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Thursday, April 11, 2013

THE OATH OF THE VAYUPUTRAS by: AMISH (amish tripathI)

THE OATH OF THE VAYUPUTRAS आधा पढ़ चुका हूँ। थोड़ा विश्राम कर कहानी को आत्मसात करने और समझने का प्रयास कर रहा हूँ! मुझे आभास हो रहा है कि यह मनोरंजन नहीं हो रहा है, बल्कि एक गंभीर चिंतन के साथ अंतर्द्वंद्व चल रहा है! कोई ऐसी बात नहीं है जो प्रश्न हो! सभी उत्तर, समस्त सत्य और तथ्य हमारे सामने हैं! बस उत्कंठा, उत्सुकता, जिज्ञासा यही है कि अब क्या होगा, और कैसे होगा?_और यही सबसे बड़ा सस्पेंस है जिसने भूख-प्यास और नींद का हरण कर लिया है! यही एक निष्ठावान विलक्षण लेखक की लेखनी की जबरदस्त सफलता है का प्रमाण है!

SHIVA TRILOGY की पढ़ाई के दरम्यान उत्सुकता-वश 'और' जानकारी के लिए और, सुनी सुनाई बातों की पुष्टि के लिए जब छानबीन की, तो पाया कि अमीश आज की तारिख में भारत में उपन्यास लेखन से वांछित "स्वान्त:सुखाय" को प्राप्त करते हुए भारतीय समाज में विद्वजनों के सर्वोत्कृष्ट समुदाय का अभिन्न अंग बन चुके हैं! ऐसे चमत्कृत व्यक्तित्व से कौन प्रभावित, अभिभूत और प्रेरित नहीं होगा भला! और यह मेरे लिए बहुत ही सुखद समाचार है कि यह युवा लेखक मेरी पठन-पाठन, ख़ास कर रह-रहकर चौंकाते रहने वाले सस्पेंस थ्रिलर, की भूख को अपने अंदाज़ से शांत करता रहेगा! जैसा कि यह "शिव-त्रय" चौंकाता रहता है! अमीश की आगामी रचना, उपन्यास की अगली श्रृंखला के बारे में उनके अनेक प्रशंशक अपने अनुमानों के आवेग को नहीं रोक पा रहे हैं! और ऐसा होता ही है! .....खैर,

THE OATH OF THE VAYUPUTRAS की पढ़ाई को मध्यांतर में विश्राम देकर एक बार फिर से अब तक की घटनाओं को याद करता हूँ: _ऐसा करते समय यह सावधानी बरतना जरूरी है कि मुझसे कोई "राज़" फाश न हो, जिससे आपका मजा मारा जाय! ....आधी किताब को पढ़ चुकने के बाद भी अब तक यह समझ में नहीं आया है कि इस किताब का नाम 'वायूपुत्रों की शपथ' रखने का क्या औचित्य है!! पिछली विवेचना में (इस किताब को थामने से पहले) यह अनुमान लगाया गया था कि "हनुमान" नाम धारी एक किरदार की एंट्री तो होगी ही! ...लेकिन....यह...अब तक ...नहीं हुआ है! लेकिन वायूपुत्रों की चर्चा यदा-कदा, दो-चार बार हुई है! पता चलता है कि ये पिछले महादेव के बसाय काबिले वाले हैं जिनके अधिकार में "दैवी-अस्त्र" हैं और जो आगामी नए महादेव के चुनाव में मुख्य भूमिका निभाते हैं! हमारे हीरो शिव का नीलकंठ के रूप में बिना किसी पूर्व योजना और चयन के आगमन सबको हैरान किये हुए है! शिव तो खुद हैरान है!! उसे यह सब बकवास और पागलपन लगता है! इस शिव-त्रय में शिव का बचपन बड़े संक्षेप में रहस्यमय तरीके से एक स्वप्न अथवा याद की तरह लिखा गया है! शिव जब क्रोधानुन्माद से उत्तेजित होता है तब उसकी ललाट (दोनों भौहों के बीच का स्थान, जहाँ तिलक लगाया जाता है) पर जलन और धमक होने लगती है और उसका कंठ (गला) असह्य रूप से ठंडा हो जाता है! बचपन में भी शिव के साथ ऐसा हो चुका है; _एक खौफनाक घटना जिसमे एक असहाय स्त्री उसपर होते अत्याचार में (बालक)शिव को मदद के लिए आवाज़ देती है, _एक भयानक राक्षस सरीखा व्यक्ति शिव को मार डालने के लिए खदेड़ता है, लेकिन शिव असमंजस में है कि वह अपनी जान बचाए या उस स्त्री की मदद करे? _ यह याद उसे बार-बार सताती है! शिव को जब ऐसी तकलीफ होती थी तब उसका चाचा उसके ललाट और गले पर एक दवा में अपने ही रक्त की कुछ बूँदें मिलाकर मलहम लगा दिया करता था जिससे शिव को वक्ती राहत मिलती थी! आज भी शिव को वही तकलीफ सताती रहती है! सती के पिता, मेलुहा के राजा दक्ष को शिव से नाराजगी बिलकुल उसी अंदाज़ में होती है जैसा कि शिव पुराण में वर्णित है। हाँ, हालात भिन्न हैं! महर्षि भृगु का किरदार The secret of the NAGAS से ही स्पष्ट है, और उनकी यही भंगिमा और कृत्य शिव पुराण में भी वर्णित है। सिर्फ प्रस्तुतिकरण भिन्न है! भृगु सामने वाले की आँखों में झांककर उसके मन के विचारों को पढ़ लेने की क्षमता रखते हैं; क्योंकि वे ब्रम्हा के पुत्र और सप्तऋषियों में से एक हैं!

पर्वतेश्वर, आनंदमई, भगीरथ, कार्तिक, गणेश, काली और परशुराम, जो अब शिव के दल में शामिल हैं पंचवटी की यात्रा के दरम्यान गोदावरी नदी के पास "दैवी अस्त्रों" के हमले से बच तो जाते हैं लेकिन हैरान हैं कि इसके पीछे किसका हाथ है और क्यों? _इन प्रश्नों का उत्तर और अंदाजा पहले मिल चूका है और अब प्रत्यक्ष हो चूका है! पंचवटी में यह रहस्य भी खुलता है कि देवगिरी में मंदार पर्वत पर नागाओं द्वारा आतंकवादी हमले का क्या उद्देश्य था! उत्तर से जो वांछित ख़ुशी होनी चाहिए थी वैसा न होकर प्रतिक्रिया ज्यादा मानवीय और स्वाभाविक लगता है! फिर यह प्रश्न उठता है कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है!? बुराई को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए बुराई की तलाश है! अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलु हैं! अच्छाई को अपनाकर बुराई का नाश करने के लिए फैसला होता है! पर वह बुराई है क्या? और कौन उसके पैरोकार और संरक्षक हैं!? कुल मिलकर पूछिए तो इस महागाथा में, असल में "शत्रु"/खलनायक कौन है!?? और इन खलनायकों की लालच/लालसा और महत्वाकंछा क्या है!??

शिव ने समूचे सप्त-सिन्धु सहित, स्वद्वीप, मगध, ब्रंगा, दंडक वन, पंचवटी, उज्जैन सहित पूरे भारत का भ्रमण कर लिया है! ऐसा संकेत मिला है कि शायद वह "परिहा" भी जाएगा; जो वायूपुत्रों का स्थान है! नक़्शे में जहाँ परिहा दिखलाया गया है, आज वह UAE/(अमीरात)है!! युद्ध में शिव का हथियार धनुष-बाण, तलवार और ढाल है, त्रिशूल नहीं!! त्रिशूल को सिर्फ एक बार दिखलाया गया है; पहली पुस्तक में! पूरे शिव-त्रय की कहानी में शिव नायक हैं अतः अंत में उनकी विजय सुनिश्चित है! इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन वह विजय क्या उन्हें और हमें सात्विक प्रसन्नता प्रदान करेगा!? सती का दु:स्वप्न अनिष्ट का संकेत देता है! कहीं ऐसा तो नहीं कि विजयश्री जब हासिल हो तबतक हमारा कुछ 'अनमोल' लुट चूका हो, कुर्बान हो चूका हो?? क्या इस कहानी का अंत सुखद होगा? कहीं दक्ष यज्ञ के हवन कुंड में 'सती' स्वयं को भस्म तो नहीं कर देंगी जैसा कि शिव पुराण में वर्णित है; जिसके बाद शिव बैरागी हो जाते है!!?? .......................?

समूचे SHIVA TRILOGY में अब तक के सारे कथानक में मुझे सबसे ज्यादा किसी किरदार ने प्रभावित किया है और मैं जिनका प्रशंसक बन चूका हूँ और मन ही मन उनकी प्रत्येक उपस्थिति में, प्रत्येक कृत्य में, प्रत्येक भाषण में और प्रत्येक निर्णय में आत्मविभोर हो जाता हूँ और दिल से जिनकी सराहना करता हूँ वे हैं मेलुहा के सेनानायक, सती के पितृतुल्य श्रीमान पर्वतेश्वर! मित्रों, इनका किरदार प्रेरणास्पद है, और सबके लिए एक -रिफ्रेश सबक- है!

सातवें विष्णु श्रीराम के उत्तराधिकारी वासुदेव पंडितों से शिव का मानसिक तरंगों द्वारा संपर्क सिर्फ किसी मंदिर से ही किया जा सकता है! अपनी अनेक शंकाओं के समाधान और अपने निर्णयों की महत्ता को न्यायोचित समझने की गरज से शिव उज्जैन जाता है जहाँ के मंदिर में उसे वासुदेव पंडितों के मुखिया गोपालजी से मुलाकात होती है! स्वयं शिव को और सबको 'अब' शिव की असली पहचान हो चुकी है! शिव को अब अपना उद्देश्य मालुम हो चुका है!

अब शिव ने बुराई को पहचान लिया है! शिव बुराई को जड़ से नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध हो कर संकल्प ले चूका है! शिव और उनका दल संगठित हो चूका है! एक बहुत बड़ा युद्ध अवश्यम्भावी और अटल है! शिव ने चुनौती दे दी है! खलबली मच चुकी है! कौन किसके तरफ है? कौन किसके पक्ष से लडेगा?_निर्णय हो चूका है! युद्ध की तैयारयाँ, पैंतरेबाजियां, षड्यंत्र और जासूसी शुरू हो चुकी है!! युद्ध का मैदान रक्तरंजित होने के लिए तैयार है!

...बस्स, "हर हर महादेव" का उदघोष करते हुए युद्ध की दुंदुभी बजाते टूट पड़ना ही शेष है!!

'..............................!'
तो!?
नमस्ते!

THE OATH OF THE VAYUPUTRAS >>>

SHIVA TRILOGY की आखिरी कड़ी THE OATH OF THE VAYUPUTRAS पढने में तल्लीन हूँ!

मैं अभी ही यह अपने मन की बात सुनकर सुनिश्चित घोषणा करता हूँ कि "अमीश" (the author :अमीश त्रिपाठी) भारत में PAULO COELHO and DAN BROWN की कमी को हर लिहाज़ से पूर्ण, सम्पूर्ण करते हुए अपना एक अलग प्लेटफोर्म बना चुके हैं और कोटि-कोटि धन्यवाद के साथ अनेक-अनेक आशीर्वाद के सुपात्र हैं! वाह! क्या लेखन है! विश्वस्तरीय!! पढ़िए और गर्व कीजिये की हम 'हम' हैं! और अमीश हममे से एक हैं!
Filmmaker Karan Johar and Amish unveiled the cover of the much anticipated 3rd book of the Shiva Trilogy, The Oath of the Vayuputras :
Renowned filmmaker Karan Johar, and Amish, the bestselling author of The Immortals of Meluha and The Secret of the Nagas, unveiled the cover of the much anticipated 3rd book of the Shiva Trilogy, The Oath of the Vayuputras. The concluding book of the Shiva Trilogy is set to be released in early March, 2013.

Also gracing the occasion was Gautam Padmanabhan, CEO, Westland Ltd, the publishers of Amish’s books, and Rashmi Pusalkar, the designer of the cover of The Oath of the Vayuputras.

The Shiva Trilogy (comprising The Immortals of Meluha, The Secret of the Nagas and the yet to be released The Oath of the Vayuputras) has been one of the most successful book series in the history of Indian publishing. It has sold almost a million copies within a short period of two-and-a-half years, with gross retail sales of approx Rs 22 crores. The books have been released across the Indian subcontinent in various languages, including English, Hindi, Marathi, Gujarati and Telugu.
Big B, Jaya Bachchan at ‘The Shiva Trilogy’ success bash - See more at: http://www.indianexpress.com/picture-gallery/big-b-jaya-bachchan-at--the-shiva-trilogy--success-bash/2408-1.html#sthash.4rNMswFR.dpuf
Big B, Jaya Bachchan at ‘The Shiva Trilogy’ success bash - See more at: http://www.indianexpress.com/picture-gallery/big-b-jaya-bachchan-at--the-shiva-trilogy--success-bash/2408-1.html#sthash.4rNMswFR.dpuf
Big B, Jaya Bachchan at ‘The Shiva Trilogy’ success bash - See more at: http://www.indianexpress.com/picture-gallery/big-b-jaya-bachchan-at--the-shiva-trilogy--success-bash/2408-1.html#sthash.4rNMswFR.dpuf
Megastar Amitabh Bachchan and wife Jaya took time out for themselves and were spotted at the success bash of author Amish Tripathi's new book The Oath of the Vayuputras in Mumbai.    Amish Tripathi's trilogy is based on the premise that the gods were not mythical beings but creatures of flesh and blood. It has notched up gross retail sales of $4 million since the first book was published in 2010. (Photo: Varinder Chawla) _श्री .
Megastar Amitabh Bachchan and wife Jaya took time out for themselves and were spotted at the success bash of author Amish Tripathi's new book The Oath of the Vayuputras in Mumbai.

Amish Tripathi's trilogy is based on the premise that the gods were not mythical beings but creatures of flesh and blood. It has notched up gross retail sales of $4 million since the first book was published in 2010. (Photo: Varinder Chawla) - See more at: http://www.indianexpress.com/picture-gallery/big-b-jaya-bachchan-at--the-shiva-trilogy--success-bash/2408-1.html#sthash.4rNMswFR.dpuf

Tuesday, April 9, 2013

AMISH अमीश की SHIVA TRILOGY का जादु




अमीश की SHIVA TRILOGY का जादु जिस क़दर आज; अभी मुझ पर हावी है, उसकी पराकाष्ठा देखिये : यह एक कन्फर्म न्यूज़ है कि सती के रोल के लिए करीना का नाम सबसे आगे है; फिर भी मैं अपनी इच्छा को क्यूँ दबाऊं जब बेटी 'घर' की है!___और यह कलाकार आपका

Monday, April 8, 2013

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-II, by Amish] (3)

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-ll] यह किसी भी तरह से इस अनुपम,सर्वोत्कृष्ट और असाधारण महागाथा की 'लघु कथा' (3) नहीं है! सिर्फ उपसंहार सहित एक विनीत नेवेदन है >>>

इस उपन्यास के पिछले (2)विश्लेष्ण के वक़्त, कथानक के प्रवाह के साथ मैं इतने प्रश्नों से घिर गया था जितना कभी किसी भी तरह के काल्पनिक रहस्य कथाओं के नहीं हुआ था! पिछले लेख को जहाँ मैंने भन्नाते माथे के साथ छोड़ा था वह बिलकुल ठीक था! क्योंकि उससे आगे की कथा इतनी सुदृढ़, चकित कर देने वाली और सशक्त है कि किसी भी तरह से किसी भी विश्लेषण की आकांक्षा नहीं रखती अतः ऐसा करना; एक महान रचना के प्रति (एक अवांछित) धृष्टता कहलाएगी!  इस किताब, इस विषय के बारे में और कुछ कहना नए पाठकों का मज़ा ख़राब करना होगा! सिर्फ एक विनम्र निवेदन है, अपने देश की महानतम संस्कृति की खातिर एक बार इस "शिव-त्रय" को अवश्य पढ़ें!  जिन्हें आध्यात्म में रूचि है और बचपन से लेकर आज तक कॉमिक्स से लेकर 'शिव पुराण' तक आपने भगवन शंकर की जितनी लीलाएं पढ़ीं, देखीं, सुनी है उन सबका एक तरह से रिफ्रेशमेंट कोर्स पूरा हो जाएगा! ...शायद कुछ ज्ञान वर्धन भी हो!

मैं सिर्फ इतना ही निवेदन करूँगा कि मैंने इस किताब (2nd-part _English Version) को पूरा पढ़ लिया! पढने के बाद जहाँ खुश हूँ उससे ज्यादा कहीं ज्यादा 'उत्कंठा के मारे', उत्तेजित हूँ! मेरे पिछले कथन के बाद ...आगे बढ़ते ही रहस्य की परतें खुलने लगतीं हैं! लेकिन सुकून मिलने की जगह सस्पेंस और बढ़ता ही जाता है - बढ़ता ही जाता है!! हर रस्योद्घाटन, जो सवाल या रहस्य उपन्यास के पहले भाग THE IMMORTALS OF MELUHA (SHIVA TRILOGY part-I) से ही खड़े हुए हैं,  PART-II उन सबका जबाब है! जिसे पढ़कर आप अपनी-अपनी अवस्था और विचार के मुताबिक मंत्रमुग्ध होंगे, भावविभोर होंगे, चमत्कृत होंगे, हसेंगे, आंसुओं से आँखे भी भीगेंगी, दिल की धड़कन बेकाबू होगी, शेष दुनिया के लिए (..संभवतः) गूंगे-बहरे हो जायेंगे, हर्ष और उल्लास के साथ-साथ कभी गुस्से से खून भी खौलेगा, नए-नए किरदारों का आगमन, उनके नाम, उनके कर्म, उनकी उपस्थिति, उनके साथ बीतती घटनाएं, आपको किताब से अलग नहीं होने देंगी! ...उमा, माया, परशुराम, काली, कार्तिक, गणेश.....

और सबसे बड़ी बात, _सभी सवालों के जबाब मिल जाने के बवजूद इतने नए सवाल अचानक हमला बोलेंगे कि झेला नहीं जाएगा!  जरा एक झलक देखिये : (किन्ही के पास है और पढ़ चुके हैं तो भी एक बार Page No. 373 की इन लाइनों को पढ़िए)>>>
`Enough!' shouted Shiva. `Don't any of you get what really happened?` The Neelkanth turned towards Nandi and Kartik, `Take a hundred men and go down river. See if there are any survivors from the enemy ships. I want to know who they were.`
Nandi and Kartik left immediately. Shiva looked at the people around him, seething, `We were all betrayed. Whoever was firing those arrows was not picking and choosing targets, They wanted us all dead.`
`But now did they come up the Godawari? asked Kali.
Shiva glared at her. `How the hell should I know? Most people here didn't even know this river wasn't Narmada!`
`It has to be the Nagas, My Lord`, said Bhagirth. `They cannot be trusted!`
`Sure!` said Shiva, sarcastically. `The nagas sprung this trap to kill their own Queen. And then Ganesh led a counterattack on his own people and blew them up with daivi astras. If he had daivi astras and wanted to us dead, why didn't he just use the weapons on us?`
Pin-drop silence.
`I think the astras were meant to destroy Panchavati. They planned to slaughter us easily from their ships and then sail up to the Nagas capitol and destroy it as well. What they didn't bet on was the Naga wariness and extensive security measures, including the devil bosts. That saved us.`
What the Neelkanth was saying made sense. Ganesh thanked Bhoomidevi silently that the Naga Rajya Sabha had agreed to his proposal of arming the banks of the Godavari outpost with devil boats for any such eventuality.
`Someone wants us all dead,` sais Shiva. `Someone powerful enough to get such a large arsenal of daivi astras. Someone who knows about the existence of such a huge river in the South and has the ability to identify its sea route. Someone resourceful enough to get a fleet of ships with enough soldiers to attack us. Who is that person? That is the question.`  
_______अब आप खुद सोचिये इतने लम्बे कथानक में जहाँ समस्त उत्तर मिल गए-से आभास होते है वह इस वक्तव्य पर आकर एक "TURN" लेता है; जिसका उत्तर Amish की SHIVA TRILOGY का तीसरा भाग देगा, तो आप उसे बिना पढ़े रह पायेंगे, तब, _जब वो आपके हाथों में और नज़रों के सामने आपके हवाले हो?_नहीं न!?
फिर तीसरे उपन्यास के नाम पर भी तो गौर फरमाइए वायु पुत्रों की शपथ! वायु पुत्र= हनुमानजी!
जय बजरंग बलि! तोड़ दुश्मन की नली!
तो, फिर नमस्कार!
मैंने THE OATH OF THE VAAYUPUTRAS (3rd & Last part of AMISH'S SHIVA TRILOGY) पढना शुरू कर दिया है .....
विनयावनत,
_श्री .

Saturday, April 6, 2013

यथार्थ

यथार्थ तो यह है कि, नहीं लगता इस वर्ष मुझे कंघी की जरूरत पड़ने वाली है! उगते बालों के ये 'मेरा धर्मेन्द्र' जिसका नामकरण रिकार्ड्स के लिए "यथार्थ" तय किया गया; को नोच डालता है!! अभी इसे मेरे चश्मे से लगाव हो गया है! यूँ बेरहमी से उसे नोचता है कि लगता है ...गया ! मेरी खानाबदोश सी ज़िन्दगी में ऐसे लम्हे चुराने तक की कोई गुंजाइश नहीं इसलिए 'डाका' डालना पड़ता है! डुग्गु = मेरा धर्मेन्द्र= आप सभी का "-यथार्थ-" !! कल [05/APRIL/2013 को]इसकी पहली वर्षगाँठ थी! मैं निक्की का शुक्रगुजार हूँ जिसने मुझे यह नाम सुझाया! यथार्थ! ... फिर भी ये मेरा धर्मेन्द्र ही रहेगा! अब इसके माँ-बाप और दुनिया जो चाहें इसे बुलाएं!


























इस मौके पर बच्चों ने SLIDESHOW का प्रोग्राम रखा था; जिसे उन्होंने खुद तैयार किया था, जो एक साल में बढ़ते डुग्गु की कहानी है; इसमें शामिल होने केलिए मुझे कल "-भारतीय रेल की जनरल-" बोगी द्वारा रांची जाना पड़ा और फिर ......लौटना भी पड़ा!

_श्री .

Friday, April 5, 2013

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-II, by Amish] (2)

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-II, by Amish]यह विश्लेषण समूचे उपन्यास की लघु कथा है ! (2) कृपया पढ़ें >>>
 ..............शिव ने देखा नाव में पानी बहुत तेजी से भर रहा था! उफनती नदी में डूबते अपने मित्र को बचाने के लिये बेतहाशा डगमगाती नाव को संभालने का प्रयत्न करते हुए शिव पतवारों से जूझ रहा है! ...पानी की थपेड़ों से आतंकित ब्रहस्पति की आँखें आश्चर्य से खुली रह जातीं हैं; उसे लगा कि उसके पैरों में कहीं से आई एक रस्सी लिपटती जा रही है और उसे पानी में खींच रही है! वह चीखता है "...Shiva! Help! Please help me!' शिव बेतहाशा नाव को ब्रहस्पति की तरफ खे रहा था! "Hold on! I'm coming!" अचनाक पानी में से एक विशालकाय तीन सिरों वाला सर्प निकला! शिव के देखते-देखते वह रस्सी ब्रहस्पति के जिस्म पर ऊपर लिपटती और उसे कसकर भींचती जा रही है! वह सर्प था! "Noooo!"
शिव हडबडा कर जाग उठा! शिव का ललाट ( उसकी भौहों के बीचोबीच) जोर से धधक रहा था! उसका नीला गला असह्य रूप से अत्यंत ही ठंढा हो गया था!  देखा, सभी लोग सो रहे थे! नौका गंगा की लहरों में हौले-हौले डोलती अपने गंतव्य की ओर शांति से बढ़ रही थी। शिव खिड़की के पास खड़ा होकर ठंढी हवाओं के साथ अपने धड़कते दिल को काबू करने लगता है! ब्रहस्पति को याद कर शिव की मुट्ठियाँ कस जातीं हैं! वह पुनः अपनी शपथ दुहराता है _He curled his fist and rested it against the wall. "I will get him, Brahaspati. That snake will pay." ...............उन्हें काशी से निकले दो सप्ताह हो गए हैं! और तीन सप्ताह में वे ब्रंगा पहुँच जायेंगे।

[मैं थोडा हैरान हूँ। "पंचवटी" जैसी पावन भूमि "नागाओं" की राजधानी!!??......शायद जबाब आगे मिले।] ....नागाओं को खबर है कि शिव का काफिला ब्रंगा पहुँचने वाला है! घायल नागा स्वस्थ हो चूका है! नागाओं की रानी ब्रंगा के राजा को शिव के मंतव्य की सूचना दे कर उसे सचेत कर देने का संकेत देती है! "नागा", रानी को हैरान करते हुए काशी जाने की बात कहता है '..क्यों?' 'She didn't go with the Neelkanth.' The Queen stiffened. "नागा" सफाई देता है की इसीप्रकार से ही उसे 'उत्तर और शान्ति' मिल सकेगी। कुछ बहस के बाद रानी ये कहकर स्वीकृति देती है कि वह भी उसके साथ जायेगी!

यात्रा पर अपनी चौकस नज़र रखे मुआयने पर लगे पर्वतेश्वर की नज़र आनंदमई पर पड़ती है। उसे आश्चर्य होता है की आनंदमई, उतंक के निर्देशों का पालन करते हुए (वस्तुतः उसका मज़ाक उड़ाते हुए) चाक़ू से निशाना लगाने का अभ्यास कर रही है! वहीँ उसका छोटा भाई भागीरथ भी खड़ा है! आनंदमई सबको हैरत में डालते हुए एक लटके हुए Target Board पर एक के बाद एक सांय-सांय 6(छः) चाकुओं को चलाती हैं, और सभी ठीक Board के केंद्र पर लगतीं है! पर्वतेश्वर के मुँह से आनंदमई के लिए तारीफ निकल जाती है। .....इस SHIVA TRILOGY में आनंदमई एक रोचक किरदार हैं! वह हमेशा निडर, निर्भीक और बेबाक हैं! वह हमेशा अपने सौन्दर्य के लिए गुलाब की पंखुडियां मिले दूध से स्नान करती हैं! वह गज़ब की नृत्यांगना हैं! वह हमेशा बेबाकी से बिना किसी की परवाह किये 'उकसाने' वाले वस्त्र धारण करतीं हैं! और अभी हमें यह भी प्रमाण मिला कि वह एक कुशल 'योद्धा' भी हो सकतीं हैं! वह प्रारंभ से ही पर्वतेश्वर को रिझाने की कोशिश करती रहतीं हैं! जबकि पर्वतेश्वर "दशरथ-शपथ" धारी कट्टर ब्रम्हचर्य के मूर्तिमान, जीवंत स्वरुप हैं! इनकी बातचीत रोचक प्रसंग प्रस्तुत करती है! ऐसा लगता है जैसे दोनों के बीच कोई बाजी चल रही है! पर्वतेश्वर के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनकर आनंदमई मुस्काती हैं और सदा की भाँती उन्हें 'पर्व' कहकर पुकारती हैं! Anandmayi turned with a great smile. 'Parva! When did you get here?' Parvateshwar, meanwhile, had found something else to admire. He was staring at Anandmayi's bare legs. Or it seemed. Anandmayi shifted her weight, relaxing her hips to the side saucily. 'See, something you like, Parva?' पर्वतेश्वर आनंदमई की कमर से लटकती तलवार की ओर इशारा कर कहते हैं 'That is a long sword.' आनंदमई का चेहरा उतर जाता है। वह खीज जाती हैं! पर्वरेश्वर आनंदमई को अपने साथ द्वंद्वयुद्ध में तलवारबाजी के लिए आमंत्रित करते हैं। आनंदमई उनके इस प्रस्ताव की उपेक्षा कर यह जताते कि"{तुम अपने युद्ध कौशल की श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर मुझे अपने प्रभाव के नीचे दबाना और स्वयं को सर्वोत्कृष्ट साबित करना चाहते हो, ऐसा मुझे मंज़ूर नहीं!!}"_वहाँ से तूफ़ान के झोंके की तरह चली जातीं हैं!

शिव का काफिला ब्रंगा की जल सीमा में नदी में ही निर्मित उसके प्रवेश द्वार के पास पहुँच गया है! B.Tech. पढने वाले छात्रों (मेरे बच्चों) ने ब्रंगा के प्रवेश द्वार के बनावट पर कहा कि उन्हें यह बहुत अच्छा लगा! शिव कहता है कि ये द्वार नहीं "फंदे" हैं! इस स्थान का न्यायोचित फिल्मांकन (यदि फिल्म बनेगी तो) अमीश के दृष्टिकोण से बड़े जबरदस्त तकनीकी विशेषज्ञों की मांग करेगा! ........द्वार पर के रोमांचक प्रसंग किताब में पढने में मज़ा देता है! ईतना ... कि लिखने में हाथ दुख जाएगा! प्रवेश द्वार के द्वारपालों की मुखिया Major  -प्रमुख- का नाम "उमा" है!! वह अपने कर्तव्य के प्रति दृढ-निश्चई और कठोर है! वह दिवोदास को पहचान जाती है। लेकिन पुरानी बातों को भूलते और दिवोदास को हैरत में डालते और व्यंग्य करते हुए उसके वापस आने का कारण पूछती है! उसकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि वह नागाओं की रानी को विशिष्ट मान देती है! तब विवश दिवोदास उससे कहता है कि वह नागाओं की रानी से भी ज्यादा अति-विशिष्ट व्यक्ति को लेकर ब्रंगा के राजा से मिलवाने आया है! लेकिन इसका उमा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता! वह दिवोदास की खिल्ली उडाती है! तब हताश दिवोदास महसूस करता है कि अब स्वयं 'नीलकंठ' को ही सामने आना पड़ेगा! क्योंकि उसे मालूम था की उमा को भी "नीलकंठ की पौराणिक गाथाओं'" पर विश्वास था। भागीरथ भी प्रयत्न करता है, पर उमा अडिग है! बिना महत्वपूर्ण कारण के, प्रवेश की इजाज़त नहीं! बात इतनी बढ़ जाती है कि उमा शिव तक को धक्का दे कर तिरस्कार पूर्ण स्वर में उसे Get out of Here कह देती है!! तलवारें मायनों से बहार निकल आतीं हैं ..., अचानक! "...ठहरिये!"_शिव आ खड़ा होता है। उसका अंगवस्त्रम खिसका हुआ है! उसका नीला गला साफ़ दीप्तिमान होकर नुमायां हो रहा है! यह देखते ही उमा धम्म से बैठ जाती है और .....भौंचक्का-सा शिव देखता रह जाता है,.....अब उमा की रुलाई रोके नहीं रुक रही! वह रोये ही जा रही है और शिव के करीब आकर शिव की छाती पर मुक्का मारते रोती है और आंसू बहाते विलाप करते लगातार कहते जा रही है "...अब तक तुम कहाँ थे, ...अब तक तुम कहाँ थे,.!!..तुम पहले क्यूँ न आये,...तुम पहले क्यूँ न आये,..!!". 
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इधर सती की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं! काशी का राजा अथिथिग्व एक -नागा- से "राखी" बंधवा रहा है! वह नागा स्त्री, जिसका धड़ तो एक है पर छाती के पास से दो-दो कंधे और दो सर हैं! असल में वह एक शरीर में दो-औरत है!! सती इस स्तब्धकारी दृश्य से हैरान-परेशान है कि एक सेविका की नज़र सती पर पड़ जाती और सती को सामने आना पड़ता है! वह आक्रामक भाव से अथिथिग्व से जबब-तलब करती है और कारण पूछती है! तब वह दो सिर वाली नागा स्त्री जिसका नाम "माया" है सती से बहस करती है! उसका एक सिर "सरलमना" है जबकि दूसरा _"आक्रामक!!" इस बहस को किताब में पढ़िए! अथिथिग्व उसे अपनी बहन बताता है! और सती से वचन मांगता है कि वो ये रहस्य किसी से न कहे! सती वचन देती है! _सूर्यवंशी वचन!!
________________मेरी खोपड़ी भन्ना रही है!
आप भी भुनभुनाइये!
कुछ अवकाश चाहता हूँ! शीघ्र हाजिर होऊंगा!
नमस्ते!
विनयावनत,
_श्री .

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-II, by Amish]

THE SECRET OF THE NAGAS [SHIVA TRILOGY part-II, by Amish]यह विश्लेषण समूचे उपन्यास की लघु कथा है ! (1) कृपया पढ़ें >>>
इस किताब के प्रारंभ से पहले .....
शिव को अपने बचपन की एक हौलनाक दास्तान की याद आ रही है, और उसे अपने चाचा की सुकून पहुंचाने वाली बातें याद आ रहीं हैं, उसे थोड़ी सांत्वना मिलती है। .....

रामजन्मभूमि मंदिर, अयोध्या के प्रांगण में शिव-सती पर घात लगाकर, 'वही' नागा अचानक हमला कर उन्हें घायल कर देता है! इस भिडंत के बाद शिव के पीछा करने पर वह नागा तो एक घोड़े पर सवार होकर उसकी रास अपने चाक़ू से काटकर, निकल भागता है! लेकिन उसी नागा के द्वारा घोड़े के मालिक को फेंककर मारी गई स्वर्णमुद्राओं से भरी पोटली में से शिव एक स्वर्णमुद्रा (2-स्वर्णमुद्राओं के बदले) लेकर घायल सती को दिखाता है; दोनों उसपर ढलाईकर उंकेरी गई आकृति पर हैरान होते हैं! इसपर एक Horizontal crescent moon; चंद्रमा, और टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें थीं!! ...क्या हैं ये ?


स्वद्वीप की सभा में _शिव में, पिछले युद्ध के अनुभव के बाद, आये वैचारिक बदलाव से दक्ष अचंभित हैं! ...शिव का मानना है कि ये लोग(...चंद्रवंशी) बुरे नहीं हैं! राजा दिलीप 'नीलकंठ' के बदले विचार से प्रसन्न है; लेकिन राजकुमार भागीरथ अभी भी शंकालु हैं और 'बर्बर देहाती' को आदर नहीं देते! शिव द्वारा पूछे जाने पर कि वह नागाओं को कैसे ढूंढ सकता है, दिलीप सहम जाते हैं, पर बतलाते हैं कि "ब्रंगा" का राजा इस बारे में अच्छा बतला सकता है; क्योंकि वह 'काली-शक्तियों' को मानने वाला और नागाओं से मेल-जोल रखने वाला है! 'अश्वमेध यज्ञ' में स्वद्वीप से पराजित होने के बाद हुए समझौते के मुताबिक स्वद्वीपवासी उनके राज्य-छेत्र में प्रवेश नहीं करेंगे इसके बदले _ब्रंगा, स्वद्वीप को सालीना शुल्क देगा! शिव इस बात से चकित होता है कि स्वद्वीप के अधिकार क्षेत्र की भूमि के भीतर "एक दूसरा राज्य और राजा' भी हो सकता है!" इसी तरह 'काशी' भी स्वद्वीप साम्राज्य के भीतर ही है और अविश्वसनीय परन्तु समृद्ध ब्रंगा वाले सिर्फ काशी से ही व्यापारिक सम्बन्ध रखते हैं! इसी बैठक में यह भी पता चलता है कि ब्रंगा में कोई 'रहस्यमई-बीमारी" सदैव एक महामारी की तरह आती है जिससे आक्रान्त होकर कुछ ब्रंगा वासी काशी में 'शरणार्थी' के रूप में बसे हुए हैं! जिन्हें अपने राज्य ब्रंगा से सहायता मिलती रहती है! यहीं सती राजा दिलीप से पूछतीं हैं कि ब्रंगा कहाँ स्थित है? _उत्तर सुनकर, एक-दूसरे को देखते हुए शिव-सती मुस्कुराते हैं! __उनकी समझ में 'नागा' वाले 'स्वर्णमुद्रा पर उंकेरी गई आकृति" का रहस्य समझ में आ गया था!
 Dilipa was about to ask where Shiva got the coin from, but was cut off by the Neelkanth.
`How quickly can we leave for Kashi?`
राजा दक्ष और राजा दिलीप में संधि के लिए शिव बहुत ही होशियारी से ऐसी व्यवस्था कायम करता है कि जिसे दोनों राजा सहर्ष मान जाते हैं! काशी-यात्रा की तैयारी और नीलकंठ और सती की सुरक्षा में पर्वतेश्वर को तैनात कर दक्ष अपनी राजधानी लौट जाते हैं! .... इसी बीच फुर्सत में दोस्त भद्र के साथ चिलम का आनंद लेते वे भगीरथ और राजा दिलीप के पारस्परिक संबंधों पर चर्चा में लीन थे कि चीख-पुकार सुनाई देती है! भगीरथ का घोडा बेकाबु होकर खतरनाक ढंग से खाई की तरफ भागा जा रहा है! उसपर सवार भगीरथ की जान खतरे में हैं,..शिव उनकी प्राण रक्षा करता हैं, घोड़े के बेकाबु होने के कारण को दिखाकर शिव समझाता है कि `...Somebody doesn't like you, my friend.`...... भगीरथ शिव का मित्र बन जाता है! शिव भगीरथ को अपने साथ काशी चलने को आमंत्रित करता है!

आनंदमई (भगीरथ की बड़ी बहन) भी काशी यात्रा पर चलेंगी, अतः उनकी विशेष मांग और सेवा पूछने के उद्देश्य से पर्वतेश्वर उनसे मिलते हैं तो आनंदमई सरयू नदी के दक्षिण (वर्तमान में बिहार स्थित बक्सर में गंगा नदी के) तट पर स्थित उस स्थान पर जहाँ भगवन श्रीराम ने ऋषि विश्वामित्र की आज्ञा से ताड़का राक्षषी का वध किया था, पूजा-अर्चना करने के लिए रुकने और व्यवस्था करने की मांग करतीं हैं जहाँ ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम-लक्षमण को विशेष अमोघ अष्त्र-शष्त्र प्रदान कर उन्हें उनकी दीक्षा दी थी! ... शिव की काशी यात्रा प्रारंभ हो जाती है! शिव का काफिला; जिसमे सभी -प्रमुख किरदार- शामिल हैं, सरयू नदी में विशेष नौका-यानों पर सवार हो, काशी प्रस्थान करता हैं! सुन्दर मनोरम दृश्यों को देख पुलकित होते, विशेष स्थानों पर रूककर पूजा करते वे आगे काशी की ओर बढ़ते हैं! ......इस यात्रा में नदी के किनारे सबकी आँखों से छिपते-छिपाते नागओं का एक सैन्यदल, उनका सरदार "नागा"_'लोकाधीश', सेनापति विश्व्द्युम्न, और नागाओं की महारानी और उनका प्रधान-मंत्री 'कर्कोटक' एक षड्यंत्र के तहत शिव के काफिले के साथ-साथ चल रहे हैं!! (ढान-ढ़-ना!!)....ये "नागा", महारानी को विशेष क्षणों में "मौसी" बुलाता है! .... शिव का काफिला 'मगध'-नगर- में प्रवेश करता है, जहाँ का राजा 'महेन्द्र' है! और भी कई नए किरदारों और उनकी निष्ठा, और वास्तविकता से परिचित होते, हर्षित और रोमांचित होते, अचंभित होते, पड़ाव डालते और नौकायन करते शिव-सती आगे बढ़ रहे हैं! .... इधर जंगल में मगध का राजकुमार 'उग्रसेन' एक अबला आदिवासी महिला से उसका बच्चा छीनना चाहता है, वह माँ अपने बेटे की रक्षा के लिए संघर्ष करती है,... इस संघर्ष का कोलाहल सुनकर स्तब्ध नागा इस दृश्य को देखते हैं! नागाओं का मुखिया "नागा" सोचता है "...क्या माँ है!" _वह उग्रसेन को ललकारता है,... तना-तनी और बहस होती है, कुछ ऐसी सच्चाईयां सामने आती हैं जो उग्रसेन के प्रति बर्बर और घृणास्पद है!!  ...लेकिन "नागा" का इस प्रकार द्रवित होना...सवाल खड़े करता है!! "नागा" (नागाओं का _तथाकथित 'लोकाधीश') _उनका विरोधकर बच्चे को छुड़ाकर उसे उसकी माँ को देने के लिए लड़ाई करता हैं,... एक तीर उसके कंधे को बेध डालती है जिसके आवेग से उसके पाँव उखड़ जाते है और उसपर मूर्छा तारी हो जाती है! लेकिन वह संभलकर उठता है और पूरी नागा सेना उग्रसेन के दल पर घातक आक्रमण कर देती है ....`NO MERCY!`........

मगध में शिव, भगवन 'नरसिंह' के दर्शन कर मुग्ध होता है। उस मंदिर में उसे पिछली बार के तीन पंडितों; जो स्वयं को विष्णु के उत्तराधिकारी 'वसुदेव' कहते हैं, चौंथे पंडित से होती है .....यहाँ शिव को एक नयी अनुभूति होती है' ....Radio Waves...!'; जिसके प्रयोग से सभी वसुदेव जब जी चाहे एक-दूसरे से मानसिक तरंगों द्वारा सम्पर्क कर सकते हैं! शिव के आश्चर्य का कारण है कि पंडितजी उसके मन की बात कैसे सुन पाए!!?....और बड़ा आश्चर्य स्वयं शिव अन्य सभी वसुदेवों की बातें और आवाजे कैसे और क्यों सुन पा रहा है ...!? कई तरह से शिव के कई सवालों के जबाब मिलते हैं पर कई और नए सवाल खड़े हो जाते हैं!....

{हमारे नायक दल में चर्चा है कि उग्रसेन की मौत के लिए मगध उन्हें जिम्मेवार समझता होगा !}...उग्रसेन का भाई सुर्पदमन सबको चकित करते हुए नीलकंठ की सेवा में विनम्रता से हाज़िर होता है! सुर्पदमन एक स्वर्ण मुद्रा दिखाकर बतलाता है कि वह उसे उग्रसेन की लाश के पास से मिला है; और शिव से सवाल पूछकर सबको चकित कर देता है कि 'अयोध्या में आपको ऐसा ही सिक्का मिला था ना!!'.....शिव सुर्पदमन को आश्वाशन देता है कि जब "नागा" से उसका सामना होगा तो सुर्पदमन को युद्ध में अवश्य शामिल करेगा।

नागाओं की महारानी नागा-प्रमुख के घायल होने पर चिंतित हो अपनी राजधानी 'पंचवटी' की यात्रा से वापस लौटकर नागा को डांटती है कि उसने एक वाहियात जंगली औरत के लिए अपनी और सभी सैनिकों की जान खतरे में डालने का दुस्साहस किया फिर उसे "उस स्त्री"(कौन?...सती..!?); से{जो शुरू से ही उनकी चिंता का विषय औरTarget है}दूर रहने की अपनी पुरानी सलाह को जोर देकर दुहराती है! ....इधर, शिव-सती सकुशल काशी पहुँचते हैं और वहां के पवित्र वातावरण से प्रसन्न होकर निर्णय लेते हैं कि उनके बच्चे का यहीं जन्म लेना श्रेष्ठ होगा! वे काशी नगरी के 'अस्सी घाट' पर पहुँच जाते हैं! घाट का नाम "अस्सी(80)" रखने के बारे में शिव के प्रश्नोत्तर में भगीरथ उन्हें वह प्रसंग बतलाते हैं जो इस नामकरण का निमित्त बना था!...यहाँ शिव के मन में एक सवाल उठता है, (`...किसने कहा असुर बुरे होते हैं...!!?`) भगवान् 'रूद्र' के द्वारा हुई उस युद्ध के बाद "रूद्र" की ही आज्ञा पर दैवी-अष्त्रों पर प्रतिबन्ध, अस्सी घाट पर 'अब कोई वध नहीं'; और मृतकों की अंत्येष्टि के आज्ञा की कथा रोमांचित करती है! किसी की भी अत्येष्टि काशी में गंगा के तटों पर की जा सकती है _की अनुमति प्रसारित होते ही कई आप्रवासियों ने काशी को अपना घर ही बना लिया! इस प्रकार ब्रंगा वालों ने भी यहीं अपना छेत्र (लोकल भाषा में मोहल्ला) बाउंड्री-वाल सहित एक नगर ही बसा डाला था! इन कहानियों को सुनते हुए शिव की नौका काशी के 'अस्सी-घाट' पर लंगर डालती है! काशी में शिव के आगमन की सूचना से उत्साह-उल्लास का वेग किसी थामे नहीं थम रहा, सभी 'नीलकंठ' को देखना और छूना चाहते हैं! घाट पर बड़ी भारी भीड़ है! काशी नरेश 'अथिथिग्व' आगे आकर, ख़ुशी से भीगी आँखों से, नीलकंठ और उनकी प्राणप्रिया सती का स्वागत करते हैं!

शिव-सती के काशी आगमन पर सभी खुश हैं! .....अचानक; जब नीलकंठ जनता से मिलने वाले हैं, भारी खलबली मच जाती है, समाचार मिलता है कि ब्रंगा वालों के छेत्र में स्थानीय लोगों के साथ "दंगा" हो गया है ..."क्यों? 'क्योंकि ब्रंगा वालों ने फिर (...फिर) एक मोर (peacock) की हत्या कर दी है!! ...इस दंगे को काफी बहस और बिचार के बाद कंट्रोल करने के लिए पर्वर्तेश्वर स्वयं को प्रस्तुत करते हैं!....रण-नीतियां तैयार होते ही वे पर्वतेश्वर के नेतृत्व में ब्रंगा वासियों के छेत्र में वे प्रवेश करते हैं! पर्वतेश्वर ने बहुत अच्छी रण-नीति अपनाई थी, किसी की जान नहीं लेनी, सिर्फ टेम्प्रोरली घायल करना है, .. वे धावा बोलते हैं, पत्थरों की बरसात जो किसी मिसाइल से कम नहीं थी, को झेलते, धकेलते सभी ब्रंगा वालों की प्रधान कोठी में घुस जाते हैं जहां ह्रदय विदारक रहस्योद्घाटन होता है कि ब्रंगा वाले 'मोर' को क्यों मारते थे!? .. तभी एक ब्रंगा वासी पर्वतेश्वर के सर पर भरी वजनी प्रहार कर उसे प्राणघातक रूप से विस्मित करते हुए घायल कर देता है! [अमीश कहते हैं_ Even a Mountain Can Fall!]
 ...इधर, शिव-सती 'काशी' में विश्वनाथ मंदिर में आते हैं और वहां की अप्रतिम सुन्दरता और शान्ति से प्रभावित होकर बहुत प्रसन्न होते हैं! भगवन विश्वनाथ -रूद्र- की मूर्ती उन्हें रोमांचित करती है, स्तब्ध करती है, प्रफुल्लित करती है! वहीँ सती के सहचरी कृतिका को यह सवाल सूझता है कि रूद्र की संगिनी "मोहिनी" यहाँ क्यों नहीं हैं? उसे शीघ्र ही उत्तर मिल जाता है! उसे 'मोहिनी' का दर्शन होता है, और उनकी मूर्ती की स्थापना के पीछे छिपे दर्शनशात्र की महत्ता समझ में आती है! यहाँ अथिथिग्व से शिव को -रूद्र- के मोती जड़ी दाढ़ी-युक्त संरचना की कथा और 'परीहा' (परियों के देश) की बात सुनने को मिलती है। प्रभु रूद्र की प्रतिमा भय उत्पन्न करने वाली थी, ...क्यों? शिव सोचता है, तभी उसे वसुदेवों की आवाजें सुनाई देतीं हैं ..... जो उत्तर भी दे रहीं हैं और सवाल भी पूछ रही हैं ... `Where are you Panditji?`
`Hidden, from view; Lord Neelkanth. There are too many people around.`
`I need to talk to you.`
`All in the good time, my friend. But if you can here me, can't you here the desperate call of your most principled follower?`
MOST PRINCIPLED FOLLOWER?
The voice had gone silent. Shiva turned around,concerned.
शिव, पर्वतेश्वर के लिए जहाँ चिंतित है वहीँ कुछ क्रुद्ध भी! आयुर्वती पर्वतेश्वर की प्राण रक्षा के लिए हर संभव प्रयत्न कर रहीं हैं! एक बार फिर 'सोमरस' के इस्तेमाल पर सवाल-जबाब होते हैं, अंततः सोमरस का प्रयोग किया जाता है! पर्वतेश्वर की खोपड़ी की हड्डी के नीचे कनपटी के ऊपर दिमाग में गंभीर रक्त-स्राव हुआ है; "That there was blood haemorrhaging" _OPPERATION? शल्य-चिकित्सा खोपड़ी की चोट में तभी की जा सकती है जब मरीज़ को होश हो और उसे अपनी घायलावस्था का पूरा भान हो; अन्यथा प्राण जा सकते हैं! सिर्फ एक उपाय है 'सजीव; LIVE ताज़ी संजीवनी वृक्ष की छाल!"; जो सिर्फ 'मेलुहा' में है या हिमालय की तराई में! मुश्किल यह है की वह छाल, वृक्ष से अलग होते ही अपनी शक्ति कुछ ही मिनटों में तुरंत खो कर बेकार हो जाता है; फायदा तभी है जब उसे उन्हीं ताज़े क्षणों के भीतर ही प्रयोग में लाया जाय! सोमरस ने बस इतनी सहायता की, कि रक्तस्राव रुक गया! पर..., तभी नंदी भगीरथ को अपने साथ आने को कहता है! चकित भगीरथ नंदी के साथ हो लेता है और तब उसे सबसे ज्यादा हैरानी होती है जब नंदी उसे ब्रंगा काबिले के सरदार 'दिवोदास' से मिलवाता है! दिवोदास दुखी है कि उसकी गैर-मौजूदगी में वह हादसा हुआ! वह पर्वरेश्वर के प्रति कृतज्ञ है कि उनकी रण-नीति के कारण ही उसके काबिले वाले और उसका परिवार अभी जीवित और सुरक्षित हैं! अतः वह सहायता करना चाहता है! कुछ बहस के बाद दिवोदास, भगीरथ को एक मलहम देता है जो पर्वतेश्वर की प्राण-रक्षा कर सकेगा! ...आयुर्वती इस मलहम को सूंघते ही गंभीर हो जाती है, लेकिन उसी से पर्वतेश्वर की प्राण रक्षा होती है! "_सफल इलाज़ के बाद में_"; यह बात आयुर्वती शिव की मौजूदगी में भगीरथ से पूछती है कि उसे वो चमत्कारी मलहम कहाँ से मिला !? भगीरथ असमंजस में पड़ जाता है; क्योंकि शिव की आँखों में शंका है! आयुर्वती के मुताबिक उस मलहम में ऐसे मिश्रण थे जो संजीवनी वृक्ष के छाल के गुणों को बनाय रखने में कामयाब थे और ऐसी विद्या सिर्फ "-नागाओं-" को मालूम थीं!!!???(ढन-ढ़-ना!!) ...अब भगीरथ परेशान हो जाता है और बार-बार शिव को मनाने लगता है उसका नागाओं से कुछ लेना-देना नहीं! `प्रभु .....!` पर्वतेश्वर के लिए चिंतित आनंदमई भी अब उनके उत्तम स्वस्थ्य से संतुष्ट और खुश हैं! अंततः शिव भी शांत होता है; और विचार कर दिवोदास से तुरंत मिलने की इच्छा ज़ाहिर करता है! दिवोदास से मिलने और एक दुसरे को पसंद करने के उपरांत शिव दिवोदास को ब्रंगा जाने की अपनी इच्छा ही नहीं अपनी आज्ञा भी सुनाता है! वजह? दिवोदास के मुताबिक ब्रंगा साम्राज्य जो दर असल स्वद्वीप के अंतर्गत है नागाओं से ज्यादा लगाव रखता है; और उसका राजा 'चंद्रकेतु' इसमें नागाओं के प्रति उदार है! ...क्यों !!??? शिव दिवोदास को अपनी शरण देता है ! और उसे शीघ्र (शुभस्यशीघ्रम) ब्रंगा यात्रा की तैयारी की आज्ञा देता है! ...इसी दरम्यान काशी के मंदिर में 'वसुदेव' पंडितजी शिव को एक लेप देते हैं; यह कहकर कि इसे सती के उदर पर लगावें इससे प्रसव आसान होगा! और सती जो शंकित थी की कहीं  फिर कुछ (पुरानी जैसी अनहोनी न हो) कोई शंका नहीं रहेगी! शिव-सती के पुत्र का निर्विघ्न जन्म होता है! चूँकि शिव, सती की परिचारिका 'कृतिका' से बहुत प्रसन्न है अतः अपनी "बेटी" का नाम कृतिका ही रखना चाहता है जबकि सती की जिद्द है कि लड़का होगा! आखिरकार वह शुभ घडी आ ही गई जब शिव-सती के प्रथम संतान की उत्पत्ति हुई! आयुर्वती ख़ुशी से झूमती प्रसव-गृह से बाहर आ शिव को बतातीं हैं की STRONG, NICE, BEAUTIFUL, HAPPY, MIGHTY, HEALTHY पुत्र का जन्म हुआ है! सारी काशी नगरी में उत्साह और उल्लास का वातावरण छा जाता है! इस शुभ समाचार को सुन राजा दक्ष अपनी रानी वीरनी सहित काशी पधारते हैं! राजा दिलीप भी शामिल होते हैं! समूचे नगर में उत्सव का माहौल है! इस उत्सव में आनंदमई के साथ "उत्तंक" का युगल नृत्य और शिव की एकल नृत्य से सभी को अलौकिक आनंद और सुख की अनुभूति होती है! चूँकि शिव कृतिका की सेवा भाव से बहुत प्रभावित था उसने अपने बेटे को ( जो अगर बेटी होती तो कृतिका ही कहलाती) "कार्तिक" नाम देता है!.., इधर दिवोदास शिव की आज्ञानुसार पोत (शक्तिशाल्ली नाव) के निर्माण में लगा है! इसी दरम्यान द्रपकु के अंधे पिता 'पूर्वक' का भी काशी आगमन होता है! जिसे थोड़े परिहास के बाद शिव उसे अपने अंगरक्षकों में शामिल कर लेता है क्योंकि वह एक पुराना लेकिन काबिल योद्धा रह चूका है; जो अपने अंधेपन के बावजूद अभी भी आवाजों को सुनकर मुकाबला करने में और शत्रु को पराजित करने में खूब सक्षम है!

राजा दक्ष द्वारा कार्तिक के लिए 18-वर्षों तक के लिए 'सोमरस' चूर्ण के उपहार का शिव-सती विरोध करते हैं! तब मजबूरन दक्ष को यह बताना पड़ता है कि मंदार पर्वत के (ब्रहस्पति सहित) विध्वंश के बावजूद एक जगह कहीं गोपनीय रूप से ऋषि भृगु के निर्देशानुसार प्रचुर मात्रा सोमरस चूर्ण उपलब्ध है जो पूरे मेलुहा के लिए काफी से ज्यादा है! और लगातार निर्माण का काम भी ज़ारी है! ... इसी बीच नए पोत के निर्माण कार्य के निरिक्षण से लौटते भगीरथ पर एक जानलेवा हमला होता है जिसे भगीरथ और गुप्त रूप से छिपे नंदी, जो शिव की आज्ञा पर भागीरथ पर गोपनीय सुरक्षात्मक निगाह रखता है; की सहायता से आसानी से विफल कर दिया जाता है! ...आनंदमई की सिफारिश पर उतंक; एक पुराना योद्धा जो घायल होने के कारण अपने कूबड़ की वजह से नाकाम हो चूका है; जो एक बहुत ही सक्षम योद्धा भी है, को शिव की सेना में शामिल करने की फरमाइश पर पर्वरेश्श्वार उतंक की नकली (लकड़ी की) तलवार से परीक्षा लेता है और उसकी क्षमता से प्रभावित होकर सेना में शामिल करता है; आनंदमई प्रसन्न होती है!

शिव और अन्य सभी दिवोदास द्वारा निर्मित नाव (पोत) को देख कर जहाँ खुश होते हैं वहीँ हैरान भी होते हैं कि उसकी पेंदी में -नयी धातु- "लोहे" की चादरों का बहुलता से प्रयोग कर विचित्र निर्माण किया गया था! पूछने पर दिवोदास उन्हें कहता है कि नाव जब ब्रंगा की जल सीमा के "फाटक" पर पहुंचेगी तभी इसका महत्त्व सबकी समझ में आएगा! आयुर्वती दिवोदास का आभार व्यक्त करतीं हैं कि उनके दिए लेप से सती का प्रसव आसन हुआ; ...दिवोदास हैरत से इनकार करता है! निःसंदेह उसने पर्बतेश्वर के लिए वह लेप भगीरथ को दिया था, पर किसी प्रसव के लिए नहीं! सभी को विलक्षण आश्चर्य होता है, कि शिव को वह लेप किसने दिया था!? ...शिव क्रोध में है! वह नंदी और वीरभद्र को अपने साथ ले कर बिना किसी के प्रश्नों का उत्तर दिए निकल पड़ता है! मंदिर में पहुंचकर शिव वसुदेवों को गर्जना से पुकारता है लेकिन सिर्फ उसकी ही ध्वनी गूंजती है कोई उत्तर नहीं मिलता! क्रोध से उन्मत्त शिव मंदिर से बाहर निकल जाता है! {उसके मन में ये प्रश्न था कि नागाओं वाली औषधि मिली संजीवनी का लेप वसुदेओं के पास कैसे और क्योंकर पहुंचा!!??] (...शिव को उसका बचपन; वह असाधारण घटना; वह लेप!!! और उसके काका के बोल याद आते हैं!)...सती आश्चर्यचकित है! वसुदेव पंडितजी के पास नागाओं वाली औषधि!  "?" '...कैसे ? ...क्यों?'

शिव, सती और कार्तिक से विदा लेता है और दिवोदास द्वारा तैयार नौका-यानों पर अपने कुमुक के साथ सवार होकर ब्रंगा की यात्रा पर निकर पड़ता है ....नागाओं की खोज में . बदला लेने और उन्हें दंड देने के लिए ...!

नागाओं की रानी "नागा" से क्रुद्ध है। वह सवाल करती है कि क्या उसने प्रसव के लिए वसुदेव को औषधि दी थी!!?? "नागा" सहम कर "हाँ" बोलता है! "...क्यों??"; "...मैंने उन्हें अपना नीजी औषधि ही दिया है, ब्रंगा की आपूर्ति बाधित नहीं होगी!"

इधर 'मेलुहा में ऋषि भृगु के सामने राजा दक्ष एक अपराधी की तरह उनके चरणों में पड़ा नतमस्तक है! ऋषिवर क्रोध में हैं !" ...क्या तुमने उन्हें स्थान की सूचना भी दे दी?" ; "नहीं मुनिवर!' 

राखी के त्यौहार का दिन है! काशी  में सती अपने कक्ष की खिड़की से वही दृश्य फिर देख रही है ......! राजा अथिथिग्व एक नाव पर अपने परिवार -सिर्फ अपने परिवार- के साथ गंगा नदी के पूर्वी घाट की तरफ नौका द्वारा जा रहे हैं! ये यूँ रहस्यमय तरीके से क्यों हर बार (आम जनता के लिए) प्रतिबंधित छेत्र में जाते रहते है! "...मैं इसका पता लगा कर रहूंगी!' सती कृतिका को कार्तिक की देखभाल की जिम्मेवारी सौंपकर -थोड़ी बहस के बाद- दृढनिश्चय हो कर अपनी तलवार और ढाल के साथ गंगा में छलांग लगाकर काफी सावधानी से चुपके-चुपके नदी के बीच के रेत पर विश्राम करते हुए फिर गहरे पानी में नीचे-नीचे तैरते नदी को पार कर पूर्व में स्थित राजा अथिथिग्व के -गोपनीय महल- में गोपनीय ढंग से प्रवेश करती है! ...सर्वत्र स्तब्धता है; कहीं कोई आहट नहीं, .... तभी ..सती को कुछ बातचीत की आवाजें सुनाई देती हैं! उन आवाजों के पीछे वह स्तब्ध और सुनसान महल में कभी भी, कैसे भी अचानक आक्रमण से सतर्क; प्रवेश कर आवाज आती कक्ष की और बढती जाती है! जिस कक्ष से आवाज आ रही थी सती उस कक्ष में एक ओट से झाँक कर देखती है _राजा अथिथिग्व के सामने रक्षाबंधन की सामग्री से सजी थाल है, और राखी बंधने वाली ........ हे प्रभु ! .....उसके धड एक हैं पर (2) दो- कंधे और (2)दो स़िर हैं ..... वो तो  .............................!.

(मुझे बारम्बार जम्हाई आ रही है) अवलोकनार्थ अमीश द्वाराप्रस्तुत कुछ नक़्शे हैं; कृपया इन्हें बारीकी से देखें !


परसों मिलता हूँ! 
 विनयावनत,
_श्री .                                               

Tuesday, April 2, 2013

इतना तो याद है मुझे

राजेश खन्ना कार चला रहे हैं और मैं...?  मैं भीनी-भीनी बरसात में मोटरबाइक चला रहा हूँ ...

इतना तो याद है मुझे ...
हो ओओ ...!!
इतना तो याद है मुझे,
हाये ये ....
इतना तो याद है मुझे,
के उनसे मुलाकात हुई ...
इतना तो याद है मुझे,
के उनसे मुलाकात हुई ...
बाद में जानें क्या हुआ ...
हो ओ ओ ...
बाद में जानें क्या हुआ,
हाये ये ....
बाद में जानें क्या हुआ,
ना जाने क्या बात हुई...
बाद में जानें क्या हुआ,
ना जाने क्या बात हुई...
इतना तो याद है मुझे ...
ओ ओ ओ ...

वादे वफ़ा के,
करके कसमे उठाके के
किसी पे दिल झुक के
चला आया ....
नज़रें मिलाके,
नींद अपनी गंवा के,
कसक दिल में बसा के
चला आया ....
दिन तो गुज़र जाएगा,
हो ओ ओ ...
दिन तो गुज़र जाएगा, 
हाये ये ....
दिन तो गुज़र जाएगा,
क्या होगा जब रात हुई ...
दिन तो गुज़र जाएगा,
क्या होगा जब रात हुई ...
इतना तो याद है मुझे ...

मारे हया के,
मैं तो आँखें झूका के,
ज़रा दामन बाच के
चली आई ...
पर्दा हटा के,
उनकी बातों में आके,
उन्हें सूरत दिखाके
चली आई ...
किससे शिकायत करूँ ...
हो ओ ओ ...
किससे शिकायत करूँ,
हाये ये ....
किससे शिकायत करूँ,
शरारत मेरे साथ हुई ...
किससे शिकायत करूँ,
शरारत मेरे साथ हुई ...
इतना तो याद है मुझे ...

...ओ ...ओ ...ओ
आ आ ओ ओ ...
थी इक कहानी,
पहले ये जिंदगानी,
उन्हें देखा तो जीना मुझे आया ...
दिलबर ओ जानी,
शरम से पानी पानी, थी मैं
बस्स पसीना मुझे आया ...
ऐसे मैं भीग गई,
हो ओ ओ ...
ऐसे मैं भीग गई,
हाये ये ....
ऐसे मैं भीग गई ...
जैसे के बरसात हुई ...
ऐसे मैं भीग गई ...
जैसे के बरसात हुई ...
इतना तो याद है मुझे ...
हो ओओ ...!!
इतना तो याद है मुझे,
हाये ये ....
इतना तो याद है मुझे,
इतना तो याद है मुझे,
के उनसे मुलाकात हुई ...
इतना तो याद है मुझे,
हो ओओ ...!!
इतना तो याद है मुझे,
इतना तो याद है मुझे,
इतना तो याद है मुझे,
http://www.youtube.com/watch?v=1wF9LwfbJcc
_श्री . 

नीलकंठ

हमारे शहर (!?!) के सबसे पुराने, ...सबसे पुराने चाय-नाश्ते की एक दूकान अभी भी अपने उसी पुराने स्वरुप में है जिसे मैं अपनी यादाश्त के मुताबिक पिछले 40 वर्षों से देखता आ रहा हूँ! इसके पहले मालिक स्वर्गीय माधव चन्द्र दास (बंगाली) उर्फ़ "माधो दादा" थे! परसों मैं उनके यहाँ चाय-नाश्ते के लिए बैठा था कि मेरी नज़र धुवें से काली पड़ चुकी दीवाल पर टंगी भगवान्  के इस तस्वीर पर पड़ी! मैंने अपने मोबाइल कैमरे से उसकी चार तस्वीरें खींचीं; उनमें से जो बेहतर लगा उसपर मैंने अपनी कल्पनानुसार कंप्यूटर पर कुछ प्रयोग किया जिसका हासिल ::> मेरे प्रभु "नीलकंठ" प्रकट भय !! 
भगवान् की जटाओं पर का 'चन्द्रमा', और उनका 'नीला'कंठ मैंने बनाया है! देखिये समूची-सारी दुनिया की बुराइयों के "विष" को धारण करने वाले मेरे प्रभु के कंठ की नीली "आभा"(the Tint) को देखिये!! भगवान् ने इस विष को कंठ में ही रोक लिया जिसके परिणामस्वरूप उनका कंठ नीला हो गया, और वे "नीलकंठ" कहलाये!
 "ॐ नमः शिवाय!!"
 _श्री .

in between ...THE SECRET OF THE NAGAS continued...

SHIVA TRILOGY (PART 2) THE SECRET OF THE NAGAS के उस स्थान पर हूँ जहाँ राजा दिलीप के साम्राज्य 'स्वद्वीप' की राजधानी 'अयोध्या' से गंगा तट के किनारे बसे 'काशी' नगर की यात्रा बस शुरू होने ही वाली है। शिव ने राजकुमार भगीरथ की प्राण रक्षा की, जब उसका घोडा बेकाबू होकर बेतहाशा एक ऐसी खतरनाक चढ़ाई की तरफ भाग रहा है जिसके बाद उफनती सरयु नदी की ओर गहरी खाई है! ...भागीरथ, शिव का मित्र बन जाता है। ..... शिव ने पर्वतेश्वर को यात्रा की कमान और सभी जिम्मेवारियां सौंप दीं हैं! पर्वतेश्वर राजकुमारी आनंदमइ से पूछने आते हैं, यदि उनकी कोई ख़ास इच्छा हो! आनंदमइ पर्वतेश्वर से कहतीं हैं कि यात्रा के दरम्यान वो उस स्थान पर जाकर भगवान् श्रीराम की पूजा करना चाहतीं हैं जहाँ ऋषि विश्वामित्र ने उन्हें और भ्राता श्रीलक्ष्मण जी को अमोघ शष्त्रों की शिक्षा दे कर कई शष्त्र प्रदान किये थे; और जहाँ प्रभु श्रीराम ने ""ताड़का"" नामक राक्षषी का वध किया था! .....मित्रों यह स्थान, तड़का वध स्थल, अभी भी कायम है और यह बिहार राज्य के "बक्सर" [http://hi.wikipedia.org/wiki/बक्सर]शहर में गंगा के किनारे है जहाँ रोजीना पूजा-अर्चना होती ही रहती है! मेरे बड़े मामा जी का बक्सर शहर में ही घर है और वे वहीँ सपरिवार निवास करते हैं! मेरी माँ वहां घूम आईं हैं! मुझे अभी यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है! लेकिन इस किताब में उस स्थान का वर्णन पढ़कर लोमहर्षक रोमांच हो रहा है ...! अमीश की "SHIVA TRILOGY" में पौराणिक भारतीय उपमहाद्वीप का जो नक्शा छपा गया है वह भी गहन अध्ययन योग्य है; जिसमे 'अयोध्या', 'काशी', और 'मगध' सरयु और गंगा नदी के संगम पर निकट ही एक त्रिकोण में पास-पास ही हैं ...!!

स्वीकारोक्ति : उपन्यास के उपरोक्त प्रसंग में पूजा स्थल का नाम अमीश द्वारा "बक्सर" प्रयुक्त नहीं किया गया है! लेकिन 'ताड़का' वध वहीं हुआ था ये तय है, मैंने बक्सर का लिंक दिया है, यह साश्वत सत्य है।





मैं आगे की रोमांचक यात्रा पर 'शिव' के साथ निकलता हूँ तबतक आप कृपया नक्शा बाँचिये ...
नमस्कार
_श्री .

Wednesday, March 27, 2013

THE IMMORTALS OF MELUHA by Amish Tripathi

मित्रों, SHIVA TRILOGY का पहला पार्ट =>"THE IMMORTALS OF MELUHA" पढ़ लिया! पढ़कर चमत्कृत हूँ! हतप्रभ हूँ! और बहुत ही, ...बहुत ही खुश भी कि 'अमीश' (Amish Tripathi) के रूप में भारत में एक ऐसे लेखक का अभुदय हुआ, प्रादुर्भाव हुआ है जिनके लेखन को , मैं, -कम-से-कम- मैं  तो विश्वस्तरीय कहूँगा, जिनके लेखन को समूचे देश में सराहा गया, अपनाया गया, प्रशंसा की गई, और की जाती रहेगी! सभी के लिए पढने योग्य, बहुत ही सरल भाषा में अत्यंत ही वृहद् और विषद कथानक! शानदार प्रस्तुति! पठनीय! पठनीय!! पठनीय!!! एवं _संग्रहनीय! किताब के पीछे छपे आखिरी लाइनों में 'अमीश' की तुलना Paulo Coelho से की गई है!

'शिव'
शिव एक आम आदमी है! तिब्बत स्थित 'कैलाश पर्वत' के भू-भाग में 'मानसरोवर' झील के पास के एक काबिले का कबीलाई नेता है! उसे अपने अतीत का ज्ञान नहीं! वहां उसका बचपन का साथी भद्र है, जिसके साथ चिलम(में भरे गांजे) का कश खीचना, और आये दिनों अन्य कबीलों के साथ होने वाली लड़ाइयों के वह आदि हो चुके हैं! पर शिव को चैन नहीं! उसे बार-बार अपने चाचा की बात याद आती है जो कहता था कि ये तिब्बती काबिले की सरदारी उसका प्रारब्ध नहीं है! तो फिर उसका प्रारब्ध क्या है?

इस किताब के किरदार 'शिव-पुराण' के अनुसार ही हैं; अलबत्ता उनकी एंट्री, और उनका पद(ओहदा), उनकी महत्ता और शिव के साथ उनका संपर्क और सम्बन्ध कहानीकार ने अपनी शैली में रचा है, जो कथानक को सहस्रों शताब्दियों पहले की कथा न कहकर वर्तमान युग के शुरूआती देश-काल (Before 1900 BC) की चर्चा करता है! फिर भी कहानी में शिव के आगामी जीवन में आने वाले और पात्रों के नाम भी पुरातन 'शिव-पुराण' के अनुसार ही हैं! सिर्फ कहानी कहने का यह ढंग है कि शिव को "भगवन शंकर" कदापि न समझकर एक साधारण इंसान के रूप में स्वीकार कर कथानक के प्रवाह के साथ हो लिया जाय! आगे आने वाले किरदार भी (पुरातन) नामकरण वाले हैं, जो आते जाते हैं; लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनके नाम जाने/पढ़े हुए होने के बावजूद, उनके पद(ओहदा), और कार्य आपको चमत्कृत करेंगे, सवाल खड़े करेंगे और उत्तर जानने के लिए आप पन्ना पलटते जाने को विवश हो जायेंगे!

नंदी! दक्ष! सती! और ब्रहस्पति ! _ये सभी मेलुहवासी सूर्यवंशी हैं! पर्वतेश्वर! _ये एक दबंग किरदार है (पढ़ते समय बारम्बार -पता नहीं क्यों, राज बब्बर का चेहरा- सामने आ जाता है!!); ये सती के धर्मपिता और सूर्यवंशी मेलुहा साम्राज्य का सेनाधिपति है; इनकी धर्मपुत्री होने के कारण ही सती का एक नाम 'पार्वती' भी है! दक्ष सूर्यवंशी साम्राज्य के राजा हैं! नंदी एक साधारण अधिपति(कप्तान) है, जिनके साथ तिब्बत से शिव का 'मेलुहा' आगमन होता है! सती, राजा दक्ष की बेटी है। और ब्रहस्पति _एक सरयूपारी ब्राम्हण हैं जो मेलुहा का प्रधान वैज्ञानिक है जिसके जिम्मे "सोमरस" के अलावे और भी कई ऐसे अनुसंधानों का जिम्मा है जिसमे सर्वत्र का हित है, जो शिव से मिलते ही उसका मित्र बन जाता है। जबकि पर्वतेश्वर, रामभक्त और उनके आदर्शों का बहुत ही कट्टर अनुयायी है, जो क़ानून और नियम भंग के खिलाफ है! जिसे "नीलकंठ" के ऊपर कोई भी अंधविश्वास नहीं है! पर धीरे-धीरे ... कुछ होता है! किताब में पढ़िए ....! 'आयुर्वती' साम्राज्य की चिकित्सक हैं!

पश्चिमी छेत्र के सूर्यवंशियों की राजधानी "देवगिरी" की _पूरब की ओर के चंद्र्वंशियों से पुरानी शत्रुता है! चंद्र्वंशियों की राजधानी "अयोध्या" है!! सबको यकीन हैं कि चंद्र्वंशियों ने ही "नागाओं" को अपने साथ मिला लिया है जो आये दिन मेलुहा; जो दरअसल 'सप्त-सिन्धु' की वजह से -India- है, पर आतंकवादी हमला कर उसे तबाह करने पर तुले हैं! नागा _जो अपना चेहरा कभी नहीं दिखाते; जो हमेशा एक "फणदार चोंगा" और नकाब पहने होते हैं, जो कतई यकीन के काबिल नहीं, अत्यंत ही भयानक और निर्दयी हैं, बहुत ही काबिल योद्धा हैं! चंद्र्वंशियों को इस किताब में खलनायक और नागाओं को उनका साथी बताया गया है, _क्या वाकई ऐसा ही है!!?? ...फिर एक नागा! _वही नागा जो सती के पीछे शुरू से पड़ा है, क्यों नदी में डूबती दो स्त्रियों की मगरमच्छ से रक्षा करता है, जो एक स्त्री के द्वारा कोसे जाने पर भावुक होकर रोने जैसा हो जाता है ..!!??

चंद्रवंशी _जिनके राजा 'दिलीप' हैं, उके पुत्र का नाम 'भगीरथ' है और पुत्री का नाम 'आनंदमयी' है! क्या ये सचमुच इस किताब के खलनायक हैं!? हाँ! तो कैसे? नहीं! नहीं!? तो ..तो क्या रहस्य है!!? वे नागाओं जैसे निक्रिष्ट्तम "आतंकवादियों' से मिलकर सूर्यवंशियों के खिलाफ लागातार आक्रमण पर आक्रमण क्यों किये जा रहे हैं?

छोटी झड़प हो, छापामार लड़ाई हो, बड़ा हमला हो या छोटा, या फिर युद्ध ही क्यों न हो; इनका प्रस्तुतीकरण इतने कमाल का है जो हमें उसी युग और देश-काल की सैर कराता है जो लेखक की रचना दिखाना चाहती है! (दिमाग में 'ग्लैडियेटर' के युद्ध का दृश्य उभरता है!)

सती _का किरदार शुरुआत में कई उलझनें पैदा करता है; जिनका उत्तर मिलने पर एक-बा-एक हम आवक-से हो जाते हैं; जिन्होंने एक दीर्घ-आयु जिया है, जो कोमल हैं; नृत्य सीखतीं हैं, जो एक वीरांगना हैं! अदभुद योद्धा! जिनके क्रोद्ध में भगवती भवानी की छवि दिखेगी! "अग्निपरीक्षा" क्या और कैसे होती है वो इस किताब में पढ़िए! सती, शिव से प्रेरणा पाकर "तारक" जैसे एक भयानक और महाशक्तिशाली योद्धा को पराजित करतीं हैं और जो उसकी जान न लेकर उसे क्षमा कर देतीं हैं! लेकिन जो विकर्म/अछूत/शापित/पूर्वजन्म के दुष्कृत्यों की वजह से शापित है!!? आखिर क्यों? पूरे देश में ही विकर्म व्यवस्था से शिव आहत है! .......बे-शक शिव-सती का विवाह होता है; लेकिन उसे होते पढना एक रोमांचकारी यात्रा है जिसे हरेक "पढ़ाकू" पढना चाहेगा। पढ़-पढ़कर फिर पढना चाहेगा!

अपनी यात्रा में शिव कई ऐसे क्षणों से और हालातों से गुजरता है कि आप भावविभोर होंगे, और रोमांचित भी!
शिव _नटराज से नीलकंठ, नीलकंठ से महादेव (देवों के देव!) बनता है। ऐसा कोई अंधविश्वास उसे बनाता है या कोई अटल विशवास, या उसके कर्म या उसका प्रारब्ध? क्या वह प्रभु श्री राम के छोड़े अधूरे कार्यों को पूरा कर पायेगा? क्या शिव को उसके सभी सवालों के जबाब मिल जाते हैं?

ब्रहस्पति की प्रयोगशाला मंदार पर्वत पर है! जहाँ सोमरस बनाया जाता है और भी अन्य अनुसंधान किये जाते है! शिव-सती के विवाह के पश्चात ही उस पर एक आतंकवादी हमला होता है जिसमे समूचा पर्वत और प्रयोगशाला ध्वस्त हो जाते हैं! चारों तरफ तहस-नहस हो चुके प्रयोगशाला की ईमारत के अवशेष और कई-कई व्यक्तियों की छिन्न-भिन्न लाशें पड़ीं हैं! चारों तरफ खूनआलूदा अंग-प्रत्यंग बिखरे पड़े हैं लेकिन उनमे से किन्ही से ब्रहस्पति के बारे में पक्की सूचना नहीं मिलती कि वे जीवित है या भयानक विस्फोटों में वे पूर्णतः जलकर ख़ाक हो गए! ...शिव क्रोध में है! वह बारीकी से घटनास्थल की पड़ताल करता है तो उसे एक चमड़े का ब्रेसलेट मिलता है जिस पर तीन साँपों द्वारा '-ॐ-' की आकृति बनी हुई है!! शिव घोषणा करता है कि वह किसी प्रयोग की वजह से घटी कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि सोची-बिचारी साजिश थी जिसके पीछे उसी नागा का हाथ है जिसके साथ शिव-सती की भिडंत हो चुकी है! अपने भ्राता सामान मित्र ब्रहस्पति की हत्या का बदला लेने के लिए कठोरतम शपथ लेकर शिव चंद्र्वंशियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर देता है!!

"अरिष्टनेमि" कौन थे?
"हर हर महादेव" जैसे उद्घोष की क्या व्याख्या है!?

किताब का नाम "IMMORTALS"अमर"/मृत्युंजय रखने का क्या अभिप्राय है! क्या सभी "अमृत" पिए हुए हैं!!?

इस किताब के और दो भाग पढने हैं अतः एक सवाल मुझे अभी से परेशान कर रहा है! वो ये कि हमारे हिन्दू धर्मग्रंथों (शिव-पुराण, जिसका मैंने एक बार अध्ययन करने का सौभाग्य पाया है) में राजा दक्ष को शिव का परम विरोधी बताया गया है। जबकि अभी तक जो 'दक्ष' का रूप सामने आया है उसमे श्रीराम के पिताश्री दशरथजी के सामान प्रेम और वात्सल्य है। जिन्हें भगवन शंकर और दक्ष की शत्रुता का पता है; असमंजस में हैं, और उत्कंठा के मारे मेरा तो बुरा हाल है कि आगे क्या हुआ, या होगा?? यदि अमीश की कहानी पुराण को ही फॉलो करती है तो (अमिश की किताब में) ऐसा क्या हुआ होगा जिससे राजा दक्ष जैसा शिवभक्त, शिव का विरोधी ही नहीं बल्कि शत्रु बन जाता है!? खैर ये तो आगे की बात है....

पूरे उपन्यास का विश्लेषण करना मेरे लिए असंभव है क्योंकि मैं इसके योग्य नहीं! फिर भी शिव के मित्र भद्र का वीरभद्र नामकरण, त्रिशूल का वजूद में आना, शिव का सौम्य स्वभाव और उसकी व्यूह रचना और उसका युद्ध कौशल, और उसका क्रोध, अग्निबाण की सत्यता, _सती पर उसका प्रयोग और परिणाम!; सोमरस और सरस्वती नदी का रहस्य आपको चमत्कृत करेगा और लोमहर्षक अनुभूति का अहसास कराएगा! चंद्र्वंशियों की असलियत जिनका (इसी किताब के) आखिर में पता लगने पर आपको सच्चा रोमांच होगा।

यह किताब जिस तरह समाप्त(नहीं) होता है; व्यग्र करता है कि बिना कुछ विचारे दुसरे भाग को थाम लिया जाय..;

शिव अपने सवालों के जबाब के लिए अयोध्या स्थित 'रामजन्मभूमि' मंदिर में जाता है जहाँ उसे 'तीसरा' पुरोहित/पंडित मिलता है जो उसके सवालों के जबाब देने वाला है! वहां तक वह छिपते-छिपाते आया है! मंदिर से अपने विश्राम गृह को लौटने के क्रम में मंदिर के प्रांगन में ही उसे सती (-शिव की पत्नी बन चुकी सती-) से मुलाक़ात होती है, जो अपने पति की चिंता और अनुराग में उसके पीछे वहां आ गई है ...कि अचानक वही, _वही, _वही खतरनाक 'नागा' जो अत्यंत ही भयानक शत्रु प्रतीत होता है, उन पर घात लगा कर जानलेवा हमला कर देता है .......
to be continued ....
धत्त!तेरे की!!
ऐसे तो यार अखबारों में कार्टून ही छापे जाते थे!!
...तो मिलते है फिर दुसरे भाग के बाद ...
सादर नमस्कार.
_श्री .
PS: दीपांशु जी की सलाह से ली गई किताब "-the alchemist_", written by Paulo Coehlo; मेरे हाथों में है! और SHIVA TRILOGY के शेष दोनों भाग भी, असमंजस में हूँ कि पहले किन्हें पढूं! क्या TOSS करूँ? देखते हैं जी ...

Saturday, March 23, 2013

होली है !!:

होली है !!

होली के शुभ अवसर पर आप सभी को किसम-किसम की रंग बिरंगी शुभकामनायें! पढ़िए जबलपुर के हास्य कवि प्रदीप चौबे जी की ये कविता जिसे 1980 के दशक में लोकप्रिय पत्रिका "धर्मयुग" में पढ़ा था! आज इन्टरनेट पर पढ़ा, सो आप मित्रों के साथ शेयर करता हूँ! इस कविता में भारतीय रेल के 'जनरल' बोगी में सफ़र करने वाले यात्री का अनुभव, उसकी व्यथा कथा; हास्य के रस में भीगी हुई : 

भारतीय रेल की जनरल बोगी
पता नहीं आपने भोगी कि नहीं भोगी
एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे


हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे
तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला - 'अन्दर जाओगे ?'
हमने कहा - 'तुम पहुँचाओगे !'
वो बोला - बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं आपको भी पहुँचा दूंगा
मगर रुपये पूरे पचास लूँगा.
हमने कहा - पचास रुपैया ?
वो बोला - हाँ भैया
दो रुपये आपके बाकी सामान के
हमने कहा - सामान नहीं है, अकेले हम हैं
वो बोला - बाबूजी, आप किस सामान से कम हैं !
भीड़ देख रहे हैं, कंधे पर उठाना पड़ेगा,
धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा
वैसे तो हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है
मगर आपके लिए दाँया हाथ भी लगाना पड़ेगा
मंजूर हो तो बताओ
हमने कहा - देखा जायेगा, तुम उठाओ
कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया
और पूरी ताकत लगाकर हमें जैसे ही उठाया
कि खुद बैठ गया
दूसरी बार कोशिश की तो लेट गया
बोला - बाबूजी पचास रुपये तो कम हैं
हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं, बम हैं
भगवान ही आपको उठा सकता है
हम क्या खाकर उठाएंगे
आपको उठाते-उठाते खुद दुनिया से उठ जायेंगे !
हमने कहा - बहाने मत बनाओ
जब ठेका लिया है तो उठाओ.
कुली ने अपने चार साथियों को बुलाया
और पता नहीं आँखों ही आँखों मैं क्या समझाया
कि चारों ने लपक कर हमें उठाया
और हवा मैं झुला कर ऐसे निशाने से
अन्दर फेंका कि हम जैसे ही
खिड़की से अन्दर पहुँचे
दो यात्री हम से टकराकर
दूसरी खिड़की से बाहर !
जाते-जाते पहला बोला - बधाई !
दूसरा बोला - सर्कस मैं काम करते हो क्या भाई ?


अब जरा डिब्बे के अन्दर झाँकिए श्रीमान
भगवान जाने डिब्बा था या हल्दी घाटी का मैदान
लोग लेटे थे, बैठे थे, खड़े थे
कुछ ऐसे थे जो न बैठे थे न खड़े थे, सिर्फ थे
कुछ हनुमान जी के वंशज
एक दूसरे के कंधे पर चढ़े थे
एक कन्धा खली पड़ा था
शायद हमारे लिए रखा था
हम उस पर चढ़ने लगे
तो कंधे के स्वामी बिगाड़ने लगे बोले - किधर?
हमने कहा - आपके कंधे पर !
वे बोले - दया आती है तुम जैसे अंधे पर
देखते नहीं मैं खुद दूसरे के कंधे पर बैठा हूँ
उन्होंने अपने कन्धा हिला दिया
हम पुनः धरती पर लौट आए
सामने बैठे एक गंजे यात्री से गिड़गिडाये - भाई साहब
थोडी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये
वो बोला - आइये हमारी खोपड़ी पर बैठ जाइये
आप ही के लिए साफ़ की है
केवल दो रुपए देना
मगर फिसल जाओ तो हमसे मत कहना !

तभी एक बोरा खिड़की के रास्ते चढा
आगे बढा और गंजे के सिर पर गिर पड़ा
गंजा चिल्लाया - किसका बोरा है ?
बोरा फौरन खडा हो गया
और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला
बोरा नहीं है बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है
अन्दर आने का यही एक तरीका है
हमने आपने माँ-बाप से सीखा है
आप तो एक बोरे मैं ही घबरा रहे हैं
जरा ठहर तो जाओ अभी गददे मैं लिपट कर
हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं
उनको आप कैसे समझायेंगे
हम तो खड़े भी हैं वो तो आपकी गोद मैं ही लेट जाएँगे


एक अखंड सोऊ चादर ओढ़ कर सो रहा था
एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था
हमने जैसे ही उसे हिलाया
उसकी बगल वाला चिल्लाया -
ख़बरदार हाथ मत लगाना वरना पछताओगे
हत्या के जुर्म मैं अन्दर हो जाओगे
हमने पुछा- भाई साहब क्या लफड़ा है ?
वो बोला - बेचारा आठ घंटे से एक टाँग पर खड़ा
और खड़े खड़े इस हालत मैं पहुँच गया कि अब पड़ा है
आपके हाथ लगते ही ऊपर पहुँच जायेगा
इस भीड़ में ज़मानत करने क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?
 
एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा
तो पूरे डिब्बा मिल कर उसे बाहर धकियाने लगा
नौजवान बोला - भाइयों, भाइयों
सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए
एक अन्दर वाला बोला - क्या ?
खड़े रहने की जगह चाहिए तो प्लेटफोर्म पर खड़े हो जाइये
जिंदगी भर खड़े रहिये कोई हटाये तो कहिये
जिसे देखो घुसा चला आ रहा है
रेल का डिब्बा साला जेल हुआ जा रहा है !
इतना सुनते ही एक अपराधी चिल्लाया -
रेल को जेल मत कहो मेरी आत्मा रोती है
यार जेल के अन्दर कम से कम
चलने-फिरने की जगह तो होती है !


एक सज्जन फर्श पर बैठे हुए थे आँखें मूँदे
उनके सर पर अचानक गिरीं पानी की गरम-गरम बूँदें
तो वे सर उठा कर चिल्लाये - कौन है, कौन है
साला पानी गिरा कर मौन है
दीखता नहीं नीचे तुम्हारा बाप बैठा है !
क्षमा करना बड़े भाई पानी नहीं है
हमारा छः महीने का बच्चा लेटा है कृपया माफ़ कर दीजिये
और अपना मुँह भी नीचे कर लीजिये
वरना बच्चे का क्या भरोसा !
क्या मालूम अगली बार उसने आपको क्या परोसा !!


एक साहब बहादुर बैठे थे सपरिवार
हमने पुछा कहाँ जा रहे हैं सरकार ?
वे झल्लाकर बोले जहन्नुम में !
हमने पूछ लिया - विथ फॅमिली ?
वे बोले आपको भी मजाक करने के लिए यही जगह मिली ?

अचानक डिब्बे में बड़ी जोर का हल्ला हुआ
एक सज्जन दहाड़ मार कर चिल्लाये -
पकड़ो-पकड़ो जाने न पाए
हमने पुछा क्या हुआ, क्या हुआ ?
वे बोले - हाय-हाय, मेरा बटुआ किसी ने भीड़ में मार दिया
पूरे तीन सौ रुपये से उतार दिया टिकट भी उसी में था !
कोई बोला - रहने दो यार भूमिका मत बनाओ
टिकेट न लिया हो तो हाथ मिलाओ
हमने भी नहीं लिया है गर आप इस तरह चिल्लायेंगे
तो आपके साथ क्या हम नहीं पकड़ लिए जायेंगे ....
वे सज्जन रोकर बोले - नहीं भाई साहब
मैं झूठ नहीं बोलता मैं एक टीचर हूँ ....
कोई बोला - तभी तो झूठ है टीचर के पास और बटुआ ?
इससे अच्छा मजाक इतिहास मैं आज तक नहीं हुआ !
टीचर बोला - कैसा इतिहास मेरा विषय तो भूगोल है
तभी एक विद्यार्थी चिल्लाया - बेटा इसलिए तुम्हारा बटुआ गोल है !


बाहर से आवाज आई - 'गरम समोसे वाला'
अन्दर से फ़ौरन बोले एक लाला - दो हमको भी देना भाई
सुनते ही ललाइन ने डाँट लगायी - बड़े चटोरे हो !
क्या पाँच साल के छोरे हो ?
इतनी गर्मी मैं खाओगे ?
फिर पानी को तो नहीं चिल्लाओगे ?
अभी मुँह मैं आ रहा है समोसे खाते ही आँखों में आ जायेगा
इस भीड़ में पानी क्या रेल मंत्री दे जायेगा ?

तभी डिब्बे में हुआ हल्का उजाला
किसी ने जुमला उछाला ये किसने बीड़ी जलाई है ?
कोई बोला - बीड़ी नहीं है स्वागत करो
डिब्बे में पहली बार बिजली आई है
दूसरा बोला - पंखे कहाँ हैं ?
उत्तर मिला - जहाँ नहीं होने चाहिए वहाँ हैं
पंखों पर आपको क्या आपत्ति है ?
जानते नहीं रेल हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है
कोई राष्ट्रीय चोर हमें घिस्सा दे गया है
संपत्ति में से अपना हिस्सा ले गया है
आपको लेना हो आप भी ले जाओ
मगर जेब में जो बल्ब रख लिए हैं
उनमें से एकाध तो हमको दे जाओ !


अचानक डिब्बे में एक विस्फोट हुआ
हलाकि यह बम नहीं था
मगर किसी बम से कम भी नहीं था
यह हमारा पेट था उसका हमारे लिए संकेत था
कि जाओ बहुत भारी हो रहे हो हलके हो जाओ
हमने सोचा डिब्बे की भीड़ को देखते हुए
बाथरूम कम से कम दो किलोमीटर दूर है
ऐसे में कुछ हो जाये तो किसी का क्या कसूर है
इसिलए रिस्क नहीं लेना चाहिए
अपना पडोसी उठे उससे पहले अपने को चल देना चाहिए
सो हमने भीड़ में रेंगना शुरू किया
पूरे दो घंटे में पहुँच पाए
बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो भीतर से एक सिर बाहर आया
बोला - क्या चाहिए ?
हमने कहा - बाहर तो आजा भैये हमें जाना है
वो बोला - किस किस को निकालोगे ? अन्दर बारह खड़े हैं
हमने कहा - भाई साहब हम बहुत मुश्किल में पड़े हैं
मामला बिगड़ गया तो बंदा कहाँ जायेगा ?
वो बला - क्यूँ आपके कंधे
पे जो झोला टँगा है
वो किस दिन काम में आयेगा ...
इतने में लाइट चली गयी
बाथरूम वाला वापस अन्दर जा चुका था
हमारा झोला कंधे से गायब हो चुका था
कोई अँधेरे का लाभ उठाकर अपने काम में ला चुका था


अचानक गाड़ी बड़ी जोर से हिली
एक यात्री ख़ुशी के मरे चिल्लाया - 'अरे चली, चली'
कोई बोला - जय बजरंग बली, कोई बोला - या अली
हमने कहा - काहे के अली और काहे के बली !
गाड़ी तो बगल वाली जा रही है
और तुमको अपनी चलती नजर आ रही है ?
प्यारे ! सब नज़र का धोखा है
दरअसल ये रेलगाडी नहीं हमारी ज़िन्दगी है
और हमारी ज़िन्दगी में धोखे के अलावा और क्या होता है ?
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_श्री . 

होली है !!

भारतीय रेल – हुल्लड मुरादाबादी की हास्य कविता:


भारतीय रेल – हास्य कविता

एक बार हमें करनी पड़ी रेल की यात्रा
देख सवारियों की मात्रा
पसीने लगे छुटने
हम घर की तरफ़ लगे फूटने

इतने में एक कुली आया
और हमसे फ़रमाया
साहब अन्दर जाना है?
हमने कहा हां भाई जाना है….
उसने कहा अन्दर तो पंहुचा दूंगा
पर रुपये पुरे पचास लूँगा
हमने कहा समान नहीं केवल हम हैं
तो उसने कहा क्या आप किसी समान से कम हैं ?….

जैसे तैसे डिब्बे के अन्दर पहुचें
यहाँ का दृश्य तो ओर भी घमासान था
पूरा का पूरा डिब्बा अपने आप में एक हिंदुस्तान था
कोई सीट पर बैठा था, कोई खड़ा था
जिसे खड़े होने की भी जगह नही मिली वो सीट के नीचे पड़ा था….

इतने में एक बोरा उछालकर आया ओर गंजे के सर से टकराया
गंजा चिल्लाया यह किसका बोरा है ?
बाजु वाला बोला इसमें तो बारह साल का छोरा है…..

तभी कुछ आवाज़ हुई ओर
इतने मैं एक बोला चली चली
दूसरा बोला या अली …
हमने कहा कहे की अली कहे की बलि
ट्रेन तो बगल वाली चली..
______________________श्री________________________
अगर ये नकलची 'बन्दर' हैं! तो हम क्या किसी से कम हैं!!