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Sunday, January 27, 2013

वे मुसलमान थे


शरद श्रीवास्तव shared Rajendra Yadav's status.
November 28, 2012/  

कविवर देवी प्रसाद जी कविता। 
बहुत दिनों के बाद किसी कविता ने इस कदर दिल को छुआ की आत्मा तक को झंझोड़ दिया . देवी प्रसाद जी को इस कविता के लिए बहुत साधुवाद और राजेंद्र यादव जी को आभार।
वे मुसलमान थे
 
वे मुसलमान थे
कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे
ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे
वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!
बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया
वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की
प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे
न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे मुसलमान थे
वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए
वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू
वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं
वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे
वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे
वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता
मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती
वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता
मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता
वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे
वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे
इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे
वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे
वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे
वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे
वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं
वे शहर के बाहर रहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं
उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे
वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है
अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे
वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए
वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे
सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे
वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे

-देवी प्रसाद

Friday, January 25, 2013

झूठे गैंग-रेप का आरोप. एक रवायत को आमंत्रण!?!?

पद्मभूषण सम्मान की झड़ियों में स्वर्गीय प्रिय राजेश खन्ना को मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान की घोषणा से जहां ख़ुशी हुई वहीँ दिल में एक डर घर कर गया है:_

एक ज़माने में दहेज़ का लिए बहुओं को जलाने और मार डालने की खतरनाक रवायत बन गई थी। जिससे पूरा देश आहात था। उस समय 'विजय-विकास' सीरिज़ के जासूसी उपन्यासों के रचयिता श्री वेद प्रकाश शर्मा ने एक सामाजिक-थ्रिलर उपन्यास की रचना की थी-"बहु मांगे इन्साफ"; जिस पर हिंदी फिल्म भी बनी थी। बाद में कुछ घटना क्रम ऐसे हुए जिसमे ये हौलनाक सच सामने आया कि दुर्भावना और पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता वाली लड़कियों-दुल्हनों ने झूठे दहेज़ प्रताड़ना का आरोप लगा कर कई निर्दोष लड़कों-युवाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया। धीरे-धीरे ऐसे झूठे आरोप आम होनें लगे। ऐसे ही भयावह झूठ पर श्री वेद प्रकाश शर्मा ने दहेज़ आधारित अपराध पर एक नए उपन्यास की रचना की जिसमे कैसे एक दुल्हन ने झूठे दहेज़ के आरोप में एक परिवार को बर्बाद कर दिया। वो उपन्यास था -'दुल्हन मांगे दहेज़'; जिसे पढ़कर अभी भी सिहरन होती है। आज इस उपन्यास की याद आने की एक वजह है।

हालिया दिल्ली गैंग-रेप कांड, जिसमे 'दामिनी' की जान गई; और जिससे अभी भी हम सभी देशवासी थर्राये हुए हैं, जिसके वजह से दिल्ली पुलिस काफी सक्रीय हो चुकी है; क़ानून की आखें भी इस जघन्य कांड से चुंधियाई हुई हैं; गणतंत्र दिवस की पूर्व सन्ध्या पर देश को संबोधित करते भारत के माननीय राष्ट्रपति श्रीमान प्रणब मुखर्जी महोदय ने भी अपनी संवेदना प्रकट की और कई हिदायतें दीं; ऐसे हालात में  _आज एक लड़की ने दिल्ली में कुछ युवकों को झूठे गैंग-रेप के आरोप में फंसा दिया। फिर बाद में मुकर गई। उसने बताया कि उन युवकों में से एक ने उससे शादी का वादा करने बाद भी शादी नहीं की इसी से कुढ़कर उसने ये 'झूठा' आरोप उन पर मढ़ दिया था! 

लगता है अब झूठे गैंग-रेप का आरोप एक रवायत बनने जा रहा है।

कितने फंसेंगे,कितने मरेंगे? गंभीर सवाल है।

ज़रा सोचिये।

_श्री . 25-01-2013/Ldga.


Thursday, January 24, 2013

सुरेन्द्रमोहन पाठक के अमर बोल

निम्नलिखित बातें वो बातें हैं जिन्हें पाठक सर ने रचा है, और जो अक्सर मेरी जुबान से भी अब निकलने लगा है। जिनमे से कुछ चुनिन्दा लाइनें मैं सभी मित्रों के साथ शेयर करना चाहता हूँ। जिन्होंने पाठक सर के उपन्यास पढ़े हैं उन्हें इनसे जरूर इत्तेफाक होगा। हो सकता है मेरे किसी मित्र ने पहले भी इसका जिक्र कर शेयर किया होगा, फिर भी मैं चाहूँगा कि इसे आप पढ़ें। ये वो लाइनें हैं जिसने अपनी बात को अभिव्यक्त करने में मुझे सक्षम बनाया, जो मेरी अभिव्यक्ति को शब्द प्रदान करते है। इन्हें किसी उपन्यास में यदि आपने पढ़ा है या अभी पढ़ रहे हैं तो निश्चित ही वह श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक सर की रचना है। पाठक सर के ये शब्द और वाक्य अब एक अमर बोल बन चुके हैं। मेरे किसी मित्र को ये पढ़ कर कुछ और याद आये जिसे इसमें जुड़ा होना चाहिए, तो प्लीज़ मेरी जानकारी में लायें।1985 में जब मैं दिल्ली के एक कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ता था। उस समय हमारा इंस्टिट्यूट करोल बाग़ के सामने 5-B पूसा रोड पर स्थित था। तब होस्टल में मेरे रूम मेट हरमिंदर सिंह कालरा (जो सिक्ख हैं, काफी वक़्त से संपर्क में नहीं हैं, MBBS डॉक्टर हैं) बिजनौर के रहने वाले थे। उनसे उस वक़्त की मेरी घनिष्ठता मुझे याद है, वे मुझे पंजाबी सिखाते थे और मैं उन्हें भोजपुरी। तक़रीबन उसी समय मेरी रूचि पाठक सर के उपन्यासों से हो चुकी थी। पंजाबी बातचीत, सवाल-जबाब को हिंदी में पढने पर जो आनंद आता है उसे शब्दों से व्यक्त नहीं कर सकता। खैर इन्हें पढ़िए: सुरेन्द्रमोहन पाठक के अमर बोल:

1. जेनेरल एक्सप्रेशंस :>>> पढने में सिर्क एक वाक्य हैं, पर कहानी (अगर आप पढ़ रहे हैं तो) के सन्दर्भ में इनके बहुत बड़े मायने होते हैं। इससे साफ़ ये अंदाजा हो जाता है कि 'लेखक' को हयूमन साइकोलोजी की कितनी तगड़ी पहचान, और औए पेश कने के ये कितने बेमिसाल अंदाज़ हैं!!>>>
>वह सन्न रह गया।
>वो हिचकिचाया।
>वो सकपकाया।
>वह हकबकाया।
>वह भौंचक्का रह गया।
>उसने बेचैनी से पहलु बदला।
>उसने आहात भाव से देखा।
>उसका चेहरा कानों तक लाल हो गया।
>वह मूछों में मुस्कुराया।
>प्रत्याशा से उसका दिल उछला।
>वो जैसे आसमान से गिरा।
>कोई हौले से हंसा।
>उसने नाक से धुंवे की दोनाली छोड़ी।

2. रमाकांत की उक्तियाँ :>>>
>"आओ जी।जी आया नूं। रक्खो" ...क्या? .."ओ, तशरीफ़!"
>"चल भई, तेरी रोटी शोटी करिए।"
>"ओए, की नां ए तेरा। एद्दर आ।"
>"सोचन ते दयो मालको।"
>"तो हो जाय एक-एक पैग अमरीकसिंह काले बिल्ले नूं!"
>"खुश कित्ता ई मित्रा।"
>"ओ! गोल्ली किद्दि ते गैनें (गहनें) किद्दे, बादशाहों!"
>"यारां नाल बहारां मेले मित्रां दे।"
>"लो जी, हौर सुनो।"
>"माइंयवा, अन्ने कुत्ते हिरणा दे शिकारी।"
>"जुलाहे दियां मस्खारियाँ माँ-भैन नाल।"
(ऐसे मौकों पर सुनील की हंसी छूटती है तब रमाकांत कहता है):
सुनील हंसा।
>"हस्स्या ई कंजर।"
सुनील और जोर से हंसा।

3. इंस्पेक्टर प्रभुदयाल का कथन (सुनील को):>>>
>"मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो।"

4. विमल के उद्गार:(गुरुवाणी):>>> [ ये यादाश्त से लिखा है, त्रुटियों की संभावना है। कृपया सही स्पेलिंग हिंदी की लिपि में बताएं।]
>"वाहे गुरु सच्चे पातसाह, तू मेरा राखा सबनि थानी।"
>"दीनदयाल दयानिध दोखन, देखत है पर देत न हारे।"
>"सुरा सोई पहिचानिए जो लड़े दीन के हेत। कबहूँ न छाड़े खेत सुरा सो ही।"
>"बांह जिना दी पकड़िये, सिर दीजै बांह ना छडिये।"
>"भय काहू को देत नहीं नहीं, नहीं भय मानत आहीं।"_'खालसा न किसी को डराता है, न ही किसी से डरता है।'
>"कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज़े सुखन। ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।"
>''सिर दीने सिर रहत है, सिर राखे सिर जाए।''
 >"देहु शिवा वर मोहि ईहै शुभ कर्मन तें कबहूँ न टरौं, न डरों अरिसो जब जाई लरौं निसिचै करि अपनी जीत करौं। जब आऊ की अउध निदान बनै अथि ही रण में तब जूझि मरौं!!''

...अभी और भी कई ऐसी ही ओजस्वी वाणी हैं, जो अभी याद नहीं आ रही।
फिलहाल, नमस्ते।
_श्री .
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ps : इस लेखन में जिन पंक्तियों को लाल किया है। उसने आज मुझसे बिछड़े मेरे मित्र, मेरे भाई डॉक्टर हरमिंदर सिंह कालरा मिल गए। सोशल मीडिया के माध्यम से इस लेख को facebook पर शेयर किया, fb-Friend श्री हरमिंदर छाबरा जी डॉक्टर एच एस कालरा मेरे मित्र के जीजाजी निकले; जिनसे मुझे डॉक्टर कालरा का पता मिला; यूँ भगवती भवानी ने बिछड़े मेल कराये। सभी का शत-शत-नमन।

Wednesday, January 23, 2013

मैंने निश्चय कर लिया है

मैंने निश्चय कर लिया है कि अब अपने कुछ मित्रों के पठान-पाठन से सबक लेकर कुछ कालजयी रचनाओं को पढने और कुछ सीखने का। इसलिए शायद अब इस ब्लॉग पर मैं कम ही पोस्ट रखूँगा। आत्मविश्लेषण के लिए स्वयं को पहचानने की आवश्यकता है। मुझे मेरी भूलों का अंदाजा हो रहा है। मेरा सोचना ठीक निकला। दुनिया प्यार- मोहाब्बत और दिलवालों से भरी पड़ी है। उनमे से जो भी चुनोगे हीरे-मोती ही मिलेंगे। फिर अपनी हांकने से पहले सामने फैले विशाल ज्ञान के भण्डार जो अनमोल रचनाएं हैं उन्हें पढ़े बिना कुछ कहना करना नादानी होगी। संभल कर चलने में ही गति है। और यही संभलने का सही वक़्त है।
........
_श्रीकांत तिवारी .

Baadsha Said :


थैंक्स डिअर! तुम्हे क्या लगता है, मुझे अपने लेखन में जारी रहना चाहिए?

Baadsha Said : Baadsha Said : > bilkul... 100% jari rehna chahiye. mujhe aapki lekhani bahut achchi lagti hai. bhasha pe aapki jo pakad hai woh bahut hi majboot hai. aur aap jo beech-beech mein apni lekhani mein ek akkhadpan/tethpan dalte hain to aur bhi achcha lagta hai. mujhe yakeen hai ki dhire-dhire aur log aapki lekhani se wakif hoyenge aur pasand bhi karenge.

 मुझे कुछ ऐसे ही उत्तर की अपेक्षा थी। तुम्हारे इस सहयोग और भरोसे का शुक्रिया।
_________________________23`FEB`13
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  • Niloy Ranjan Chakraborty Kya kahoon??? Main pahle hi kah chuka hoon ki apki lekhani aur hindi bhasha per apki pakad bahut achchi hai. Aapke ka likha hua padhna achcha lagta hai. Yeh bi achcha laga halanki main kuch baaton se ittefaq nahi rakhta lekin aap is lekh mein pehle hi bataa chuke hain ki yeh aapke mann ki hai aur main is baat ki izzat karta hoon.
  • श्रीकांत तिवारी पुत्तर जी ! प्लीज, एक्सप्लेन! अच्छी कमेंट प्रोत्साहित कर मार्गदर्शन कराती है। निष्पक्ष बेबाक कमेंट रास्ते पर लाती है। मैं भटकना नहीं चाहता इसलिए जिन बातों से तुम इत्तेफाक नहीं रखते उन्हें मेरे साथ यदि ओपन्ली नहीं तो -(मेसेज बॉक्स)- के थ्रू या और माध्यम...See More
  • Niloy Ranjan Chakraborty Mama, main jaldi bataoonga. Woh kya hai ki mujhe likh kar apni baat bataane me waqt lagega. Mujhe likhne ki aadat jo nahi hai. Lekin kuch aisa serious nahi hai. Aapke lekh ki mool baat se main jaroor ittefaq rakhta hoon.
  • श्रीकांत तिवारी जल्दी बताना पुत्तर जी, सस्पेंस से जान निकली जा रही है।


  • 05:57PM Ldga/Jh/India.23`01`2013
    बादशा..........!  इसे पढो। क्या यही बात है, जो तुम कहना चाहते हो :>
    ...कोई जब तरक्की उन्नति कर ऊंचे पायदान पर कदम रखता है तो वहाँ के नए और पहले से ही फले-फूले उन्नत समाज से उसका सामना होता है। अब चूंकि वही उसकी दुनिया है तो जाने-अनजाने या विवशता से उसे वहाँ के कल्चर, ट्रेडिशन और तौर-तरीके को अपनाना ही पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उसकी गति नहीं। कोई छोटे से शहर से बड़े शहर जाता है तो अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर भी उसे वहाँ के शहरी जीवन को अपनाना ही पड़ता है, क्योंकि इसके बिना वहाँ उसकी गति नहीं। इसी तरह कोई छोटा कलाकार अपनी कला के दम पर बड़े और पहले से ही बुलंदी के मंचों पर आसीन, पूर्वस्थापित और बुलंद कलाकारों की जामात में जाकर मिलता है तो उसे अपनी कलात्मक रूचि के कारण उनके साथ स्वाभाविक तारतम्य स्थापित करना ही पड़ता है, या हो ही जाता है। और आज के आधुनिक युग में भाषा के आधार पर यूँ छटनी-करण ठीक नहीं जैसा की मैंने भोजपुरी कलाकारों के इंग्लिश ज्ञान पर कटाक्ष कर दिया है। अमिताभ बच्चन के पिताजी तो हिंदी भाषा के साहित्यकार होने के बावजूद विदेश से पी.एच.डी. करते हैं  However from 1941 to 1952 he taught in the English Department at the Allahabad University and after that he spent the next two years at St Catharine's College, Cambridge, Cambridge University doing his doctoral thesis on W.B. Yeats. Harivanshrai’s thesis got him his PhD at Cambridge. तो ऐसे पारिवारिक वातावरण में साहित्य की उपासना तो होगी ही। चाहे वो किसी भी भाषा में हो। भाषा का बैरियर लगाकर किसी की खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं। आज का भोजपुरी कलाकार अगर भोजपुरी गाते हुए कभी इंग्लिश बोलता है तो इसमें क्या बुराई है। ऐसा करके उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया जो मैंने उनके बारे में तल्ख़ बातें लिख दीं जो मुझे उच्च विचार का नहीं बल्कि संकीर्ण विचार का व्यक्ति साबित करती है। अमित जी और बॉलीवुड के सितारे इंग्लिश बोलें तो ठीक; भोजपुरी वाले बोल दिए तो गलत!?_ये ठीक नहीं। और चूँकि तुम मुझसे प्यार करते हो सो तुम्हें मुझसे ऐसे कमेंट्स की उम्मीद नहीं थी। तुम चाहते हो कि मैं अपने विचारों को भले हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन इसके साथ ही मुझे अपनी सोच को व्यापक करना होगा। सबके लिए, सभी भाषा के लिए सम्मान का नजरिया रखना होगा तभी कोई बात बन पाएगी, अन्यथा मेरी दुसरे लोग ऐसी आलोचना करेंगे कि मुझे वापसी का दरवाज़ा ही देखना पड़ेगा। क्योंकि लेखन क्षेत्र में ऐसे संकीर्ण विचारों के लिए कोई जगह नहीं। और यही बात कांटे की तरह मेरे अपने अजीजों को भी चुभेगी कि आज दौर में भी मैं इतना पढ़-लिखकर अपनी सोच इतनी छोटी रखता हूँ। ___यही बात थोडा दर्द दे गई। है न पुत्तर जी?
    अब देखो उपरोक्त भी तो मैंने ही लिखा है ना! मेरी अपनी ही बातों में कितना विरोधाभास है। पर यह बात तुम्हारे ज़रा सा हिंट देते ही मेरे लिए चुनौती बन गई; फलतः मैंने अपने "...मन की" को सुधारा तो नहीं; उसके बदले एक नई पोस्ट की रचना की ताकि ये रिकार्ड रहे। मुझे तुरंत ही पूरा अहसास हो गया कि कहाँ चूक हुई है!! अभी तो मैंने ऊँगली पकड़कर चलना शुरू किया है, इसलिए मुझे चाहिए कि मैं अभी और अध्ययन कर लूं।
    मैंने पहले ही कहा है जिस मन से प्रशंशा सुनते हैं, उसी मन से आलोचना भी सुननी चाहिए। इसीलिए तो आपको दोस्त माना है, प्यारेलाल।
    _श्री . 


    Thursday, January 24, 2013

    Srikant Mama,

    जिन से तुम इत्तेफाक नहीं रखते वो बतलाने वाले थे, मैं प्रतीक्षा में हूँ।


    Srikant Mama,
    Main aapke mool baat, jispe aapne yeh lekh likha hai, se puri tarah sahmat hoon. Hindi bolne aur likhne walon ko nichi nazar se dekhne waale log khud apne mansik diwaliyepan ka parichay dete hain. ismein koi do raiy nahi ki aise log padhe likhe ganwar hote hain jo khud ko intellectual samajhte hain, lekin asal mein agyani hote hain.
    khair yahan ye jawab likhne ka karan yeh hai ke main aapke do baaton se asahmat hoon.
    1. angreji aksharawali ke akshar ko hindi likhne ke liye istemal karna kahin se bhi hindi ka apman nahi hai balki yeh to samman ki baat hai ki apke paas angreji akshar rahne ke bawjood aap unka istemal hindi likhne mein kar rahein hain. Aaj kal ke bhag daud ke is daur mein hamesha hindi aksharawali mein likh pana mumkin nahi ho sakta, khas kar aap jab electronic samaan istemal karte hon. yeh baat to aap bhi manenge ke hindi mein type karna angreji mein type karne se jyada mushkil hai aur waqt bachane ke liye bahut baar aisa karna padta hai. main to hamesha hi yeh karta hoon kyonki pehli baat to mere computer pe hindi fonts nahin hai, jo ki main asani se rakh sakta hoon, aur doosri baat hindi type karne mein thoda samay to lagta hai kyunki uski practice nahi hai. ab aap kah sakte hain ki yeh kaunsi badi baat hai, practice karlo. lekin mera kaam aisa hai ki mujhe angreji mein hi hamesha type karna padta hai aur agar main hindi practice karron to mere liye apne ungliyon mein samanjasya baithana mushkil ho jaige. duniya mein shayad bahuit kam typist honge jo alag alag bhashaon mein utni hi asaani se type kar lete hain. Main bas yahi kahna chahta hoon ki bahut log aisa hindi ka apmaan karne ke liye nahi balki majboori mein karte hain.

    2. Doosri baat jisse main sahmat nahi hoon, woh apka yeh kehna ki ab aap angreji sikh nahin sakte. mujhe maloom hai ki aap angreji samajh bol lete hain, phir bhi main yeh kahoonga ki sikhne ke liye to koi umar nahin hoti. hindi ka man samman apni jagah hai aur rahega lekin angreji sikhne se hindi ka man samman nahi chala jayega. jaise hindi hamari rashtrabhasha hai aur hamein yeh aana chahiye waise hi is yug mein tarraki ke liye angreji aanaa bahut jaroori hai. yeh globalization ka zamana hai aur aap apne aapko ek jagah baandh ke nahin rakh sakte hain. aapko aage bdhna hai to yeh bhashaa to sikhni padegi. apni bhashaa jante hue kuch aur bhashayein sikhne mein koi burai to nahi hai. aur sikhne ki koi umar nahi hoti. main isliye bhi yeh kah raha hoon ki agar kisiko angreji ka gyan nahin hai to use higher studies karne mein bahut pareshani hogi kyunki aage ki padhai ke liye jaroori kitabein shayad hi aapko hindi mein milengi. kahin bahar jakar naukri karne mein bahut pareshani hogi. duniya ke alag alag hisson ko samajhne mein bahut pareshani hogi.
    bas wahi lik raha tha
    main bas yehi kehna chah raha tha ki koi bhi cheez agar sikhne mile to sikhna chahiye aur uski koi umar to hoti nahi hai. isliye aapka yeh kehna ki aap sikh nahi sakte se main sahmat nahi hoon.

    kuch amitji ki ke baare me kahi baaton se bhi main sahmat nahi hoon per woh baatein discuss karna jaroori nahi hai.
    Chat Conversation End.
    थैंक्स डियर! 100% agreed !! एक बात साफ़ कर दूं जो कि असलियत है :_"मुझे हिंदी टाइपिंग बिलकुल नहीं आती। हिंदी मैंने सीखा ही नहीं है, न ही इसकी ट्रेनिंग ली है।_"  "ये सब मेरे ब्लागस्पाट पर कम्पोजिंग करते समय खुद हो जाता है, वर्ना मेरे सामने भी वही मजबूरी है जो तुम्हारे सामने है। मैंने बताया हुआ है कि पहले इसकी उपलब्धता न रहने के कारण मुझे भी बातें इंग्लिश keyboard पर ही ठोकनी पड़ती थी। जबसे google  पर अपना ब्लॉग मैंने बनाया है तो उसमे ये सुविधा है कि  '-जब इंग्लिश कीज़ पर हिंदी के शब्दों को टाइप किया जाता है तो वो ऑटोमेटिकली "देवनागरी" में प्रकट हो जाता है। ऐसा होता पाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि अब ऐसे softwares उबलब्ध हो गए हैं। जिसे प्रयोग में लाने से अपनी मातृभाषा के शब्द देवनागरी लिपी में आसानी से लिखे जा सकते हैं। बस जरूरत है स्पेलिंग के लिए सही कीज़ पंच करना। बाकी अपने-आप हो जाता है। पर अफ़सोस  है कि इसे DOWNLOSAD करके INSTALL नहीं किया जा सकता।"
    और ये सच्ची बात है प्यारे, कि मैं स्पोकन इंग्लिश नहीं सीख पाऊंगा। मैं थोडा कमज़ोर स्टूडेंट रहा हूँ। स्कूल में मुझे इंग्लिश में 100 में 80 नबर आते थे वो और बात है पर प्रैक्टिकल लाइफ में इसे बोलना पड़ा तो मैं असक्षम सिद्ध हुआ। """खफा होकर मैंने अब अंग्रेजी को गरियाना शुरू किया ऐसी बात नहीं है। वो दूसरे ज़ज्बे की बात है जो राष्ट्रभाषा के समर्थन में मैंने अपनी आवाज़ लगाईं है।""" इंग्लिश बोलना सीखने की तमना मेरी तभी पूरी हो पाएगी जब मैं इंग्लिश वातावरण में इंग्लिश बोलने वालों की संगत में 1-2 साल समय बिताऊं। ऐसा हो नहीं पायेगा। यही मेरी मजबूरी है। इसीलिए मैंने कहा की अब मैं अंग्रेजी सीख नहीं सकता।

    मैंने अपने बच्चों को खुद इंग्लिश सिखाया ताकि वो आगे बढ़ सकें। मैंने लोहरदगा में स्पोकन इंग्लिश कोचिंग इंस्टिट्यूट की स्थापना की थी ताकि अपने शहर में इसे बढ़ावा दूं; लेकिन एक वाहियात गद्दार ने मुझे ऐसा धोखा दिया जिसके ज़ख्म अभी भी ताज़ा हैं, जिसके कारण मेरे पुत्र सामान कमल को ताजिंदगी शर्मिंदगी का भागी बनना पड़ा। मैंने अपने इंस्टिट्यूट में खुद गद्दी की नौकरी करते हुए 6-महीने विद्यार्थियों को इंग्लिश-ग्रामर की शिक्षा दी जिसे जारी रखने का प्रयास किया (जिद्द किया) जो खेद है, मुझसे पूरा न हो सका। अंततः मुझे इंस्टिट्यूट बंदकर लाखों रुपयों का नुक्सान झेलना पड़ा। मैंने पहले ही कहा मैं तुम्हारी बात से 100% सहमत हूँ। मैं बच्चों को हमेशा हरदम ये कहता हूँ कि अपने सपने सच करने हैं तो इंग्लिश, गणित और साइंस(विज्ञान) पर अपनी मज़बूत पकड़ बनानी ही होगी, एक समय कम खाओ पर अपनी जिद्द मत छोडो। इंग्लिश ग्लोबल लैंग्वेज है इसे अपनाए बगैर तरक्की मुमकिन नहीं। मुझे ख़ुशी है कि जिम्मी, सन्नी ने ऐसा कर दिखाया लेकिन लड्डू (बेचारा) भाइयों के बाहर चले जाने के कारण अकेला पड गया। थोडा नहीं बहुत कमज़ोर है। और इंग्लिश इसकी सबसे बड़ी समस्या है। अब 1-महीने के बाद इसकी 10वीं बोर्ड की परीक्षा है। 
     उम्मीद करता हूँ आगे भी तुम्हारा समर्थन और प्यार मेरे प्रति बना रहेगा। सुप्रिया ने लेख पसंद किया, उसका कमेंट उत्साहवर्धक है, ठीक उसी तरह जैसे तुम्हारा। थैंक्स अगेन! 

बचपन की याद से स्फूर्ति

23,फ़रवरी,2013 बुधवार लोहरदगा

बचपन की याद से कितनी स्फूर्ति आ जाती है!!
मुझे याद है जब मैं बिछावन पर आराम करते बाबूजी की देह पर कैसे चढ़कर उनके गुदगुदे पेट पर बैठ जाता था! बाबूजी मुझे अपनी छाती से भींच लेते थे। इस क्रम में उनकी बनियान ऊंची सरक जाती थी, उनका गोरा पेट और उनकी नाभि नुमाया हो जाती थी। मैं बालसुलभ चंचलता से उनकी नाभि में ऊँगली डाल देता था, बाबूजी गुदगुदी के मारे हँसते हुए बेहाल हो प्रेम से मुझे चूमते और नाटकीय तरीके से मुझसे कुश्ती लड़ने लगते थे। वे मुझसे हारने का ड्रामा करते और मुझे अपने गँवई अंदाज़ में भोजपुरी के कहावात दोहे के रूप में सुनाते थे :
 "सात भँईंस के सात चभ्भुक्का, सोरह सेर घीऊ खाऊं रे।
 कहाँ बाड़े तोर बाघ मामा, एक तकड़ लड़ जाऊं रे।।"
.....यह याद आते स्वतः मन मुस्काने, ...पर दिल रोने लगता है। अल्पायु में ही हमने अपने बाबूजी को खो दिया। इसके लिए ऊपर वाले से मुझे हमेशा शिकायत बनी रहेगी।

आज गद्दी में स्वर्गीय शिव बाबु की पुण्य तिथि मनाई जा रही है। जहां मेरी बैठने की जगह पर बाबूजी की तस्वीर मुझे मेरी ओर ताकती दिख रही है, वे मुस्कुरा रहे हैं।

_श्री .  

मन की.........

स्वीकारोक्ति : यह लेख लम्बा हो गया है:
गर्मी ने जोरदार धमकी दे दी है। पता नहीं इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग के लिए कथित रूप से जिम्मेवार "चतुर रामालिंगम" का हाथ है या नहीं लेकिन इस बार की गर्मी दहशतनाक होगी। तय है। 

आप जब भी इस पेज को खोलोगे मुझे प्रायः यहाँ अडिग खड़ा मौजूद पाओगे; तुम्हारे प्यार और सहभागिता के लिए..., (प्रायः ; अक्सर इसलिए कि रिज़क भी कमाना होता है, अतः हमेशा, सदा, सर्वदा जैसे वादे नहीं कर सकता)...........
मैं शब्दों के संसार में विचारने वाला स्वछन्द प्राणी हूँ, किसी भी ख़ास समुदाय, ग्रुप के तानाशाही बंधन, पाबंदी, नियम और शर्तों से परे, ...आज़ाद! ...हो सकता है मेरी ये आज़ादी आपको या किसी और को और नहीं तो औरों को नागवार और अ-संस्कृत लगे और मुझे ले डूबे! लेकिन बेझिझक-बेहिचक "एकला चोलो रे" _मेरी नीयति है, मैं इसे नहीं बदल सकता। पर, मैं लम्पट नहीं। मैं अभद्र नहीं। मैं कायर नहीं। देशप्रेम के ज़ज्बे से भरपूर! दोस्ती के ज़ज्बे से भरपूर! भाईचारे के ज़ज्बे से भरपूर। और प्यार दुलार से मजबूर.....।
अगर किसी को मुझसे दुर्गन्ध की धमकी मिलती हो, या मेरे साथ डूब जाने का खतरा सताता हो तो सबसे पहले वही मैदान छोड़ेगा, मैं नहीं।
सबसे पहले वही मुझे Unfriend करेगा, मैं नहीं।
सबसे पहले वही मुझे Unsubscribe करेगा, मैं नहीं।
मुझे शब्दों से न हटा सकोगे मित्रां! मैं तो इतना प्यारा हूँ कि प्यार से ही मर जावांगा।
"यारां नाल बहारां मेले मित्तरां दे"-पे में कुर्बान भी हो जाऊं तो कोई गम नहीं।

अंग्रेजी ज्ञान पर होती हिंदी की उपेक्षा के सन्दर्भ में मैंने पिछले दिनों अपने विचार कुछ इस तरह व्यक्त किये थे; जिनमे आज कुछ नये शब्द जोड़ रहा हूँ: मुझे झेल सकते हो झेलो __ वर्ना कोई बंधन नहीं।

मुझे हैरत है इन नामोंनिहाद, मशहूर-ओ-आम शुद्ध भारतीय सुपर स्टार्स से,चाहे वो किसी भी क्षेत्र के हों, की अंग्रेजी-प्रेम और हिंदी की उपेक्षा पर! कई ऐसे लोग जो खाते तो हिंदी का हैं पर गाते हैं अंग्रेजी का, अंग्रेजी बोल कर। हिंदी में सवाल करो वो अंग्रेजी में उत्तर देते हैं। फिल्मों की नगरी में सिवाय अमित जी, जो स्वयं हिंदी के बड़े विद्वान् फ़िल्मी हस्ती हैं, धरम पा जी और दिलीप साब (जो बड़ी उम्दा उर्दू बोलते हैं) और कुछ अन्य लोगों की तरह जो अपनी मातृभाषा की खूब कद्र जानते और करते हैं को छोड़ कर, बाकी के सारे के सारे हिन्दुस्तानी नामचीन हस्ती जो हिंदी क्षेत्र  के हैं पता नहीं क्यों अंग्रेजी के भूत से इतना डरते हैं कि उसकी गुलामी करने और उसका मैला चाटने से बाज़ नहीं आते। फिल्म 'कहानी'(विद्या बालन वाली) की पार्टी के विडियो में भोजपुरी फिल्म के एक सुपरस्टार ने फिल्म की तारीफ़ अंग्रेजी में यूँ करते नज़र आते हैं जैसे अब उन्हें बिहारीपन से मुक्ति मिल गई हो और अंग्रेजी बोलकर वे जताना चाह रहे हों कि -'हे बॉलीवुड भगवान् मैंने तुम्हारे लिए ही तो भोजपुरी को माध्यम बनाया था, अब तो मेरी तरफ अपनी नज़रें ईनायत करने की कृपा करो, देखो अब तो मैं भी फर्ल-फर्ल अंग्रेजी बोलने लगा!!" जबकि इस फिल्म के निर्देशक सुजॉय घोष बिना हिचके अपने बंगाली होने के बावजूद कभी हिंदी में भी बोलते दिखे। भोजपुरी लोक गीतों की एक गायिका ने नाम-मशहूरियत-दौलत से मालामाल होने के बाद जब अपना पहला इंटरव्यू दिया तो कैमरे को देखते ही उनकी भंगिमा बदल गई, जैसे शिकायत कर रहीं हों कि मरदूद अभी तक कहाँ क्या कर रहा था! फिर जब सवाल पूछे गए तो उनके मुँह से अंग्रेजी की धार फूट पड़ी, यूँ बोलीं जैसे मडोना को मुँह चिढा रहीं हों। _हैं न अंग्रेजी की महीमा?

 इसी महिमा की रोग से ग्रसित मैं खुद भी हूँ। जब आप मेरे पोस्ट्स पढ़ रहे होते हैं तो उनमे मेरी अभिव्यक्ति में आपको हिंदी फ़ॉन्ट्स में इंग्लिश के शब्द मिलते हैं, उर्दू और एकाध बार पंजाबी के शब्द भी मिलेंगे। वो इसलिए कि पढने-लिखने की रुचि के सन्दर्भ में मैं जैसे लेखकों को पढता हूँ उनमे सबसे सर्वोत्तम अभिव्यक्ति- अंदाजेबयां की शैली श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक सर की है, जिनके 'सुनील'/'विमल'-सीरिज़ में चार भाषाओं की स्वादिष्ट चासनी होती है। सुनील सीरिज़ में रमाकांत की वजह से जो पंजाबी है, और जिसकी हिंदी थोड़ी कमजोर है लेकिन हँसी-ख़ुशी के जो फव्वारे फूटते हैं वह शाश्वत (सच्ची/निर्मल) प्रसन्नता बिखेरती हैं। इसी क्रम में 'विमल सीरिज़' में खुद विमल जो असलियत में सरदार है, सिक्ख है, की वजह से पंजाबी और गुरुवाणी पढने को मिलते है। मेरी पुस्तकों की अलमारी में आपको पाठक सर के उपन्यासों की बहुलता के बीच -सिडनी शेल्डन, डैन ब्राउन, जेम्स पीटरसन, और स्टीफन किंग, डेविड बाल्डाक्की की किताबें भी दिखेंगी। जिनमे सिडनी शेल्डन की प्रकाशित सभी सतरहों (17) उपन्यास मैंने पढ़े हैं। डैन ब्राउन की अभी तक प्रकाशित पाँचों उपन्यास मैंने पढ़ी है। जेम्स पीटरसन की कहानियों पर हॉलीवुड में फिल्मे भी बनी हैं लेकिन खेद है उनकी लेखन शैली में मुझे मज़ा नहीं आया। दाम वसूलने की जिद में किसी तरह इन्हें झेला। और स्टीफन किंग साहब से मैं विनम्रता से माफ़ी चाहूँगा,.....1-2 चैप्टर से ज्यादा मुझसे नहीं पढ़ा गया, क्यों? भई ज़रा-सा भी कुछ समझ में ही नहीं आया। जबकि हॉलीवुड के ये बड़े दुलारे "हॉरर" लेखक हैं। उनके 2-उपन्यास अभी भी नये के नये यूँ ही पड़े हुए हैं। इसी तरह अमिताभ बच्चन का प्रशंसक होने के बावजूद मैं उनके ब्लॉग को नहीं पढ़ पाता, _बड़ी भारी अंग्रेजी लिखते है। यदि अमित जी अपने ब्लॉग पर हिंदी में लिखें तो इंग्लिश का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर हिंदी का बहुत कुछ संवर जाएगा। डैन ब्राउन के लेखन में गज़ब की कशिश है! इन्ही साहब की लिखी 'रॉबर्ट लैंगडन' सीरिज़ की सभी तीन उपन्यासों पर हॉलीवुड में फिल्मे बनी, अलबत्ता तीसरी 'दी लॉस्ट सिंबल' अभी प्रदर्शित नहीं हुई है। इनके छठे उपन्यास के लिए इनके विश्व व्यापक फैंस में भारी बेचैनी है। सिडनी शेल्डन की 17-हों उपन्यास मुझे पसंद आईं। और अपनी पसंद मैं रिपीट कर पढता ही रहता हूँ। जिनमे सबसे ज्यादा मुझे मेरी अपनी मातृभाषा हिंदी में पाठक सर को मैं रोज़ पढता ही रहता हूँ। इसी वजह से मेरी भाषा में कहीं-कहीं पाठक साहब का प्रभाव है। और इसपे मुझे फक्र है। ये पाठक सर की लेखनी का ही ज़हूरा है कि बचपन की फंतासी (तिलस्मी) दुनिया से बाहर निकलकर मुझे यथार्थ के धरातल पर आना नसीब हुआ, 'मीना मर्डर केस' नामक सुनील सिरीज़ का उपन्यास जब मैंने पढ़ा था तब आवाक रह गया था। इसी उपन्यास के कारण मैं पाठक सर का मुरीद बना। इस उपन्यास के कथानक ने मुझे ऐसा झिंझोड़ा झकझोरा जिसके वजह से हिंदी क्राइम फिक्शन नोवेल्स पढने के मेरे सारे कांसेप्ट को बदल कर रख दिया। साहबान, वो दिन है और आज 'सीक्रेट एजेंट' का दिन पाठक सर के अलावे हिंदी क्राइम फिक्शन के किसी दुसरे लेखक के उपन्यास को मैंने छुआ तक नहीं, और आइन्दा आगे ऐसा होगा भी नहीं।

समय के साथ-साथ मुझे कई विषयों में रूचि हुई जिसके अनुसार मेरे पास ग्रंथों के अम्बार जमा होने लगे। आध्यात्म में रूचि हुई तो उस सन्दर्भ के ग्रंथों की संगत हुई। कई 'पुराण', 'श्रीमद्भागवतगीता' की कई टीकाएँ, 'श्रीशुकसुधासागर', 'महाभारत', 'वाल्मीकि रामायण', 'आध्यात्म रामायण', तुलसीदास जी की 'रामचरिमानस', तुलसी साहित्य की 'मानस रहस्य' और अनेक तुलिदासविरचित रचनाएं, और भी कई प्रकार के गीताप्रेस की किताबें मैंने पढ़ी। साहित्य के लिए मुंशी प्रेमचंद जी की 'गबन', 'गोदान' तथा और भी कई कहानी संग्रह पढ़े, रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' अभी भी पढता हूँ, बच्चन जी की कालजयी 'मधुशाला' भी जब मन करे पढने लगता हूँ।

आप पूछ सकते हैं कि जब मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो तक़रीबन 25-30 इंग्लिश के उपन्यास मैंने कैसे पढ़ डाले? जबाब है_ 1. रूचि, 2. उत्सुकता। और मेरी पहली रुचि के पीछे मेरे पुत्र प्रितीश हाथ है। जब मैं एकबार हॉलीवुड की फिल्म "दी डा विन्ची कोड" हिंदी में (डब) देख रहा था तब उसने कहा था कि वो इस फिल्म की मूल कहानी जिसपे ये फिल्म बनाई गई है उसकी पढ़ी हुई है। मैंने कोई ध्यान नहीं दिया था। इंजीनियरिंग में उसके सिलेक्शन के बाद काउंसलिंग के लिए उसे लेकर 2009 अगस्त में जब मैं कोलकाता गया था, तब लौटने के क्रम में कोलकाता ट्रेन स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर रात के वक़्त हम अपनी ट्रेन लेट होने की मजबूरी में वक़्तगुजारी के लिहाज़ से एक बुक स्टाल पर जा खड़े हुए। मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि मुझे पाठक सर की लिखी नई पुस्तक 'प्यादा' मिल गई थी।  तभी प्रितीश (जिम्मी) ने मुझसे कुछ पैसे मांगे, मैंने पूछ क्यों, तो वो मेरा हाथ पकड़कर वापस बुक स्टाल तक ले गया। उसने मुझे इंग्लिश की एक उपन्यास दिखाई और बोला कि वो इसे खरीदना चाहता है। मैंने उसे वो उपन्यास ले लेने दिया। वो था डैन ब्राउन का लिखा "ऐजेल्स & डीमन्स"! उसने उसी वक़्त मुझसे कहा कि मैं उसे पढूं। मैंने कहा -'बेत्त! हमरा बुझैतई?' उसने कहा -'आप पढ़िए तो!" मैंने कोशिश की, जिसका परिणाम ये हुआ कि पूरे सफ़र में मैं उससे पूछता रहा कि उसका पढना पूरा हुआ या नहीं!? ताकि मैं पढ़ सकूँ! बचपन से ही सस्पेंस, थ्रिलर और रहस्य कथाओं का रसिक हूँ। डैन ब्राउन ने बड़ी ही सरल और सहज ही समझ में आने लायक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग किया है। और यह उनके सभी उपन्यासों में है। उनकी लेखन शैली मुझे खूब भाई। उनके उपन्यासों में 'डिसेप्शन पॉइंट' मुझे अलग से पसंद है क्योंकि 'इस उम्र' में मेरी धड़कन फिर से धक्-धक्' हुई थी, सस्पेंस से!! इसी प्रकार सिडनी शेल्डन भी सरल इंग्लिश लिखते थे। हिंदी लेखकों ने इनकी कहानियों के कई सीन अपने उपन्यासों में सेम-टू-सेम (पात्रों और स्थान का नाम बदलकर) उसे अपनी सोच के मुताबिक कॉपी किया है। दुःख है 2005 में उनका निधन हो चुका है। क्राइम क्वीन अगाथा क्रिस्टी की 'हरक्युल पोइरोट' सिरीज़ के 4 ही उपन्यास मैंने पढ़े हैं। अगाथा क्रिस्टी के बारे में विख्यात है कि ससार में अब तक बाइबल के बाद सबसे ज्यादा इन्हीं के उपन्यासों की बिक्री हुई है जो एक रिकार्ड है। इसके बावजूद -धन्य हो देवता!- मुझे अंग्रेजी लिखना-बोलना नहीं आया और आइंदे शायद आएगा भी नहीं।

अंग्रेजी जानना और बोलना कतई बुरी बात नहीं, न ही मैं इसके खिआफ़ किसी प्रकार का जिहाद कर रहा हूँ। खुद मेरे अपने बच्चे, और नाते रिश्ते के कई लोग इंग्लिश माध्यम के छात्र रहे हैं जिन्हें कभी-कभी हिंदी की शब्दावली ज्यादा भारी लगती है। मेरी भांजी रिम्पी(प्रियंका) के पति मेरे दामाद उदयन जी बंगाली हैं फिर भी उन्हें हिंदी तो क्या बंगाली पढने में भी दिक्कत होती है, जिसके लिए उन्हें अफ़सोस है कि वे मेरे पोस्ट्स नहीं पढ़ पाते। पर वे हिंदी को नीची निगाह से नहीं देखते। न समझने पर उत्सुकता से मतलब पूछ लेते हैं। अभी हाल ही में मैंने प्रितीश को अपना लिखा लेख 'सूरज और प्रहरी' पढ़कर उसपर कमेंट करने को कहा। उसने खूब मन लगाकर पढ़ा। मैंने पूछा -'कैसा लगा?' उसने कहा -'बढ़िया! लगता है जैसे कोई सुरेन्द्रमोहन पाठक के बहुत "दीवाने" फैन ने लिखा है।' मैं खुश हो गया। थोड़ी ही देर उसने बड़ी मासूमियत से पूछा -'ये "प्रहरी" क्या होता है?' अब आप ही सोचिये कि मेरी क्या हालत हुई होगी। ये परिणाम है अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा का! उसकी अभिव्यक्ति इंग्लिश है, वो उसकी ख़ुशी। मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम हिंदी है, मेरी ख़ुशी।

मुझे गर्व है की मैं हिंदी भाषी हूँ। हिन्दुस्तानी हूँ, हिंदी बोलता हूँ, हिंदी पढता हूँ, हिंदी लिखता हूँ।

मैं एक बेहद मामूली आम आदमी हूँ, मैंने अपनी शिक्षा के माध्यम से कोई भी गौरव हासिल नहीं किया है। इस हिसाब से मैं खुद को एक अशिक्षित [uneducated] ही कहूँगा। अतः क्या मुझे डर के मारे अपना मुँह लपेट कर किनारे जा बैठना चाहिए!? न बोलूं, लिक्खूं, न किसी तरह का प्रतिवाद करूँ, न ज़ुल्म की मुखालफत करूँ, न अपनी बात कहूँ, न अपनी पसंद-नापसंद को ज़ाहिर करूँ! क्या ये ठीक रहेगा? एकबार एक बन्दे ने इंग्लिश में कई शब्दों को एक साथ जमा करके मुझे कोसा, मेरी निंदा की और खूब अपनी भड़ास निकाली और ऐसा कर उन्होंने खुद अपनी पीठ थपथपाई। वो "निन्दीय निंदा" अभी भी मेरे पास है, मेरी बहुमूल्य संपत्ति की तरह। यह मेरी सबसे बड़ी कमाई है, क्योंकि 'निंदक नियरे राखिये' पर मेरी श्रद्धा है। पर क्या फायदा? इंग्लिश तो मुझे आती ही नहीं! और इन शब्दों के मतलब डिक्शनरी में खोजते फिरने की किसे फुर्सत है!? आज भी कभी उस पृष्ठ को देखता हूँ तो सोचता हूँ लिखकर पोस्ट करते वक़्त ये ज़नाब कितने खुश, और स्वाभिमान से भरे होंगे। उनकी ये ख़ुशी बनी रहे। पर उस पन्ने पर उस बन्दे की लिखावट का मतलब समझने के लिए मैं तो अब अंग्रेजी सीखने से रहा।

आप बाज़ार से कोई सामान खरीदते हैं तो अपनी जेब से उसका मूल्य चुकाते हैं। सामान पसंद आती है तो उसकी तारीफ़ करते हैं, नहीं पसंद आती तो शिकायत करते हैं। और ये मेरा हक है कि मैं अपनी नापसंदगी खुलकर ज़ाहिर करूँ। ऐसा करने वाला क्या इस सृष्टि पर मैं अकेला व्यक्ति हूँ? अमिताभ बच्चन सदी के महानायक हैं। इससे किसको इनकार है! मेरा परिवार, मेरा पूरा जीवन इस बात का साक्षी है कि अमित जी मेरे लिए क्या हैं। पर मैं यह कहने और मानने से पीछे नहीं हटूंगा कि उन्होंने भी फ्लॉप फ़िल्में दीं हैं। कुली फिल्म के फाईट सीन को फिल्माते वक़्त वे घायल न हो गए होते तो आप ईमानदारी से सच बोलिए - कहिये उसमे ऐसा क्या था जो पसंद के लायक था। सिर्फ एक चीज़ अच्छी थी। अमित जी की शानदार पर्सनालिटी। उसके बाद क्या ये सच नहीं है की उनकी फ़िल्में लगातार फ्लॉप होती चली गयीं? इससे क्या हम सुखी हो गए थे? जी नहीं। खून के आठ-आठ आँसू रोते थे, और कामना करते थे कि अब...अब...अब अमिताभ फिर दहादेंगे। पर कुली से शुरू हुई उनकी फिल्मों की क्वालिटी की गिरावट सन 2000 ही में संभली। तबतक जवानी की कई बहारें वो गंवा चुके थे। अगर यह झूठ है तो साबित कीजिये। क्योंकि मैंने पहले ही इसी ब्लॉग के शुरूआती पृष्ठों में अपनी कही बात को साबित किया हुआ है। खोलो WIKIPEDIA! देखो उसमे अमित जी की फिल्मोग्राफी! हर साल के साथ उनकी प्रदर्शित फिल्मों की कहानी छापी हुई है। और जैसे-जैसे उनकी फ़िल्में प्रदर्शित होतीं गईं अपनी उम्र और कक्षा के साथ हम भी बड़े होते गए। ये सारी हिस्ट्री मैंने विस्तार से "अमिताभ बच्चन और मैं" शीर्षक के अंतर्गत लिखा हुआ है जो इसी ब्लॉग पर अभी भी मौजूद है। कौन हिट, कौन फ्लॉप, सब सामने आ जाएगा। सबसे बड़ा सुबूत तो अमित जी स्वयं हैं जो अनेको बार उन्होंने खुद ये बात स्वीकार की है। पर क्या उन्होंने उसमे मेहनत और लगन से काम नहीं किया था!? क्या वो 'नेम-फेम-मनी' के मारे बौरा गए थे? जी नहीं! ऐसा उनकी उस वक़्त की बदकिस्मती के सिवाय और कुछ नहीं था। 'सिलसिला' के बाद स्वर्गीय यश जी ने भी अमित जी के साथ कोई फिल्म नहीं की। जो 'दीवार', 'कभी-कभी', 'त्रिशूल', 'काल पत्थर' जैसी वो फ़िल्में दीं जिनमे 'विजय' बने अमिताभ के किरदार भुला पाना असंभव है। क्या ऐसी सफलता अमित जी ने फिर कभी रिपीट करी? की हो तो बताओ! मैं आपको चुनौती देता हूँ। ...पर खेद है ऐसा है ही नहीं कि मैं मेरी बात झूठी हो जाय। 'सलीम-जावेद' की जोड़ी टूट गई थी। बदकिस्मती से कोई दूसरा कहानीकार, डायलाग लेखक वो काम कर के न दे सका, जो शोले। दीवार।डॉन। त्रिशूल। काल पत्थर। खून-पसीना। जैसी कामयाबी को दुहरा पाता। न मनमोहन देसाई और न ही प्रकाश महरा ने अमित जी की सफलता को बनाए रखा। 'मर्द' में आपको क्या भाया था? 'गंगा जमुना सरस्वती' में आपको क्या भाया था? 'जादूगर' में आपको क्या भाया था? 'तूफ़ान' में आपको क्या भाया था? 'लाल बादशाह' में  क्या भाया था? नथिंग! सभी फ्लॉप हो गए। न ढंग की कहानी थीं, न ढंग का निर्देशन! अतः नतीजा खराब हुआ। वर्ना व्यक्तिगत तौर पर आज अमित जी जितने प्यारे हैं इससे कहीं ज्यादा "तब" प्यारे थे। महान इंसान जिस शिद्दत से कामयाबी कमाता है, उसी शिद्दत से नाकामयाबी को मंज़ूर भी करता है। और अमित जी स्वयं इस बात की बेमिसाल 'मिसाल' हैं।  इसीलिए उन्हें बारम्बार मेरा सलाम है। ठीक इसी प्रकार ये मेरा हक है कि अगर मुझे सुरेन्द्रमोहन पाठक की कोई रचना पसंद नहीं आती तो अपनी नापसंदगी खुल कर जाहिर करूँ। पर ऐसा नहीं है। पाठक सर ने अभी तक जो रचा वो हिंदी क्राइम फिक्शन का इतिहास बन गया जिसमे हर उपन्यास एक मील के पत्थर की तरह अडिग खड़ा है। इसके लिए पाठक सर को मेरा सलाम।

मुझे खेद है की "अमिताभ बच्चन और मैं" की रचना करते वक़्त मेरे पास इस ब्लॉग की उपलब्धता नहीं थी, जिसके कारण मुझे रोमन फोंट्स में हिंदी लिखनी पड़ी। पर मैं कोशिश करूंगा की उन्हें देवनागरी में तब्दील कर सकूँ।

मैं सिर्फ अपने 'नायकों', भले चाहे वो किसी भी फील्ड के हों, सिर्फ ये गुजारिश करना चाहता हूँ कि वो हिंदी की नाकद्री और उपेक्षा बंद करें। इसी विषय पर मैंने कुछ लिखा है; जिसे मैंने "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"/facebook  के साथ शेयर किया, जिसे सराहा गया  :>> 
  "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे" 
"जो लोग अंग्रेजी बोलने से खुद को विद्वान मानते हैं और हिन्दी में अपनी तौहीनी समझते हैं........वो ये जान लें कि अंग्रेज मुल्कों में Toilet साफ करने वाला भी अंग्रेजी बोलता है, अतः भाषा से किसी की विद्वता परिभाषित नही होती....

मात्रभाषा हिन्दी ही हमारी पहचान है॥जय हिन्द!".....<यह मेरी नहीं क्रांतिकारी सोच की वाणी है।
मैंने जो कहा है वो निम्नलिखित है: 

यहाँ >>> आगे मेरे विचार हैं : पढ़िए :>>>

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"________श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र।

 ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!? अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर बाबू जिम्मेवार हैं उनका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन। नमस्ते महोदय !! अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे। सबसे अच्छी भाषा वही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है। ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable); अछूतपन का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है। मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है। अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

 जय हिन्द। 

_श्री.

Tuesday, January 22, 2013

"यार" पे कर दे सब कुर्बान!!"

यार के साथ मेले की बहार का मज़ा अपने घर में, या बाहर कैसे लिया जाता है इसे जानने के लिए रमाकांत मल्होत्रा 'अम्बरसरिये' नूं और सुनील को जानना बहुत जरूरी है। >>>"अमेरिका के एक नेता - Charles Evans Hughes ने एक बार हमारे जीवन में दोस्तों की अहमियत को दर्शाते हुए कहा था - "A man has to live with himself, and he should see to it that he always has good company "

पाठक सर ने भी इसी बात को दुसरे तरीके से कुछ युं कहा है -

" हमारी ज़िन्दगी में 'यार' एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल हम बहुत हल्के में करते हैं।..... मैं रोज़ कितने ही लोगों को जानता हूँ और फिर कितने ही लोगों से मिलता हूँ , क्या वो मेरे 'यार' हैं?
मैं अपने दफ्तर में 500 लोगों के साथ नौकरी करता हूँ - ऐसे में क्या वो सारे मेरे यार हो गए ? ......... नहीं - ऐसा नहीं है। यार वो होता है - जो आप का हमख्याल हो, हमनिवाला, हमप्याला हो। हर कोई 'यार' के दर्जे में नहीं आता। " <<<{
Kanwal Sharma फँस ऑफ़ एसएमपी के लेख से }_"यार वो होता है - जो आप का हमख्याल हो, हमनिवाला, हमप्याला हो। हर कोई 'यार' के दर्जे में नहीं आता।"....ये लाइन और पाठक सर के बोल असर कारक हैं। और इसका आभास हमें होने के बावजूद हम अपनी भावनाओं को शब्द नहीं दे पाते। यह पंक्ति हमें अभिव्यक्ति के लिए वांछित शब्द प्रदान करती है। _पाठक सर को शत-शत नमन।

बाबूजी हमें छुटपन में ही ये कहकर कमांड करते थे कि -'संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात।' _बड़ी सारगर्भित और अमल के काबिल बात है। पर, हम जब कभी किसी से दोस्ती करते हैं, या यूँ कहें कि जब दो जने आपस में दोस्त बनते हैं, मित्रता का नाता स्थापित करते हैं, तब हम इस हिदायत और इसकी सारगर्भिता को पूरी तरह भूले होते हैं। उस समय एक दुसरे का साथ, उनका पास-पास होना, न होने पर एक दुसरे को मिस करना ही अहम रह जाता है। बाबूजी की बात की महत्ता फिर भी कायम रहती है क्योंकि आप अपने हमखयाल, समान रूचि वाले को ही पसंद करते हैं, इसी प्रकार अगला भी आपको पसंद करता है। आपकी रूचि आपके संस्कार के मुताबिक होती है। संस्कार परिवार से ही मिलता है। दो अनजान लोगों की मुलाक़ात होने पर जब वो एक दुसरे के साथ कुछ वक़्त गुजारते हैं तब एक-दुसरे के गुण-दोष का पता चल जाता है और यह निर्णय लेना सहज हो जाता है कि हम दोनों मित्र बने या न बने। किसी के लिए आपके मन में उसकी शक्ल देखकर या उसकी चपलता देखकर या उसका परफॉरमेंस देखकर या गुण देखकर अनुराग पैदा होता है और आप उसके मित्र बनने की ख्वाईश करते हैं तो ऐसी ही ख्वाईश जबतक आपके प्रति अगले के मन में जाग्रित नहीं होगी, दोस्ती हो ही नहीं सकती। किसी की बाँह मरोड़कर या उसके सिर पर सवार होकर, उसके पीछे पड़े रहकर उसे तंगकर, धमका कर और मजबूर कर के यह रिश्ता आप कभी नहीं जोड़ सकेंगे। इसके लिए सिर्फ एक ही रास्ता है और वो ये कि यदि आप चाहते हैं -रिपीट- आप चाहते हैं कि फलां आपका दोस्त बन जाय तो सीधे बे-झिझक, बेख़ौफ़ उसके पास जाइये और दोस्ती की पेशकश रखिये। अगर आप सोचते हैं कि कोई दूसरा जबतक आपको नहीं पूछता तबतक आप उसे कोई भाव नहीं देंगे तो यहाँ मेरा एक विनम्र निवेदन है -'सर! आप किसी की दोस्ती के काबिल नहीं। नमस्ते!' 

दोस्ती और चमचई के फर्क को समझिये। समय सबसे बड़ा और बलवान होता है, समय के साथ हमने जो निर्णय लिया होता है उसकी परीक्षा स्वतः हो जाती है कि हमारा निर्णय सही था या गलत। आप खुद ही ये समझ जाते हैं कि इस 'सम्बन्ध' की आयु कितनी है। फिर भी नहीं समझते तो बाबूजी की बात पर गौर करने की आवश्यकता आन पड़ती है, या (आपके) बाबूजी (या अन्य बड़े) यदि उपस्थित हैं तो वे चेतावनी दे देते हैं। इसके बावजूद भी आप बाज़ नहीं आते तो एक-दुसरे के लिए कष्टप्रद स्थिति का कारण बन जाते हैं, जिसका अंजाम कभी-कभी दुखद भी हो सकता है। सो, दोस्तों जब तक हम जीवित रहेंगे नीली छतरी वाला हमेशा हमारी ऐसी परीक्षा लेता ही रहेगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि बाबूजी की बात की आन बनी रहे। इस परीक्षा में हम कभी फेल नहीं होंगे।

"निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करत सुभाय।।" --कबीर 
(Keep your critic close to you; give him shelter in your courtyard.
Without soap and water he cleanses your character.__कबीर जी दी वाणी) _और ऐसी निंदा आपका सबसे करीबी दोस्त ही आपकी आपके मुँह पर करेगा।___पर पहले दोस्त तो बने! -रिपीट- पहले 'दोस्त' तो बने !! दोस्त बनने से पहले ही कोई अल-बल बकने लगे तो कैसे बीतेगी? किसी बड़े दिलवाले ने कहा है: _रूठो। दुश्मनी करो। पर इस तरह कि खुदा फिर से दोस्त बनने का मौका दे तो एकदूसरे के आगे शर्मिन्दा न होना पड़े।

आप किसी से प्रभावित हो कर उससे दोस्ती करना चाहते हैं पर वो आपका हमखयाल होने के बावजूद आपके प्रति इच्छुक नहीं तो मरिये मत। इस फ़ॉर्मूले पर अमल कीजिये -'तू नहीं और सही, और नहीं और सही!' दुनिया दिलवालों से खाली नहीं। यदि आपका दिल साफ़ है। आप भले हैं। दोस्ती की ख्वाईश है पर कोई दोस्त नहीं। कोई पूछता भी नहीं। इसका मतलब सिर्फ यही हुआ कि अबतक आपने कोशिश की ही नहीं, की तो दिल से नहीं की। अरे भले आदमी! ऐसा इत्तेफाक शायद ही कभी हुआ होगा या आइंदे होने वाला होगा तो होगा कि कोई खुद आपके पास आकर मित्रता का प्रस्ताव रक्खे। तुम क्या आसमान से उतरे कोई अवतारी हो, जो कोई आ कर तुम्हारे आगे लोट लगाएगा और फ़रियाद करेगा कि ऐ खुदा के बन्दे मुझे अपना दोस्त बना ले! तेरे बैठे रहने से और सपना देखते रहने से कुछ नहीं होगा। तुम हाथ आगे बढाओगे तभी तो कोई उसे थामेगा! ये सोच कर घुलने से क्या फ़ायदा कि 'हाय! कोई मुझे नहीं पूछता!' ...आ,चल उठ! अपने-आप को तौल कि तू किस काबिल है? क्या काबिलियत है तेरे में? किसी को तू जब अपना दोस्त बनाएगा तो उससे शेयर करने के लिए 'तेरे' पास क्या है? क्या अर्पण करेगा तू उसे? जब यह समझ में न आये तो थोडा ठहर जा। थोड़ी देर के लिए थम जा। आत्मविश्लेषण कर। तू जान जाएगा, तुझे उत्तर मिल जाएगा। फिर जिससे दोस्ती की तमन्ना है उससे जा के मिल। बता उसे अपने दिल की बात। बोल कि तू उसका दोस्त बनना चाहता है। फिर बाकी वो नीली छतरी वाला है न, सब ठीक कर देगा। देखना, उस वक़्त तेरे चेहरे पर कैसी लाली छाई होगी। रगों में खून जोश मार रहा होगा। रोमांच से लोमहर्षक अनुभूति के कारण तेरे चेहरे का तेज़ खिला हुआ, तमतमाया हुआ होगा। और तेरा दोस्त तुझे हासिल हो जाएगा। लेकिन ताकीद रहे _जितनी बड़ी ख्वाईश होती है कभी-कभी उतनी ही बड़ी निराशा हाथ लगती है। दोस्ती में हर वक़्त देने की, अर्पण करने की फितरत की ही अहमियत है, मांगने की, मांगते रहने की नहीं। ...इस बात की जरा व्याख्या करो बाकी समझदार हो तो खुद समझ जाओगे। तेरा दोस्त बाँहें फैलाए तरी राह में है। जाकर लग जा उसके गले।

बे-मेल लोगों में भी बेमिसाल दोस्ती हो जाती है जो ताजिंदगी कायम रहती है। किसी की शक्ल अच्छी नहीं, किसी की जात ऊंची नहीं, किसी की सामजिक अवस्था आपके बराबर की नहीं, किसी की माली हालत (आर्थिक स्थिति) बराबरी की नही फिर भी ऐसे भले मित्र हैं जो इन बातों को हिकारत की नज़र से नहीं देखते, इंसान को इंसान की नज़र से देखते और उसे अपने सान्निध्य का अवसर देकर उसे अपना मित्र बना लेते हैं। हमने अक्सर देखा है कि घमंड में कैसे-कैसे अपमानजनक शब्द बोले जाते है,-"ई...!?' '...ई छुछुंदर तोर दोस्त हउ? साला करियट्ठा! मैलाहा, पिलुवाहा ! भगाओ हीयाँ से एकरा ! अईसने-अईसने लफंगन के हे संघत में न तूं बिगड़ गेले हे !" यही छछूंदर जब फ़ौज में शामिल होकर सरहद की सुरक्षा में शहीद हो जाता है तो उसे छछूंदर कहने वालों के रंग गिरगिट की तरह बदल जाते हैं। कोई अभिनेता, खिलाड़ी या नामी हस्ती बन जाता है तो कहने वालों के बोल बदल जाते हैं। अतः ऐसी अवस्था में जब आप देखें कि यदि आपके मित्र की तौहीन हो रही है, बेईज्ज़ती हो रही है, तो उसके उन गुणों को सामने लाइए जिसके गुणों के कायल होने के बाद आपने उसे अपना दोस्त बनाया था और बकवाद करने वाले, भले चाहे वो आपके अभिभावक हों, पहले का और और और पुराना घनिष्ठतम यार! _उनकी गलतफहमी को दूर कर दीजिये, पर दोस्त को आहत न होने दीजिये। उन्हें बताइये कि ये गणितज्ञ है, वैज्ञानिक है, विद्वान् है, संगीतकार है, गायक है, कलाकार है, इंजिनियर है, कहानीकार है, लेखक है, चित्रकार है, खिलाड़ी है, बिजनेसमैन है, स्कूल मास्टर है, अभिनेता है, नेता है, पत्रकार है, वकील है, डॉक्टर है, सिपाही है, सैनिक है, मुंशी है, किरानी है, लिपिक है, दुकानदार है, चपरासी है, ड्राईवर है, माली है, दरवान है, ...और भी कुछ है या नहीं है लेकिन एक आप ही के जैसा इंसान है जो आनंद दायक मानवीय अनुभूतियों से लबरेज़ है, और दोस्ती के काबिल है और ये भी जरूर कहिये कि आपने नहीं _"उसने आपको" अपना दोस्त बनाकर 'आपका' मान बढाया है। दोस्ती की है न! ऐसे ही दोस्ती निभाई जाती है। यहाँ किसी प्रकार के विद्रोह या बगावत की बात नहीं, दोस्त की इज्ज़त की रक्षा करते हुए दोस्ती जैसे पाक और पावन रिश्ते को नयी ऊंचाई यूँ ही दी जाती है। इसके बिना इस रिश्ते की गति नहीं।
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कभी-कभी चमचों से घिरे नौजवान ख़ूबसूरत मसलमैन को उसकी चमचमाती गाडी और शख्शियत को देखते ही आप उसकी दोस्ती के लिए लालायित हो जाते हैं, और आप कामना करने लगते हैं कि अगर अब आप भी उसके दाएँ-बाएँ वाले ख़ास चमचे बन जाएँ तो आपकी तो निकल पड़ेगी। यही हो रहा है आजकल। इसी सोच से ग्रसित लोग आज देश को कलंकित कर रहे हैं।  ............सावधान! ऐसे लोगों की जामात बढती जा रही है। यह बहुत ही खतरनाक है। इसे रोकना होगा। ये लोग गुंडा एलिमेंट को बढ़ावा देने वाले नौदौलतिये हैं। पैसे और ग्लैमर के लालच के हवाले इनके चमचे उनकी शैतानी आग में अपनी चापलूसी से घी की आहूति देने जैसी वाहियात हरकत कर समाज और देश को रोजीना रुलाये चले जा रहे हैं। इनकी रोकथाम जरूरी है। वर्ना हम गए! यह संगत ही वह कुसंगत है जिससे बाबूजी हमेशा सचेत किया करते थे। ...देख लो अंजाम!! 'दामिनी' के बाद भी .........अभी भी कुछ नहीं बदला।
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दोस्त, दोस्त के काम आते हैं। किस काम आते हैं? ये भी कोई डिस्कशन की बात है! इसके बारे में क्या कहना!!

महान व्यक्ति कोई महान काम करता है तो उसे पता भी नहीं होता कि उसने कब कहाँ, क्या महान कर दिया है। किस पर कैसे, कैसी महत्ता कर दी है। उसे अपनी महानता का भान तक नहीं होता। अपने स्वभाव सुलभ महान कर्मयोग में लीन उपकृत लोगों की "थैंक्यू" उसे सुनाई नहीं देती। इसलिए वो "मोस्ट-वेलकम" भी नहीं बोलता। यूँ उसकी आलोचना भी हो जाती है,...वह मुस्कुराता रहता है। हैट्स ऑफ टू देम!

'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी।'
'ये दोस्ती-ई, हम न...हीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ ना छोड़ेंगे।'
'कुर्बानी-कुर्बानी ...कुर्बानी..ईं..ईं, अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी ...मित्रों!_इस गाने को पूरा गाकर या सुनकर देखो और बतलाओ इसमें कौन किसके लिए किसकी कुर्बानी की बात कर रहा है? ' यारी मेरी कहती है,_यार" पे कर दे सब कुर्बान!!"
 _ऐसे ही और न जाने कितने गीत और गाने हैं जो दोस्ती, यारी को रेखांकित करते हैं, महिमामंडित करते हैं, उसका गुणगान करते दोस्ती को ही समर्पित हैं। कितने भाग्यशाली होंगे वो लोग जिन्हें दोस्ती जैसा दुनिया का सबसे अहमतरीन और पाक रिश्ता उनकी तकदीर ने उन्हें दिया होगा। माँ के बाद दुसरे नंबर पर दोस्ती की ही जगह है, बाप और भाई की भी नहीं, जिसमे कि किसी प्रकार के राज-सिंघासन, धन-दौलत और हिस्से के कारण हमेशा हरदम के कई खुरेंज़ दास्तान भरे पड़े है। पर दोस्ती इन लानतों से परे है। इसमें एक दुसरे के प्रति सिवाय एकनिष्ठ समर्पण के दूसरी किसी भेद भरी बात के लिए कोई जगह होती ही नहीं। दुई का कोई भेद नहीं होता।
_ये हमारे गीतों के अमर बोल साक्षी हैं, प्रमाण हैं इस बात का कि दुनिया में दोस्ती जैसा पावन रिश्ता सहोदर भाई जैसे रिश्ते से भी महान होता है। एक दोस्त अपने जिगरी दोस्त के लिए जो बे-झिझक कर सकता है, करता है, वह कभी-कभी सहोदर भाई भी नहीं कर पाता, पिता भी नहीं कर पाते। और दोस्ती सिर्फ एक दुसरे पर अटूट विश्वास के दम पर कायम रहती है। दोस्त एक दुसरे से जिस बे-तकल्लुफी से पेश आते हैं, एक ही थाली में खाना खाते हैं, बिना ये परवाह किये कि 'उसका जूठा है!'_यह बे-तकल्लुफी ही इस बात का प्रमाण होती है कि ये जिगरी दोस्त हैं। भोलेनाथ शिवशंकर भगवान् की श्रीविष्णु भगवान् से मित्रता। भोलेनाथ शिवशंकर भगवान् की श्रीरामजी के साथ अनुराग! सुग्रीव जी के साथ श्रीरामजी की मित्रता! विभीषण के साथ श्रीरामजी की मित्रता। अर्जुन के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। सुदामा जी के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। उद्धव जी के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। दुर्योधन के साथ कर्ण की मित्रता। मिसालें गिनने बैठोगे तो गिनती भूल जाओगे। दोस्ती किसी भी आदम जात की किसी भी दुसरे आदम जात से हो सकती है, हो जाती है, होती है, होती रही है और होती रहेगी। इसमें लिंग-भेद, जाति और उम्र के लिए भी कोई जगह नहीं। 75 वर्षीय वृद्ध भी एक 21 वर्षीय नौजवान के दोस्त होते हैं।

"अरे जा ना तू निश्चिन्त रह, हम(मैं) सब देख लेंगे(लूँगा)।" क्या ऐसा बोलने वाला आपने देखा है ?  >> "हाँ ! कितने देखे! सिरिफ बोलते हैं। डाइलोग मारते हैं। ज़रुरत के वखत मोबाइल पर '_घर से_' बोलते हैं- "हाँ! हाँ! ..अरे .. बड़ी दुःख होलउ इयार सुनके। अईसन कर ना, हम तोरा बाद में फोन करइत हियऊ, .. न!, ... उ .. हाँ रांची आइलीयाई हे, ..अच्छा औवा हियई त बतियावल जाइतै।"    

 ये जूठे अभी ही त्याज्य हैं। और अपनी पहचान के "दायरे" को बढ़ाइए।

एक बहुत ही प्यारा नारा है। जिसे दोस्ती के ज़ज्बे को नयी ऊंचाई देने वाले मेरे प्रिय लेखक सुरेन्द्रमोहन पाठक साहब ने बुलंदी पर पहुंचाया है -"यारां नाल बहारां, मेले मित्रां दे।"
(निवेदन : ये मेरे अपने विचारहैं। खुद को तसल्ली देने के लिए। पर मैं इसे निश्छल मित्रता और दोस्ती को समर्पित करता हूँ।)
 तो क्या ख्याल है? दोस्ती करोगे मुझसे?
_श्री .

Sunday, January 20, 2013

92 वर्षीय श्री प्राण साहब ... तबियत में सुधार की सूचना

हमारे प्रियतम हिंदी फिल्मोद्योग के अपने जमाने के दिग्गज लोकप्रिय 'खलनायक' 92 वर्षीय श्री प्राण साहब 25`दिसंबर से लीलावती हस्पताल में भर्ती हैं। ताज़ा समाचार के मुताबिक उनकी तबियत में सुधार की सूचना मिली है।

Saturday, January 19, 2013

अंग्रेजी ज्ञान पर होती हिंदी की उपेक्षा !

मुझे हैरत है इन नामोंनिहाद, मशहूर-ओ-आम शुद्ध भारतीय सुपर स्टार्स,चाहे वो किसी भी क्षेत्र के हों, की अंग्रेजी-प्रेम और हिंदी की उपेक्षा पर! कई ऐसे लोग जो खाते तो हिंदी का हैं पर गाते हैं अंग्रेजी का, अंग्रेजी बोल कर। हिंदी में सवाल करो वो अंग्रेजी में उत्तर देते हैं। फिल्मों की नगरी में सिवाय अमित जी, धरम पा जी, और दिलीप साब की तरह जो अपनी मातृभाषा की खूब कद्र जानते और करते हैं को छोड़ कर, बाकी के सारे के सारे हिन्दुस्तानी जो हिंदी क्षेत्र  के हैं पता नहीं क्यों अंग्रेजी के भूत से इतना डरते हैं की उसकी गुलामी करने और उसका मैला चाटने से बाज़ नहीं आते। फिल्म 'कहानी'(विद्या बालन) की पार्टी के विडियो में भोजपुरी फिल्म के सुपरस्टार रवि किशन भी फिल्म की तारीफ़ अंग्रेजी में यूँ करते नज़र आते हैं जैसे अब उन्हें बिहारी कूड़ेदान से मुक्ति मिल गई हो और अंग्रेजी बोलकर वे जताना चाह रहे हों कि -'हे बॉलीवुड भगवान् मैंने तुम्हारे लिए ही तो भोजपुरी को माध्यम बनाया था, अब तो मेरी तरफ अपनी नज़रें ईनायत करने की कृपा करो, देखो अब तो मैं भी फर्ल-फर्ल अंग्रेजी बोलने लगा!!" जबकि इस फिल्म के निर्देशक सुजॉय घोष बिना हिचके अपने बंगाली होने के बावजूद हिंदी में ही बोलते दिखे। भोजपुरी लोक गीतों की गायिका कल्पना ने नाम-मशहूरियत-दौलत से मालामाल होने के बाद जब अपना पहला इंटरव्यू दिया तो कैमरे को देखते ही उनकी भंगिमा बदल गई, जैसे उनका पुराना गुलाम रहा हो। फिर जब सवाल पूछे गए तो उनके मुँह से अंग्रेजी की धार फुट पड़ी, यूँ बोला कि मडोना को मुँह चिढा रही हो। _हैं न अंग्रेजी की महीमा?

अंग्रेजी जानना और बोलना कतई बुरी बात नहीं, न ही मैं इसके खिआफ़ किसी प्रकार का जिहाद कर रहा हूँ। मैं सिर्फ अपने 'नायकों', भले चाहे वो किसी भी फील्ड के हों, सिर्फ ये गुजारिश करना चाहता हूँ कि वो हिंदी की नाकद्री और उपेक्षा बंद करें। इसी विषय मैंने कुछ लिखा है; जिसे मैंने "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"/facebook  के साथ शेयर किया :>>
"क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"
"जो लोग अंग्रेजी बोलने से खुद को विद्वान मानते हैं और हिन्दी में अपनी तौहीनी समझते हैं........वो ये जान लें कि अंग्रेज मुल्कों में Toilet साफ करने वाला भी अंग्रेजी बोलता है, अतः भाषा से किसी की विद्वता परिभाषित नही होती....
मात्रभाषा हिन्दी ही हमारी पहचान है॥जय हिन्द!"..............................................<यह मेरी नहीं क्रांतिकारी सोच की वाणी है।
मैंने जो कहा है वो निम्नलिखित है: >>>
 "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!???? अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर जिम्मेवार है उसका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन। नमस्ते महोदय !! अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे। सबसे अच्छी भाषा वो ही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है। ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।
मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable) का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो पहले अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है। मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है। अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

जय हिन्द!!!
-श्रीकांत तिवारी.
 http://www.facebook.com/krantikaribharat/posts/528588813841783?notif_t=like
राहत की बात है कि मेरे उपरोक्त लेखन को सराहा जा रहा है।
 

Thursday, January 17, 2013

सीक्रेट एजेंट के पन्नों से

सीक्रेट एजेंट के पन्नों से :>------
'फ़ौरन हाँ बोलो, बेटा। ये सोच कर फ़ौरन से पेश्तर हाँ बोलो कि जिस नौकरी ने तुम्हें कलंकित किया, वही अब तुम्हारे पाप धोएगी।'
' ...........'बाकी रही जान जोखम की बात तो जोखम कहाँ नहीं है, बेटा! जो शख्श जोखम से खौफ खाता है, उसके लिए तो हर कदम पर जोखम है। वो दरख्त परवान नहीं चढ़ सकता जिसे हर वक़्त अपने पर बिजली गिरने का खतरा सताता हो।'
'............'जो लोग मौत से डरते हैं, समझो वो पहले ही तीन चौथाई मर चुके हैं।'
'नया सूरज निकलता है तो हर कोई कहता है कि ये मेरी बाकी जिंदगी का पहला दिन है, इसलिए मैंने कुछ नया, कुछ रचनात्मक करके दिखाना है।'

"पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात; देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा प्राभात।"

'............बेटा, वो जिंदगी का सफ़र हो या जंग का मैदां; मुहाज कोई भी हो, हौसला जरूरी है।'


......जारी (Contd.)

...और मेरा निधन हो गया।

13,जनवरी-13 को मनोज भईया अपने फोन के मुताबिक ठीक साढ़े दस बजे गद्दी पहुँच गए। प्रणाम-पाती हुआ। बैठे! मित्रों, सहकर्मियों से बातें करने लगे। मुझे फुर्सत में होता देखकर बोले -'आप दो मिनट के लिए घर चले जाइये।' उनकी बात का मंतव्य समझ कर मैंने सहकर्मी-मित्रों से 'बस तुरंत आते हैं' बोल कर घर आया। भाभी ने मनोज भईया के हाथों गरमा-गरम नाश्ता भेजा था। 

17,जनवरी-13 को वीणा (मेरी धर्मपत्नी) ने मुझसे कहा कि मैं मनोज भईया वाला टिफिन उनके घर जाकर दे आउं। इसी बहाने मैंने सोचा कि चलो उधर ही डॉक्टर से मिलता आऊंगा। कफ-खाँसी से परेशानी बढ़ गयी थी। मैं अपनी मोटरसाइकल से, मनोज भईया वाला टिफिन, जिसमे वीणा ने गरम-गरम वेज-कटलेट, और तिल-ग़ुड से बनी "लाई" भरकर दिया था, लेकर निकल गया।

सभी कामों से निपट कर दवा खरीद कर मैं घर लौट रहा था। मोटरसाइकल काफी तेज़ मैं कभी नहीं चलाता। पर रेंगता भी नहीं। दुपहिया या वैन, मैं जब भी ड्राइव करता हूँ, सिर्फ ड्राइव ही करता हूँ। पूरी तरह सचेत। चौकस। अगल-बगल बे-वजह मेरा ध्यान कभी नहीं जाता। फिर भी छोटे शहरों के गलत फैशन और चलन (ऐब) से मैं भी ग्रसित हूँ। छोटे-से फासले हो या एक-दो किलोमीटर की दूरी, हेलमेट पहनने में लोगों की हेठी जो होती है। सड़क की दुरावस्था की कहानी सनातन धर्म जितनी पुरानी है। हिचकोलों को झेलते नियमित गति से मैं घर आ रहा था। दशकर्म-घाट के पास SBI मोड़ (बहुचर्चित नाम : 'भट्ठी ढलान') के पास जैसे ही मैं पँहुचा, ..... मुझे एक पुकार सुनाई दी : 

"प्रणाम भईया ....!!!"

हो सकता है वो पुकार किसी और के लिए हो। यूँ कोई भी किसी को भी पुकार सकता है। किसी ने मेरा नाम तो नहीं पुकारा था। ऐसी सोच के हवाले आम जीवन में हम कई बार दो-चार होते ही रहते है। फिर भी मुझे लगा हो-न-हो कोई मेरा ही वाकिफकार है,....जानी पहचानी आवाज़,...अभिवादन का वो ढंग,...वो अंदाजेबयां,...वो आत्मीयता...! लगा, जैसे मुझे ही पुकारा गया हो। मुझसे ज़ब्त न हो सका। और मैंने आवाज़ की ओर पलटकर देखा। यही मेरी सबसे बड़ी भूल हो गई,....आवाज़ देने वाले को पहचानने में मुझे दिक्कत हुई,...भीड़ में किसी  जानी-पहचानी सूरत की खोज में गाडी तलमलाई जिसे सँभालने में मुझसे डैड-ब्रेक लग गया,...मोटरसाइकल की हैडल मुड़ गई,...उसके पहिये खुरदरी सड़क पर डगमगाते हुए फिसले,...बैलेंस न संभल सकने के कारण मोटरसाइकल उलट गई और मुझे साथ घसीटते फिसलते हुए इलेक्ट्रोनिक-कौमियुनिकेशनस की एक दूकान के पास लगे मास्ट लाईट के सख्त स्टील के खम्भे से जा टकराई,...गिरते ही मुझे कई तरह की चोटें लगीं,...बायाँ हाथ कलाई के पास बुरी तरह छिला और ऐंठकर टूट गया,...बायाँ घुटना बुरी तरह छिल गया,... मोटी जीन्स के छिल जाने से खून बाहर टपकने लगा,... दाहिने पैर के बुरी तरह ऐंठ जाने के कारण एंडी की हड्डी टूट गई,...दायाँ घुटना टूट गया,...सिर खम्भे से टकरा कर झनझनाया,....फिर खोपड़ी चटखनेकी आवाज़, ......दर्द से मेरी रूदन और चीख,...मुँह पर भल-भल कर बहता खून,...किसी के हंसने की आवाज़,...किसी का व्यंग्यपूर्ण कथन-"ओद्दे! गीरलऊ बेट्टा! ही ही ही।",....फिर कोलाहल की आवाज़,... दूर से आती पुकार की आवाज़ ....'प्रणाम भईया!', ....फिर सब कुछ सुन्न,...आवाजें मद्धम होती दूर जाने लगीं,...मुझमे खुद की चेतना से नाता टूटता लगा,... सभी दर्दों-चोटों की पीड़ा का अहसास ख़त्म,...तेज़ रौशनी,...फिर काला अन्धेरा, ...अन्धेरा......और शांति। इतना सबकुछ होने में सिर्फ 5-सेकेण्ड लगे।

फिर?

"का होलई-का होलई!? '...के हई - के हई!? '...अईस स्साला! '...ऊंह! '...अरे बाप!" _बस सिर्फ आवाजें-ही आवाजें! किसी ने मेरे शरीर को छूना भी मुनासिब न समझा। खून-आलूदा मेरे छिन्न-भिन्न शरीर और ध्वस्त मोटरसाइकल, सबके लिए एक कौतुहल का विषय बन गया। ज़िन्दगी में किसी ने मुझे कभी भी कोई अहमियत नहीं दी, आज मेरी दुर्दशा भी लोगों के लिए एक "विषय" मात्र ही था, अहमियत तो दूर की बात है। किसी ने मुझे पहचाना भी नहीं। फिर भी किसी ने पहचाना। क्या पता शायद उसीने जिसने "प्रणाम भईया" की पुकार लगाईं थी! इस बुरी खबर को मेरे घर पहुँचने में आधा घंटा लग गया। जबकि घर अगले, मस्जिद मोड़ से आगे लोहरदगा सदर थाना के सामने ही है।

घर में हाहाकार मच गया।

इस बीच दुर्घटना स्थल पर कुछ भले लोगों ने कहीं से एक गाडी की व्यवस्था करके मुझे हस्पताल पहुंचाने का इंतज़ाम किया। घर के लोगों को पता लगा मुझे हस्पताल ले जाया गया है। जब रोते-कलपते, दहाड़ें मारते, छाती पीटते माँ और वीणा हस्पताल पहुँचीं तो उन्हें ये दर्दनाक सूचना मिली की हस्पताल लाते समय गाडी में रास्ते में ही मेरी मृत्यु हो गई थी। 

'.............................!'

अब यहाँ किसी का क्या दोष!? जो हुआ वो मेरी नीयति थी। मुझे कोई गिला नहीं।

_श्री .
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................जब मेरी तन्द्रा टूटी तो मैंने 'पुकार' को इग्नोर किया, घर पहुंचा। दवा खाई। और अपनी लिखाई-पढ़ाई में मगन हो गया। अचानक सड़क पर एक भारी गाडी के इंजन की घर्र-घर्र और उसके रपटते हुए टायरों की आवाज़ के साथ एक महीन लेकिन भयानक चित्कार सुनाई दी। मैं दौड़ कर बाहर निकला। मेरी नज़र एक सफ़ेद बोलेरो पर पड़ी जो थोडा ठिठकी, फिर उसके ड्राईवर ने गाडी भगा दी। मैं उसका नंबर न देख सका। मैंने देखा मेरे घर के सामने बकरी का एक नन्हा-सा बच्चा खून की उल्टियां करते हुए छटपटा रहा है। फिर लोग जमा होने लगे। मुझे 'वही' कुटिल हंसी और व्यंग्य सुनाई देने लगी -"चलअ! आज के मीट के इंतज़ाम तो होलई  ना!" 

गाड़ी ने बकरी के बच्चे के सिर को, गले को बुरी तरह रौंधा था। उसकी एक पिछले पैर की खुर गायब थी, अगला एक पाँव गायब था। थोड़ी ही देर में बकरी के बच्चे ने अपने ही खून के तालाब में तड़पकर दम तोड़ दिया।

...फिर? 

"का होलई-का होलई!? '...के हई - के हई!? '...अईस स्साला! '...ऊंह! '...अरे बाप!" _बस सिर्फ आवाजें-ही आवाजें!! तमाशाइयों की।

घर से कलावती दीदी निकली और लोगों को गरियाने लगी। पर किसी में कोई संवेदना नहीं थी। थोड़ी देर बाद कलावती दीदी ने उस बकरी के बच्चे के शव को हटाया और उसे मिटटी दी।
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अब आप बताइये किस प्रकार-से मेरी जान उस बकरी के बच्चे की जान से भिन्न है जिसके निर्दोष खून से अभी भी मेरे घर के सामने की ज़मीन रक्तरंजित है? वो निश्चय ही मेरी मौत थी जो गलती से उस बकरी के बच्चे को लील गई! आज मौत देखना मेरी नियति थी जो कि मैंने देखि!
*"सत्य कथा"*

_श्रीकांत .