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Tuesday, January 22, 2013

"यार" पे कर दे सब कुर्बान!!"

यार के साथ मेले की बहार का मज़ा अपने घर में, या बाहर कैसे लिया जाता है इसे जानने के लिए रमाकांत मल्होत्रा 'अम्बरसरिये' नूं और सुनील को जानना बहुत जरूरी है। >>>"अमेरिका के एक नेता - Charles Evans Hughes ने एक बार हमारे जीवन में दोस्तों की अहमियत को दर्शाते हुए कहा था - "A man has to live with himself, and he should see to it that he always has good company "

पाठक सर ने भी इसी बात को दुसरे तरीके से कुछ युं कहा है -

" हमारी ज़िन्दगी में 'यार' एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल हम बहुत हल्के में करते हैं।..... मैं रोज़ कितने ही लोगों को जानता हूँ और फिर कितने ही लोगों से मिलता हूँ , क्या वो मेरे 'यार' हैं?
मैं अपने दफ्तर में 500 लोगों के साथ नौकरी करता हूँ - ऐसे में क्या वो सारे मेरे यार हो गए ? ......... नहीं - ऐसा नहीं है। यार वो होता है - जो आप का हमख्याल हो, हमनिवाला, हमप्याला हो। हर कोई 'यार' के दर्जे में नहीं आता। " <<<{
Kanwal Sharma फँस ऑफ़ एसएमपी के लेख से }_"यार वो होता है - जो आप का हमख्याल हो, हमनिवाला, हमप्याला हो। हर कोई 'यार' के दर्जे में नहीं आता।"....ये लाइन और पाठक सर के बोल असर कारक हैं। और इसका आभास हमें होने के बावजूद हम अपनी भावनाओं को शब्द नहीं दे पाते। यह पंक्ति हमें अभिव्यक्ति के लिए वांछित शब्द प्रदान करती है। _पाठक सर को शत-शत नमन।

बाबूजी हमें छुटपन में ही ये कहकर कमांड करते थे कि -'संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात।' _बड़ी सारगर्भित और अमल के काबिल बात है। पर, हम जब कभी किसी से दोस्ती करते हैं, या यूँ कहें कि जब दो जने आपस में दोस्त बनते हैं, मित्रता का नाता स्थापित करते हैं, तब हम इस हिदायत और इसकी सारगर्भिता को पूरी तरह भूले होते हैं। उस समय एक दुसरे का साथ, उनका पास-पास होना, न होने पर एक दुसरे को मिस करना ही अहम रह जाता है। बाबूजी की बात की महत्ता फिर भी कायम रहती है क्योंकि आप अपने हमखयाल, समान रूचि वाले को ही पसंद करते हैं, इसी प्रकार अगला भी आपको पसंद करता है। आपकी रूचि आपके संस्कार के मुताबिक होती है। संस्कार परिवार से ही मिलता है। दो अनजान लोगों की मुलाक़ात होने पर जब वो एक दुसरे के साथ कुछ वक़्त गुजारते हैं तब एक-दुसरे के गुण-दोष का पता चल जाता है और यह निर्णय लेना सहज हो जाता है कि हम दोनों मित्र बने या न बने। किसी के लिए आपके मन में उसकी शक्ल देखकर या उसकी चपलता देखकर या उसका परफॉरमेंस देखकर या गुण देखकर अनुराग पैदा होता है और आप उसके मित्र बनने की ख्वाईश करते हैं तो ऐसी ही ख्वाईश जबतक आपके प्रति अगले के मन में जाग्रित नहीं होगी, दोस्ती हो ही नहीं सकती। किसी की बाँह मरोड़कर या उसके सिर पर सवार होकर, उसके पीछे पड़े रहकर उसे तंगकर, धमका कर और मजबूर कर के यह रिश्ता आप कभी नहीं जोड़ सकेंगे। इसके लिए सिर्फ एक ही रास्ता है और वो ये कि यदि आप चाहते हैं -रिपीट- आप चाहते हैं कि फलां आपका दोस्त बन जाय तो सीधे बे-झिझक, बेख़ौफ़ उसके पास जाइये और दोस्ती की पेशकश रखिये। अगर आप सोचते हैं कि कोई दूसरा जबतक आपको नहीं पूछता तबतक आप उसे कोई भाव नहीं देंगे तो यहाँ मेरा एक विनम्र निवेदन है -'सर! आप किसी की दोस्ती के काबिल नहीं। नमस्ते!' 

दोस्ती और चमचई के फर्क को समझिये। समय सबसे बड़ा और बलवान होता है, समय के साथ हमने जो निर्णय लिया होता है उसकी परीक्षा स्वतः हो जाती है कि हमारा निर्णय सही था या गलत। आप खुद ही ये समझ जाते हैं कि इस 'सम्बन्ध' की आयु कितनी है। फिर भी नहीं समझते तो बाबूजी की बात पर गौर करने की आवश्यकता आन पड़ती है, या (आपके) बाबूजी (या अन्य बड़े) यदि उपस्थित हैं तो वे चेतावनी दे देते हैं। इसके बावजूद भी आप बाज़ नहीं आते तो एक-दुसरे के लिए कष्टप्रद स्थिति का कारण बन जाते हैं, जिसका अंजाम कभी-कभी दुखद भी हो सकता है। सो, दोस्तों जब तक हम जीवित रहेंगे नीली छतरी वाला हमेशा हमारी ऐसी परीक्षा लेता ही रहेगा। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि बाबूजी की बात की आन बनी रहे। इस परीक्षा में हम कभी फेल नहीं होंगे।

"निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करत सुभाय।।" --कबीर 
(Keep your critic close to you; give him shelter in your courtyard.
Without soap and water he cleanses your character.__कबीर जी दी वाणी) _और ऐसी निंदा आपका सबसे करीबी दोस्त ही आपकी आपके मुँह पर करेगा।___पर पहले दोस्त तो बने! -रिपीट- पहले 'दोस्त' तो बने !! दोस्त बनने से पहले ही कोई अल-बल बकने लगे तो कैसे बीतेगी? किसी बड़े दिलवाले ने कहा है: _रूठो। दुश्मनी करो। पर इस तरह कि खुदा फिर से दोस्त बनने का मौका दे तो एकदूसरे के आगे शर्मिन्दा न होना पड़े।

आप किसी से प्रभावित हो कर उससे दोस्ती करना चाहते हैं पर वो आपका हमखयाल होने के बावजूद आपके प्रति इच्छुक नहीं तो मरिये मत। इस फ़ॉर्मूले पर अमल कीजिये -'तू नहीं और सही, और नहीं और सही!' दुनिया दिलवालों से खाली नहीं। यदि आपका दिल साफ़ है। आप भले हैं। दोस्ती की ख्वाईश है पर कोई दोस्त नहीं। कोई पूछता भी नहीं। इसका मतलब सिर्फ यही हुआ कि अबतक आपने कोशिश की ही नहीं, की तो दिल से नहीं की। अरे भले आदमी! ऐसा इत्तेफाक शायद ही कभी हुआ होगा या आइंदे होने वाला होगा तो होगा कि कोई खुद आपके पास आकर मित्रता का प्रस्ताव रक्खे। तुम क्या आसमान से उतरे कोई अवतारी हो, जो कोई आ कर तुम्हारे आगे लोट लगाएगा और फ़रियाद करेगा कि ऐ खुदा के बन्दे मुझे अपना दोस्त बना ले! तेरे बैठे रहने से और सपना देखते रहने से कुछ नहीं होगा। तुम हाथ आगे बढाओगे तभी तो कोई उसे थामेगा! ये सोच कर घुलने से क्या फ़ायदा कि 'हाय! कोई मुझे नहीं पूछता!' ...आ,चल उठ! अपने-आप को तौल कि तू किस काबिल है? क्या काबिलियत है तेरे में? किसी को तू जब अपना दोस्त बनाएगा तो उससे शेयर करने के लिए 'तेरे' पास क्या है? क्या अर्पण करेगा तू उसे? जब यह समझ में न आये तो थोडा ठहर जा। थोड़ी देर के लिए थम जा। आत्मविश्लेषण कर। तू जान जाएगा, तुझे उत्तर मिल जाएगा। फिर जिससे दोस्ती की तमन्ना है उससे जा के मिल। बता उसे अपने दिल की बात। बोल कि तू उसका दोस्त बनना चाहता है। फिर बाकी वो नीली छतरी वाला है न, सब ठीक कर देगा। देखना, उस वक़्त तेरे चेहरे पर कैसी लाली छाई होगी। रगों में खून जोश मार रहा होगा। रोमांच से लोमहर्षक अनुभूति के कारण तेरे चेहरे का तेज़ खिला हुआ, तमतमाया हुआ होगा। और तेरा दोस्त तुझे हासिल हो जाएगा। लेकिन ताकीद रहे _जितनी बड़ी ख्वाईश होती है कभी-कभी उतनी ही बड़ी निराशा हाथ लगती है। दोस्ती में हर वक़्त देने की, अर्पण करने की फितरत की ही अहमियत है, मांगने की, मांगते रहने की नहीं। ...इस बात की जरा व्याख्या करो बाकी समझदार हो तो खुद समझ जाओगे। तेरा दोस्त बाँहें फैलाए तरी राह में है। जाकर लग जा उसके गले।

बे-मेल लोगों में भी बेमिसाल दोस्ती हो जाती है जो ताजिंदगी कायम रहती है। किसी की शक्ल अच्छी नहीं, किसी की जात ऊंची नहीं, किसी की सामजिक अवस्था आपके बराबर की नहीं, किसी की माली हालत (आर्थिक स्थिति) बराबरी की नही फिर भी ऐसे भले मित्र हैं जो इन बातों को हिकारत की नज़र से नहीं देखते, इंसान को इंसान की नज़र से देखते और उसे अपने सान्निध्य का अवसर देकर उसे अपना मित्र बना लेते हैं। हमने अक्सर देखा है कि घमंड में कैसे-कैसे अपमानजनक शब्द बोले जाते है,-"ई...!?' '...ई छुछुंदर तोर दोस्त हउ? साला करियट्ठा! मैलाहा, पिलुवाहा ! भगाओ हीयाँ से एकरा ! अईसने-अईसने लफंगन के हे संघत में न तूं बिगड़ गेले हे !" यही छछूंदर जब फ़ौज में शामिल होकर सरहद की सुरक्षा में शहीद हो जाता है तो उसे छछूंदर कहने वालों के रंग गिरगिट की तरह बदल जाते हैं। कोई अभिनेता, खिलाड़ी या नामी हस्ती बन जाता है तो कहने वालों के बोल बदल जाते हैं। अतः ऐसी अवस्था में जब आप देखें कि यदि आपके मित्र की तौहीन हो रही है, बेईज्ज़ती हो रही है, तो उसके उन गुणों को सामने लाइए जिसके गुणों के कायल होने के बाद आपने उसे अपना दोस्त बनाया था और बकवाद करने वाले, भले चाहे वो आपके अभिभावक हों, पहले का और और और पुराना घनिष्ठतम यार! _उनकी गलतफहमी को दूर कर दीजिये, पर दोस्त को आहत न होने दीजिये। उन्हें बताइये कि ये गणितज्ञ है, वैज्ञानिक है, विद्वान् है, संगीतकार है, गायक है, कलाकार है, इंजिनियर है, कहानीकार है, लेखक है, चित्रकार है, खिलाड़ी है, बिजनेसमैन है, स्कूल मास्टर है, अभिनेता है, नेता है, पत्रकार है, वकील है, डॉक्टर है, सिपाही है, सैनिक है, मुंशी है, किरानी है, लिपिक है, दुकानदार है, चपरासी है, ड्राईवर है, माली है, दरवान है, ...और भी कुछ है या नहीं है लेकिन एक आप ही के जैसा इंसान है जो आनंद दायक मानवीय अनुभूतियों से लबरेज़ है, और दोस्ती के काबिल है और ये भी जरूर कहिये कि आपने नहीं _"उसने आपको" अपना दोस्त बनाकर 'आपका' मान बढाया है। दोस्ती की है न! ऐसे ही दोस्ती निभाई जाती है। यहाँ किसी प्रकार के विद्रोह या बगावत की बात नहीं, दोस्त की इज्ज़त की रक्षा करते हुए दोस्ती जैसे पाक और पावन रिश्ते को नयी ऊंचाई यूँ ही दी जाती है। इसके बिना इस रिश्ते की गति नहीं।
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कभी-कभी चमचों से घिरे नौजवान ख़ूबसूरत मसलमैन को उसकी चमचमाती गाडी और शख्शियत को देखते ही आप उसकी दोस्ती के लिए लालायित हो जाते हैं, और आप कामना करने लगते हैं कि अगर अब आप भी उसके दाएँ-बाएँ वाले ख़ास चमचे बन जाएँ तो आपकी तो निकल पड़ेगी। यही हो रहा है आजकल। इसी सोच से ग्रसित लोग आज देश को कलंकित कर रहे हैं।  ............सावधान! ऐसे लोगों की जामात बढती जा रही है। यह बहुत ही खतरनाक है। इसे रोकना होगा। ये लोग गुंडा एलिमेंट को बढ़ावा देने वाले नौदौलतिये हैं। पैसे और ग्लैमर के लालच के हवाले इनके चमचे उनकी शैतानी आग में अपनी चापलूसी से घी की आहूति देने जैसी वाहियात हरकत कर समाज और देश को रोजीना रुलाये चले जा रहे हैं। इनकी रोकथाम जरूरी है। वर्ना हम गए! यह संगत ही वह कुसंगत है जिससे बाबूजी हमेशा सचेत किया करते थे। ...देख लो अंजाम!! 'दामिनी' के बाद भी .........अभी भी कुछ नहीं बदला।
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दोस्त, दोस्त के काम आते हैं। किस काम आते हैं? ये भी कोई डिस्कशन की बात है! इसके बारे में क्या कहना!!

महान व्यक्ति कोई महान काम करता है तो उसे पता भी नहीं होता कि उसने कब कहाँ, क्या महान कर दिया है। किस पर कैसे, कैसी महत्ता कर दी है। उसे अपनी महानता का भान तक नहीं होता। अपने स्वभाव सुलभ महान कर्मयोग में लीन उपकृत लोगों की "थैंक्यू" उसे सुनाई नहीं देती। इसलिए वो "मोस्ट-वेलकम" भी नहीं बोलता। यूँ उसकी आलोचना भी हो जाती है,...वह मुस्कुराता रहता है। हैट्स ऑफ टू देम!

'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी।'
'ये दोस्ती-ई, हम न...हीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ ना छोड़ेंगे।'
'कुर्बानी-कुर्बानी ...कुर्बानी..ईं..ईं, अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी ...मित्रों!_इस गाने को पूरा गाकर या सुनकर देखो और बतलाओ इसमें कौन किसके लिए किसकी कुर्बानी की बात कर रहा है? ' यारी मेरी कहती है,_यार" पे कर दे सब कुर्बान!!"
 _ऐसे ही और न जाने कितने गीत और गाने हैं जो दोस्ती, यारी को रेखांकित करते हैं, महिमामंडित करते हैं, उसका गुणगान करते दोस्ती को ही समर्पित हैं। कितने भाग्यशाली होंगे वो लोग जिन्हें दोस्ती जैसा दुनिया का सबसे अहमतरीन और पाक रिश्ता उनकी तकदीर ने उन्हें दिया होगा। माँ के बाद दुसरे नंबर पर दोस्ती की ही जगह है, बाप और भाई की भी नहीं, जिसमे कि किसी प्रकार के राज-सिंघासन, धन-दौलत और हिस्से के कारण हमेशा हरदम के कई खुरेंज़ दास्तान भरे पड़े है। पर दोस्ती इन लानतों से परे है। इसमें एक दुसरे के प्रति सिवाय एकनिष्ठ समर्पण के दूसरी किसी भेद भरी बात के लिए कोई जगह होती ही नहीं। दुई का कोई भेद नहीं होता।
_ये हमारे गीतों के अमर बोल साक्षी हैं, प्रमाण हैं इस बात का कि दुनिया में दोस्ती जैसा पावन रिश्ता सहोदर भाई जैसे रिश्ते से भी महान होता है। एक दोस्त अपने जिगरी दोस्त के लिए जो बे-झिझक कर सकता है, करता है, वह कभी-कभी सहोदर भाई भी नहीं कर पाता, पिता भी नहीं कर पाते। और दोस्ती सिर्फ एक दुसरे पर अटूट विश्वास के दम पर कायम रहती है। दोस्त एक दुसरे से जिस बे-तकल्लुफी से पेश आते हैं, एक ही थाली में खाना खाते हैं, बिना ये परवाह किये कि 'उसका जूठा है!'_यह बे-तकल्लुफी ही इस बात का प्रमाण होती है कि ये जिगरी दोस्त हैं। भोलेनाथ शिवशंकर भगवान् की श्रीविष्णु भगवान् से मित्रता। भोलेनाथ शिवशंकर भगवान् की श्रीरामजी के साथ अनुराग! सुग्रीव जी के साथ श्रीरामजी की मित्रता! विभीषण के साथ श्रीरामजी की मित्रता। अर्जुन के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। सुदामा जी के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। उद्धव जी के साथ श्रीकृष्णजी की मित्रता। दुर्योधन के साथ कर्ण की मित्रता। मिसालें गिनने बैठोगे तो गिनती भूल जाओगे। दोस्ती किसी भी आदम जात की किसी भी दुसरे आदम जात से हो सकती है, हो जाती है, होती है, होती रही है और होती रहेगी। इसमें लिंग-भेद, जाति और उम्र के लिए भी कोई जगह नहीं। 75 वर्षीय वृद्ध भी एक 21 वर्षीय नौजवान के दोस्त होते हैं।

"अरे जा ना तू निश्चिन्त रह, हम(मैं) सब देख लेंगे(लूँगा)।" क्या ऐसा बोलने वाला आपने देखा है ?  >> "हाँ ! कितने देखे! सिरिफ बोलते हैं। डाइलोग मारते हैं। ज़रुरत के वखत मोबाइल पर '_घर से_' बोलते हैं- "हाँ! हाँ! ..अरे .. बड़ी दुःख होलउ इयार सुनके। अईसन कर ना, हम तोरा बाद में फोन करइत हियऊ, .. न!, ... उ .. हाँ रांची आइलीयाई हे, ..अच्छा औवा हियई त बतियावल जाइतै।"    

 ये जूठे अभी ही त्याज्य हैं। और अपनी पहचान के "दायरे" को बढ़ाइए।

एक बहुत ही प्यारा नारा है। जिसे दोस्ती के ज़ज्बे को नयी ऊंचाई देने वाले मेरे प्रिय लेखक सुरेन्द्रमोहन पाठक साहब ने बुलंदी पर पहुंचाया है -"यारां नाल बहारां, मेले मित्रां दे।"
(निवेदन : ये मेरे अपने विचारहैं। खुद को तसल्ली देने के लिए। पर मैं इसे निश्छल मित्रता और दोस्ती को समर्पित करता हूँ।)
 तो क्या ख्याल है? दोस्ती करोगे मुझसे?
_श्री .

Sunday, January 20, 2013

92 वर्षीय श्री प्राण साहब ... तबियत में सुधार की सूचना

हमारे प्रियतम हिंदी फिल्मोद्योग के अपने जमाने के दिग्गज लोकप्रिय 'खलनायक' 92 वर्षीय श्री प्राण साहब 25`दिसंबर से लीलावती हस्पताल में भर्ती हैं। ताज़ा समाचार के मुताबिक उनकी तबियत में सुधार की सूचना मिली है।

Saturday, January 19, 2013

अंग्रेजी ज्ञान पर होती हिंदी की उपेक्षा !

मुझे हैरत है इन नामोंनिहाद, मशहूर-ओ-आम शुद्ध भारतीय सुपर स्टार्स,चाहे वो किसी भी क्षेत्र के हों, की अंग्रेजी-प्रेम और हिंदी की उपेक्षा पर! कई ऐसे लोग जो खाते तो हिंदी का हैं पर गाते हैं अंग्रेजी का, अंग्रेजी बोल कर। हिंदी में सवाल करो वो अंग्रेजी में उत्तर देते हैं। फिल्मों की नगरी में सिवाय अमित जी, धरम पा जी, और दिलीप साब की तरह जो अपनी मातृभाषा की खूब कद्र जानते और करते हैं को छोड़ कर, बाकी के सारे के सारे हिन्दुस्तानी जो हिंदी क्षेत्र  के हैं पता नहीं क्यों अंग्रेजी के भूत से इतना डरते हैं की उसकी गुलामी करने और उसका मैला चाटने से बाज़ नहीं आते। फिल्म 'कहानी'(विद्या बालन) की पार्टी के विडियो में भोजपुरी फिल्म के सुपरस्टार रवि किशन भी फिल्म की तारीफ़ अंग्रेजी में यूँ करते नज़र आते हैं जैसे अब उन्हें बिहारी कूड़ेदान से मुक्ति मिल गई हो और अंग्रेजी बोलकर वे जताना चाह रहे हों कि -'हे बॉलीवुड भगवान् मैंने तुम्हारे लिए ही तो भोजपुरी को माध्यम बनाया था, अब तो मेरी तरफ अपनी नज़रें ईनायत करने की कृपा करो, देखो अब तो मैं भी फर्ल-फर्ल अंग्रेजी बोलने लगा!!" जबकि इस फिल्म के निर्देशक सुजॉय घोष बिना हिचके अपने बंगाली होने के बावजूद हिंदी में ही बोलते दिखे। भोजपुरी लोक गीतों की गायिका कल्पना ने नाम-मशहूरियत-दौलत से मालामाल होने के बाद जब अपना पहला इंटरव्यू दिया तो कैमरे को देखते ही उनकी भंगिमा बदल गई, जैसे उनका पुराना गुलाम रहा हो। फिर जब सवाल पूछे गए तो उनके मुँह से अंग्रेजी की धार फुट पड़ी, यूँ बोला कि मडोना को मुँह चिढा रही हो। _हैं न अंग्रेजी की महीमा?

अंग्रेजी जानना और बोलना कतई बुरी बात नहीं, न ही मैं इसके खिआफ़ किसी प्रकार का जिहाद कर रहा हूँ। मैं सिर्फ अपने 'नायकों', भले चाहे वो किसी भी फील्ड के हों, सिर्फ ये गुजारिश करना चाहता हूँ कि वो हिंदी की नाकद्री और उपेक्षा बंद करें। इसी विषय मैंने कुछ लिखा है; जिसे मैंने "क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"/facebook  के साथ शेयर किया :>>
"क्रांतिकारी सोच जो लोगो का स्वाभिमान जगा दे"
"जो लोग अंग्रेजी बोलने से खुद को विद्वान मानते हैं और हिन्दी में अपनी तौहीनी समझते हैं........वो ये जान लें कि अंग्रेज मुल्कों में Toilet साफ करने वाला भी अंग्रेजी बोलता है, अतः भाषा से किसी की विद्वता परिभाषित नही होती....
मात्रभाषा हिन्दी ही हमारी पहचान है॥जय हिन्द!"..............................................<यह मेरी नहीं क्रांतिकारी सोच की वाणी है।
मैंने जो कहा है वो निम्नलिखित है: >>>
 "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।"
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!???? अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर जिम्मेवार है उसका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन। नमस्ते महोदय !! अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे। सबसे अच्छी भाषा वो ही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है। ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।
मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable) का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो पहले अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है। मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है। अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

जय हिन्द!!!
-श्रीकांत तिवारी.
 http://www.facebook.com/krantikaribharat/posts/528588813841783?notif_t=like
राहत की बात है कि मेरे उपरोक्त लेखन को सराहा जा रहा है।
 

Thursday, January 17, 2013

सीक्रेट एजेंट के पन्नों से

सीक्रेट एजेंट के पन्नों से :>------
'फ़ौरन हाँ बोलो, बेटा। ये सोच कर फ़ौरन से पेश्तर हाँ बोलो कि जिस नौकरी ने तुम्हें कलंकित किया, वही अब तुम्हारे पाप धोएगी।'
' ...........'बाकी रही जान जोखम की बात तो जोखम कहाँ नहीं है, बेटा! जो शख्श जोखम से खौफ खाता है, उसके लिए तो हर कदम पर जोखम है। वो दरख्त परवान नहीं चढ़ सकता जिसे हर वक़्त अपने पर बिजली गिरने का खतरा सताता हो।'
'............'जो लोग मौत से डरते हैं, समझो वो पहले ही तीन चौथाई मर चुके हैं।'
'नया सूरज निकलता है तो हर कोई कहता है कि ये मेरी बाकी जिंदगी का पहला दिन है, इसलिए मैंने कुछ नया, कुछ रचनात्मक करके दिखाना है।'

"पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात; देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा प्राभात।"

'............बेटा, वो जिंदगी का सफ़र हो या जंग का मैदां; मुहाज कोई भी हो, हौसला जरूरी है।'


......जारी (Contd.)

...और मेरा निधन हो गया।

13,जनवरी-13 को मनोज भईया अपने फोन के मुताबिक ठीक साढ़े दस बजे गद्दी पहुँच गए। प्रणाम-पाती हुआ। बैठे! मित्रों, सहकर्मियों से बातें करने लगे। मुझे फुर्सत में होता देखकर बोले -'आप दो मिनट के लिए घर चले जाइये।' उनकी बात का मंतव्य समझ कर मैंने सहकर्मी-मित्रों से 'बस तुरंत आते हैं' बोल कर घर आया। भाभी ने मनोज भईया के हाथों गरमा-गरम नाश्ता भेजा था। 

17,जनवरी-13 को वीणा (मेरी धर्मपत्नी) ने मुझसे कहा कि मैं मनोज भईया वाला टिफिन उनके घर जाकर दे आउं। इसी बहाने मैंने सोचा कि चलो उधर ही डॉक्टर से मिलता आऊंगा। कफ-खाँसी से परेशानी बढ़ गयी थी। मैं अपनी मोटरसाइकल से, मनोज भईया वाला टिफिन, जिसमे वीणा ने गरम-गरम वेज-कटलेट, और तिल-ग़ुड से बनी "लाई" भरकर दिया था, लेकर निकल गया।

सभी कामों से निपट कर दवा खरीद कर मैं घर लौट रहा था। मोटरसाइकल काफी तेज़ मैं कभी नहीं चलाता। पर रेंगता भी नहीं। दुपहिया या वैन, मैं जब भी ड्राइव करता हूँ, सिर्फ ड्राइव ही करता हूँ। पूरी तरह सचेत। चौकस। अगल-बगल बे-वजह मेरा ध्यान कभी नहीं जाता। फिर भी छोटे शहरों के गलत फैशन और चलन (ऐब) से मैं भी ग्रसित हूँ। छोटे-से फासले हो या एक-दो किलोमीटर की दूरी, हेलमेट पहनने में लोगों की हेठी जो होती है। सड़क की दुरावस्था की कहानी सनातन धर्म जितनी पुरानी है। हिचकोलों को झेलते नियमित गति से मैं घर आ रहा था। दशकर्म-घाट के पास SBI मोड़ (बहुचर्चित नाम : 'भट्ठी ढलान') के पास जैसे ही मैं पँहुचा, ..... मुझे एक पुकार सुनाई दी : 

"प्रणाम भईया ....!!!"

हो सकता है वो पुकार किसी और के लिए हो। यूँ कोई भी किसी को भी पुकार सकता है। किसी ने मेरा नाम तो नहीं पुकारा था। ऐसी सोच के हवाले आम जीवन में हम कई बार दो-चार होते ही रहते है। फिर भी मुझे लगा हो-न-हो कोई मेरा ही वाकिफकार है,....जानी पहचानी आवाज़,...अभिवादन का वो ढंग,...वो अंदाजेबयां,...वो आत्मीयता...! लगा, जैसे मुझे ही पुकारा गया हो। मुझसे ज़ब्त न हो सका। और मैंने आवाज़ की ओर पलटकर देखा। यही मेरी सबसे बड़ी भूल हो गई,....आवाज़ देने वाले को पहचानने में मुझे दिक्कत हुई,...भीड़ में किसी  जानी-पहचानी सूरत की खोज में गाडी तलमलाई जिसे सँभालने में मुझसे डैड-ब्रेक लग गया,...मोटरसाइकल की हैडल मुड़ गई,...उसके पहिये खुरदरी सड़क पर डगमगाते हुए फिसले,...बैलेंस न संभल सकने के कारण मोटरसाइकल उलट गई और मुझे साथ घसीटते फिसलते हुए इलेक्ट्रोनिक-कौमियुनिकेशनस की एक दूकान के पास लगे मास्ट लाईट के सख्त स्टील के खम्भे से जा टकराई,...गिरते ही मुझे कई तरह की चोटें लगीं,...बायाँ हाथ कलाई के पास बुरी तरह छिला और ऐंठकर टूट गया,...बायाँ घुटना बुरी तरह छिल गया,... मोटी जीन्स के छिल जाने से खून बाहर टपकने लगा,... दाहिने पैर के बुरी तरह ऐंठ जाने के कारण एंडी की हड्डी टूट गई,...दायाँ घुटना टूट गया,...सिर खम्भे से टकरा कर झनझनाया,....फिर खोपड़ी चटखनेकी आवाज़, ......दर्द से मेरी रूदन और चीख,...मुँह पर भल-भल कर बहता खून,...किसी के हंसने की आवाज़,...किसी का व्यंग्यपूर्ण कथन-"ओद्दे! गीरलऊ बेट्टा! ही ही ही।",....फिर कोलाहल की आवाज़,... दूर से आती पुकार की आवाज़ ....'प्रणाम भईया!', ....फिर सब कुछ सुन्न,...आवाजें मद्धम होती दूर जाने लगीं,...मुझमे खुद की चेतना से नाता टूटता लगा,... सभी दर्दों-चोटों की पीड़ा का अहसास ख़त्म,...तेज़ रौशनी,...फिर काला अन्धेरा, ...अन्धेरा......और शांति। इतना सबकुछ होने में सिर्फ 5-सेकेण्ड लगे।

फिर?

"का होलई-का होलई!? '...के हई - के हई!? '...अईस स्साला! '...ऊंह! '...अरे बाप!" _बस सिर्फ आवाजें-ही आवाजें! किसी ने मेरे शरीर को छूना भी मुनासिब न समझा। खून-आलूदा मेरे छिन्न-भिन्न शरीर और ध्वस्त मोटरसाइकल, सबके लिए एक कौतुहल का विषय बन गया। ज़िन्दगी में किसी ने मुझे कभी भी कोई अहमियत नहीं दी, आज मेरी दुर्दशा भी लोगों के लिए एक "विषय" मात्र ही था, अहमियत तो दूर की बात है। किसी ने मुझे पहचाना भी नहीं। फिर भी किसी ने पहचाना। क्या पता शायद उसीने जिसने "प्रणाम भईया" की पुकार लगाईं थी! इस बुरी खबर को मेरे घर पहुँचने में आधा घंटा लग गया। जबकि घर अगले, मस्जिद मोड़ से आगे लोहरदगा सदर थाना के सामने ही है।

घर में हाहाकार मच गया।

इस बीच दुर्घटना स्थल पर कुछ भले लोगों ने कहीं से एक गाडी की व्यवस्था करके मुझे हस्पताल पहुंचाने का इंतज़ाम किया। घर के लोगों को पता लगा मुझे हस्पताल ले जाया गया है। जब रोते-कलपते, दहाड़ें मारते, छाती पीटते माँ और वीणा हस्पताल पहुँचीं तो उन्हें ये दर्दनाक सूचना मिली की हस्पताल लाते समय गाडी में रास्ते में ही मेरी मृत्यु हो गई थी। 

'.............................!'

अब यहाँ किसी का क्या दोष!? जो हुआ वो मेरी नीयति थी। मुझे कोई गिला नहीं।

_श्री .
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................जब मेरी तन्द्रा टूटी तो मैंने 'पुकार' को इग्नोर किया, घर पहुंचा। दवा खाई। और अपनी लिखाई-पढ़ाई में मगन हो गया। अचानक सड़क पर एक भारी गाडी के इंजन की घर्र-घर्र और उसके रपटते हुए टायरों की आवाज़ के साथ एक महीन लेकिन भयानक चित्कार सुनाई दी। मैं दौड़ कर बाहर निकला। मेरी नज़र एक सफ़ेद बोलेरो पर पड़ी जो थोडा ठिठकी, फिर उसके ड्राईवर ने गाडी भगा दी। मैं उसका नंबर न देख सका। मैंने देखा मेरे घर के सामने बकरी का एक नन्हा-सा बच्चा खून की उल्टियां करते हुए छटपटा रहा है। फिर लोग जमा होने लगे। मुझे 'वही' कुटिल हंसी और व्यंग्य सुनाई देने लगी -"चलअ! आज के मीट के इंतज़ाम तो होलई  ना!" 

गाड़ी ने बकरी के बच्चे के सिर को, गले को बुरी तरह रौंधा था। उसकी एक पिछले पैर की खुर गायब थी, अगला एक पाँव गायब था। थोड़ी ही देर में बकरी के बच्चे ने अपने ही खून के तालाब में तड़पकर दम तोड़ दिया।

...फिर? 

"का होलई-का होलई!? '...के हई - के हई!? '...अईस स्साला! '...ऊंह! '...अरे बाप!" _बस सिर्फ आवाजें-ही आवाजें!! तमाशाइयों की।

घर से कलावती दीदी निकली और लोगों को गरियाने लगी। पर किसी में कोई संवेदना नहीं थी। थोड़ी देर बाद कलावती दीदी ने उस बकरी के बच्चे के शव को हटाया और उसे मिटटी दी।
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अब आप बताइये किस प्रकार-से मेरी जान उस बकरी के बच्चे की जान से भिन्न है जिसके निर्दोष खून से अभी भी मेरे घर के सामने की ज़मीन रक्तरंजित है? वो निश्चय ही मेरी मौत थी जो गलती से उस बकरी के बच्चे को लील गई! आज मौत देखना मेरी नियति थी जो कि मैंने देखि!
*"सत्य कथा"*

_श्रीकांत .

Wednesday, January 16, 2013

हीईईयाआह !!! सु-स्वागतम! जी आया नूं ! पैरी पौना जी! जी सर!पाठक सरजी ! पधारो जी! सादर प्रणाम!
हह:!हह:! हह:!
अब मुझे लगता है कि थोडा रूक जाना चाहिए! रूककर थोड़ा आत्मविश्लेषण जरूरी है।



'चल भई ! सीक्रेट एजेंटाँ !! तेरी रोटी-शोटी करिए।'
'.............!!!'
_श्री .

हर कोई इसे पढ़े।

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जब भारत में 'डर्टी पिक्चर' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा तो बलात्कारियों का तो हौसला और बढ़ेगा..............

सनी लिओन जैसी विश्व वेश्या को भारत में जब अतिथि बनाकर लाया जाएगा तो माँ बहिन बेटियों का सामूहिक बलात्कार ही होगा। समस्या बलात्कार की बस एक तरीके से खत्म होगी अश्लीलता बंद और मौत की सजा।

देश की समस्या है पश्चिमी अंधानुकरण ::
पश्चिमी सभ्यता का परित्याग ही भारत को बचा सकता है। जो लोग टीवी और फिल्मों मे नग्नता फैलाते है वे फिर सेक्यूरिटी लेकर क्यूँ घूमते हैं ? इन लोगों की नग्नता फैलाने की सजा बेचारी हमारी आम माँ बहन बेटियो को भुगतनी पड़ती है। परेशानी है तो गाँव से शहर और शहर से घर से बाहर जाने वाली आम माँ बहन बेटियों को.....बलात्कारी उन माँ बहिनो मे ही सनी लिओन ढूंढते रहते है और मौका पाते ही बलात्कार कर देते हैं।

अब सनी लिओन और बॉलीवुड की बालाएँ तो हाइ सिक्यूरिटी ज़ोन में रहती हैं सड़कों पर तो हमारी माँ बहनें जाती है ............. इस अश्लीलता का सम्पूर्ण त्याग ही भारत मे सदाचार की गंगा बहाएगा।



मेरा उत्तर :
http://www.facebook.com/krantikaribharat/posts/527080797325918?comment_id=5960113&notif_t=feed_comment

आज गालो मुस्कुरा लो

'आज गालो मुस्कुरा लो महफ़िलें सज़ा लो, क्या जाने कल कोई साथी छूट जाए, जीवन की डोर बड़ी कमज़ोर! ...यारों !!'

मेरे बच्चों अगर आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हो तो तुम्हें भी उसी अहसास का अनुभव होगा जो मैं अभी अनुभव कर रोमांचित हो रहा हूँ। दोस्ती बड़ी अनमोल होती है, बचपन की निश्छलता जिसे सींचती है, इसकी कदर करना। आज तुम लोगों की और तुम्हारे दोस्तों की हमें ज़रुरत है। हमें भी अपना दोस्त समझो।

बचपन को याद करो! उन साथियों और उनके साथ धूल-मिटटी में खेले लम्हों और उस वक़्त के दौर को याद कर के उसके अलौकिक सुखद पलों को महसूस करो।

दीदी से बचपन की कहानियां सुनना! बाबूजी की मौजूदगी का स्नेहिल सुख! बाबूजी की कहानियाँ! वो लोरी! वो उनका गोद में लेकर प्यार से पीठ थपथपाना...........! बाबूजी के साथ गाडी में बैठकर सपरिवार गाँव जाना! रास्ते में पड़ते खूबसूरत नज़ारे! रेलगाड़ी की पहली सवारी। घर में जब पहली बार रेडियो, पँखा और साइकल आया था...! पहली बार कूकर की सीटी पर हमारा गिरते-पड़ते भागना! निश्छल हँसी के वे प्यारे-प्यारे पल ! कितना रोमांच है इन यादों में !! ..है न?

बचपन से ही देश एक प्यारा सा घर लगता है। हर कोई अपना-सा लगता है। देशभक्ति गीतों और फिल्मों की वीरतापूर्ण सुनहरी याद का रोमांच! फिर अपना शहर! अपना मोहल्ला! मोहल्ले की हर गलियां! हर मैदान! हर खेत! हर दोस्त! और हमारे खेल, .....हर वक़्त हीरोइज्म के ज़ज्बे से भरे!! कोई धर्मेन्द्र बनता! कोई राजेश खन्ना तो कोई प्राण! कोई महाबली दारा सिंह ! कोई देव-आनंद ! कोई अमिताभ! तो कोई अजीत! तो कोई अमज़द खान! तो कभी काऊबॉय फ़िरोज़ खान!! कॉमेडियन की नक़ल! कोई सैनिक कोई सिपाही तो कोई इन्स्पेक्टर, कोई विलेन,( ...जानबूझ कर उसे बनाते थे जिसे पीटने का खूब मन करता था). रेडियो में बिनाका गीतमाला सुनने के लिए सिलोन को ट्यून करने की टेंशन! पसंदीदा गाने के जीत की ख़ुशी! ...'बिंदिया चमकेगी..........!!!'  उस वक़्त पूजा पंडालों में बजते फ़िल्मी गाने और डायलाग पर यह बहस करना कि कौन-सा  गाना या डायलाग ज्यादा हिट रहा।

रफ़ी साहब के गीत -' ये रेशमी जुल्फें ...!' महेंद्र कपूर साहब की ओजस्वी आवाज़ -'.....मेरे देश की धरती ...!' मुकेश साहब की मखमली आवाज़ -' दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पर क्या गुजरी है ...!' सुनील दत्त साहब का गाना और उनका शानदार परफॉरमेंस -' न मूंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।' 'राजकुमार साहब का गाना -'हे!नीले गगन के तले, धरती का प्यार फले!' शशि कपूर साब की -'हे!नि सुल्ताना रे, प्यार का मौसम आया!' जितेन्द्र जी की -'अरे हो!...गोरिया कहाँ तेरा देश रे!...', -आने से उसके आये बहार, जाने से उसके जाए बहार,.....बड़ी मस्तानी है,.....मेरी महबूबा!' राजेन्द्र कुमार जी की "गोरा और काला!"_और उसके गीत! वाह..वा!!" धरम-पा जी की "आदमी और इंसान" के गाने -'जागेगा इंसान ज़माना देखेगा ...!' ... -' दिल करता! ओ यारा-दिलदारा मेरा दिल करता।' 'प्रेम पुजारी में -'ताक़त वतन की हमसे है!' में देव साहब की जोशीली चाल और वीर जवानों की कदमताल !! वाह वा!! दिलीप साहब की -'मधुबन में राधिका नाचे रे !'[ _इस गाने को हमारे बचपन के साथी-पडोसी-बड़े भाई अलोक भईया आज भी रफ़ी साब की हू-ब-हू नक़ल कर सुनाते हैं।] दिलीप साब की -'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का,...', -'रामचंद्र कह गए सिया से!' दिलीप साहब की मस्ती -'मेरे पैरों में घूँघरू पहना दे तो फिर मेरी चाल देख ले!' धरम पा जी की अनमोल एस्पियोनेज फिल्म-"आँखें", जो आज भी प्रासंगिक है। "शोले" की अमिट-अमर याद! "डॉन" का -'खई के पान!'...'अमिताभ बच्चन का शेट्टी का मुँह चिढाना -' अबे ओ गंजे ,....!!!' मन्ना-डे साब का अमर गीत, अमित जी की मासूम हंसी और प्राण साहब का डांस-'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी!' मन्ना-डे साब का -'ओ मेरी ज़ोहराज़बीं!' बलराज सहानी जी को .._जे मैं भूलूं ते दुर्र फिटे मूं !!


लुका-छिप्पी! गिल्ली-डंडे से लेकर क्रिकेट के मैच में जीत की हिप-हिप-हुर्रे! पतंग उड़ाना और कटीपतंग को लूटने में जांबाजी और मारामारी। कंचे (अंटा) का खेल! कब्बड्डी!बैडमिन्टन! लूडो! लट्टू! कैरम! तालाब में दोस्तों के संग अठखेलियाँ!! बगान से माली का खदेड़ना! स्कूल की घंटी। छुट्टी की चिल्ल-पाँव!! मास्टर साहब की छड़ी! उनका-(हमारा)- कान खींचना! हमारा मूँह बनाना! इतिहास-भूगोल, गणित और विज्ञान की किताबें! हिंदी पुस्तकों की कहानियां और दोहे! कभी परीक्षा की टेंशन! कभी रूठना-मनाना! सिनेमा की टिकट की जंग में शरीक होना! त्योहारों की धूम! होली-दीवाली-दशहरे के अनमोल क्षण! कॉमिक्स का मज़ा!!.........वा वा !!!

वह ज़िन्दगी जहाँ छल-कपट से भरी गन्दी इंसानी फितरत के लिए कोई जगह नहीं।

सबसे बढ़कर देशप्रेम का वो ज़ज्बा जिसकी रोमांचक मौजूदगी की वजह से आज भी हम सदा अंग-संग हैं।

भगवान् करें इसे किसी की बुरी नज़र न लगे।

_श्री .

Tuesday, January 15, 2013

युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए

जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!

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जो लोग पाकिस्तान के साथ युद्ध चाहते है वो लाइक करे

जो पाकिस्तान के साथ अमन (शांति )चाहते है वो कमेन्ट करे

मै तो युद्ध ही चाहता हु किउ की एक बार तो पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाना ही पड़ेगा और बताना पड़ेगा की हम हिन्दुस्तानी शेर है
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  • Abhay Marodia agaami 2 saal ke liye shanti
  • Pradeep Patel war achi chiz nhi h......bahut kharab chiz h....bahut jyda
  • Shrikant Tiwari जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!
    _श्रीकांत तिवारी .

"सीक्रेट एजेंट" और मेरी बेचैनी !

            अब से 12 साल पहले एक थ्रिलर उपन्यास पढने को मिला था: "दहशतगर्दी"! इसमें लेखक ने कारगिल युद्ध में पराजित पाकिस्तान, पाकिस्तानी सेना, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों, दहशतगर्दों की खीज से पैदा हुई भारत विरोधी षड्यंत्र की (काल्पनिक) कथा कही थी। इसकी कहानी में लेखक ने कट्टर और दुर्दांत दहशतगर्दों की विकृत, घातक और भारत विरोधी मानसिकता का अत्यंत ही रोमांचक किन्तु सच्चा चित्रण किया था। इसमें इन दहशतगर्दों की सलाहियत (सम्पन्नता, पहुँच तथा दबदबे), और अंतर्राष्ट्रीय रूप से फैले इनके खतरनाक-व्यापक-अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क और दहशतनाक मंसूबे की व्याख्या एक भारत विरोधी आतंकवादी हमले के रूप में की गयी थी जिसके कामयाब हो जाते ही वे कारगिल जैसे कई और हमले समूचे भारत में अंजाम देते। इन आतंकवादियों (दहशतगर्दों) की मानसिकता का ऐसा सटीक चरित्र-चित्रण इस उपन्यास में बेमिसाल है जो कहीं, किसी और दुसरे माध्यम से, उपलब्ध भी नहीं है। इसलिए इस उपन्यास को अंग्रेजी शब्द के मुताबिक "यूनिक / एक्सक्लूसिव" कहा जा सकता है। और अपनी भाषा में "दुर्लभ!"

इस उपन्यास में एक ऐसे रेलवे ट्रैक की कल्पना की गयी है हो जो रेलवे लाइन के ज़रिये कोलकाता (इंडिया) को ढाका, मयांमार (कुवालालंपुर) होते सिंगापूर से जोडती है। इस ट्रैक पर एक बहुत ही फैंसी खूब सुविधा-संपन्न महँगी ट्रेन "कॉन्टिनेंटल एक्सप्रेस" चलती है। जो दहशतगर्दों का निशाना है। एक ख़ास विशेषता इस उपन्यास में यह है कि इसमें कोई भी किरदार फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं है। ...बाकि इसमें पढ़ लेने का कष्ट करें।

 [उदयन जी और रिम्पी! अगर आपलोग इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं तो आपके लिए एक मनोरंजक सूचना है: इस उपयास "दहशतगर्दी" में आपके शहर 'कुल्टी' का जिक्र है। इस उपन्यास में जिक्र है (काल्पनिक कथ्य को बल देने के लिए) कि कुल्टी में एक लास-वेगास स्टाइल कैसिनो है! जहाँ एक "हाई -वोल्टेज" सस्पेंसिव-ड्रामा, एक्शन-पैक्ड फाइट होता है। इस कैसिनो से आगे अमेरिकन कांस्युलेट का एक बंगला भी दर्शाया गया है। रिम्पी तो मेरी उपन्यासों की लाइब्रेरी में से कई बार, कई किताबें इन लेखक महोदय की लिखी पढ़ चुकी है। पर इसे नहीं पढ़ा। रिम्पी ने शायद "कोई गवाह नहीं" भी पढ़ा है, और उसने लेखक महोदय के लेखन की तारीफ़ भी की थी ' ...बाप रे ...! मामा! ...सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हो रहा है, ...कहीं-कहीं खूब डर लग रहा है ...!!']

'दहशतगर्दी' जैसा कथानक फिर पढने को नहीं मिला। लेखक महोदय ने खुद ये घोषणा कर रखी है कि वे करंट-अफेयर्स, ऐस्पियोनेज जैसी विषयों से परहेज करते हैं। वे रहस्य कथा, जिसे वो अपनी जुबान में "हूडनइट्स" कहते हैं, लिखने में ही सहज फील करते हैं।

मेरे इन प्रिय लेखक महोदय को ईश्वर ने भविष्य में झाँक लेने की ऐसी दिव्य दृष्टी दी है, जिसे अपनी महानता के कारण भले वो इनकार करें, कि उनके लिखे पूर्ववर्ती उपन्यासों जैसी-ही कुछ दुर्घटनाएं आजकल घटित हो रही है। दिवंगत 'दामिनी' की घटना ऐन उनके लिखे उपन्यास (20-22 साल पुराने) "जहाज का पंछी" की याद दिलाते है। यह कथानक लम्बी (3-भागों में) है। जिसका नायक ऐसा है जो आज आम आदमी की कल्पनाओं में जी रहा है, ताकि वो हक़ीक़तन प्रकट होकर बालात्कारियों को उनके किये ज़ुल्म की सजा दे सके, खोखले सरकारी तरीके से अलग मजलूम को चैन दिलाने वाले तरीके से सजा दे सके, जिससे मजबूर और कमज़ोर मजलूम को इस ताक़त का अहसास हो सके कि वे इस नायक की मौजूदगी के जेरेसाया सुरक्षित हैं! कई लोग ऐसी फरमाइश कर चुके हैं कि इस विषय को फिर कथानक का मुद्दा बनाया जाय। इस नायक "विमल" की एक सीरिज़ है जो अब तक (लेखक महोदय के 50-साल के लम्बे अदभुद लेखन काल में) कुल 41-उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इस नायक का पहला उपन्यास 'मौत का खेल' 1971 में (कीमत 2/-रुपये में) प्रकाशित हुआ था। इनके लेखन में चार भाषाओं का मनोरंजक सम्मिश्रण होता है, जिन पर इनकी खूब पकड़ है- 'हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी। मुझे यकीन है कि रहस्य कथा के प्रेमी जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे है लेखक महोदय को सहज ही पहचान चुके हैं। वैसे हम रहस्य कथा के प्रेमियों को रहस्य को रहस्य रखना बाखूबी आता है। पर यहाँ लेखक महोदय का नाम लेना कोई रहस्योद्घाटन नहीं करता।

जी हाँ! यकीनन मैं हरदिल अज़ीज़ श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक की बात कर रहा हूँ। जिनके लेखन का मैं वैसा ही दीवाना हूँ जैसे अमित जी, धरम पा जी और दिलीप साहब का।

"दहशतगर्दी" के यहाँ जिक्र की वजह है। पाठक सर का 2012 दिसंबर में प्रकाशित नया उपन्यास "सीक्रेट एजेंट"! इस उपन्यास के नाम से ही मुझे रोमांच हो रहा है,.....क्या ये दहशतगर्दी जैसी इंटरनेशनल ज़मीनों को जोड़ने वाली कहानी है!?...........क्या ये "Espionage" है, किसी Spy की कथा करेगी!?...........लेकिन पाठक सर के आजतक के लेखन इतिहास को याद करता हूँ तो ये शंका होती है कि 'टॉप-सीक्रेट' नाम के उपन्यास ने भी यूँ ही मुझे सताया था, जो सुनील सीरिज़ का था। काफी मनोरंजक होने के बावजूद  कथानक Espionage कतई नहीं था। पाठक सर की जुबानी "हूडनइट्स" था। इसी उपन्यास में सुनील को अपनी फेमस मोटरसाइकल  20-हॉर्स पॉवर की "एम.वी.अगास्टा-अमेरिका" सेठ उत्तम्चंदानी से हासिल हुआ था, जिसके बारे में सुनील का सदा शराबी पंजाबी यार रमाकांत (मीना मर्डर केस में) खूब तारीफ़ किया करता था जिसकी उस समय (1975-1080) में 80,000/रू कीमत थी।

आज मैं अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बेचैन हूँ। पाठक सर का नया उपन्यास थ्रिलर "सीक्रेट एजेंट" राँची में परसों ही खरीद लिया गया है, जिसे आज धीरू लेकर आने वाला है। बदमाश कल से ही कल-कल-कल कर रहा है, फोन रिंग हो रहा है पर उठाता नहीं। रिम्पी सहज ही मेरी बेचैनी का अंदाजा लगा सकती है। लो जी फोन लगा :- '_उं!.......हाँ!. हलो! .......आएँ!.....आज साढे आठ बजे?....साँझे के !!......शाम में!!?'......अच्छाह!

.7:18PM अभी-अभी घर आने पर पता चला कि धीरुवा अब कल-बिहाने आवेग। क्यों? ट्रेन छुट गई!
'..........दुर्र फिटे मूं !"


_श्रीकांत .

Sunday, January 13, 2013


मेरे पूरे परिवार एवं सभी मित्रों को मकर-संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!


_श्रीकांत .

श्री हनुमान जी का यह दुर्लभ चित्र

"मंगल मूरति मारुती नंदन,
सकल अमंगल मूल निकंदन।
पवनतनय संतन हितकारी,
ह्रदय विराजत अवधबिहारी।।"
न जाने कई वर्षों से श्री हनुमान जी का यह दुर्लभ चित्र (No.1)हमारे घर में स्थापित है। कई लोग पूछ चुके हैं-'ये कौन है? आपके दादाजी?' हम उत्तर देते हैं कि -'जी हाँ! बाबूजी के पुराने बुजुर्ग हैं, नाम हनुमान तिवारी है।'

दिखने में ये हमारे अपने बुजुर्ग अभिभावक ही दिखते हैं, जो श्रद्धा से मगन होकर रामायण का पाठ कर रहे है। दरअसल भगवान् श्री हनुमान जी का यह अद्वितीय दुर्लभ सजीव चित्र/विग्रह/मूर्ती भारत में कहाँ स्थापित है, हमें नहीं मालूम। कुछ लोगों ने कयास लगाया कि शायद यह गीता प्रेस, गोरखपुर (यू.पी.) स्थित एक मंदिर में स्थापित हनुमान जी की मूर्ती की तस्वीर है। कुछ लोगों ने कहा यही हनुमान जी की असली फोटो है।जो हो, अब तो ये मेरे परिवार के लिए एक पूर्वज की तरह आदरणीय हैं। हम तो अब इनकी ऐसी उपस्थिति के इतने आदि हो चुके हैं कि इनपर ही हमारी निर्भरता है। पारिवारिक तस्वीरों के साथ ही यह चित्र घर में यूँ लगा हुआ है कि ये निश्चय ही घर के बुजुर्ग और मुखिया लगते है।(No.2)
गीताप्रेस से प्रकाशित होने वाली पत्रिका "कल्याण" बाबूजी की पुरानी सदस्यता के चलते घर पर आती थी, उनमे से एक में मैंने सेम-टू-सेम यही तस्वीर, एक चित्रकार द्वारा बना छपा पाया था। पर वह साफ़ पेन्सिल वर्क था। हनुमान जी की पूजा-आराधना के लिए दूसरी, पारंपरिक तस्वीरें हैं। जैसे ये :(No.3)


।। हँ हनुमते नमः।।

_श्रीकांत .

Saturday, January 12, 2013

हनी सिंह की नहीं सुभद्रा कुमारी चौहान की आवश्यकता है

पकिस्तान की आलोचना के बीच अपने देश के भीतर नासूर की तरह पकते, फलते-फूलते नक्सलियों के द्वारा वीरगति को प्राप्त हमारे एक जांबाज प्रहरी के शव में जिंदा बम प्लांट करना क्या उस तालिबानी बर्बरता से कम है जिनके कारण मानवता शर्मसार होती है? इन विचलित कर देने वाली बर्बर घटनाओं के कारण 'दिवंगत "दामिनी" की चीख' कहीं दब नहीं गई? ..........ज़रा सोचिये ..., क्या कोई सियासत की चालबाजी है या सच में अब आदमी आदमखोर बन गया है? सरकार की क्षमता नक्सलियों के आगे अगर इतनी ही पंगु है, तो फिर सीमा की सुरक्षा की सोच कर क्या रूह नहीं काँप जाती? सरकार का यही रवैया रहा तो भगवान् न करे, हमें काफी दुःख-दंष झेलने पड़ेंगे .....! -यह एक आम आदमी की चीख है .........कोई सुन रहा भी है या नहीं?

आज देश को हनी सिंह की नहीं सुभद्रा कुमारी चौहान की आवश्यकता है। ........वंदे मातरम !!

_श्री .

Swami Vivekananda ‎(Today Swami Vivekananda's 150th Birthday) 1863-2013

आज हमारे शहर लोहरदगा में अभूतपूर्व मनभावन दृश्य देखने को मिला। खुद को डॉक्टर से दिखाना था क्योंकि मुझे ठंढ लग जाने के कारण छाती में कफ जम जाने से जब खाँसी उठती है तो थमने का नाम नहीं लेती। कई रातों से ठीक से सो भी नहीं पाता, जोर से हंसने या साँस लेने पर खूब जोर से खाँसी होने लगती है, हाल बे-हाल हो जाता है।
मोटरबाइक से डॉक्टर के यहाँ जाने को निकला तो घर के निकट थाना टोली मस्जिद मोड़ के पास भारी जाम लगा मिला। कुछ सोच कर मैंने शॉर्टकट रास्ता पकड़ा और एक गली से होते न्यू रोड जाना चाहा तो मेनका सिनेमा, देवी मंडप के पास गली के मुहाने पर भी भारी जाम मिला। यहाँ जाम का कारण पता चला। मौका था पूज्यनीय स्वामी विवेकनन्द जी के 150वीं जन्मोत्सव का। विभिन्न स्कूलों के बच्चों की सामूहिक जुलूस और झाँकी गुजर रही थी। अपने-अपने स्कूल-यूनिफार्म में सजे बच्चे-बच्चियाँ हाथों में तख्ती और बैनर लिए स्वामी जी के सम्मान में जयघोष करते जा रहे थे। जुलूस की लम्बाई और छात्र-छात्राओं की संख्या बेमिसाल थी। जुलूस इतनी लम्बी थी कि थाना टोली से लेकर न्यू रोड होते स्टेडियम तक पहुँच रही थी। जुलूस के सम्मान में हर सड़क हर मोड़ पर ट्रैफिक थम गया था। पर कहीं कोई जल्दीबाजी या बेचैनी नहीं बल्कि उत्सुकता, प्रसन्नता और गर्व से तमतमाते चेहरे रोमांच पैदा कर रहे थे। खूबसूरत झाँकी में कोई बालक विवेकानंद बना मुस्कान बिखेर रहा था।  कोई स्वामी जी द्वारा शिकागो में दिए लोकप्रिय भाषण के अनुवाद को पढ़कर सूना रहा था। वाह! मन झूम गया। झाँकी के पीछे चलते बच्चों की लम्बी लाइन संयमित और उत्साहित हो नारे लगा रहे थे। उनके शिक्षकगण जुलूस को भली-भाँती कंडक्ट कर रहे थे। इस समय मैंने अपने कैमरा को बहुत मिस किया। फिर मोबाइल की याद आई जिसमे छोटी MgP की सही पर कैमरा है। मैं भीड़ में थोडा-थोडा कर किसी तरह न्यू रोड पर पहुंचा। वहाँ का नज़ारा और भी मनभावन था। जुलूस को निकल जाने देने के लिए सड़क के हर तरफ हर प्रकार के दुपहिये-चौपहिये वाहनों की असंख्य कतार लगी हुई थी जिसे बड़ी मुस्तैदी से टैफिक पुलिस संभाले हुए जुलूस को बढ़ते जाने का निर्देश दे रही थी। मैंने फिर कोशिश की। और खिसकते-खिसकते न्यू रोड स्थित अपने बाबूजी द्वारा निर्मित हमारे मकान पर जा पहुंचा। मैंने तुरंत मोटरबाइक को मकान के ओटे पर चढ़ा कर खड़ा किया और सीढियां फलांगते सबसे ऊपर खुले छत पर जा कर देखा तो कई तरह के पेड़ों और दुसरे मकानों की ओट हो जाने के कारण दृश्य बाधित लगा। तभी सामने की छत पर से भईया "व्यास जी" की पत्नी "भउजी" ने मुझे देखा और अपने छत पर आने का इशारा किया। पर भीड़ के कारण यह हो न सका, और झाँकी करीब पहुँच चुकी थी। मैं एक मंजिल नीचे उतरा और सड़क के सामने वाले बरामदे पर पहुंचा। वहां काफी लोग जमा थे। वहां से मैंने जुलूस और झाँकी की कुछ तस्वीरें लीं, पर मुझे तसल्ली नहीं हुई। मैं नीचे उतर कर अपनी बाइक के पास खड़ा हो कर तस्वीरें लेने लगा। पर मोबाइल ने ठीक से परफोर्म नहीं किया। दुसरे जेब से दूसरा मोबाइल निकाला और उसी के कमज़ोर अधमरे कैमरे से जितना सुलभ हो सका तस्वीरें लीं। पर जो नज़ारा मैं अपनी आँखों से देख सका उसके लिए "खाँसी बाबा" की जय!!











जुलूस के निकल जाने और ट्रैफिक के सामान्य होने पर मैंने पाया कि अब डॉक्टर के यहाँ न जा सकूँगा। सो, खांसते हुए घर वापस .......  


_श्री .

हमारी एक ''पृथ्वी'' या "अग्नि" ही काफी है तुम्हारे सारे वजूद के लिए......आ ...!

जितनी मेरी उम्र है उसे मैंने पाकिस्तान की मुखालफत में ही देखा ! कभी किसी व्यक्ति विशेष की मुखालफत के रूप में। तो, कभी किसी राक्नीतिक दल की मुखालफत के रूप में ! तो कभी समूचे देश की मुखालफत के रूप में !!! क्या ये मेरी गलती है ? ..क्या किसी अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तिविशेष की गलती है? क्या ये, ...फिर, किसी  राजनीतिक दलों की गलती है? या फिर देश की सोच-समझदारी की ही गलती है जो हर कोई पाकिस्तान की मुखालफत ही देखता है? इसके बाद बाकी के दुसरे अमेरिका, इंग्लैंड और बाकी के पूरे विश्व  के देश भी पगला गए हैं!? इतने लोग, इनके देश और इनकी जनता क्या पागल और हिंसक हैं!!!!? या .. रे ... रे ... रे पाकिस्तान तेरी ही गलती है?  ऐसा ही है, तो फिर भीड़ जा न! दुमुंहें साँप!! दोगली मानसिकता में दीवाने पकिस्तान! आ न !! खुलके आक्रमण की घोषणा कर ! कमीने , कायर ! स्साले !! हमारी एक ''पृथ्वी''  या "अग्नि" ही काफी है तुम्हारे सारे वजूद के लिए..................आ ...!

जय हिन्द !!!

चमरराम के फूल, और हमारे प्रिय,मंझले, इंजिनियर साहब

 आज के दिन सन 2013 में मेरे घर में पहली बार पूजा-अर्चना और शंखनाद हुआ। ईश्वर का लाख-लाख शुकर। आज ऑफिस में चमरराम ने मुझे, अपने निश्छल प्रेम के रूप में कुछ फूल दिए। ये मेरे परिवार के लिए है,जो आपलोग हैं। सन्नी ने इस पल को संजोने का काम किया। फिर सन्नी ने खुद, मेरे संकलनों में से, "अमर चित्र कथा" छाँटकर निकाला और जाड़े की स्निग्ध धूप में बैठ उसका रसास्वादन करने लगे। देखिये मेरे चमरभाई को, उनके उगाये फूलों को, और सन्नी [हमारे प्रिय,मंझले, इंजिनियर साहब] को "अमर चित्र कथा" पढ़ते हुए.........मलुवा नीचे बैठी है, उसके बच्चे दूध पीने की होड़ में ..........!











_श्रीकांत .

Wednesday, January 9, 2013

मेरी सेंचुरियन नानी

परपोते-परनाती ध्यान दें :
सीरिकंतवा (श्रीकांत) अबहीं ले ना आइल !? .......नानी। मेरी नानी। कितनी उम्र होगी इनकी? ...ये अंदाजा गलत होगा, इसलिए यह गणित छोड़कर मैं अपनी नानी को अब सेंचुरियन नानी बोलता हूँ। कल दोपहर को उसके पास बैठकर भोजन के दरम्यान मैंने नानी से कहा था कि -'नानी हमारा साथे फोटो खिचावैयेबे नुं? अभी कैमरा नईखीं ले आइल, काल्ह ले के आइब, तइयार रहिहे। तोर फोटो खिंचब। ठीक नु?'
नानी उसी शाम से खुद बाल संवारकर तैयार बैठ गई। मामा-मामी बोलते रहे कि फोटो अगले दिन खीचने के लिए श्रीकांत आवेगा, पर रह-रह कर बात भूल जाने वाली मेरी नानी ने जिद्द पकड़ ली और गुस्से में मुझे बुलाने को कहने लगी -' बोलावअ ओकरा के उ कहलक ह कि हमार फोटो खींची, त अबले आइल काहे ना?' यूँ ही नानी ने किसी को अपने बाल छूने नहीं दिए कि -'अरे रहे ना द, फोटो नू  खिचावे के बा!'
आज सबेरे ऑफिस (गद्दी) में मामा का फ़ोन आया तब हँसते हुए ये बातें बता कर उन्होंने कहा कि मैं नानी से किया अपना वादा पूरा करूँ अन्यथा नानी तंग करेगी। सो, आज दोपहर मैं अपनी सेंचुरियन नानी के पास पहुँच गया _मुझे आया देखकर नानी नन्हें बच्चे की तरह प्रसन्न हो गई ... नानी ने तेल मांग कर बालों में लगाया, फिर उनकी जिद्द के बावजूद मामी ने उनके बाल सँवारे, और फोटो खिचना चालु _

















(...जाड़ा तो है ही, मैंने मुंडन करवाया है इसलिए भी टोपी...!) मैंने फोटो उसके ओरिजिनल साइज़ से छोटा करके पोस्ट किया है।

_श्रीकांत >