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Tuesday, May 7, 2013

एक बालक की बाल कथा :

पेश है! फ्रेश है!
इस साल जनवरी के पहले सप्ताह में मैंने मुंडन करवाया था (क्यों?_वो छोडिये!)। मैं नए उगने वाले बालों के बारे में तरह-तरह के विचारों से जूझ रहा था। घर से बाहर निकलने में लाज आती थी! '...ऊंहूं..बेई, कोई देखतई तो का बोलतई ..!' गनीमत यह थी की सीजन जाड़े का था, जिसमें टोपी के इस्तेमाल से लाज-लगाने वाली बात को छिपाया जा सकता था। फ़ौरन उनी टोपी ने मेरे कंटीले चाँद पर अपना मुकाम बना लिया, और शक्ल को एक समझौता के लायक फ्रेम प्रदान किया! बाबूजी हमेशा कहा करते थे कि :'..बबुआ के ललाट बड़ी ऊँच बा!' अभी देखते तो यही कहते कि '...अंतहीन बा!!' ...अबकी बार लम्बे बाल रखने का खूब मन है। सच्ची!! अनुपम सिन्हा सर के जैसा! सो बाल शीघ्र उगाने वाले कई नुस्खों पर गौर फरमाया गया। कोई नहीं जंचा। अतः राम-कृष्ण-अल्लाह-वाहेगुरु-जीजस का नाम लेकर माँ प्रकृति के हवाले इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया गया। और मूँछ उगाने की ठान ली! शकल पर कहीं तो बाल दिखाना चाहिए कि नहीं? सो मूंछ उगाई गई! औए अतीत को याद करने लगे जैसे इम्तिहान से पहले सबक याद किया करते थे,.....

"...सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था!"_देव आनंद की हेयर स्टाइल की क्या बात! वैसे ही "काकुल" तो बाबूजी भी बनाया करते थे! "...अरे हो ! जिया ओ जिया कुछ बोल दो !!!" कुछ दिनों बाद मैंने बाबूजी के बाल देखे तो भौंचक्का रह गया! बाबूजी अशोक कुमार दिख रहे थे और गुनगुना रहे थे :"...चल-चल रे नौजवान!" नया दौर में दिलीप साहब के बाल देखे थे न, कैसे बिना हिलाये भी उनकी भहों तक उनके 'ललाट' को अपनी सुरक्षा में रखते थे! तिलक लगाने के लिए जिन्हें कंघी से वापस ऊपर समेटना पड़ जाता था! ...जब तांगा हांकते थे तो कैसे इठलाते उड़ते थे! ...उनकी तारीफ़ में बैजयंती माला ने कितने अनुराग से गीत गाये थे! .'...उड़े जब-जब जुल्फें तेरी,...कवांरियों का दिल मचले जिंद -मेरिये !.और दिलीप साहब के बाल हवा में कैसे उड़-उड़कर इस तारीफ़ को कुबूल कर रहे थे! ..और दिलीप साहब के चेहरे का नूर! वाह! ..और उनके हँसते हुए खुले मुँह को एक शानदार फ्रेम प्रदान कर रहे थे!! "ओ..ओह:!!"  "..और फिर अमिताभ बच्चन की हेयर स्टाइल का कौन दीवाना नहीं भला !? "उनको भगवद्कृपा से क्या नहीं प्राप्त है!!!" _जिसमे से अगर बालों को हटा दिया जाय तो... सोचकर ही डर लगता है!! ...याद है न वह ज़माना, ..जब आईने के सामने खड़े होकर नाकाफी बाल को भी काफी बनाने की ज़द्दोज़हद में स्कूल में रोजीना लेट पंहुचते थे, ...और मा'-साब भर-मुट्ठी 'झोंटा' पकड़कर झंकझोरते थे! ...वाह! वो भी क्या दिन थे! "45-इंच" मोहरी वाली बेलबौटम जिसने नहीं पहनी वह क्या खाकर अमिताभ या धर्मेन्द्र बनेगा!! घर से निकलने से पहले आईने में खुद को निहार कर बाल को कंघी से संवारना लाजिमी होता था! ...बड़ी झुंझलाहट होती थी, ...किसी कोने से भी अमिताभ नहीं दिखाई पड़ते थे! पर दिल कहता _वो रहे, सामने ही तो खड़े हैं !! उन्हें आइनें में ढूँढने के लिए कितनी कोशिशें कीं, कितने पोज़ बनाते हमने, आपने और न जाने न जाने कितनों ने कितने ही समय यूँ ही, प्रयासरत, आईने के सामने बिता दिए हैं! ..एक-आध बार लगता था कि '...अइस्स्स !' ...लेकिन तुरंत वह छवि गायब हो जाती थी, और बाल उड़-मुड़ कर फिर घूंघर बन जाते थे! कभी फोटो खीचाने का अवसर आने को होता था तो उसके लिए बालों को अभी से ही संजोना समेंटना शुरू कर देते थे! स्टूडियो वाला कंघी-पाउडर के लिए जो वक़्त देता था वह सिर्फ बालों को "विजय" की तरह सोंट कर झुकाने में और संतुष्ट होने में हमें ईतना देर लगता था कि स्टूडियो वाला तब तक तीन-चार ग्राहक निपटा लेता था! जब वो थोडा बेचैन होकर आता तो '..बस, और एक मिनट!' की गुजारिश वो खूब समझता था, इसीलिए अपने हाथों से एक मिनट में ही मुझे 'विजय' बना दिया करता था, और फोटो खीचने के लिए मेज पर बैठने को कहता! कई स्टैंडों पर कसी, कई आकार की अल्युमिनियम की (लाउड स्पीकर जैसे शक्ल वाली) लाइटें सेट करता, अन्वाश्यक बत्तियां बुझाता! और स्टैंड वाली सभी लाइट्स को ऑन करता! जिसके 'GLAIR -!' से हमारी आँखें चुंधियाती! जलन सी होती! हम आँखें मींचते! आँखों से आंसू ढलकर गालों के पाउडर को धो देते! स्प्रे से सोंट कर और ड्रायर से सुखाकर और झुका कर सेट की गई महीनों की तपस्या से प्राप्त 'विजय' स्टाइल बाल और मुँह और स्टूडियो वाले द्वारा फिनिशिंग टच दिए बाल का स्टाइल किसी अनजान स्टाइल के शेप में आ जाता! लाइट की गर्मी से सूख कर फिर से घुँघर बनने की धमकी देने लगता! हमारी सारी सोच और सपने मरते हए से प्रतीत होते! फिर भी 'विजय' बने रहने की जिद्द में हम यह सारा टॉर्चर सहते! आंसू भरी आखों को किच्मिचाते खुली रखने की अदम्य साहस 'विजय' होने के जोश को और दुगुना कर देती! हम फिर डट जाते! और 'विजय' की उस शक्ल को याद करते कि वो कब, कहाँ, कैसे, कितना ..सबसे ज्यादा खुबसूरत लगा था! और निश्चय करने से पहले ही स्टूडियो वाला हाथ में अपना ऐतिहासिक पौराणिक कैमरा लेकर हाज़िर होकर कुछ खुद हड़बड़ाता और हमें भी हड़बड़ा देता! हमारे जेहन से 'विजय' गायब हो जाता! हमें "काला-पत्थर वाले चश्मा धारी संजीव कुमार दीखने लगते! मैं भगवन-भगवन कह 'विजय' को याद करता! तभी त्रिपाद पर खड़े कैमरे में से झांकता स्टूडियो वाला हमारे पास आता और हमारे चेहरे को पकड़कर इस तरह हिलाता-डुलाता जैसे हंडिया के ढक्कन की चूड़ी सेट कर रहा हो! फिर वैसे ही हमारे कंधे को टर्न देता, ट्विस्ट देता, दाए-बायं एडजस्ट कर तसल्ली करता 'हाँ! अब "घईलवा " नईं लुढ़कतई!' वो -हिलना मत- की हिदायत देता फुर्ती से वापस कैमरे में से झाँक मुझे देखता और इशारे से सर थोडा और ऊपर, थोडा नीचे करवाता! "स्माइल प्लीज़" बोलता! मैं 'विजय' हूँ ! मुस्काता हूँ! तो सेठ धरमदयाल तेजा की शक्ल दिखी! स्टूडियो वाले ने फाइनली कहा "रेडी...!" 'पसीने ले लथपथ विजय' ने चीखा :"कमीने!!!!!" -_झमाक्क_-!! खीच गई फोटो ! हफ़्तों इन्तजार के बाद जब फोटो मिला तो हमने 'विजय' को देखा! वो -फिर से- 'विजय' नहीं था! मैं नहीं था! कोई नहीं था! पर लगता तो कोई मनुष्य का बच्चा ही था! जिसकी कोई पहचान नहीं थी! पर 'विजय' बने रहने की लत्त्त जैसे खून में घुस गई है! ...ज्यादा दिन भी नहीं बीता था कि फिर सनक गए! और उपाय सोचने लगे!

अब एक ही उपाय था! हजामत बनवायेंगे ही नहीं, कम-से-कम छः महीने तक तो बिलकुल नहीं! केश बढ़ें! बढ़ते जाएँ! और शनैः-शनैः हम उसे 'विजय-शेप' में ढालते जाएँ! और रोजीना सुबह की पहली नमाज़ सुनते ही हम शुरू हो जायेंगे! फिर हेयर ड्रायर तो है ही, गरमा-गरम हवा, हर घुँघर को सीधी कर देगी! ...अगले कुछ ही दिनों बाद स्कूल में खाली पिरियड के बीच जब ग्राउंड पर जाते तो खेलते कम, अपनी 'परछाईं के सर' को ज्यादा घूरते! ;(मन हीं मन मुदित होलकर सोचते)'...हाँ! अखनी अमिताभ दिखलऊ रे, भाय!'  ...तभी किसी ने फिर भर-मुट्ठी बालों को भींचा, पलटकर देखा तो जान सूख गई! हेडमास्टर साहब ने कड़क कर अलंकारिक भाषा व्यवहार का नमूना पेश करते झट एक कैंची जेब से निकली और मुट्ठी भर जकड़े हुए बालों को कुतर कर फेंक दिया!! हम हक्के-बक्के, दुक्के-चौंके-खड़े रह गए!! हैडमास्टर साहब गरजे :"...`~!@#$%^&* इमरजेंसी का टाइम है, इंदिरा जी के हुकम है कि ईस्कूल में लम्बा बाल नइ रखना है, हम बोले थे ना?_फिर काहे रखा रे .*&^#@!" और दो थाप दिए! फिर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ! उनकी नज़र "45-इंची" मोहरी वाली स्कूल-ड्रेस के रंग वाली "बेलबौटम" पर पड़ी, :"...ई बोरा पएँध के ईस्कूल आया है!?और उनकी कैंची ने इस बार बेलबौटम की भी जान निकाल दी! उन्होंने ये किया क्यों की इंदिरा जी ने उन्हें अधिकृत किया था! इस फटी बेलबौटम को पहने हुए चलते वक़्त मर्दानी टांगें जब जांघ तक की झलक झलकातीं थीं तो मारे शर्म के मरने को भी मन नहीं करता था! हेड मास्टर मुझे "सामंत" दीखता! 'विजय' की तरह दांत किटकिटाते, छिपते-छिपाते मेन रोड के बदले पतली गलियों से गुजरते धीमे-धीमे से चलते, अपना बस्ता कनपटी से सटाय, चुपके से घर में घुसे, बस्ता फेंका, एक गमछे से सिर ढके आईने में अमिताभ को देखा ...अमिताभ नहीं थे! न 'विजय' था! न मैं था! ..फिर कोई अजनबी बालक था!! जिसके सर के बालों की हजामत और अजीबोंगीब कतरब्योंत का कौशल देखकर "नउवा" के सम्मान में "तत्काल प्राप्त भाषा व्यवहार ज्ञान" का एक सुन्दर सा नमूना मेरे मुँह से निकला गया! सुन कर त्योरियां चढ़ाए बाबूजी कमरे से निकले और दो चमेंटा लगा दिए! ("...अमिताभ उर्फ़ 'विजय' की यह दुर्दशा!"...एक दिन में चार चमेंटा! उफ़ !) जब उनकी नजरें मेरे बालों पर पड़ी तो वे समझ गये कि 'बबुआ' ने कांग्रेस के इमेजेंसी यज्ञ में अपने बालों की भी आहुति दे दी है! "..अर्रेह !! पैन्टवो के!?"...वे मुझे पैन्ट बदलवा कर उसी वक़्त सैलून में ले गए! ठाकुर को बोले कि तुरंत इसकी अच्छी हजामत करो,.. हम आते हैं! वे लौटे तो उनके इतजार में बैठे, उंघते और सुबक-सुबक कर रोते मेरी नजर उनपर पड़ी और उनकी नजर मुझपर, ...पर वे उपेक्षा से दूसरी तरफ देखने लगे!! मुझे पहचाना ही नहीं! मैं बेंच पर से उठकर सुबकते-सुड़कते उनके पास आ ही रहा था कि उन्होंने ठाकुर से पूछा :"बबुआ केने गइलन?" ठाकुर ने हैरानी से उन्हें देखा, और मेरी ओर इशारा किया! बाबूजी :""..आएँ! ..ई का? हो! एकर "बेल" कहे मूंड दिए?" ठाकुर ने कहा :"कौनो जग्घे नैय हलई 'तवेरे बबा'(तिवारी बाबा), केने से कैचिया लगैतिलई ! एहे लास्ट उपाय रहई!" ...बाबूजी मुझे पुचकारते, अपने (नए) "चाँद" के टुकड़े को सहलाते हुए घर ले आये और हर वह वादा किया जिससे बालक का मन बहल जाय! लेकिन अमिताभ का गुस्सा शांत नहीं हुआ! वह -विजय- बुरी तरह फुनफुनाया हुआ ही रहा ..

...आज भी अमिताभ मीन्स "_विजय_" का गुस्सा वैसे ही भड़का हुआ है! गुस्सा है पर 'विजय' और अमिताभ नहीं,...है तो ये मूँछ वाला जो आईने से मुझे घूरता कोई उदण्ड और जिद्दी, बज्र-बुद्धि, "गर्दभ"-स्वर वाला, ढीठ अहिर दिख रहा है, जिसका तम्बाकू के दुर्गन्ध युक्त मैला गमछा भी धुलने से मना करता है, यानि सच्चा साथी है! अस्तु, चाँद की रौशनी बिखर कर बर्बाद हो रही है!

 _ऐसा क्यों ? आगे पढ़िए ...

....और ..26-जनवरी`2013आते तक इतने बाल उग चुके थे कि अब काँटों की तरह चुभते नहीं थे। हाथ फेरने पर एक मखमली अहसास होता था। लेकिन आईने में प्रत्याशित चेहरा नज़र नहीं आया। मैं रोज़ कल्पना करता कि इस बार बालों के फ्रेम में जड़ी मेरी सूरत कुछ तो गज़ब जरूर ढायेगी ! लेकिन सिरफल (बिल्व फल अर्थात बेल) सिरफल ही दिखता था, जिसपर बरसाती चिकते पड़े दीखते थे, निराशा होती थी, लेकिन आशा नहीं टूटती थी। ...उगेगा...उगेगा ! दिन-हपते-महीने गुजर गये, कंघी जिसे हाथ लगाय महीनें बीत चुके, जनवरी से मई आ गया पर वह तिरस्कृत भिखार की भांति सूख कर अपना लावण्य खो चुका है ! ...तब एक ख़याल मन में आया! चलो थोड़ी दिनों के लिए अमिताभ नहीं, "आमिर" ही सही, मूँछ उगा ली जाय, कहीं तो बाल दिखने ही चाहिए! हाल ही में फिल्म "तलाश" में पहली बार खाखी वर्दीधारी पुलिस इंस्पेक्टर की और उसकी शानदार मूँछ की याद आई और 'चन्देल' के भीतर -CFL- ( C. A. Fail ) रौशन हो गया! ...लेकिन मूँछ की पहली "शो" ही पिट गई! मेरे बेटे ने मुझे मेसेज किया ;'OH1..god11..clear your mustache, nOw! "आमिर तुरन 'धूम' मचने भाग गया! आखिर हमउम्र है! ...लेकिन विजय कहीं न कहीं से अभी भी मुझे आश्वासन दे रहा है! मन ने कहा 'घर की खेती है, दुसरे का क्या जाता है, अपनी सुनो - अपनी करो! तो मूँछ कायम रही! सोचा शादी-व्याह का सीजन है, दो-दो शादियाँ हैं, क्यों न इसी गेटउप में यह शादी-सीजन पार कर दिया जाय! दो सप्ताह में मूँछ के बाल इतने बड़े अरज में बढ़ गए थे कि अब उन्हें शेप-&-साइज़ दिया जा सकता था! कार्यालय का हरेक कर्मचारी साथी अब एक नए विषद राय-विचार में मग्न हो गए! पहले वाली बात एक हपते में ही हवा हो गई! कोई बोलता बोलता रुक गया! कोई दैनिक अभिवादन भूल गया! कोई मुँह फेरकर हंसा! किसी ने मुँह भी नहीं बिचकाया! कोई आँखें फाड़े देखता रहा! कोई सोच में डूबा हुआ! तो कहीं खुसर-फुसर! इस जोरदार धीमे झटके से जब वे उबरे _२-हपतों में बेशुमार राय-विचार मेरे पास जमा हो गए! लेकिन किसी के भी विचार को मैं क्यों मानूं, आखिर मेरी भी तो कोई सोच है, मूँछ मेरी है या उनकी? सबके विचारों को तिलांजलि देकर मोबाईल से नाइ को फोनकर घर आने को कहा! उसने कहा :"ढेरे भीड़ हई भईया अखनी नै आवे पारेंगे! एक-आध घंटा बाद आते हैं! वइसे आप हियें सैलुनवे में आइये ना तुरते काम हो जाएगा!" मैंने कहा :"नहीं भाई, घर पर ही आइये!" और नाइ का इंतजार करने लगा! आखिरकार खूब कलपाकर नाइ आया, तो मैंने उसे एक-दो DVD चलाकर, हीरो के ख़ास पोज़ को still कर दिखलाया! Less than 1-CM मेरी लम्बी बालों को दिखलाकर बोला :"बाल अईसन, ओर मोंछ अईसन होखे के चाहीं!" पुराने जमाने के मशहूर "खिजाब" ने विभिन्न रंगों के "डाइज़"/"मेहंदी" का रूप ले लिया है, मैंने नाइ से बालों और नई-नवेली मूँछ को कलर कर देने को कहा! (आखिर सादी-बियाह के समय हई !). नाइ ने सेवा पूरी की और मुझे आईना देखकर तसल्ली करने को कहा! मैंने आईने में झाँका ...न अमिताभ रुपी विजय, न आमीर, दिलीप साब तो बड़े दूर की बात है, यहाँ तो खुद मैं ही नहीं हूँ! कोई खूंखार शक्ल वाला असामाजिक तत्व खड़ा है .."रंगे हुए मूँछ और नन्हें बालो वाला शेट्टी!!" _क्या ऐसा सचमुच संभव है? है। तभी तो असलियत सामने है! लेकिन मैं तो बढियां आदमी हूँ यार! हे भगवान!.... क्या से क्या हो गया! आदमी यूँ भी कहीं बदलता है भला! फिर मैंने खुद को तसल्ली दी और कई तरह के सवालों के कई तरह के एक्सपलेनेशंस सोचने लगा! डर सिर्फ दो जनों से था! पहले वाइफ से! दुसरे बॉस से!! ...फिर मैंने पुनः अपने को तसल्ली दी '...अभी कोई है कहाँ!' "हम जइयई, भईया?" _नाइ ने टोका। "हाँ ..हाँ! जा!" ..और अपने ख्यालों में फिर खो गया! नाइ ने फिर टोक दिया। "अरे हाँ रे, जाहिन ना !" नाइ हिचकिचाया : "उ.. भ..भईया पइसवा .."  मुझे खेद हुआ, मैंने उसे राजी-ख़ुशी कर विदा कर दिया। उसपर बिगड़ने का क्या मतलब? जो कहा गया उसे उसने किया! करनी तो मेरी थी, जिसे भुगतनी भी मुझे ही होगी! मैं झुंझलाया (:"...आखिर बेल काहे ला मुंडवइले हलियई, कितना अच्छा बाल रहई जिके मुंडवा के अब पछताईत हियई, के जाने ई बरिस में समूचा जमबो करतई की नईं!?)...और मूँछ भी अभी ताज़ा-ताज़ा काला रंगा हुआ भयानक लग रहा है! यूँ जैसे कोई -उपरी जिलों- का कुरता पहने अहिर हो जिसका लाल गमछा, वस्त्र का एक अनिवार्य वस्तु, जिसकी लाठी जैसी ताक़त की पहचान स्थापित है, जो हमेशा उसके कंधे पर या मुण्डे हुए बेल पर शोभायमान रहती है, और सेम-टू -सेम यही वेष-भूषा होती है जो आदमी आईने से मेरी और मेरी आँखों में झाँक रहा है, जो ढिठई से पेश आता हैं, पान-गुटखा-तम्बाकू-खैनी-गांजा-भांग-दारु-सिगरेट-बीड़ी का नित्य सेवन और पालन सनातन धर्म की तरह समझकर करता हैं; जिसकी आँखें हमेशा लाल रहतीं है! जो हर उम्र की महिला को सर्फ एक ही निगाह से देखता है! जो हर भीड़ में आपको धकियाता है! जो हर गाडी में जबरन सीट लूटता है! जो सिनेमा की टिकटों की ब्लैक-मार्केटिंग करता है! जिसके आचार-व्यवहार बोली और मंत्रोच्चार भी में माँ-बहन (वो चाहे उन्हीं की माँ-बहन क्यों न हो !) गाली-गलौज युक्त वाक्य होते हैं जिसके प्रयोग के बिना वो अपना दुखड़ा तक नहीं सुना सकता! जो अब बसें धोने वाला खलासी नहीं है, बस का कंडक्टर नहीं है, बस अड्डे पर बसों के टिकटों की एजेंटी भी अब यह नहीं करता, पेट्रोल पम्प का नोज़ल मैन भी नहीं है, _अब यह हाई-वे पेट्रोल पम्प का मालिक है!! यह नेताजी हैं!! यह नेताजी के ख़ास चमचा हैं! जो नेताजी की लालबत्ती वाली सफ़ेद, कई झंडे फ़ुनगे लगे, एक्स्ट्रा लाइट्स लगी -बोलेरो- में बिना हॉर्न बजाय 'उलटी दिशा से ', वन-वे में दनदनाते फिरते हैं! सोसाइटी के नासूर......!" फिर भी हिम्मत करके उपरी जिलों के सफ़र को निकल गए!

वाइफ से पहले घर के मर्दों और गुंजन से मुलाकात हुई, मैंने आशीर्वाद देने से पहले पूछा :"कैसा लग रहा हूँ? गुंजन :"एकदम झकास!" तभी वाइफ पधारीं :"ई डाकू जइसन मोंछ का जाने काहे ला बढ़ा लिए हैं, छेह!' माँ :"ठीक त लागतआ" मैंने सफाई दी और ढिठाई में ही पनाह ढूंढी :"रे !आखिर सार के बियाह बा!" फिर किसी को मेरी मूँछ से मतलब नहीं रहा! आते वक़्त गाँधी सेतु पर मैंने नयी मूँछ और कुर्ते में फोटो खिंचवाई थी! कैमरा में उन्हें देखने लगा _मुझे वही असभ्य मुस्टंडा, गुंडा मुझे घूरता हुआ दिखा! जो कभी-कभार मस्तकपर लम्बा लाल टीका लगाए औए हाथों में लाल धागे और कड़े भी पहनता है! मैंने कैमरा बंद कर दिया! अब तो किसी तरह यह यज्ञ पूरा हो, घर पहुंचूं फिर ...तभी वाइफ़ ने सवाल शुरू किया :"मोंछ काहे बढ़ा लिए हैं?" जबाब :"मुंडवाने के लिए।" सवाल : मुंडवाना ही था तो बढाए काहे?" जबाब : "मुंडवाने के लिए!"

सफ़र से लौटने के साथ ही यह निर्णय ले लिया गया कि मूँछ की कुर्बानी हर हाल में दी जायेगी! लेकिन ख़ास मौके पर! आप मेरी मूँछ मुंडन संस्कार में सादर आमंत्रित होइएगा!

जाते-जाते कृष्ण चन्दर जी की किताब "एक गधे की आत्म कथा" में शुमार एक शेर शायद यहाँ भी फिट लगे!
 "बनाकर गधों का हम भेस 'ग़ालिब'l"
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैंll"

बेलम !
बौटम !!
बौड़म !!!
भह :
_श्री .

Sunday, May 5, 2013

दो कलियाँ !! (1968)

दो कलियाँ !! (1968)

बचपन की एक और मीठी याद !!
जब हमने इस फिल्म को पहली दफा देखा था तब हम "बेबी सोनियां' (रणवीर कपूर की माताश्री) से भी छोटे थे!
पहले सिनेमा घरों में आगामी फिल्म का ट्रेलर दिखाना एक व्यावसायिक आवश्यकता थी, और एक फैशन भी! फिल्म्स मनोरंजन का एक एकलौता और सबसे सस्ता माध्यम हुआ करता था! दर्शकों को 'अभी देख रही फिल्म' से ज्यादा मज़ा और रूचि प्रत्याशित 'ट्रेलर' को देखने में होती थी! दोस्तों से सुनकर की चालु फिल्म के मध्यांतर में फलाना-फलाना फिल्मों का ट्रेलर दिखया जा रहा है, ......दो-दो , तीन-तीन ट्रेलरर्स दिखाए जा रहे हैं'!!__सुनकर 'चालु' वाहियात फिल्म को देखने केलिए भी अच्छी-खासी भीड़ हो जाया करती थी जो ट्रेलर पेश होने पर उसकी घोषणा करने वाली वाली प्रमाण-पत्र की स्लाइड देखते ही यूँ हर्षित होकर जोश से हो-हल्ला करते, सीटियाँ मारते और तालियाँ पीटते थे जैसे वाहियात फिल्म की टिकट का पैसा वसूल हो गया हो! कभी-कभी तो सुपर हिट फिल्म के बीच दिखाई गई वाहियात फिल्म के ट्रेलर से भी वही शोर शराबा और हर्ष ध्वनी होती थी! ये क्रेज़ था ट्रेल्लर्स का !! हमने भी किसी अच्छी या वाहियात फिल्म में "दो कलियाँ" का ट्रेलर देखा था, और फैसला हो गया था कि इसे नहीं छोड़ेंगे! "...महमुदवा के देखना हउ जी, मामू मुरुख=(खूब) हंसईले हउ "नउवा" (हज्जाम) बइन के !! लास्ट में तो मार-पीट भी हई ईयार!!" जब फिल्म लग जाती तो (फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखने की स्वतंत्रता नहीं थी !) योजनायें बनने लगतीं! सिर्फ बच्चों और नौजवानों की ही नहीं बल्कि घर के मुखियाओं का या बुद्धिजीवी वर्ग के मुखियाओं के भी बैठकें यूँ लगतीं जैसे किसी गंभीर सामजिक मुद्दे के उचित निर्णय पर पहुँचने में बहस हो रही हो, और जिसमे शिरकत करना हर बच्चे-बूढ़े और जवान का नैतिक दायित्व हो! _कब देखना है? _कौन सा शो देखना है? _किस 'क्लास' में बैठकर देखना है? _फिल्म की टिकट कौन कटाएगा? __<< ये सबसे अहम् बात होती थी! घर की लड़कियां, महिलायें, सहेलियां कैसा श्रृंगार करूँ?_कौन सी ड्रेस पहनूं जैसे प्रश्नों को सुलझाने हफ़्तों लगा देती थीं! उन दिनों सिनेमा के बुकिंग क्लर्क्स की शान ये थी कि उसकी एक 'पहचानती नज़र'; एक 'टच !'_के लिए लोग, फिल्म के हीरो से जादा उसमे दिलचस्पी लेते थे! उससे जान-पहचान में सबसे बड़ी शान होती थी! वह सोसाइटी के हाई क्लास के वर्ग का सम्मानित सदस्य हुआ करता था! जहाँ बैठता, उसके चारों तरफ मजमां-सा लग जाता था! झूठ तो झूठ ही सही, कई लोग तो उससे अपनी दोस्ती और रिश्तेदारी तक के किस्से सुनाकर रौब गांठा करते थे! बुकिंग विंडो से टिकट कटा पाने में सफल होने वाले लोगों की भी एक ख़ास जामात हुआ करती थी, जिसने कटा लिया सबकी इर्ष्य भरी नज़रों का पात्र बन जाता, लेकिन अपनी मित्र मंडली में हाँफते हुए और अपनी उंखड़ी साँसों पर काबू पाते वो रौब से छाती फुलाता, अपनी नुची-चुथी बाल, बदन और कमीज़ की सिलवटें झाड़ता और कड़क कर पान वाले से अपन पान मांगता, और यूँ चबाकर थूकता जैसे सिकंदर ने अभी-अभी दिलावर को पीट दिया हो !! .....यह फिल्म उस ज़मानें की हैं जब मुफलिसी की भी खासी इज्ज़त हुआ करती थी! ..और आज !! वही टिकट कलर्क जिंदा तो है पर यह शहर उसे नहीं पचानता! बल्कि वह अब अपनी खो चुकी पुरानी पहचान के लिए सबको देख रहा है, "...ये वही तो है जो हर बार मेरे घर के बाहर खड़ा रहकर पैसे देने को सदैव तैयार ताकि उसे टिकट विंडो की मारा-मारी से न गुजरना पड़े, और जो लोगों को बता सके "..अरे हाँह:! मामू टिकट नई रखतई, जानई नई हई का बेट्टा हमरा?" लेकिन अब कोई उसे उपेक्षा से भी देखने को राज़ी नहीं!  .......
Do Kaliyan is 1968 film directed by R. Krishnan and S. Panju. It stars Mala Sinha, Biswajeet, Mehmood and Neetu Singh.

Do Kaliyaan

Cast

    Mala Sinha as Kiran
    Biswajeet as Shekhar (as Biswajit)
    Mehmood as Mahesh
    Om Prakash as Kiran's Father
    Nigar Sultana as Kiran's mother
    Gitanjali (as Githanjali)
    Manorama as Madhumati
    Hiralal
    Umesh Sharma
    Shabnam
    Bharathi
    Sujatha
    Neetu Singh as Ganga / Jamuna (as Baby Sonia)
____________
Directed by     R. Krishnan
S. Panju
Produced by     Mukhram Sharma(dialogue)
Jawar N. Sitaram (Screenplay/Story)
____________
Music by     Ravi
Cinematography     S. Maruthi Rao
Editing by     S. Panjabi
R. Vittal
Release date(s)     1968
Country     India
Language     Hindi
खुबसूरत गानों, और अच्छी कहानी युक्त यह सुन्दर फिल्म पूरी-की-पूरी YouTube पर उपलब्ध है!
_श्री .

ओस की बूँद - राही मासूम रजा

"ओस की बूँद"
लेखक _ राही मासूम रजा
मैंने अभी कुछ दिनों पहले (यात्रा के पहले ही दिन यानी 25-अप्रैल को ही गाडी में पूरा पढ़ लिया था!) ही पूर्ण किया!
कैसा लगा?
यह एक स्वाभाविक प्रश्न है जिसे हरेक मित्र पूछना चाहेंगे; जिन्होनें मुझे इस किताब को पढने की प्रेरणा दी, और पहले इसे ही पढने को प्रेरित किया! __अगर साफगोई से काम लूँ और अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को निष्पक्ष, निश्छल, और निर्मल मन से सच और सिर्फ सच बोलूं तो ये बोलूँगा :



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क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः 
च चा चि ची चु चू चे चै चो चौ चं चः 
ह हा हि ही हु हू हे है हो हौ हं  .......................................
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 
 

A B C D 
E F G H 
I J K L 
M N O P
Q R S T 
U V W X 
Y Z
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10........................................................



“GIVE ME SOME SUN SHINE, GIVE ME SOME RAYS,…..GIVE ME ANOTHER CHANCE  _I WANNA GROWN UP ONCE AGAIN………….!” 

किसी की शझ में कुछ नहीं आया तो मैं क्या करूँ ! ऐएं!!?
 

Saturday, May 4, 2013

आँखें (1968)

आँखें (1968)
ankhen (The Eyes) ! A DIAMOND JUBILEE HIT !!

The best of the best espionage movie ever made in India !
A great creation of the legendary Producer Director Late Ramanand Sagar & his all SAGAR family !
The movie's disc cover proudly proclaims :
1."ACCLAIMED UNANIMOUSLY BY PRESS"
2. "INTRINSICALLY INTERESTING STORY, DIALOGUE IS CRISP AND MEANINGFUL, LYRICS ARE HIGHLY POETIC" __Times of India Bombay
3. "BEST SPY FILM OF TYE YEAR (मैं तो कहूँगा :"...the BEST of the era !!") SUPERB SHOWMANSHIP" __Biltz Weekly, Bombay.
4. "BEAUTIFULLY CONCEIVED...., MASTERLY EXECUTED...., LIVELIEST ENTERTAINMENT...., MAGNUM OPUS...., RICH PURPOSE"__Amrit Bazar Patika - Calcutta
5. "SPECTACULAR SIGNIFICANT AND DYNAMIC"__Cine Advance - Calcutta
6. "FASCINATING FOREIGN LOCATIONS"      __FimFare - Bombay            
7. "Celebrated Diamond Jubilee"
8. "Shown at Film Festival MOSCOW"
9. "Celebrated 25 Silver jubilee Weeks over 12 Stations"
10 "Winner of FilmFare Awards : Best Director _ Ramanand Sagar ; Best Cinematographer _ G. Singh"
11."100 Days at over 25 Stations !"
12. "ALL TIME RECORDS AT 50 STATIONS"
13. "ALL TIME RELEVANT"
14. "the SHRIKANT TIWARI LIKES THIS MOST FROM HIS CHILDHOOD & the story goes like this"::::>>>
Please read........
सन 1972 में हमारे शहर में पहला सिनेमा घर (हॉल) बना! छोटे शहरों में नई फ़िल्में लगना उस ज़माने में किसी चमत्कार से कम नहीं था! ...कोई चमत्कार न होना था, न हुआ ! अतः 1974 में जब यह फिल्म मैंने पहली बार "W.T." देखि थी तब मेरी उम्र छोटी-सी, नन्हीं-सी थी!...और मैं अपने बाबूजी की गोद में रहता था! ईतनी-सी उम्र (8 Yrs.) में ही मैंने इस फिल्म का भरपूर आनंद लिया था!
ब्लैक & वाइट में --"समाचार"-- समाप्त होते ही (रंगीन) फिल्म शुरू होती है और रफ़ी साहब की बुलंद आवाज़ गूंजती है :" उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, ...जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं ऑंखें!" ...इतने में ही रोमांच हो आता है और हॉल का शोर शांत हो जाता है, सभी दर्शकों की "आँखें" अब स्क्रीन पर है..,
कहानी एक Sabotage से शुरू होती है! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए इस आतंकवादी हमले पर सरकार के बयान हैं कि इसमें दुश्मन मुल्कों का हाथ है! जिसके तत्काल बाद एक गोपनीय इमरजेंसी मीटिंग होती है! यह मीटिंग एक गैर-सरकारी देशभक्त लोगों की है जिन्होनें नेताजी सुभाषचंद्र बोष से तालीम पाई थी, और उनकी सेना "आज़ाद हिन्द फ़ौज" के वीर सेनानी थे! इस गोपनीय ग्रुप के लीडर हैं बुजुर्ग मेज़र दीवानचंद मेहरा! इस "गैर-सरकारी ग्रुप" को सरकार से सहमती और सहूलियतें प्राप्त हैं, यह ग्रुप अत्यंत गोपनीय हैं, जो किसी की नज़रों में नहीं हैं! मेजर साहब का पुत्र सुनील भी इसी ग्रुप का एक सदस्य है! इस मीटिंग में यह तय पाया गया कि निःसंदेह हिन्दुस्तान में जासूसी और तोड़-फोड़ की सभी कुकृत्यों के पीछे दुश्मन मुल्कों का हाथ है! ग्रुप मेंबर अशफाक साहब का छोटा बेटा अनवर भी (पहली बार) इस मीटिंग में शामिल है जो मेजर साहब से सहमत नहीं है, और जिसकी "ऑंखें" कुछ और बयां करतीं हैं! मेज़र साहब एक गोपनीय जानकारी सभी सदस्यों से शेयर करते हैं कि मेजर साहब के दोस्त और अशफाक साहब के बड़े बेटे सलीम, जो गुप्त मिशन पर बाहर है, ने कुछ ख़ास जानकारियाँ दीं हैं!! दुश्मनों द्वारा स्मगलिंग के मार्फ़त हिन्दुस्तान में घातक हथियार और गोला-बारूद चुपके से लाया जा रहा है !! सलीम ने उनका पता पा लिया है और वह भी उसी शिप पर "ऑंखें" सजग रखते हुए समुद्री यात्रा कर रहा है! उसे अब सिर्फ हथियारों के खेप का पता लगाकर और उनपर गुप्त निशान लगाकर मेजर साहब को सूचित करना है !!  

समुद्री यात्रा में शिप पर मौजूद दुश्मनों के -इंडिया में सक्रीय- डॉक्टर/कमांडर का मैसेज आता है जो शिप पर 'उसकी टीम' के "कैप्टन" को बतलाता है कि उनके पीछे एक हिन्दुतानी जासूस लगा हुआ है ...... इनमें मंत्रणा होती है, और "उस हिंदुस्तानी" जासूस से निपटने की रणनीति तय होती है!

दुश्मन मुल्कों के तरफ से हिन्दुस्तान में एक अत्यंत ही गुप्त स्थान पर वेष-भूषा बदले, छद्म रूप में सक्रीय कमांडर और उसके सदस्यों, प्यादों और उनके "डैन", सीक्रेट अड्डे के भेद को देखकर वास्तविक रोमांच होता है!! कमांडर वह हर पैंतरा जानता और आजमाता है जिससे गद्दार पैदा किये जाते हैं जो उसकी नापाक मंसूबों में सहायक होते हैं, जो अगर पकडे भी जाएँ तो उनसे कोई खतरा न हो !

'शिप' पर सलीम हथियारों की पेटियों पर गुप्त निशान लगता है, जिसे दुश्मनों की "ऑंखें" देख रही हैं, लेकिन वे अभी उसे नहीं पकड़ते! सलीम ट्रांसमीटर पर मेजर साहब को इन सारी बातों की जानकारी देता है! और अपना शक जाहीर करता है कि शायद उसे पहचान लिया गया है !! मेजर साहब सलीम को सावधान रहने को कहते हैं, और हिदायत देते हैं कि संभव है दुश्मन बीच समुद्र में ही हथियारों की पेटियां उतार दे !!

इस -45 साल पुरानी- फिल्म में _घरों में गुप्त रूप छिपाए गए ट्रांसमीटरों का ईतना शानदार और रोमांचक और सटीक प्रस्तुतिकरण है कि आज भी देखकर लोमहर्षक रोमांच होता है! वास्तव में इस ख़ास बात को इसी शानदार तरीके से फिर कभी नहीं दिखाया जा सका है! ट्रांसमीटर की "टु टु....टू टू टू...बीप-बीप-बीप" की आवाज़ के साथ कंट्रोल पैनल पर लगे कई रंगों के लाइट्स का जलना-बुझना जादुई असर डालने में अभी भी कामयाब है जो रहस्य को और भी रोमांचक बनाता है! समूची फिल्म ही विभिन्न प्रकार के ट्रांसमीटरों के साथ आगे बढती है! ऑपरेशन द्वारा -अंगों में- छिपे "माइक्रो ट्रांसमीटर्स" की चर्चा और उपयोग इस फिल्म को वास्तविक Espionage Movie का दर्ज देती है! रह-रहकर कई तरह के ट्रांसमीटर्स से हमारा ताल्लुक व तआर्रुफ़ करवाया जाता है, और हॉल में 'अईस्स...-अईस्स...' की ध्वनि मजा और बढ़ा देती है! इस फिल्म की कहानी यानि -जासूसी- की "लय" कभी नहीं टूटती, कभी नहीं बहकती! "एक सच्ची और सम्पूर्ण जासूसी Espionage फिल्म_!!" इस कहानी का जासूस हीरो सिर्फ जासूस है! यह गाना नहीं गाता! यह डांस नहीं करता! हलांकि हसीनाएं इसपे रीझती और मोहित होती हैं लेकिन सुनील को सिर्फ अपने कर्तव्य और मिशन का ही ध्यान रहता है! हरेक कलाकार अपनी भूमिका में खूब जमा हुआ है! शानदार एक्टिंग और जानदार डायलॉग्स और चिल्लिंग इवेंट्स + थ्रिल्लिंग एक्शनस आपको चनाचूर खाने और पानी तक नहीं पीने देंगे! इसीलिए भर पेट खा-पीकर इसे देखिएगा! देख चुके हैं तो फिर से देखिये, खाना मेरे यहाँ आ कर खाइये!! ट्रांसमीटर्स के -सदुपयोग और दुरुपयोग- का ईतना वृहद्, विषद और विहंगम परफोर्मेंस फिर दुबारा कभी नहीं देखा !! आज के ''''-आधुनिक साइबर दुनिया-'''' में ट्रांसमीटर्स के मार्फ़त घात-प्रतिघात का ऐसा मुजाहिरा बॉलीवुड दुबारा नहीं दे सका, न ही कोई और शानदार Espionage फिल्म पेश कर सका ! यदि "ऐसी ही कशिश" वाली इसके मुकाबिले, इसके समकक्ष "कोई दूसरी Espionage हिंदी फिल्म" आपलोगों ने देखी है तो बताइये ताकि उसे मैं भी देख लूं!

[जीतेंद्र भाई की 'फ़र्ज़' as a spy thriller का नाम न लीजियेगा, क्योंकि वह 1st Indian Espionage Movie of India है भी या नहीं मुझे नहीं मालूम, फिर भी जीतू भाई के लिए और उसके गानों के लिए मैं उसकी इज्ज़त करता हूँ, लेकिन वह the Best नहीं है! मिथुन as Gun Master G9 मुझे कभी भी पसंद नहीं, सॉरी]

BEST of THE BEST ये है! _"ऑंखें !!" जो रीयली "ऑंखें" खोलती है! आगे पढ़िए....

.....मेजर साहब के बेटे सुनील से उसकी बहन 'जापानी लड़की' की कहानी सुनती है! इसमें भी, यानि जापान जाने में भी सुनील का मकसद उसका कर्तव्य ही है, लेकिन किसी 'मिशन' पर नहीं! जापान में सुनील की मुलाकात मिनाक्षी से हुई थी, जो सुनील से प्रेम करने लगती है! मिनाक्षी के दिवंगत पिता सुनील के पिताजी मेजर साहब के दोस्त और आज़ाद हिन्द फ़ौज के सेनानी थे! एक शानदार और यादगार और सदाबहार गाना यहाँ है: "...मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत कभी, कभी...!" एक और बात शेयर कर लूं : 'इस फिल्म को देखने के बाद "बोटिंग" मेरे लिए किसी Fantasy से कम न थी! आज तक जब भी मौका लगा और बोटिंग का चांस मिला मुझे यही गाना याद आता रहता है, सही है, कुछ बातें आपके व्यक्तित्व का ही नहीं, वरण अस्तित्व का अंग बन जातीं हैं...!'

....सलीम जो दुश्मनों के बीच है,......अपने मिशन को अंजाम देते हुए मारा जाता है !!! ...जिसकी मौत की खबर सुनते ही मेजर साहब की ".....सलीईईइम!!" की चीख से सारा स्क्रीन लाल खूनी रक्तमय हो जाता है!

कैप्टन, जो 'शिप' द्वारा हिन्दुस्तान में छिपे देश के दुश्मनों के लिए आर्म्स & अम्युनेशन ला रहा था, बड़े ही रहस्यमय तरीके से कमांडर के पास आता है! (किस रहस्यमय तरीके से? जिन्होंने नहीं देखा, अवश्य देखिये।) कैप्टन का आना, उसका कमांडर से मिलना, गुप्त अड्डे की सैर, ...जो सुरक्षा के अत्याधुनिक साधनों और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल्ड यंत्र, उपकरण self destruction, by pushing a only button के लिए भी well equipped है, और trespassing controlled laser signals से लैस और सुरक्षित है, मस्त लगता है!! और कमांडर द्वारा अपने मंसूबों की व्याख्या __इन दृश्यों को रामानंद सागर साहब ने फिल्माने में लगता है अपनी पूरी क्षमता लगा दी थी! किन शब्दों में इसकी तारीफ करूँ समझ में नहीं आता! कमांडर द्वारा उसके अपने मंसूबों की व्याख्या को सुनने में ऐसा लगता है जैसे वह ""_अभी के, तत्काल के_"" हालातों को बयाँ कर रहा हो ! यही इस फिल्म को ALL TIME RELEVANT, सर्वकालीन प्रासंगिक के विशेषण को इज्ज़त दिलाता है, जो Breathtaking है! Very Exciting, Very Surprising or Impressive है!! -और जो सच में सच है!-  और जो देश और हमारे लिए अफ़सोस और चिंता की बात है!
 .......इधर हताश मेजर साहब सुनील को कहते हैं : "...अब तुम्हें -बेरुत- जाना होगा !!" _मिशन है: देश से बाहर देश के दुश्मनों को धता बताते हुए यह पता लगाना कि हिन्दुस्तान में दुश्मनों का "सदर मुकाम" कहाँ है? _मुल्क के अन्दर मुल्क के दुश्मन कौन हैं?? _यहाँ से सुनील की एक्शन में इंट्री होती है ! मेजर साहब सुनील को बेरुत में पहले ही पहुँच चुके अन्य ग्रुप मेम्बर्स और स्थानीय सहायक नदीम की तस्वीरें दिखाते हैं! सुनील मिनाक्षी की तस्वीर देखकर हैरान रह जाता है, कि वह भी इसी ग्रुप की सक्रीय सदस्या है, जो बेरुत में एक डांसिंग ट्रूप की शक्ल में मौजूद हैं! ...दिल थाम कर हम सुनील के साथ बेरुत जाते हैं ...! वहाँ सुनील की मुलाक़ात मिस्टर नदीम से होती है जो सुनील को बेरुत में सहायता और सहूलियतों के साथ ख़ास सूचनाएं देकर सुनील के गुप्त मिशन को सफल होने में मदद करेगा! ख़ास और ज्यादा गुप्त बात यह है कि नादिम को भी यह बात नहीं मालूम कि बेरुत में सुनील के कोई और साथी भी हैं !! नादिम सुनील को जिस होटल में ठहराता है वहां की तलाशी लेते वक़्त सुनील को कई जगह से जानबूझ कर छिपाए गए ट्रांसमीटर्स मिलते हैं !! और (हम) दर्शक सन्न रह जाते हैं ! बेरुत में मिनाक्षी को Indian Embassy से एक ख़त मिलता है, जिससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान से कोई एजेंट इस मिशन को अंजाम देने के लिए आ रहा है, जिसकी उन्हें पूरी सहायता करनी होगी और जो मिशन का इंचार्ज होगा! चिट्ठी पर लगी पोस्टेज स्टाम्प को एक ख़ास लिक्विड से भिगोकर उखाड़ने पर दो स्टैम्प्स के नीचे छिपे दो "माइक्रो फिल्म" मिलते हैं जिसमे से एक में कोडेड मेसेज है और दुसरे में हिन्दुस्तान से आने वाले एजेंट की तस्वीर...!  बेरुत में छिपते-छुपाते, नदीम से भी बचकर अपने साथियों तक सुनील किस तरीके से पहुँचता है ...फिल्म में देखिये !! यहाँ दुश्मनों द्वारा ट्रांसमीटर्स का इस्तेमाल यूँ है जैसे आज का मोबाइल फ़ोन हो, और भविष्य दिखला रहे हो !! (जेम्स बांड की फिल्म You Only Live Twice की याद दिलाती है!!) सुनील की मुलाकात अपने ग्रुप मेंबर्स और मिनाक्षी से होती है! मिनाक्षी और ग्रुप के दो ख़ास सदस्य "महमूद" और "स्टूडियो ओनर" भी कोई कम नहीं हैं! उन्होंने भी अपना मुकाम ऐसा गोपनीय बनाया है जो सुनील को खूब भाता है! सुनील, नदीम पर अपना शक ज़ाहिर करता है..., फिर जब मिशन शुरू होता है,...सांस लेने की भी जैसे फुर्सत नहीं मिलती...! कर्णप्रिय गाने के दरम्यान भी स्टंटमय जासूसी !!  ">>>"गैरों पे करम अपनों पे सितम ??" ...काहे हो ? मिनाक्षी का 'विग' समूचे स्क्रीन को कवर कर लेता है (हा हा !!)! इस पार्टी में, जो नादिम के जन्म दिन की ख़ुशी में है, सुनील की मुलाक़ात शाहजादी ज़ेनब से होती है, जो पहली नज़र में सुनील पर फ़िदा हो जाती है।.....

दुश्मन को जानकारी है कि मेजर साहब को रोके बिना उनके मनसूबे पूरे नहीं होंगे! अतः वह घात लगते हैं! मेजर साहब के नवासे का अपहरण कर लेते हैं! जिसमें एक गद्दार उनका साथ देता है!

फिर सांस लेने को तभी फुर्सत मिलती है जब इंटरवल के बाद सुनील की बहन भगवान् के सामने दुखद गाना गाती है! शायद यह गाना इंटरवल के बाद इसलिए डाला गया होगा ताकि सभी दर्शक आराम से हलके होकर अपना चनाचूर या पॉपकॉर्न खाते हुए बढियां से सैटल-डाउन हो लें! ...लेकिन जैसे ही गाना समाप्त होता है दुश्मन अपनी चाल चल देते हैं! कमांडर अपने दल की सदस्या "मैडम" को एक षड्यंत्र रच कर मेजर साहब के घर में घुसा देता है! मेजर साहब को बस इतना पता है कि यह "बुढ़िया" उनकी बेटी के पति की सगी मौसी हैं!! और फिर सांसें रोक देने वाली घटनाएं छद्म वेष-भूषा, फेस-मास्क और ट्रांसमीटर्स के गज़ब के खेल, खतरनाक खेल शुरू हो जाते हैं!... बेरुत से सुनील का मेसेज _by the interception of enemy radio signals_ बुढ़िया 'मैडम' कमांडर को भेजती है, कमांडर इस मेसेज को वापस बेरुत में अपने पार्टनर को देता है, बेरुत में बैठा हिंदुस्तान का दुश्मन सुनील पे जिसकी शरू से ही ""ऑंखें"" लगीं हैं फिर घातक घात करते हैं ...और सुनील क़ैद हो जाता है! ...ट्रांसमीटर्स के सहयोग से ही मीनाक्षी, महमूद और 'स्टूडियो ओनर' मिलकर भिखारियों जैसा वेष धारण कर सुनील का पता लगाने में बेरुत की गलियों की ख़ाक तक छान देते हैं लेकिन सुनील का पता नहीं मिलता .....वे दुश्मनों के बीच हैं ...... और मिलकर नाच-गा रहे हैं "... तुझको रक्खें राम तुझको अल्लाह रक्खे ....इंटरनेशनल फकीर आये हैं .... अरे कहाँ छुप गया है तू कठोर ........!!"  कॉमेडी, कॉमेडी ही लगती है जो निर्मल हास्य पैदा करती है कोई फूहड़ता नहीं!  .....अंततः बेरुत में सफलता मिलती भी है या कोई जान से जाता है? नदीम में क्या भेद था? ज़ेनब नाम की रहस्यमयी किरदार ने (जो असलियत में दुश्मन की जासूस है!) सुनील पर रीझ कर जिसकी जान लेनी थी, क्या करती है? क्या सुनील को बेरुत में सफलता मिलती है या ......

हॉल में खुशनुमा हंसी, ठहाके, तालियाँ, शोर, हल्ला, गालियों, कोसनों और जूत-पूजार ने नवाजी जा रही बुढ़िया 'मैडम' को  मेजर साहब जब हुमच कर मारते हैं तब गज़ब का माहौल बन जाता है, Gun Fire, Suspense & Horror से हमारी हालत भी पतली होती है!! ...लेकिन "मैडम" सायनाइड खाकर जान दे देती है !! ऐसी शानदार अदाकारी दुर्लभ ही देखने को मिलती है!! अफ़सोस से गर्दन हिलाते मेजर साहब का संवाद आज भी मुझे रोमांचित कर देता है _: "इसकी मौत हमारी शिकश्त है!"

फिल्म की खासियत है "ऑंखें" ! हर किसी की "ऑंखें"!! और आँखों की भंगिमाएं! जैसे आँखों से ही संवाद अदायगी कर रहे हों ! और रामानंद सागर साहब इसमें पूर्णतः सफल रहे है! मैंने उन्हें सेल्यूट करता हूँ!
_जय हिन्द!

मित्रों, उपरोक्त में मैंने कहीं भी किसी भी कलाकार का नाम नहीं लिया है, फिल्म में जिसकी जो भूमिका है वही लिखा है! वो बाकी अब यहाँ --पेस्ट-- किये देता हूँ :
Directed by Ramanand Sagar
Produced by Ramanand Sagar
Written by Ramanand Sagar



Music by Ravi
Cinematography G. Singh
Editing by Lachhmandass
Release date(s) 1968
Country India
Language Hindi

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Cast:

  • Mala Sinha ... Meenakshi Mehta
  • Dharmendra ... Sunil
  • Kumkum ... Sunil's Sister
  • Sujit Kumar ... Nadeem
  • Mehmood ... Mehmood
  • Lalita Pawar ... Madam / fake Mousi
  • Daisy Irani ... Lily
  • Zeb Rehman ... Princess Zehnab
  • Madhumati ... Madhu
  • Neelam
  • Sujata
  • Nazir Hussain ... Diwan Chand aka Major Saab
  • Jeevan ... Doctor
  • Amarnath
  • Madan Puri ... Captain
  • Dhumal ... Studio Owner
  • Sajjan ... Boss in Beirut
  • Master Ratan ... Babloo
  • Hiralal
  • Parduman
  • A. A. Khan
  • Jagdish Kanwal
  • Narbada Shankar
  • Ram Tipnis
  • Lachhmandass
  • M. B. Shetty ... Guard who gets arrested with the Diamond Dealer
  • Kailash Advani
  • Ishar Singh
  • Shafi
  • Lalit Kumar
  • Ramlal
  • Mohammed Ali
  • Sheru
  • Qamar
  • Vishnu
  • Bismillah
  • & श्रीकांत तिवारी : AS दर्शक & प्रशंशक  

 


























Friday, May 3, 2013

स्वर्गीय शहीद सरबजीत जी

भाइयों !
स्वर्गीय शहीद सरबजीत जी को आज देश का बच्चा-बच्चा जान गया! उसपे हुए हर ज़ुल्म को जान गया! लेकिन उसकी दुखद और खौफनाक कहानी स्कूलों में नहीं पढ़ाई जायेगी! देश के झंडे को सरबजीत के शोक में नहीं झुकाया जाएगा! दूसरी तरफ चीन अपने नापाक इरादे दिखला रहा है! प्रधान मंत्री जी और अन्य नेता लोग बयानबाजी का मैच खेलने में व्यस्त हैं! कैसे बेदर्द और -spineless- गवर्नमेंट है हमारी??
यह संकट की घडी है!
यारों ! कुछ तो सोचो!
क्या सरबजीत मी मौत बेकार चली जायेगी!? ...और हम इन्टरनेट पर बैठकर गप्पें मारें!?
क्या हम तीन दिन के लिए इससे (इन्टरनेट/ facebook वगैरह से) परहेज नहीं रख सकते!?
""">>>क्या तीन दिन का मौन रखने से हमारे कर्तव्य-कर्म पूरे हो जायेंगे!!??........नहीं।<<<"""
तो?
अपना चेहरा मत छुपाओ !!
सामने रहो !!
लड़ो !
आवाज़ लगाओ !!
वह माध्यम चाहे जो भी हो ! हिलाओ और झकझोरो इस कमज़ोर सरकार को !!
AC चैम्बर में बैठे रहने से, और 'बतकूचन' करने से अच्छा होगा, यदि हम सरबजीत के परिवार के प्रति संवेदनशील हो सकें, और अपनी भावनाओं और गुस्से से इस लचर सरकार को अवगत करा सकें! वरना तुम्हारे आंसू कभी भी नहीं सूखेंगे!

तो फिर उठिए .......
भारतीय सेना से मुखातिब होइये!
अपने देश के वीर सपूतों की थोड़ी संगत कीजिये।
और उनके विचार जानिये, और अपनी भावनाओं से उन्हें अवगत कराकर उनका मनोबल बढ़ाइए ........
कहिये की हम सदैव उनके साथ हैं .........

Thursday, May 2, 2013

STORY OF AN ABANDONED CHILD!

एक त्यागा हुआ बच्चा!
बच्चे के जन्म के चंद महीनों बाद ही बच्चे की माँ की असामयिक, आकस्मिक मृत्यु .....!!
बाप ने नहीं पूछा, दूसरी शादी रचा ली  .......!
चाची-चचाओं ने नहीं पूछा, अपनी दुनियाओं में खो गये  .......!!
दादा-दादी ने नहीं पूछा, आखिरकार इतना बड़ा "कुटुम"(कुटुंब) है!!
...बस दादी कभी रो लेती थी ....!
और चचेरी बहन रो-रोकर सूनी-सूनी-सी हो गई!
आखिरकार किसी ने पूछा।
बच्चे की नानी ने!
नानी के बड़े भाई  ने इस त्यागे हुए बच्चे को अपना लिया !!
यह बच्चा जिसे इसका "पूर्ण-नव-पत्नी-व्रता" पिता अपना नाम तो क्या अपना एक दस्तखत तक देने को राज़ी नहीं...! जो भाई कभी अपनी वीणा दीदी का दुलारा खिलौना था, "..बउआ था !!", ...वीणा से दूर रहते हुए भी सदा उसके दिल में रहा! अपनी दादी से बच्चे की चचेरी दीदी (वीणा) हमेशा पूछा करती थी :"ए, ईया! ई बउवा कब ले आई?"...पर दादी खुद कुछ जानती तो बताती न !! बहन, अपने भाई के उसके नाना के यहाँ चले जाने से अकेली रह गई थी, उसे याद कर रोती रहती ...!!

मेरी मुलाकात इस बालक से इनके दादाजी की म्रत्यु-परांत के कर्मकांड के दौरान हुई! उसी समय मैंने इसकी बचपन की कहानी सुनी! तभी से यह बालक मेरा दोस्त बन गया! बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के इस बालक ने CAT  Indian Institutes of Managementपास किया और BIT (Birla Institute of Technology, MESRA, RANCHI JH.) से MBA की पढ़ाई, शानदार तरीके से पूरी की!! और आज यह खुबसूरत गबरू नौजवान दिल्ली में एक बड़ी कंपनी के मैनेजमेंट विभाग में कार्यरत है! रांची में अपनी MBA की पढ़ाई के दरम्यान इसने दो (2) वर्ष [होस्टल में रहते हुए भी] हमारे साथ गुजारे। इस दौरान हमारे पारस्परिक सम्बन्ध और और और प्रगाढ़ हुए! बहन ने बचपन से लेकर अबतक की जैसे सभी राखियाँ अपने भाई की कलाई पर बाँधी! बहन-भाई का पुनर्मिलन हो गया!

a real DABANGG !! की शादी !
बहन 21 अप्रैल को ही 'तिलक' में सम्मिलित होने के लिए चली गयी थी! कार्यालय की व्यस्तता और मुझे अभी मालिकान की इजाज़त भी लेनी थी, अतः मुझे छुट्टी मिलते ही यात्रा की तैयारी शुरू हो गई!

25/04/2013
सबकी जिद्द थी कि 'इतने' लम्बे सफ़र में "-मैं-" गाडी नहीं चलाऊं! 500KM से ज्यादा की दूरी, अव्यवहारिक, अव्यवस्थित ट्रैफिक और रैश ड्राइविंग को 'कंपीट' करने का मेरा भी कोई इरादा नहीं था। ऐसे मौके पर अभी मुझे कलीम की भारी कमी सता रही है! कलीम मेरा favourite (all time) ड्राईवर है, मेरे बेटे की उम्र का है, लेकिन, चूंकि मैं ड्राईवर की रेगुलर और दैनिक सेवा नहीं चाहता, न जरूरत होती है; अतः कलीम अपना और अपने बीवी बच्चों का पेट पालने के लिए किसी और की नौकरी करता है! और उसका मालिक रोजीना अपनी गाडी भाड़े/सट्टे पे कमाई के लिए चलवाता है, जो कलीम को छुट्टी देने को राजी नहीं! कलीम एक दक्ष ड्राईवर है जिसे कई राज्यों के कई कई रास्तों की बड़ी अच्छी जानकारी है! मैंने जब-जब उसे अपने ड्राईवर के तौर पर रखा किसी भी सफ़र में उसे मैंने गाडी रोककर राहगीरों, या लोकल दुकानदारों से सही रास्ते की जानकारी के लिए पूछताछ करते नहीं देखा कि : "... अंऐं भैया एहे रस्तवा नि पटना जईतई?" कलीम हमेशा मुझसे कहा करता है कि 'सर, ए गो बढियां गाडी लीजिये ना, हम बराबर साथे रहेंगे, गाडी भाड़ा में चलेगा, उसी से कमा कर लोन भी चूका देंगे!' ......मगर अफ़सोस अभी मेरी दशा ऐसी नहीं! ...अब कलीम की जगह रमेश जा रहा है! ये हमारे कर्मक्षेत्र के नाईट गार्ड का बेटा है, मुझे भरोसा दिलाया गया है कि इससे आपको निराशा नहीं होगी। और वाकई मुझे कोई निराशा नहीं हुई!

सो, हम सुबह सवेरे गौरी-गणेश-महेश को मना कर निकल पड़े! अभी हमारे यहाँ [लोहरदगा, (झारखण्ड)] में एक हलके चादर वाला गुलाबी जाड़े का मौसम है! लेकिन जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए गर्मी का प्रकोप बढ़ता गया! लोहरदगा से चतरा तक का सफ़र ठीक-ठाक ही नहीं आनंददायक रहा, शक हुआ कि झारखण्ड सरकार बिहार सरकार से कुछ सीखकर सड़कें ठीक करवा रही है! "गया" पहुँचते ही लगा जैसे हम चूल्हे पर चढ़े किसी कूकर में बंद हैं! चतरा के बाद आखिरी मुकाम -(बिहार)-...डोभी, गया, जहानाबाद,पटना, गाँधी सेतु, हाजीपुर फिर मुजफ्फरपुर तक सड़ी हुई गर्मी, और पिछले "--15 वर्षों से लगातार निर्माणाधीन--" सड़कें अभी भी अपने फूटे करम पर रो रहीं हैं और उससे भी कहीं ज्यादा हमें रुला रही है! कभी भी, कहीं भी चैन नहीं मिला! खूब हिचकोले खाते, गेंद की तरह उछलते, गिरते, लुढ़कते माँ के कोसनों, और (घर की दाई) कलवातिया-'दी' के "भाँड-बिसर" गारी सुनते, पसीना पोंछते, गर्म पानी पीते, और मेरी पुरानी बिमारी Coccydynia [Coccydynia is a medical term meaning pain in the coccyx or tailbone area, usually brought on by sitting too abruptly.] जो फिर धमका रही है, का दर्द सहते 03:30PM बजे हम मुजफ्फरपुर पहुँच गए! भगवानपुर चौक पर पिंटू भाई जी हमारे इन्तजार में खड़े थे! उनसे मिलन हुआ! वे हमें मुजफ्फरपुर निवास पर ले गए जहाँ हमने 2 घंटे से ज्यादा विश्राम किया! इसी बीच पिंटू जी ने शादी सम्बंधित कुछ वैवाहिक सामग्रियों की शौपिंग कर ली। फिर हमारी गाड़ी से ही वे हमें गाँव रूपनारायण-पुर लिवा ले गये! जहाँ बड़े-बुजुर्गों सहित इस एपिसोड के हमारे "हीरो" से हमारी मुलाकात हुई! रूपनारायण-पुर! ...गाँव!

"गाँव !" .... मेरे हीरो का गाँव! जब हम पहुंचे तब भगवान सत्यनारायण जी की कथा-पूजा हो रही थी। मंत्रोच्चार से वातावरण पवित्र हो रहा था। मैंने देखा ...मवेशियों के खाने वाली चारे की नांदें! ...मिटटी के घर और फूस की छत! इलेक्ट्रिक पोल पर रोता कलपता मरियल बल्ब कराह कर अपनी मजबूरी जताने की कोशिश कर क्षमा माँगा रहा है! ...अनाज रखने वाली मिटटी की गोल-गोल 'कोठियां' और फूस से बनी उनकी उलटे cone जैसी छत! अधिकाँश दीवालों पर ठोके हुवे गोबर के गोइंठे! गाँव का सबसे सस्ता ईंधन!! ...खुला-खुला वातावरण! चारों तरफ फैली हरियाली ही हरियाली! हरेक प्रकार के वृक्ष, पेड़, पौधे, लताएँ, फूलों के अनेक प्रकार के रंग! आम, कटहल, केले, महुआ, पीपल, नींबू , शरीफा, अमरूद, बेशुमार लीचियों के पेड़ों पर नन्हें बल्ब की तरह टिमटिमाते लीचीयों से लदे पेड़, ताड़-तरकुल-खजूर और साबूदाने के पेड़, और इन सबके मुखिया सामान अतिविशाल जटाधारी बरगद जो न जानें कितना बूढा है और जो न जानें इस गाँव के कई परिवारों की कई कई पुश्तें देख चूका है  !!...  जैसे इस छोटी-सी आबादी के एक अंग हों, एक साथ मिलकर मन को मोहे ले रहे हैं! मेरे हीरो के घर का दालान! 'खटिया' पर बिछावन डालकर लेटे, बैठे कई लोग, कई बुजुर्ग, आपस में धर्मचर्चा में मगन,...कोई भाव-भंगिमा बनाते "रुद्राष्टक" सूना कर गर्व से फूले जा रहे हैं; "...प्रचंडं प्रकृष्टम् प्रगल्भं परेशं, अखंडं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ..." तो कोई "देवी कवच" की महिमा बखान रहे हैं! ...एक तरफ नवनिर्मित घर! घर के सामने और एक बगल में लगे चापाकल! एक तरफ एक बड़ा प्रांगण वाला मंदिर और परमात्मा को नमस्ते करता उठा हुआ लम्बा गुम्बद! तीन तरफ से घिरे बीच की ज़मीन इतनी बड़ी कि किसी बड़े शहर में जिसकी कीमत का हिसाब लगाना कठिन है लेकिन किसी भी बिल्डर ताइकून के लिए मानीखेज ...., पर यहाँ इसे "बढ़नी" (झाडु) से बुहारकर, और बिना गोबर के घोल का इस्तेमाल किये हाथ से ही सिर्फ पानी के द्वारा लीपा गया है ...जिसपर लीपने वाली दाई की उँगलियों से चारों ओर अर्धचन्द्राकार आकृतियाँ और वातावरण की खुशबु मुझे मेरे बचपन और बाबूजी की स्नेहिल उपस्थिति की याद दिला रहा है! ...और यहाँ आकर ख़ुशी से मेरी आँखें नम हो रही हैं! '..और मन में 'धरम पा-जी' (धर्मेन्द्र)का चेहरा सामने है, जो गा रहे हैं '.......दिल कहे रुक जा रे रुक जा....यहीं पे कहीं,...जो बात, ...जो बात इस जगह है, कहीं पर नहीं........' रात्रि भोज में दक्ष हलवाइयों द्वारा बनाए खाने का लुत्फ़ उठाते समस्त ग्रामवासी!! सभी से हमारा मिलन हुआ! सही है, असली सभ्यता मिटटी में ही है, कंक्रीट में नहीं!!

नहीं थे तो सिर्फ वो लोग जिनके खानदान का यह बच्चा है! नहीं था तो वह शख्श जिसके बीज से इस बच्चे ने जनम लिया! लानत है उनकी तताकथित विद्वता पर! कितने झूठे हैं वे? और कितनी झूठी है उनकी मर्दानगी और शान, कितना व्यर्थ और शापित है उनका जीवन!

26 -तारीख को मैंने कुछ रस्में देखीं! ऐसी अनोखी रस्में, जिन्हें मैंने पहले कभी देखा सुना नहीं था! हमारे यहाँ बालकों का जब यज्ञोपवीत संस्कार (जनेउ) होता है, लगभग आधी वैवाहिक मांगलिक कार्यक्रम तभी पूरे हो जाते है! बचपन में ही इस बच्चे ने कई जानलेवा बीमारियों को झेला है! इसकी नानी ने बच्चे के स्वास्थ्य लाभ के लिए जितनी मन्नतें मांगीं थीं वह सभी पूरी की जा रहीं थीं! नानी के बड़े भाई जिन्होंने इस बच्चे को गोद लिया है, काफी बूढ़े हो चुके हैं! नेत्र विकार के कारण अब अंधे हो चुके हैं। जिन्हें हीरो 'नाना' कहता है और इनकी पत्नी (वृद्धा नानी) को प्यार से "माई" बुलाता है! सभी ने, यहाँ तक कि 'बहन' ने भी तीन दिनों का उपवास रखा है, रस्में निभाई जा रहीं हैं! आपको जानकार कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि ये सभी रस्में ब्रम्हा के चतुर्थ वर्ण के सपूतों --(शूद्रों)-- द्वारा निभाई जा रहीं हैं! जिसमे एक प्रधान पुजारी है, एक सहायक, एक रसोइया, और दो-तीन जने हैं, और सब मिलकर एक गायक मण्डली भी हैं!! इन्होने केले के थम, और केले के फल सहित केले के पेड़ (कदली/कदरी) के प्रयोग से बीच की ज़मीन पर घर के प्रवेश द्वार के सामने केले के थम से ही बहुत ही खूबसूरत चारदीवारी और बीच में मंडप बना दिया है! जिसमे बांस के बने खिलौने-जैसे धनुष-बाण, तीर-कमान, रंगीन झंडे लगाए हैं! एक लम्बे बांस को रंगीन कागजों से पूरा लपेट कर उसके सिरे पर एक ध्वजा बांधकर उसे मंडप के मध्य में खड़ा कर दिया गया जिसके ध्वजा के बंधन से बंधे कई लारियां चारों तरफ तान दी गईं हैं, जिनपर रंगीन कागजी झंडे लहरा रहे हैं! मण्डली के सभी सदस्यों को "भगत जी" के सम्मानित नाम से बुलाते हैं! इन्हें ख़ास रस्म के समय पीले रंग में रंगी नई धोती, और पीली नई बनियान, दान कर पहनाई गई! इनके गायन और मृदंग के वादन के तारतम्य के साथ मनभावन नृत्य की व्यख्या मेरे लिए कठिन है! लोकगीतों को गाते इनके सभी गाने सृष्टि निर्माता भगवान ब्रम्हा, पालक "श्री"युक्त विष्णु, और उमापति महादेव सहित भगवान् श्रीगणेश जी, हनुमान जी, और सभी प्रधान मातृ-शक्तियों को समर्पित हैं! मृदंग बजाते मुक्त कंठ से गाते और मृदंग को लिए-लिए झूम-झूम कर नाचते भगतन के शानदार परफोर्मेंस को देख मैं मंत्रमुग्ध हो गया! गायन-वादन का लय और तारतम्य, मृदंग की गूँज शांत हो इससे पहले ही गूंजते मृदंग सहित नर्तक हवा में उछलकर एक चक्कर घूम जाता है!! पीतल की थाली के कोर पर दोनों पाँव रखकर मृदंग बजाते नाचते हुए एक भगत जी ने पूरे मंडप की परिक्रमा पूरी की तो हीरो की बहन के मुँह से वाह! निकल गई! जिन्होनें उपवास रखा था सभी ने मंडप की परिक्रमा की! इन्हीं भगतन ने सभी वैवाहिक मांगलिक कार्य पूरे करवाए ! भगत जी लोगों के समस्त कार्यक्रम आत्यन्त मनभावन लगे! मैं अपने Handycam को अभी बहुत miss कर रहा हूँ, जिसका charger पिछली बार बोकारो छूट गया है! सो, still camera से ही संतोष करना पड़ा! पर कई ख़ास मौकों की तस्वीरें नहीं ले सका!

27-तारीख को बरात रवाना हुई! बारात अपने गंतव्य 'नवीनगर'(औरंगाबाद) पहुंची! परंपरागत तरीके से बारात सजी! निकली! द्वार पूजन हुआ! जयमाला की रस्म हुई! इसके बाद डिनर हुआ! मैं हीरो के साथ वापस जनवासे आ गया! उधर "गुरहथी" की रस्म हुई! गुरहथी, को कन्या निरिक्षण भी कहते हैं, लेकिन निरिक्षण वाली कोई बात नहीं होती! यहीं पर दूल्हा का ज्येष्ठ भाई दुल्हन को गहने चढाता है! यही रस्म गुरहथी कहलाती है! ज्येष्ठ भाई यूँ "भसुर" बन जाता है, जिससे दुल्हन सदैव परदा करती है! और घर में घुसते वक़्त भसुर महाशय को खोंख-खंखार की आवाज़ के साथ अन्दर आना पड़ता है! पिंटू जी ने यह रस्म पूरी की! 

...आगे की कहानी थोड़ी फ़िल्मी जरूर है, पर सच्ची!!; बहुत ही महत्वपूर्ण है, कदाचित भावुक भी! ........रात के 02:15AM बजे मुझे हीरो ने जगाया :"जीजाजी उठिए! शादी के लिए बुलाहटा आया है!" मैंने नींद से बोझिल होकर मना किया, लेकिन हीरो ने फिर कहा :"मेरी शादी देखने का मन नहीं है क्या?" ...मैं जागा! देखा सभी प्रधान लोग सोये हुये हैं! बुजुर्ग बीमार नाना भी! मैंने पूछा :"क्या ये लोग नहीं चलेंगे?" गुंजन ने कहा सभी थके हुए हैं! बाकी पिए हुए हैं! आप चलिए! हीरो के कुछ दोस्तों के साथ उसे लिए मैं लड़की के घर पहुँचा! बड़े सत्कार के साथ हमें विवाह मंडप में ले जाया गया! 12 हो या 72, मैंने जितनी भी शादियाँ अपने रिश्तेदारों की अटेंड कीं हैं, सभी में मेरी भूमिका एक फोटोग्राफर की ही होती है! यहाँ भी मुझे यही करना था! मैंने प्रोफेशनल विडियो शूट करने वालों के बीच अपना मुकाम बनाया और एक कुर्सी की गुजारिश की जो तत्काल पेश हुई, मैं उस पर बैठकर चाय सिप करते, जम्हाई रोक-रोक कर फोटो खींचने लगा! पंडित जी ने विधि-विधान के अनुसार वेद मन्त्रों का उच्चारण शुरू किया! और दुल्हे से बिभिन्न प्रकार के पूजा करवाने लगे!

 "...लड़के के पिताजी को बुलवाइये!" _अचानक पंडित जी की यह आवाज़ सुनकर मैं चौंका!! 

क्षण भर में ही कई तरह के भाव मेरे मन में उथल-पुथल मचाने लगे! शायद यह भगवन के नाम से पुकारे जाने वाले का षड्यंत्र था! हीरो की सामाजिक अवस्था से भली-भाँति परिचित होकर भी इस प्रकार के पुकार का मतलब मैंने सिर्फ यही समझा कि शायद पंडित जी इन बातों से अनजान हैं! मैं चुप रहा! तभी लकड़ी का बना और सनमाइका जड़ा एक बड़ा-सा पीढ़ा आया उसपर सिली हुई एक आसनी रखी गई, पंडित जी ने उस पर अभिमंत्रित अक्षत की बौछार की और बोले : "हाँ, भाई समाधी जी के बोलाइये!"...मैंने सोचा नाना क्यों नहीं आये ......तभी मैंने देखा एक व्यक्ति, जो दोनों घरानों से सम्बंधित हैं, ने पंडित जी से कुछ कहा, पंडित जी ने मुझे इशारा किया _कहा :"बाबू, आप यहाँ आइये!" पीछे से मेरे एक रिश्तेदार की आवाज़ आई :"उठअ हो सिरकांतजी, आगे बढ़अ !!" ...मैं अभी भी बात नहीं समझा था, ...शरमाते-सकुचाते मैं मंडप के भीतर गया, आशंकित भाव से पंडित जी को देखा जैसे पूछना चाहता हूँ कि :"_क्या?" पंडित जी ने मुझसे कहा कि मैं "इस" आसन पर बैठूं!! ......शायद कभी किसी ने मुझे "यशश्वी भवः" का आशीष दिया होगा जो आज फलित हुआ! मैंने 'ऊपर वाले' के "गेम" को समझ लिया! नाम आँखों से हीरो को निहारते, और गर्व से छाती तान कर मैं उस आसन पर विराजमान हो गया! मंत्रोच्चार में हीरो के (रक्त)खानदानी बाप-दादाओं के नाम के शुमार से मुझे कतई कोई ऐतराज़ नहीं हुआ! लेकिन कभी भी हीरो ने अपने मुँह से अपने बाप का नाम नहीं लिया! एक छोटे से शंख और अक्षत द्वारा पंडित जी ने मुझसे कुछ पूजा करवाई! फिर लड़की को बुलाया गया! लड़की के माता-पिता भी आये और विवाह शुरू हुआ! लड़की के पिता ने एक समधी के रूप में मेरा सत्कार किया! हमने एक दुसरे को जनेउ पहनाया! एक दूसरे की छति पर दही और तिलाक-युक्त पान चिपकाए, और गले मिले! मैंने हीरो के पिता के रूप में सभी वैवाहिक मंगलाचार पूरे किये! फिर कन्यादान के वक़्त भी लड़की के पिता ने कन्यादान कर वर के हाथ में अपनी बिटिया का हाथ दे दिया, उस पर वही शंख रखा गया जिससे पंडित जी ने मुझसे पूजा करवाई थी, लड़की के दो भाइयों ने शंख पर तैलधारावत जल प्रवाहित करना शुरू किया, जो एक पीतल के बड़े-से कड़ाह में जमा होता गया, पंडित जी ने लगातार वैदिक मंत्रों का जप जारी रखा ...फिर वर-वधु का हाथ मेरे हाथों में सौंप दिया गया! फिर "लावा" (धान) मेराई! ...फिर भँवर! ...फिर सिंदूरदान! ...फिर चुमावन! ...फिर कोहबर! सारी रात महिलाओं द्वारा छेड़खानी भरी "गारी-युक्त" गीतों का मधुर गायन होता रहा! ...सुबह "मथझका" के वक़्त मैंने नाना को बुलवा लिया और उन्हीं से संपन्न करवाया! फिर मंडप (मड़वा) में ही सभी प्रमुख लोगों का भोजन हुआ! फिर मेहमानों की बिदाई हुई! 'समधी-मिलन' हुआ! कुछ रस्में पूरी कर मैं अपनी "बहु" को लेकर हीरो की बहिनिया के पास जाने को निकल पड़ा!

रास्ते में तीसरी बार "गंगा माई" के दर्शन हुए! महात्मा गाँधी सेतु! मैंने अपनी जेब कुछ सिक्के निकाले! नेपाली ड्राईवर को मैंने गाडी रोकने को कहा! मेरे बताये स्थान पर उसने गाडी खड़ी की! मैंने अपने पास के सभी सिक्के बहु के हाथ में देकर मंगलकामना और प्रार्थना करने को कहा! फिर वे सिक्के बहु से ले कर वर-वधु दोनों को "_नियुंछ कर_" वह सभी सिक्के गंगा माई को अर्पण कर दोनों को आशीर्वाद दिया! ....फिर हम घर (गाँव) पहुँच गए! 

28-तारीख को विदा होने से पहले बहु (प्रियंका nickname : छोटी) को जब मैंने आशीष दिया तो उसने कहा :"...अब तो आप ही मेरे पापा हैं न?" ....................................................................!'

30 अप्रैल, 2013 लोहरदगा वापस!

इस यात्रा में मेरी कुछ भूमिका रही हो, कुछ उपलब्धियां रहीं हो ....लेकिन मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि वहां की बच्चा पार्टी में मैं काफी घुल-मिल गया! और मुझे एक बड़ा ही प्यारा नन्हा दोस्त मिल गया! पहली बार वह सहमा हुआ था, दूसरी बार संकोच में था पर धीरे-धीरे वह मुखर होता गया! पहली बार मैंने उससे पूछा "मुझे पहचानते हो?" उसने नज़रें झुकाकर सहमती में सर हिलाया! "कौन हूँ मैं?"_मैंने पूछा। सहमी हुई हलकी आवाज़ में उसने कहा :"दादाजी!" मैं जम कर हंसा! यह छः (6) वर्षीय बच्चा, पिंटू जी का बेटा है! पिंटू जी अपना और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए मुजफ्फरपुर शहर में ऑटो चलाते हैं! यही बच्चा दुल्हे मियां का "सहबाला" बना था! रास्ते भर यह मेरी ही गोद में गया और लौटा! अब यह मुझे "अंकल जी" कहता है! जब मैंने उससे कहा कि मैं और तुम अब दोस्त हैं! तो उसने अपनी नन्ही उँगलियों के इशारे से मुझे झुकने को कहा! मैं झुका, उसने मेरे कान में कुछ कहा! मैं समझ न सका! बच्चे _आदित्या उर्फ़ प्रियांशु_ ने कई बार कोशिश की, मैं उसके शब्द नहीं समझ सका! तब मैंने आस-पास मौजूद सभी को भगाया और उससे बोला कि 'यार जोर से बोलो' तब उसने देखा कि वीणा भी मुस्काती हुई हमारी ओर ही आ रही है! बच्चा फिर चुप हो गया! तब वीणा ने कहा :"जोर से बोलो बाबु, ई तनी जादे ही बहिर हैं!" 
तब प्रियांशु ने कहा :" दोस्त तो चौकलेट देने से बनते हैं न? हम आपको चौकलेट देंगे, तो आप हमको कौन वाला चौकलेट दीजियेगा?" वीणा ने उसकी जेब भर दी! 
मैंने वादा किया की अगली बार जब मैं मिलूँगा तब cadbury के बड़े वाले चौकलेट दूंगा; तबतक इनसे जो मन करे खरीद कर खाए! वह मुझसे लिपट गया! वीणा ने उसका माथा चूम लिया!

शुभम !
_श्री .

Thursday, April 25, 2013

शमशाद बेगम



शमशाद बेगम
 
देश की सर्वोत्तम गायिकाओँ की कतार में काफी आगे, लता जी और सुरैया जी के सदृश माननीय! आज हमारे बीच नहीं रहीं! उन्हें इस ग्रुप के सभी सदस्यों की तरफ से हार्दिक श्रद्धांजली!
 निम्नलिखित 10(दस) गाने और संलग्न चित्र उनकी याद में :
1.http://www.youtube.com/watch?v=6gjRzQFv47c मेरे पिया गए रंगून __फिल्म "पतंगा"1949
2.http://www.youtube.com/watch?v=ZJxJuWUF3uw छोड़ बाबुल का घर ..._फिल्म "बाबुल"1950
3.http://www.youtube.com/watch?v=bHzi4Nn-D6g सैयाँ दिल में आना रे __फिल्म "बहार"1951
4.http://www.youtube.com/watch?v=DJFwNErOujc कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र__फिल्म "आर-पार"1954
5.http://www.youtube.com/watch?v=SFqGQ54WT9Y ओ ले के पहला-पहला प्यार__फिल्म "CID"1956

6.http://www.youtube.com/watch?v=PoHnHnB4_jsकहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना __फिल्म "CID"1956
7.http://www.youtube.com/watch?v=shFt7sGaujc बूझ मरे क्या नाम रे__फिल्म "CID"1956
8.http://www.youtube.com/watch?v=KnyM2O3h2FU रेशमी सलवार कुरता जाली का__फिल्म "नया दौर"1957
9.http://www.youtube.com/watch?v=TC7LyI1GVYw तेरी महफ़िल में किस्मत आज़मां कर हम भी देखेंगे__फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म"1960
10. http://www.youtube.com/watch?v=kItK3kQlyko कजरा मोहब्बत वाला__फिल्म "किस्मत"1968

हार्दिक संवेदना एवं पुष्पांजली!
निवेदक-
विनयावनत,
_श्रीकांत तिवारी

Tuesday, April 23, 2013

"विजय !"

"Cheers gentlemen!"
... अभी मैं -DON-/विजय की दुनिया में हूँ ..12`Year old boy! nOw 47Yr. old ..."OLD!!?" ना ना -kid-_KID, ...थोडा पगलाया सा, ...थोडा बौराया सा, ...थोडा व्हिस्की(की याद) का बुखार,... ज्यादा "भांग"(से बदहजमी) का खुमार,...मूंह में पान,...साथ में प्राण, ...थोडा ज्यादा ही जोश, ...नन्हा-सा होश! ...watching the movie... "-DON-"_78@HOME.CAM

"विजय !"
यह एक शब्द नहीं, एक नाम नहीं, एक परिचय नहीं, एक पुकार का बोल नहीं, यह जय-पराजय का मामला भी नहीं,..... यह इन सबसे इतर एक बुनियाद है, जो वज्र से भी मज़बूत है! इसी बुनियाद पर "अमिताभ बच्चन" नाम के एक आदमी की; -नायक से महानायक बने शानदार और प्रेरक;- "आसमानी इमारत" इस पृथ्वी पर खड़ी है, और पृथ्वी के जीवनप्रयंत अडिग, अचल खड़ी रहेगी! हम मर जायेंगे, मिट जायेंगे लेकिन इस इमारत के बगल में खड़ा होने वाला कोई नहीं! (था तो था .. था!!) न है, न होगा! अमित जी की इस बुनियाद को टक्कर देना अब प्रकृति के वश में भी नहीं है! जिसका नाम है _
"विजय !"
जिसे फ़िल्मी पर्दे पर पुकारने में एक माँ को फक्र होता है, एक भाई को गर्व होता है, एक दोस्त का सीना चौंडा हो जाता है, जो एक आम आदमी है, जो हमारे पड़ोस में रहता है, जो हमारे लिए लड़ता है, हमारे हक में लड़ता है, जो हमारे जैसे ही कपडे पहनता है, जो हमारी तरह ही ढाबे की चाय पीता है, जो कभी गंभीर है ........चुप, खामोश,......लेकिन अशांत! पहाड़ के गर्भ में खौलते दहकते लावे की तरह, ...जो फट पड़ने को तत्पर ज्वालामुखी के मुहाने जैसा खतरनाक है, जिसे देखकर, जिसकी सुलगती आँखों को देखकर दुश्मन, और अत्याचारी यूँ ही आधा मर जाता है, जिसकी मौजूदगी जीत है; -"विजय"- की गारंटी है! वह विजय जो कभी "जय" के रूप में वीरू ...!वीरू......!! कहता ऐंठ कर दम तोड़ता है तो पूरा जनसमुद्र रोता है! ..जो 'विजय' मंदिर में माँ की गोद में मरता है तो इंसानियत रो पड़ती है!!

"विजय !" _जिसके बगैर अमिताभ का कोई वजूद नहीं................................

वही "विजय" DON में जब "........अबे ओ` गंजे!!" कहकर 'शेट्टी' को उकसाता है तो सिनेमा घर के भीतर ही नहीं बाहर खड़ी उत्सुक भीड़ में भी जोश, ख़ुशी और हंसी के फव्वारे फुट पड़ते हैं! वो तालियाँ और वो सीटियाँ अब इतिहास बन चुकी हैं; लेकिन उसकी ताजगी और सुगंध अभी भी उसी पुरजोर जोश के साथ हमारे साथ है!

_श्री .

Friday, April 19, 2013

ठुमक चलत रामचंद्र

भगवन के जन्म पर यह  गया 
"भय प्रकट कृपाला दीनदयाला कोसल्या हितकारी।
फिर ........

II Thumak Chalat Ramchandra II
ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ..

किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ..

अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ..

विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर .
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ..

तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां .. 

ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां …
Baby Ram walks, swaying unsteadily
Baby Ram…. His anklets ring in tune with his steps
किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां …
Laughing joyously he stumbles around on the ground
He is fondly picked into the laps of King Dasharath’s queens
Baby Ram walks…
His anklets…
अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां …
They cover him with saris, dusting the dirt off and caressing his bruises
They offer loving and reassuring words of devotion to make him feel better
तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां …
Poet Tulsidas is thrilled at the face of Ram, which has the glory of the Sun
Baby Ram is exactly what he imagined him to be
Baby Ram walks…
his anklets…
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श्रीरामनवमी की हार्दिक शुभ कामनाएं! 
निवेदक :
श्रीकांत तिवारी  

Thursday, April 18, 2013

DAN BROWN :

DAN BROWN : नाम ही काफी है!

मित्रों !
प्रतीकों में छिपे रहस्यों को समझने और दुनिया को अपने नायाब कहानियों अथवा उपन्यासों या अपने सर्वोत्प्रिय पात्र 'रोबर्ट लैग्डन' के माध्यम से साझा करने और अपने पाठकों को विस्मित करने में और रहस्यों के खुलासे से हर्षित करने में माहिर श्रीमान DAN BROWN को बार-बार, बार-बार, लगातार, पढने, पढ़ते रहने का मन करता है! इन्होने अपने उपन्यासों के प्रकाशन काल के 16 वर्षों में मात्र छः (6) उपन्यास ही हमें पढने को दिए हैं! जिनमे से चार (4) 'रोबर्ट लैग्डन' सिरीज़ के उपन्यास हैं! 1. THE DA VINCI CODE - April`2003 में प्रकाशित हुआ था, _इसी उपन्यास ने DAN BROWN को वांछित पहचान दिलाई, _इसपर फिल्म बनी, और खूब सफल रही! 2. ANGELS & DEMONS - May`2000 में प्रकाशित हुई थी, जो उपन्यास के रूप में खूब सफल रही, और जो English language का मेरे जीवन का पहला उपन्यास है! लेकिन इसपर बनी फिल्म जो May`2009 में रिलीज़ हुई; कथानक के साथ न्याय न कर पाने के कारण नहीं चली! 3. THE LOST SYMBOL - September`2009 में प्रकाशित हुई, इसके कथानक का जादू अभी भी हम पाठकों पर हावी है! और चौथा 4. INFERNO (480 Page का यह नायाब नगीना) - 14,March,2013 को प्रकाशित होने वाला है, जिसके इंतज़ार में हम पलक-पांवड़े बिछाय बैठे हैं! ठीक उसी तरह जैसे कभी 'वेताल' या 'मैन्ड्रेक' के लिए किया करते थे!!

उपरोक्त चार के अलावे बाकी के दो उपन्यास 'रोबर्ट लैग्डन' सिरीज़ से अलग एक अत्यंत ही दुर्लभ और दक्ष लेखक के रूप में DAN BROWN को स्थापित करता है। DAN BROWN अपने शिक्षण काल और खुद लेखक बनने से पहले SIDNEY SHELDON के उपन्यासों के रसिया थे! SHELDON की "the doomsday conspiracy" पढने के बाद इन्हें खुद एक लेखक बनने का ख्याल आया! और वे बने! और क्या खूब बने! DAN BROWN के बाकी दो उपन्यास हैं : 5. DIGITAL FORTRESS -1998 में प्रकाशित हुआ था, लेकिन आप -आज, अभी- इसे पढेंगे तो ये आपको आज की तकनीकों से कहीं आगे की संभावनाओं और आविष्कारों से परिचित कराएगी, और यदि आप कंप्यूटर साइंस के अध्यापक हैं, छात्र हैं, इंजिनियर हैं, ऑपरेटर हैं, यूजर हैं तो आप चमत्कृत रह जायेंगे! 6. DECEPTION POINT - 2001 में प्रकाशित हुआ था! _ये गज़ब का सस्पेंस थ्रिलर है! _बेजोड़!! _धाँसू! इसे जितनी बार पढ़िए, फिर पढने का मन करेगा! षड्यंत्रों और रहस्यों के बीच मौत से जूझते किरदार और हौलनाक क्लाइमेक्स आपको इस किताब का मालिक बने रहने को बाध्य कर देगा!

SIDNEY SHELDON के चेले तो ये कतई नहीं हैं, क्योंकि SHELDON की कैसी भी कोई भी नक़ल या छाप इनकी किताबों में आपको हरगिज नहीं मिलेगी! यह खालिस और खालिस DAN BROWN स्टाइल और रहस्यमयी सुगंध युक्त नायाब रचनाएं हैं जिनकी "लय" कभी नहीं टूटती !! कोई भी प्रसंग, कोई भी पृष्ठ, कोई भी पैराग्राफ, कोई भी वाक्य अप्रासंगिक और अतिश्योक्ति नहीं लगेंगी! ये मेरी गारंटी है! कथानक कभी नहीं, कदापि नहीं बहकतीं हैं! "_जीरो सेक्स_!"  Zero violence!! JUST PUZZLE!!! HORRIFIC SPEED!!! ACTION!! SUSPENSE !! with HIGH HEART BEATINGS!!! जिन्हें हर किसी को अवश्य ही पढना चाहिए! चाहे वह महान बुद्धिजीवियों का वर्ग हो या मेरे जैसे रहस्य कथाओं के मामूली रसिकों का! आप DAN BROWN की कलम और लेखन क्षमता के कायल हो जायेंगे! ..........और मैं अभी ऐन यही करने जा रहा हूँ!

DAN BROWN की खासियत है कि इनके उपन्यासों में "-सिर्फ पात्र और घटनाएं मात्र ही-" काल्पनिक होती हैं; शेष सब, -'सब्ब'-, सबकुछ यथार्थ और तथ्यों पर आधारित होता है, इस बात का दावा खुद DAN BROWN साहब अपने हर उपन्यासों में करते हैं! इसे आप अपने स्तर से जांचकर संतुष्ट हो सकते हैं! इतना खुलासा, किसी भी "-अत्याधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगशाला-" का या "आविष्कार" का कहीं और नहीं पढ़ा! इनकी चर्चाएँ पन्ने भरने और किताब की मोटाई बढाने की बिलकुल नहीं होतीं, बल्कि कथानक का मज़बूत आधारस्तम्भ होतीं हैं और बहुत ही अच्छी जानकारियों का बेहद गहन रिसर्च सहित, दर्शनशास्त्र का बेहतरीन पहलु होतीं हैं! जो रोचक, रोमांचक और लोमहर्षक होने के साथ-साथ अत्यंत भेद भरी होतीं हैं! जिनके भेद जब खुलेंगे तो आप सन्न रह जायेंगे, स्तब्ध रह जायेंगे!! आप जितनी ज्यादा रूचि लेंगे उससे कहीं ज्यादा वांछित संतोष पायेंगे! यदि आपको रहस्य कथाओं में रूचि है तो आप इन्हें अपने पास से कभी अलग नहीं कर पायेंगे!

मैंने इनकी (अबतक की) सभी किताबों में एक खासियत नोट की है और वो ये _कि हरेक उपन्यास में एक "killer" अवश्य होता है! जो कथानक में नायक-पक्ष या नायक की तत्क्षण जान ले लेने के लिए पीछे पड़ा हुआ रहता है! यह killer या तो भाड़े का हत्यारा [(H)assassin]होता है, या फिर किसी सरकारी एजेंसी का कोई well equipped, high-tech ग्रुप!!< इनसे आपको "Deception Point" में मुलाकात होगी!
फिर से एक बार DECEPTION POINT पढ़ रहा हूँ! आगे कतार में THE LOST SYMBOL है, जिसका killer अभी तक की DAN BROWN की 'रोबर्ट लैग्डन' सिरीज़' का एक विशिष्ट दर्जे का सबसे महत्वपूर्ण, और सबसे खतरनाक हत्यारा है!..........

DAN BROWN की लिखी deception point !!...मन करता है कि बच्चे मुझे घेर कर बैठ जाएँ और मैं चठ्कारे ले-लेकर उन्हें इसकी कहानी सुनाऊं!! ...ठीक वैसे ही जैसे कभी विजय-विकास के कारनामें सुनाया करता था.......

_श्री .

Monday, April 15, 2013

१९७८(1978) की DON की सुनहरी याद!

१९७८(1978) की DON की सुनहरी याद! अमिताभ -DON- बच्चन के साथ! "उपहार" सिनेमा, रांची में !! बाबूजी के साथ! सपरिवार! ........आठ वर्षीय मैं, शशि, कमल, मुरारी मामा, माँ, राजकुमारी दीदी, कृष्णा दीदी, चाचा(स्व० अमर कुमार रॉय उर्फ़ अमर बाबू!), चाची और पूज्यनीय बाबूजी ......जीनत अमान(रोमा), कमल कपूर(नारंग), मैक मोहन(मैक), इफ्तेखार(इंस्पेक्टर खुराना), ओम शिवपुरी(वर्धान; नकली मल्लिक), जगदीश राज, पिंचू कपूर(oroginal Mallik), हेलन (as gorgeous KAMINI), शेट्टी(...........अबे ओ गंजे!), मास्टर अलंकार (दीपु), बेबी बिल्किश (मुन्नी), अर्पण चौधरी (अनीता _oroginal DON's mol / girlfriend), चन्द्र बारोट (director), सलीम-जावेद (writer), कल्याणजी-आनंदजी (music director) डॉन ~~~~~~~~~~~~~~and~~~~~~~~~~~~~~~PRAN (प्राण: जसजीत): "दरवाजा खुला रखो संतरि !"

Sunday, April 14, 2013

पंचतंत्र

पूर्वकाल में दक्षिण दिशा में 'महिलारोप्य' नाम का एक नगर था। उस नगर के अधिपति थे राजा, अमरशक्ति। राजा अमरशक्ति उदार होने के साथ-साथ निपुण और कुशल प्रशाशक थे। उनके तीन पुत्र थे -- बहुशक्ति, उग्रशक्ति, और अनन्तशक्ति। राजा अमरशक्ति जितने उदार थे, उनके पुत्र उतने ही उच्छ्रिंखल और अवज्ञाकारी। पिता जितने नीति-निपुण थे, पुत्र उतने ही वज्रमूर्ख! अंत में राज के मंत्री सुमति ने राजा को परामर्श दिया कि यदि राज्यसभा में उपस्थित, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता, प्रकांड विद्वान्, पंडित विष्णुशर्मा को यह दायित्व सौंपा जाय तो वे अल्पकाल में ही राजकुमारों को सब विधाओं में पारंगत बना देंगे।

यह सुनकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने पंडित विष्णुशर्मा को बुलवाया और उनसे निवेदन किया कि यदि किसी प्रकार राजकुमारों को सुशिक्षित कर दें तो पुरस्कार स्वरुप उन्हें एक-सौ गावोँ का स्वामित्व प्रदान किया जायेगा।

राजा का यह वचन सुनकर विष्णुशर्मा ने कहा --'हे राजन! एक-सौ ग्रामों का आधिपत्य प्राप्त करने पर भी मैं अपनी विद्या को नहीं बेचूंगा! मैं ब्राम्हण हूँ, और ब्रम्हाण को धन का कोई लोभ नहीं होता! वैसे भी मेरी आयु ८० वर्ष की हो चुकी है। और मैं समस्त इन्द्रीय-सुखों से विरक्त हो चूका हूँ। फिर भी, आपकी इच्छापूर्ति और 'अपने' मनोरंजन के लिए मैं आपके पुत्रों को शिक्षित करूँगा, और उन्हें छः मास की अवधि के भीतर ही नीतिशास्त्र में निपुण बना दूंगा। यदि मैं ऐसा न कर सका तो आप मुझे मृत्यु दण्ड दे सकते हैं!'

पंडित विष्णुशर्मा की यह भीषण प्रतिज्ञा सुनकर राजा अमरशक्ति आश्चर्यचकित रह गए! उन्होंने निश्चिन्त होकर राजकुमारों की शिक्षा का दायित्व पंडित विष्णुशर्मा को सौंप दिया और स्वयं शासन के कार्यों में व्यस्त हो गये।

तब पंडित विष्णुशर्मा ने तीनों राजकुमारों को विविध प्रकार की नीतिशास्त्र से सम्बंधित कथाएं सुनाई। इन्हीं सब कथाओं का संग्रह बाद में 'पंचतंत्र' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।  सचमुच 'पंचतंत्र' संस्कृत भाषा का महान ग्रन्थ है।

पुस्तक में पाँच तंत्र हैं -- 'मित्रभेद', 'मित्र-संप्राप्ति', 'काकोलूकीयम', 'लब्ध प्रणांश', और 'अपरीक्षित कारकम'। पाँच प्रकरण होने के कारण ही इसका नाम "पंचतंत्र" रखा गया। प्रत्येक प्रकरण में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर ईतनी रोचक, ईतनी ज्ञान वर्धक नीति-कथाये कही गईं हैं, जिन्हें पढ़कर अथवा सुनकर पाठक या श्रोता भावविभोर हो जाता है। ( __गंगा प्रसाद शर्मा)

अवश्य पढ़ें!

विनयावनत,
_श्री।