पार्टी में मैं काफी घुल-मिल गया! और मुझे एक बड़ा ही प्यारा नन्हा दोस्त मिल गया! पहली बार वह सहमा हुआ था, दूसरी बार संकोच में था पर धीरे-धीरे वह मुखर होता गया! पहली बार मैंने उससे पूछा "मुझे पहचानते हो?" उसने नज़रें झुकाकर सहमती में सर हिलाया! "कौन हूँ मैं?"_मैंने पूछा। सहमी हुई हलकी आवाज़ में उसने कहा :"दादाजी!" मैं जम कर हंसा! यह छः (6) वर्षीय बच्चा, पिंटू जी का बेटा है! पिंटू जी अपना और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए मुजफ्फरपुर शहर में ऑटो चलाते हैं! यही बच्चा दुल्हे मियां का "सहबाला" बना था! रास्ते भर यह मेरी ही गोद में गया और लौटा! अब यह मुझे "अंकल जी" कहता है! जब मैंने उससे कहा कि मैं और तुम अब दोस्त हैं! तो उसने अपनी नन्ही उँगलियों के इशारे से मुझे झुकने को कहा! मैं झुका, उसने मेरे कान में कुछ कहा! मैं समझ न सका! बच्चे _आदित्या उर्फ़ प्रियांशु_ ने कई बार कोशिश की, मैं उसके शब्द नहीं समझ सका! तब मैंने आस-पास मौजूद सभी को भगाया और उससे बोला कि 'यार जोर से बोलो' तब उसने देखा कि वीणा भी मुस्काती हुई हमारी ओर ही आ रही है! बच्चा फिर चुप हो गया! तब वीणा ने कहा :"जोर से बोलो बाबु, ई तनी जादे ही बहिर हैं!" 
तब प्रियांशु ने कहा :" दोस्त तो चौकलेट देने से बनते हैं न? हम आपको चौकलेट देंगे, तो आप हमको कौन वाला चौकलेट दीजियेगा?" वीणा ने उसकी जेब भर दी! 
मैंने वादा किया की अगली बार जब मैं मिलूँगा तब cadbury के बड़े वाले चौकलेट दूंगा; तबतक इनसे जो मन करे खरीद कर खाए! वह मुझसे लिपट गया! वीणा ने उसका माथा चूम लिया!

शुभम !
_श्री .