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Wednesday, January 16, 2013

हीईईयाआह !!! सु-स्वागतम! जी आया नूं ! पैरी पौना जी! जी सर!पाठक सरजी ! पधारो जी! सादर प्रणाम!
हह:!हह:! हह:!
अब मुझे लगता है कि थोडा रूक जाना चाहिए! रूककर थोड़ा आत्मविश्लेषण जरूरी है।



'चल भई ! सीक्रेट एजेंटाँ !! तेरी रोटी-शोटी करिए।'
'.............!!!'
_श्री .

हर कोई इसे पढ़े।

हर कोई इसे पढ़े। पसंद आये तो ठोको Like ! अपने विचार और इस पोस्ट को facebook पर शेयर करें:

जब भारत में 'डर्टी पिक्चर' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा तो बलात्कारियों का तो हौसला और बढ़ेगा..............

सनी लिओन जैसी विश्व वेश्या को भारत में जब अतिथि बनाकर लाया जाएगा तो माँ बहिन बेटियों का सामूहिक बलात्कार ही होगा। समस्या बलात्कार की बस एक तरीके से खत्म होगी अश्लीलता बंद और मौत की सजा।

देश की समस्या है पश्चिमी अंधानुकरण ::
पश्चिमी सभ्यता का परित्याग ही भारत को बचा सकता है। जो लोग टीवी और फिल्मों मे नग्नता फैलाते है वे फिर सेक्यूरिटी लेकर क्यूँ घूमते हैं ? इन लोगों की नग्नता फैलाने की सजा बेचारी हमारी आम माँ बहन बेटियो को भुगतनी पड़ती है। परेशानी है तो गाँव से शहर और शहर से घर से बाहर जाने वाली आम माँ बहन बेटियों को.....बलात्कारी उन माँ बहिनो मे ही सनी लिओन ढूंढते रहते है और मौका पाते ही बलात्कार कर देते हैं।

अब सनी लिओन और बॉलीवुड की बालाएँ तो हाइ सिक्यूरिटी ज़ोन में रहती हैं सड़कों पर तो हमारी माँ बहनें जाती है ............. इस अश्लीलता का सम्पूर्ण त्याग ही भारत मे सदाचार की गंगा बहाएगा।



मेरा उत्तर :
http://www.facebook.com/krantikaribharat/posts/527080797325918?comment_id=5960113&notif_t=feed_comment

आज गालो मुस्कुरा लो

'आज गालो मुस्कुरा लो महफ़िलें सज़ा लो, क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए, जीवन की डोर बड़ी कमज़ोर! ...यारों !!'

मेरे बच्चों अगर आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हो तो तुम्हें भी उसी अहसास का अनुभव होगा जो मैं अभी अनुभव कर रोमांचित हो रहा हूँ। दोस्ती बड़ी अनमोल होती है, बचपन की निश्छलता जिसे सींचती है, इसकी कदर करना। आज तुम लोगों की और तुम्हारे दोस्तों की हमें ज़रुरत है। हमें भी अपना दोस्त समझो।

बचपन को याद करो! उन साथियों और उनके साथ धूल-मिटटी में खेले लम्हों और उस वक़्त के दौर को याद कर के उसके अलौकिक सुखद पलों को महसूस करो।

दीदी से बचपन की कहानियां सुनना! बाबूजी की मौजूदगी का स्नेहिल सुख! बाबूजी की कहानियाँ! वो लोरी! वो उनका गोद में लेकर प्यार से पीठ थपथपाना...........! बाबूजी के साथ गाडी में बैठकर सपरिवार गाँव जाना! रास्ते में पड़ते खूबसूरत नज़ारे! रेलगाड़ी की पहली सवारी। घर में जब पहली बार रेडियो, पँखा और साइकल आया था...! पहली बार कूकर की सीटी पर हमारा गिरते-पड़ते भागना! निश्छल हँसी के वे प्यारे-प्यारे पल ! कितना रोमांच है इन यादों में !! ..है न?

बचपन से ही देश एक प्यारा सा घर लगता है। हर कोई अपना-सा लगता है। देशभक्ति गीतों और फिल्मों की वीरतापूर्ण सुनहरी याद का रोमांच! फिर अपना शहर! अपना मोहल्ला! मोहल्ले की हर गलियां! हर मैदान! हर खेत! हर दोस्त! और हमारे खेल, .....हर वक़्त हीरोइज्म के ज़ज्बे से भरे!! कोई धर्मेन्द्र बनता! कोई राजेश खन्ना तो कोई प्राण! कोई महाबली दारा सिंह ! कोई देव-आनंद ! कोई अमिताभ! तो कोई अजीत! तो कोई अमज़द खान! तो कभी काऊबॉय फ़िरोज़ खान!! कॉमेडियन की नक़ल! कोई सैनिक कोई सिपाही तो कोई इन्स्पेक्टर, कोई विलेन,( ...जानबूझ कर उसे बनाते थे जिसे पीटने का खूब मन करता था). रेडियो में बिनाका गीतमाला सुनने के लिए सिलोन को ट्यून करने की टेंशन! पसंदीदा गाने के जीत की ख़ुशी! ...'बिंदिया चमकेगी..........!!!'  उस वक़्त पूजा पंडालों में बजते फ़िल्मी गाने और डायलाग पर यह बहस करना कि कौन-सा  गाना या डायलाग ज्यादा हिट रहा।

रफ़ी साहब के गीत -' ये रेशमी जुल्फें ...!' महेंद्र कपूर साहब की ओजस्वी आवाज़ -'.....मेरे देश की धरती ...!' मुकेश साहब की मखमली आवाज़ -' दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पर क्या गुजरी है ...!' सुनील दत्त साहब का गाना और उनका शानदार परफॉरमेंस -' न मूंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।' 'राजकुमार साहब का गाना -'हे!नीले गगन के तले, धरती का प्यार फले!' शशि कपूर साब की -'हे!नि सुल्ताना रे, प्यार का मौसम आया!' जितेन्द्र जी की -'अरे हो!...गोरिया कहाँ तेरा देश रे!...', -आने से उसके आये बहार, जाने से उसके जाए बहार,.....बड़ी मस्तानी है,.....मेरी महबूबा!' राजेन्द्र कुमार जी की "गोरा और काला!"_और उसके गीत! वाह..वा!!" धरम-पा जी की "आदमी और इंसान" के गाने -'जागेगा इंसान ज़माना देखेगा ...!' ... -' दिल करता! ओ यारा-दिलदारा मेरा दिल करता।' 'प्रेम पुजारी में -'ताक़त वतन की हमसे है!' में देव साहब की जोशीली चाल और वीर जवानों की कदमताल !! वाह वा!! दिलीप साहब की -'मधुबन में राधिका नाचे रे !'[ _इस गाने को हमारे बचपन के साथी-पडोसी-बड़े भाई अलोक भईया आज भी रफ़ी साब की हू-ब-हू नक़ल कर सुनाते हैं।] दिलीप साब की -'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का,...', -'रामचंद्र कह गए सिया से!' दिलीप साहब की मस्ती -'मेरे पैरों में घूँघरू पहना दे तो फिर मेरी चाल देख ले!' धरम पा जी की अनमोल एस्पियोनेज फिल्म-"आँखें", जो आज भी प्रासंगिक है। "शोले" की अमिट-अमर याद! "डॉन" का -'खई के पान!'...'अमिताभ बच्चन का शेट्टी का मुँह चिढाना -' अबे ओ गंजे ,....!!!' मन्ना-डे साब का अमर गीत, अमित जी की मासूम हंसी और प्राण साहब का डांस-'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी!' मन्ना-डे साब का -'ओ मेरी ज़ोहराज़बीं!' बलराज सहानी जी को .._जे मैं भूलूं ते दुर्र फिटे मूं !!


लुका-छिप्पी! गिल्ली-डंडे से लेकर क्रिकेट के मैच में जीत की हिप-हिप-हुर्रे! पतंग उड़ाना और कटीपतंग को लूटने में जांबाजी और मारामारी। कंचे (अंटा) का खेल! कब्बड्डी!बैडमिन्टन! लूडो! लट्टू! कैरम! तालाब में दोस्तों के संग अठखेलियाँ!! बगान से माली का खदेड़ना! स्कूल की घंटी। छुट्टी की चिल्ल-पाँव!! मास्टर साहब की छड़ी! उनका-(हमारा)- कान खींचना! हमारा मूँह बनाना! इतिहास-भूगोल, गणित और विज्ञान की किताबें! हिंदी पुस्तकों की कहानियां और दोहे! कभी परीक्षा की टेंशन! कभी रूठना-मनाना! सिनेमा की टिकट की जंग में शरीक होना! त्योहारों की धूम! होली-दीवाली-दशहरे के अनमोल क्षण! कॉमिक्स का मज़ा!!.........वा वा !!!

वह ज़िन्दगी जहाँ छल-कपट से भरी गन्दी इंसानी फितरत के लिए कोई जगह नहीं।

सबसे बढ़कर देशप्रेम का वो ज़ज्बा जिसकी रोमांचक मौजूदगी की वजह से आज भी हम सदा अंग-संग हैं।

भगवान् करें इसे किसी की बुरी नज़र न लगे।

_श्री .

Tuesday, January 15, 2013

युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए

जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!

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जो लोग पाकिस्तान के साथ युद्ध चाहते है वो लाइक करे

जो पाकिस्तान के साथ अमन (शांति )चाहते है वो कमेन्ट करे

मै तो युद्ध ही चाहता हु किउ की एक बार तो पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाना ही पड़ेगा और बताना पड़ेगा की हम हिन्दुस्तानी शेर है
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  • Abhay Marodia agaami 2 saal ke liye shanti
  • Pradeep Patel war achi chiz nhi h......bahut kharab chiz h....bahut jyda
  • Shrikant Tiwari जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!
    _श्रीकांत तिवारी .

"सीक्रेट एजेंट" और मेरी बेचैनी !

            अब से 12 साल पहले एक थ्रिलर उपन्यास पढने को मिला था: "दहशतगर्दी"! इसमें लेखक ने कारगिल युद्ध में पराजित पाकिस्तान, पाकिस्तानी सेना, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों, दहशतगर्दों की खीज से पैदा हुई भारत विरोधी षड्यंत्र की (काल्पनिक) कथा कही थी। इसकी कहानी में लेखक ने कट्टर और दुर्दांत दहशतगर्दों की विकृत, घातक और भारत विरोधी मानसिकता का अत्यंत ही रोमांचक किन्तु सच्चा चित्रण किया था। इसमें इन दहशतगर्दों की सलाहियत (सम्पन्नता, पहुँच तथा दबदबे), और अंतर्राष्ट्रीय रूप से फैले इनके खतरनाक-व्यापक-अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क और दहशतनाक मंसूबे की व्याख्या एक भारत विरोधी आतंकवादी हमले के रूप में की गयी थी जिसके कामयाब हो जाते ही वे कारगिल जैसे कई और हमले समूचे भारत में अंजाम देते। इन आतंकवादियों (दहशतगर्दों) की मानसिकता का ऐसा सटीक चरित्र-चित्रण इस उपन्यास में बेमिसाल है जो कहीं, किसी और दुसरे माध्यम से, उपलब्ध भी नहीं है। इसलिए इस उपन्यास को अंग्रेजी शब्द के मुताबिक "यूनिक / एक्सक्लूसिव" कहा जा सकता है। और अपनी भाषा में "दुर्लभ!"

इस उपन्यास में एक ऐसे रेलवे ट्रैक की कल्पना की गयी है हो जो रेलवे लाइन के ज़रिये कोलकाता (इंडिया) को ढाका, मयांमार (कुवालालंपुर) होते सिंगापूर से जोडती है। इस ट्रैक पर एक बहुत ही फैंसी खूब सुविधा-संपन्न महँगी ट्रेन "कॉन्टिनेंटल एक्सप्रेस" चलती है। जो दहशतगर्दों का निशाना है। एक ख़ास विशेषता इस उपन्यास में यह है कि इसमें कोई भी किरदार फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं है। ...बाकि इसमें पढ़ लेने का कष्ट करें।

 [उदयन जी और रिम्पी! अगर आपलोग इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं तो आपके लिए एक मनोरंजक सूचना है: इस उपयास "दहशतगर्दी" में आपके शहर 'कुल्टी' का जिक्र है। इस उपन्यास में जिक्र है (काल्पनिक कथ्य को बल देने के लिए) कि कुल्टी में एक लास-वेगास स्टाइल कैसिनो है! जहाँ एक "हाई -वोल्टेज" सस्पेंसिव-ड्रामा, एक्शन-पैक्ड फाइट होता है। इस कैसिनो से आगे अमेरिकन कांस्युलेट का एक बंगला भी दर्शाया गया है। रिम्पी तो मेरी उपन्यासों की लाइब्रेरी में से कई बार, कई किताबें इन लेखक महोदय की लिखी पढ़ चुकी है। पर इसे नहीं पढ़ा। रिम्पी ने शायद "कोई गवाह नहीं" भी पढ़ा है, और उसने लेखक महोदय के लेखन की तारीफ़ भी की थी ' ...बाप रे ...! मामा! ...सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हो रहा है, ...कहीं-कहीं खूब डर लग रहा है ...!!']

'दहशतगर्दी' जैसा कथानक फिर पढने को नहीं मिला। लेखक महोदय ने खुद ये घोषणा कर रखी है कि वे करंट-अफेयर्स, ऐस्पियोनेज जैसी विषयों से परहेज करते हैं। वे रहस्य कथा, जिसे वो अपनी जुबान में "हूडनइट्स" कहते हैं, लिखने में ही सहज फील करते हैं।

मेरे इन प्रिय लेखक महोदय को ईश्वर ने भविष्य में झाँक लेने की ऐसी दिव्य दृष्टी दी है, जिसे अपनी महानता के कारण भले वो इनकार करें, कि उनके लिखे पूर्ववर्ती उपन्यासों जैसी-ही कुछ दुर्घटनाएं आजकल घटित हो रही है। दिवंगत 'दामिनी' की घटना ऐन उनके लिखे उपन्यास (20-22 साल पुराने) "जहाज का पंछी" की याद दिलाते है। यह कथानक लम्बी (3-भागों में) है। जिसका नायक ऐसा है जो आज आम आदमी की कल्पनाओं में जी रहा है, ताकि वो हक़ीक़तन प्रकट होकर बालात्कारियों को उनके किये ज़ुल्म की सजा दे सके, खोखले सरकारी तरीके से अलग मजलूम को चैन दिलाने वाले तरीके से सजा दे सके, जिससे मजबूर और कमज़ोर मजलूम को इस ताक़त का अहसास हो सके कि वे इस नायक की मौजूदगी के जेरेसाया सुरक्षित हैं! कई लोग ऐसी फरमाइश कर चुके हैं कि इस विषय को फिर कथानक का मुद्दा बनाया जाय। इस नायक "विमल" की एक सीरिज़ है जो अब तक (लेखक महोदय के 50-साल के लम्बे अदभुद लेखन काल में) कुल 41-उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इस नायक का पहला उपन्यास 'मौत का खेल' 1971 में (कीमत 2/-रुपये में) प्रकाशित हुआ था। इनके लेखन में चार भाषाओं का मनोरंजक सम्मिश्रण होता है, जिन पर इनकी खूब पकड़ है- 'हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी। मुझे यकीन है कि रहस्य कथा के प्रेमी जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे है लेखक महोदय को सहज ही पहचान चुके हैं। वैसे हम रहस्य कथा के प्रेमियों को रहस्य को रहस्य रखना बाखूबी आता है। पर यहाँ लेखक महोदय का नाम लेना कोई रहस्योद्घाटन नहीं करता।

जी हाँ! यकीनन मैं हरदिल अज़ीज़ श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक की बात कर रहा हूँ। जिनके लेखन का मैं वैसा ही दीवाना हूँ जैसे अमित जी, धरम पा जी और दिलीप साहब का।

"दहशतगर्दी" के यहाँ जिक्र की वजह है। पाठक सर का 2012 दिसंबर में प्रकाशित नया उपन्यास "सीक्रेट एजेंट"! इस उपन्यास के नाम से ही मुझे रोमांच हो रहा है,.....क्या ये दहशतगर्दी जैसी इंटरनेशनल ज़मीनों को जोड़ने वाली कहानी है!?...........क्या ये "Espionage" है, किसी Spy की कथा करेगी!?...........लेकिन पाठक सर के आजतक के लेखन इतिहास को याद करता हूँ तो ये शंका होती है कि 'टॉप-सीक्रेट' नाम के उपन्यास ने भी यूँ ही मुझे सताया था, जो सुनील सीरिज़ का था। काफी मनोरंजक होने के बावजूद  कथानक Espionage कतई नहीं था। पाठक सर की जुबानी "हूडनइट्स" था। इसी उपन्यास में सुनील को अपनी फेमस मोटरसाइकल  20-हॉर्स पॉवर की "एम.वी.अगास्टा-अमेरिका" सेठ उत्तम्चंदानी से हासिल हुआ था, जिसके बारे में सुनील का सदा शराबी पंजाबी यार रमाकांत (मीना मर्डर केस में) खूब तारीफ़ किया करता था जिसकी उस समय (1975-1080) में 80,000/रू कीमत थी।

आज मैं अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बेचैन हूँ। पाठक सर का नया उपन्यास थ्रिलर "सीक्रेट एजेंट" राँची में परसों ही खरीद लिया गया है, जिसे आज धीरू लेकर आने वाला है। बदमाश कल से ही कल-कल-कल कर रहा है, फोन रिंग हो रहा है पर उठाता नहीं। रिम्पी सहज ही मेरी बेचैनी का अंदाजा लगा सकती है। लो जी फोन लगा :- '_उं!.......हाँ!. हलो! .......आएँ!.....आज साढे आठ बजे?....साँझे के !!......शाम में!!?'......अच्छाह!

.7:18PM अभी-अभी घर आने पर पता चला कि धीरुवा अब कल-बिहाने आवेग। क्यों? ट्रेन छुट गई!
'..........दुर्र फिटे मूं !"


_श्रीकांत .

Sunday, January 13, 2013


मेरे पूरे परिवार एवं सभी मित्रों को मकर-संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!


_श्रीकांत .

श्री हनुमान जी का यह दुर्लभ चित्र

"मंगल मूरति मारुती नंदन,
सकल अमंगल मूल निकंदन।
पवनतनय संतन हितकारी,
ह्रदय विराजत अवधबिहारी।।"
न जाने कई वर्षों से श्री हनुमान जी का यह दुर्लभ चित्र (No.1)हमारे घर में स्थापित है। कई लोग पूछ चुके हैं-'ये कौन है? आपके दादाजी?' हम उत्तर देते हैं कि -'जी हाँ! बाबूजी के पुराने बुजुर्ग हैं, नाम हनुमान तिवारी है।'

दिखने में ये हमारे अपने बुजुर्ग अभिभावक ही दिखते हैं, जो श्रद्धा से मगन होकर रामायण का पाठ कर रहे है। दरअसल भगवान् श्री हनुमान जी का यह अद्वितीय दुर्लभ सजीव चित्र/विग्रह/मूर्ती भारत में कहाँ स्थापित है, हमें नहीं मालूम। कुछ लोगों ने कयास लगाया कि शायद यह गीता प्रेस, गोरखपुर (यू.पी.) स्थित एक मंदिर में स्थापित हनुमान जी की मूर्ती की तस्वीर है। कुछ लोगों ने कहा यही हनुमान जी की असली फोटो है।जो हो, अब तो ये मेरे परिवार के लिए एक पूर्वज की तरह आदरणीय हैं। हम तो अब इनकी ऐसी उपस्थिति के इतने आदि हो चुके हैं कि इनपर ही हमारी निर्भरता है। पारिवारिक तस्वीरों के साथ ही यह चित्र घर में यूँ लगा हुआ है कि ये निश्चय ही घर के बुजुर्ग और मुखिया लगते है।(No.2)
गीताप्रेस से प्रकाशित होने वाली पत्रिका "कल्याण" बाबूजी की पुरानी सदस्यता के चलते घर पर आती थी, उनमे से एक में मैंने सेम-टू-सेम यही तस्वीर, एक चित्रकार द्वारा बना छपा पाया था। पर वह साफ़ पेन्सिल वर्क था। हनुमान जी की पूजा-आराधना के लिए दूसरी, पारंपरिक तस्वीरें हैं। जैसे ये :(No.3)


।। हँ हनुमते नमः।।

_श्रीकांत .

Saturday, January 12, 2013

हनी सिंह की नहीं सुभद्रा कुमारी चौहान की आवश्यकता है

पकिस्तान की आलोचना के बीच अपने देश के भीतर नासूर की तरह पकते, फलते-फूलते नक्सलियों के द्वारा वीरगति को प्राप्त हमारे एक जांबाज प्रहरी के शव में जिंदा बम प्लांट करना क्या उस तालिबानी बर्बरता से कम है जिनके कारण मानवता शर्मसार होती है? इन विचलित कर देने वाली बर्बर घटनाओं के कारण 'दिवंगत "दामिनी" की चीख' कहीं दब नहीं गई? ..........ज़रा सोचिये ..., क्या कोई सियासत की चालबाजी है या सच में अब आदमी आदमखोर बन गया है? सरकार की क्षमता नक्सलियों के आगे अगर इतनी ही पंगु है, तो फिर सीमा की सुरक्षा की सोच कर क्या रूह नहीं काँप जाती? सरकार का यही रवैया रहा तो भगवान् न करे, हमें काफी दुःख-दंष झेलने पड़ेंगे .....! -यह एक आम आदमी की चीख है .........कोई सुन रहा भी है या नहीं?

आज देश को हनी सिंह की नहीं सुभद्रा कुमारी चौहान की आवश्यकता है। ........वंदे मातरम !!

_श्री .

Swami Vivekananda ‎(Today Swami Vivekananda's 150th Birthday) 1863-2013

आज हमारे शहर लोहरदगा में अभूतपूर्व मनभावन दृश्य देखने को मिला। खुद को डॉक्टर से दिखाना था क्योंकि मुझे ठंढ लग जाने के कारण छाती में कफ जम जाने से जब खाँसी उठती है तो थमने का नाम नहीं लेती। कई रातों से ठीक से सो भी नहीं पाता, जोर से हंसने या साँस लेने पर खूब जोर से खाँसी होने लगती है, हाल बे-हाल हो जाता है।
मोटरबाइक से डॉक्टर के यहाँ जाने को निकला तो घर के निकट थाना टोली मस्जिद मोड़ के पास भारी जाम लगा मिला। कुछ सोच कर मैंने शॉर्टकट रास्ता पकड़ा और एक गली से होते न्यू रोड जाना चाहा तो मेनका सिनेमा, देवी मंडप के पास गली के मुहाने पर भी भारी जाम मिला। यहाँ जाम का कारण पता चला। मौका था पूज्यनीय स्वामी विवेकनन्द जी के 150वीं जन्मोत्सव का। विभिन्न स्कूलों के बच्चों की सामूहिक जुलूस और झाँकी गुजर रही थी। अपने-अपने स्कूल-यूनिफार्म में सजे बच्चे-बच्चियाँ हाथों में तख्ती और बैनर लिए स्वामी जी के सम्मान में जयघोष करते जा रहे थे। जुलूस की लम्बाई और छात्र-छात्राओं की संख्या बेमिसाल थी। जुलूस इतनी लम्बी थी कि थाना टोली से लेकर न्यू रोड होते स्टेडियम तक पहुँच रही थी। जुलूस के सम्मान में हर सड़क हर मोड़ पर ट्रैफिक थम गया था। पर कहीं कोई जल्दीबाजी या बेचैनी नहीं बल्कि उत्सुकता, प्रसन्नता और गर्व से तमतमाते चेहरे रोमांच पैदा कर रहे थे। खूबसूरत झाँकी में कोई बालक विवेकानंद बना मुस्कान बिखेर रहा था।  कोई स्वामी जी द्वारा शिकागो में दिए लोकप्रिय भाषण के अनुवाद को पढ़कर सूना रहा था। वाह! मन झूम गया। झाँकी के पीछे चलते बच्चों की लम्बी लाइन संयमित और उत्साहित हो नारे लगा रहे थे। उनके शिक्षकगण जुलूस को भली-भाँती कंडक्ट कर रहे थे। इस समय मैंने अपने कैमरा को बहुत मिस किया। फिर मोबाइल की याद आई जिसमे छोटी MgP की सही पर कैमरा है। मैं भीड़ में थोडा-थोडा कर किसी तरह न्यू रोड पर पहुंचा। वहाँ का नज़ारा और भी मनभावन था। जुलूस को निकल जाने देने के लिए सड़क के हर तरफ हर प्रकार के दुपहिये-चौपहिये वाहनों की असंख्य कतार लगी हुई थी जिसे बड़ी मुस्तैदी से टैफिक पुलिस संभाले हुए जुलूस को बढ़ते जाने का निर्देश दे रही थी। मैंने फिर कोशिश की। और खिसकते-खिसकते न्यू रोड स्थित अपने बाबूजी द्वारा निर्मित हमारे मकान पर जा पहुंचा। मैंने तुरंत मोटरबाइक को मकान के ओटे पर चढ़ा कर खड़ा किया और सीढियां फलांगते सबसे ऊपर खुले छत पर जा कर देखा तो कई तरह के पेड़ों और दुसरे मकानों की ओट हो जाने के कारण दृश्य बाधित लगा। तभी सामने की छत पर से भईया "व्यास जी" की पत्नी "भउजी" ने मुझे देखा और अपने छत पर आने का इशारा किया। पर भीड़ के कारण यह हो न सका, और झाँकी करीब पहुँच चुकी थी। मैं एक मंजिल नीचे उतरा और सड़क के सामने वाले बरामदे पर पहुंचा। वहां काफी लोग जमा थे। वहां से मैंने जुलूस और झाँकी की कुछ तस्वीरें लीं, पर मुझे तसल्ली नहीं हुई। मैं नीचे उतर कर अपनी बाइक के पास खड़ा हो कर तस्वीरें लेने लगा। पर मोबाइल ने ठीक से परफोर्म नहीं किया। दुसरे जेब से दूसरा मोबाइल निकाला और उसी के कमज़ोर अधमरे कैमरे से जितना सुलभ हो सका तस्वीरें लीं। पर जो नज़ारा मैं अपनी आँखों से देख सका उसके लिए "खाँसी बाबा" की जय!!











जुलूस के निकल जाने और ट्रैफिक के सामान्य होने पर मैंने पाया कि अब डॉक्टर के यहाँ न जा सकूँगा। सो, खांसते हुए घर वापस .......  


_श्री .

हमारी एक ''पृथ्वी'' या "अग्नि" ही काफी है तुम्हारे सारे वजूद के लिए......आ ...!

जितनी मेरी उम्र है उसे मैंने पाकिस्तान की मुखालफत में ही देखा ! कभी किसी व्यक्ति विशेष की मुखालफत के रूप में। तो, कभी किसी राक्नीतिक दल की मुखालफत के रूप में ! तो कभी समूचे देश की मुखालफत के रूप में !!! क्या ये मेरी गलती है ? ..क्या किसी अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तिविशेष की गलती है? क्या ये, ...फिर, किसी  राजनीतिक दलों की गलती है? या फिर देश की सोच-समझदारी की ही गलती है जो हर कोई पाकिस्तान की मुखालफत ही देखता है? इसके बाद बाकी के दुसरे अमेरिका, इंग्लैंड और बाकी के पूरे विश्व  के देश भी पगला गए हैं!? इतने लोग, इनके देश और इनकी जनता क्या पागल और हिंसक हैं!!!!? या .. रे ... रे ... रे पाकिस्तान तेरी ही गलती है?  ऐसा ही है, तो फिर भीड़ जा न! दुमुंहें साँप!! दोगली मानसिकता में दीवाने पकिस्तान! आ न !! खुलके आक्रमण की घोषणा कर ! कमीने , कायर ! स्साले !! हमारी एक ''पृथ्वी''  या "अग्नि" ही काफी है तुम्हारे सारे वजूद के लिए..................आ ...!

जय हिन्द !!!

चमरराम के फूल, और हमारे प्रिय,मंझले, इंजिनियर साहब

 आज के दिन सन 2013 में मेरे घर में पहली बार पूजा-अर्चना और शंखनाद हुआ। ईश्वर का लाख-लाख शुकर। आज ऑफिस में चमरराम ने मुझे, अपने निश्छल प्रेम के रूप में कुछ फूल दिए। ये मेरे परिवार के लिए है,जो आपलोग हैं। सन्नी ने इस पल को संजोने का काम किया। फिर सन्नी ने खुद, मेरे संकलनों में से, "अमर चित्र कथा" छाँटकर निकाला और जाड़े की स्निग्ध धूप में बैठ उसका रसास्वादन करने लगे। देखिये मेरे चमरभाई को, उनके उगाये फूलों को, और सन्नी [हमारे प्रिय,मंझले, इंजिनियर साहब] को "अमर चित्र कथा" पढ़ते हुए.........मलुवा नीचे बैठी है, उसके बच्चे दूध पीने की होड़ में ..........!











_श्रीकांत .

Wednesday, January 9, 2013

मेरी सेंचुरियन नानी

परपोते-परनाती ध्यान दें :
सीरिकंतवा (श्रीकांत) अबहीं ले ना आइल !? .......नानी। मेरी नानी। कितनी उम्र होगी इनकी? ...ये अंदाजा गलत होगा, इसलिए यह गणित छोड़कर मैं अपनी नानी को अब सेंचुरियन नानी बोलता हूँ। कल दोपहर को उसके पास बैठकर भोजन के दरम्यान मैंने नानी से कहा था कि -'नानी हमारा साथे फोटो खिचावैयेबे नुं? अभी कैमरा नईखीं ले आइल, काल्ह ले के आइब, तइयार रहिहे। तोर फोटो खिंचब। ठीक नु?'
नानी उसी शाम से खुद बाल संवारकर तैयार बैठ गई। मामा-मामी बोलते रहे कि फोटो अगले दिन खीचने के लिए श्रीकांत आवेगा, पर रह-रह कर बात भूल जाने वाली मेरी नानी ने जिद्द पकड़ ली और गुस्से में मुझे बुलाने को कहने लगी -' बोलावअ ओकरा के उ कहलक ह कि हमार फोटो खींची, त अबले आइल काहे ना?' यूँ ही नानी ने किसी को अपने बाल छूने नहीं दिए कि -'अरे रहे ना द, फोटो नू  खिचावे के बा!'
आज सबेरे ऑफिस (गद्दी) में मामा का फ़ोन आया तब हँसते हुए ये बातें बता कर उन्होंने कहा कि मैं नानी से किया अपना वादा पूरा करूँ अन्यथा नानी तंग करेगी। सो, आज दोपहर मैं अपनी सेंचुरियन नानी के पास पहुँच गया _मुझे आया देखकर नानी नन्हें बच्चे की तरह प्रसन्न हो गई ... नानी ने तेल मांग कर बालों में लगाया, फिर उनकी जिद्द के बावजूद मामी ने उनके बाल सँवारे, और फोटो खिचना चालु _

















(...जाड़ा तो है ही, मैंने मुंडन करवाया है इसलिए भी टोपी...!) मैंने फोटो उसके ओरिजिनल साइज़ से छोटा करके पोस्ट किया है।

_श्रीकांत >




Monday, January 7, 2013

& श्री आसाराम बापू उवाच TODAY : "::::::::::दिल्ली में हुई गैंग रेप के सन्दर्भ में ""::::::::::::`~*^%$#*&^%$#*~:::`गलती एक तरफ से नहीं होती!`,:::::::::::`लड़की को बलात्कारियों से दयायाचना कर लेनी चाहिए थी!!` ::::`उन्हें भाई मान लेती!`:::::, !!!""

फिर तो श्रीराम, लक्षुमन जी को भी रावण से दयायाचना कर लेनी चाहिए थी, वो माता सीता जी को मुक्त कर देता!? या माता सीता जी स्वयं रावण से निवेदन करतीं, वो उनका अपहरण ही न करता!!(...इस पॉइंट के लिए श्री रवीश भैया NDTVindia को प्रणाम।)

...संत की असंत वाणी!!

इसी के साथ देश में बयानबाजी की मैच शुरू ....... 

Sunday, January 6, 2013

सब्र और संतोष:

बिजली की आँख-मिचौली के बीच : कुछ और ...

सब्र और संतोष:

मैंने (अपने मित्र) मास्टर साहब से कहा -"सर, अतुल को अब आपकी सहायता की ज़रुरत है। उसके 10वीं बोर्ड की परीक्षा है। पहले आपने कहा था कि अभी बहुत छोटा है, छोटी क्लास का विद्यार्थी है, 10वीं में देखेंगे। सर वो समय आ गया है। मेरा निवेदन है कि अब आप उसे अपनी छत्रछाया में ले लेने की कृपा कीजिये ताकि आपकी मदद से वो भी अपने बड़े भाइयों का अनुकरण करते हुए अपना करियर खुद संवार सके।"

मास्टर साहब सिर्फ हँसे।

मैंने फिर-से अपना निवेदन दुहराया। तब वे चुप हो गए। उनकी मुद्रा गंभीर हो गई, तो मुझे आशंका होने लगी कि कहीं मास्टर साहब नाराज़ तो नहीं हो गए!

मैंने फिर प्रयास किया -"सर ..."

अचानक मास्टर साहब मुझ पर भड़के -" तिवारी जी थोडा सबर से काम लीजिये, दो-दो बेटे तो आपके आगे निकल गए इससे आपको संतोष नहीं होता? ज्यादा लालच ठीक नहीं है।"


".....................-------!!!?"



मुझे सब्र और संतोष होता पर खेद है कि यह कोई लतीफा नहीं है।
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_श्री .