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Thursday, January 3, 2013

एकला चोलो रे


सादर नमस्कार,

एसएमपी पेज पर अपने ब्लॉग का लिंक पोस्ट करने वजह ये थी कि एक बार वो लेख "सूरज और प्रहरी" को पोस्ट करने बाद मैंने पाया कि उसमे कई जगह उच्चारण/स्पेलिंग गलत टाइप हुआ था। उसे फिर से सुधार करते वक़्त कई और उम्दा नुक्ते जेहन में आये, जिन्हें मैंने उसमे जोड़ा। इससे लेख का आकार कुछ बढ़ गया। इसी तरह जब उसे एसएमपी पेज पर सुधारना चाहा तो वैसे विकल्प "Edit Post" को मैं न पा सका, सिर्फ ""डिलीट"" ही आप्शन है, जिसके वजह से मैंने ब्लॉग के लिंक को ही पोस्ट कर दिया। हाँ! मेरे से ये गलती हुई कि पोस्ट्स मैंने 4 जगह दाल दी। बस यही बात है। इसके पीछे मेरी कोई दूसरी मंशा नहीं थी।

इस ग्रुप को ज्वाइन करने पर फील हुआ था कि अब दिल्ली में मेरे ढेर मित्र-साथी और दोस्त हैं, जो कभी मैं माता वैष्णौ देवी की यात्रा के निमित्त दिल्ली जाऊँगा तो उनके ही साथ रहूँगा, वे ही मुझे अन्यत्र न जाने देंगे, किसी होटल की जगह अपने साथ होने को कहेंगे, बल्कि जिद्द करेंगे, रमाकांत की तरह -' गोल्ली किदि ते गहने किद्दे'- कह कर अपने साथ ले जायेंगे और वो हर काम करेंगे जो एक दोस्त ही दोस्त के लिए कर सकता है।

माफ़ कीजियेगा, अफ़सोस कि ऐसा हो न सका।

मैं ये ग्रुप छोड़ना चाहता हूँ। सेल्फ क्विट करने की सुविधा होती तो मैं यह कष्ट भी आपको न देता। कृपया मुझे तत्काल प्रभाव से इस ग्रुप की सदस्यता से हटाने की कृपा करें। इसे मेरा फाइनल और अंतिम निर्णय समझें। इस विषय में कोई दूसरा विकल्प विचारणीय और वांछनीय नहीं है।

अलविदा।

_श्रीकांत .

ps : मेरे उपरोक्त मेसेज के उत्तर में सेल्फ क्विट का तरीका बताया गया; मैंने एसएमपी ग्रुप छोड़ दी है। आज बड़ी राहत, सुकून और हल्कापन महसूस कर रहा हूँ। मुझे ख़ुशी है।


******आगे मेरे आंसू ...
मेरी गलती थी।

मुझे इसका भान तक न हुआ कि मेरी इस कदर उपेक्षा की जायेगी। इंसान की इन्सानी फितरत से अंधी होकर आत्मसम्मान की भावना, कब विकृत होकर स्वाभिमानी से किस कदर अभिमान में बदल जाती है, फिर मित्र भी अचानक हमलावर हो जाने को विवश हो जाते हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मुझे मिला। जहां मौजूद हर कोई खुद को दुसरे से ज्यादा, बहुत ज्यादा होशियार और दानिशमंद समझता है। जहाँ पहले से मौजूद सभी नहीं पर कुछ बंदे, मंच के मठाधीश, जो सभी बावन गज के है, जिनके हाथ में हमेशा हंटर है, क्योंकर अपने आगे किसी और को पनपने देंगे भला! यह भी मुझे सोच लेना चाहिए था। मैं बहुत एहसानमंद हूँ इस मंच के मठाधीशों का जिन्होंने मुझसे 'मेरा' परिचय करा दिया। तहे दिल से शुक्रिया।

एक सलाह में मुझे बताया गया कि इस प्रकार के मंचों, फोरम, पर "मेरे जैसे लोगों" के लिए कोई जगह नहीं है। 'मेरे जैसे लोग!!" _सड़कछाप ! _मजदूर-क्लास ! _समाज के बहिष्कृत, तिरस्कृत ! ...क्या, कैसा ??? जिनकी यही पहचान है कि वो अपने ही जैसे किरदारों की किरदारनिगारी से अभिभूत होकर किरदार के रचयिता को अपना मसीहा समझ लेने की भूल, भयंकर भूल, एक अक्षम्य अपराध कर बैठते हैं, और उमंग में अपनी भावनाएं बांटने की कोशिश करते है!? शायद हाँ। तब हंटर की फटकार सीधे मेरे मुँह पर पड़ती है और हंटर वाले भैया, जिनका एलीमेंट्री कैनाल उल्टा होता है, अपने जेहन का मैला अपने उदगार "-गाली-" से व्यक्त कर अपनी कुसंस्कृत प्रवृत्ति और व्यक्तित्व का परिचय, फिर से कराते हैं।

होना तो ये चाहिए था कि पहले ही दिन मुझे चेतना आ जाती। पर मैं ऐसा खुशकिस्मत कहाँ! मेरी महत्वाकान्छायें ही मेरी दुश्मन हैं। जितनी बड़ी उम्मीद होती है उतनी ही बड़ी निराशा मिलती है। इज्ज़त के बदले गालियों और कोसनों से नवाज़ा जाता है, वही गालियाँ जो जेहन में आ तो जातीं हैं पर मैं व्यक्त नहीं करता, ये मेरे संस्कार का असर है या भय का मुझे पता नहीं।

विडम्बना देखिये : अपने रचे किस्से में जैसे किरदार रचते हैं और वाहवाही बटोरते हैं, वैसे लोगों से उन्हें हकिक़तन खुद घिन्न आती है! ये प्रपंच एक कटु सत्य है, इसपर भी ये कथा कह कर प्रशंसा पाने का लालच नहीं छोड़ते।

मेरे उपरोक्त निवेदन के प्रत्युत्तर में मुझे सेल्फ क्विट करने की विधि बताई गई। मैंने क्विट किया। मैंने यह मंच छोड़ दिया। मैंने वैसे और एक मंच को छोड़ दिया जिसमे मुझसे पूछे बगैर "मेरे जैसे लोग" को सदस्यता दे दी गई थी।

अब ...
"एकला चोलो रे ...........!"
रे ऐ श्रीकांत! चल अकेला ............

Tuesday, January 1, 2013

सूरज और प्रहरी

निम्नलिखित पक्तियों में मैंने अपनी कल्पना से एक छोटी-सी कथा कही है, इसका उद्देश्य किसी भी दृष्टि से स्वार्थसिद्धि नहीं है।  मेरी इस कथा के नायक हैं एक काल्पनिक किरदार, जिनका निश्चय ही कहीं-न-कहीं वजूद है। 
तो दोस्तों, कथा कुछ यूँ है..................
.....................सांझ ढले सूरज भाई ! चाँद भाई ! सितारे लोग ! हवा भाई ! आग भाई ! पानी भाई ! धरती माई ! आकाश भाई ! इन्दर भाई ! ब्रम्हा दादा ! विष्णु भईया ! ठाकुर यमराज सिंह जी ! चित्रगुप्त सिन्हा ! नारदनगदन जी ! एंड अबभ आल शंकर बाबा !  ...इत्यादि एक जगह पीपर नीचे बईठ के थके हारे-से आपस बतिया रहे थे।
...
सूरज भाई :" वे...! कितनी बदबू है! छे:! माइयवि धूल-धुवां के मारे सांस तक लेना मुहाल है। भई ! हम घिनरते-घिनरते बहुत थक गए हैं। हम तो कल नई उगेंगे!"

चाँद भाई :" हाँ यार! रात में तो और बूरा हाल है, तुम तो शाम होते ठेके पर मस्ती के लिए निकल लेते हो, मुसीबत मेरे गले पड़ जाती है। कल रात तो बड़ी भयानक गुजरी। बहुत ज़ुल्म हुआ। मैं तो ऐसी स्तिथि में घर से नहीं निकलने वाला, ठण्ड में कौन रात भर जागे कि 'जम' ही जाय!"

सितारे लोग समवेत स्वर में :" जी। सर जी, एकदम्मे ठीक बोलते हैं! धरती बहन के तरफ झांकते डर लगता है। अचानक-अचानक इनके यहाँ के बासिन्दे हम सबके ऊपर कूद पड़ने लगे हैं। हम तो कहे देते हैं धरती बहन! रोको अपने निवासियों को वर्ना परिणाम अच्छा नहीं होगा!" "चाँद सर के उपरे कई बार ये लोग अटैक कर चुके हैं। न मानें तो हम हड़ताल कर देंगे!"

ब्रम्हा दादा :" एइ ! हल्ला मत करा ! ध्यान टूटा हई!"

धरती माई (सिसकते हुए ) :" तो अपने कहल जाय! हम का करीं? अपने सभे के तो पतों न होई कि हम कइसन-कइसन अत्याचार सहत बानी" "का करीं ? आपन देह पर के लइकन के देह पर से झिटिक दीहीं ?" "हम महतारी हईं, निरदई ना। हमार जे करम बा हम पुराइब। भले चाहे इन्दर भाई हमरा उपरे बजर पटक देस।"

विष्णु भईया :" ठीक है - ठीक है, धरती बहन तुम शांत रहो, मैं इस मामले में शंकर बाबा से चर्चा करके कोई समाधान निकालूँगा। आप क्या कहते हैं शंकर बाबा?"

नारदनगदन जी ने खडताल बजाया और दुक्की लगाईं :"नारायण ! नारायण !!"

शंकर बाबा ने मेहनत से आँखें खोलीं और उनीन्दे से लड़खड़ाते स्वर में बोले :"होऊँ!!! की कहलियई? "...धरती बहिन के कोई दिक्कत हई? ...दुर्र! त ये में सोचे के का हई! कहन न! सबके तुरते उलट-पलट पटक के रख दियाई?"

ब्रम्हा दादा झल्लाए  :"धेत्त तेरे कि ! एह शंकर बाबा! तनी शांत रहन न! कहालियाई न ध्यान टूटा हई!"

ठाकुर यमराज सिंह जी :" ओए चीन्द्रंगुप्ताँ ! की बयस्स होईं रल्लीं एँ? नाँ-पता लिक्ख रक्ख पिच्छे वेखाँगा! मेरी भैंस नु जुलाब हो रई ये।"

चित्रगुप्त सिन्हा :"हूकम। यहाँ तो मरने-मारने की भारी धक्कमपेल मची है!!! एक-एक का नाम लिखने में ब्रम्हा दादा के अनेक कल्प बीत जायेंगे! आपको सिर्फ रजिस्टर्ड प्राण खींचना ही पसंद है तो ये काम खुद ही कर लीजिये वैसे भी लाख अनुग्रह के बावजूद आपने अभी तक मुझे लैपटॉप ले कर नहीं दिया, कलम-स्याही मिलती भी तो नहीं, वैसे भी मेरी उंगलियाँ दुख रहीं हैं, एक छुट्टी की एप्लीकेशन लिखी है, वो वर्षों से आपके टेबल पर धूल फांक रही है, जिसका आपने अबतक कोई संज्ञान नहीं लिया, इन मुर्दों की क्या सोचेंगे! ... म म मैं भी अभी छुट्टी चाहूँगा। आखिर न्यू इयर ईव है जी!"

ठाकुर यमराज सिंह जी :"खुर्र्रर्र्र्रर्र्र .........!!."

सूरज भाई (आवेश में)  विष्णु भाई से :" आप बुरा मत मानियेगा सर जी! कुछ भी कहिये, कल तो हम नहिएँ उगेंगे।"

विष्णु भईया ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई। पर बोले कुछ नहीं। फिर रहस्यमय दंग से मुसकुराय जैसे कोई युक्ति सूझी हो। पर फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझा।

हवा भाई ने फुसफुसा कर पानी भाई से कहा :" इयार सुरजवा के बात ठीक हैय। इसका हम समर्थन करते हयं। हमारा भी यही बिचार हैय। वइसे भी हमको कल फुर्सत नई हैय। कल सुराजवा के चक्कर में हमर बेटा के ठुड्डी पर इन्दरवा बजर मार दिया था। हमको ब्रम्हा दादा से शिकायत भी करना हैय और उसका इलाज भी करवाना हैय। कल हम भी नहीं बहेंगे।"

इन्दर भाई ये सुनकर भड़के :" अजी ए ! हवा भाई! ई भी तो सोचिये कि आपका छोकरा बन्दर की तरह उधम मचा रहा था, यकीन न हो तो सूरज भाई से पूछ लीजिये कि कल उसके वजह से सूरज भाई और यहाँ मौजूद सभी लोगों को केतना तकलीफ हुवा था। ऐसे में जो मेरा फ़र्ज़ था सो मैंने निभाया। रही बात उसके चोट कि तो वो ठीक हो जायेगा। मैं गारंटी करता हूँ। क्यों ब्रम्हा दादा! का बोलते हैं?"

ब्रम्हा दादा फिर भड़क गए :" दुर्र रेह !! अरे तोहीन हमरा ध्यान करे देबा कि नई?" "चुप्प, चुप्प !" "इतना-इतना राछस सब से मेंटलथिरेपी से बतियावै थियइए! सभन के बरदान में लम्पटई और अधर्म करे के ताकत देइवे ला हई जे से जुलुम और पाप ढेर बढ़े ताकि ओखनी के बिनास करे खाती बिसनु भाई के फेन्न-से भेस धरे पड़े, अरे भीळेण नईण रहतई त इनकर हीरो के अवतार के पुछ्तई!?" " भीळेण बिना हीरो काऊंन काम के?" "अब चुप्प! सब कल्ह देखल जयितई!"

पानी भाई फुसफुसाते हुए हवा भाई से  :"बॉस! अपुन का भी अगाडी-पीछाड़ी दून्नों तरफ बड़ी दरद है। लगता है आर्कटिक और अंटार्कटिक दून्नों पिघल जायेगा। कल गंगा बहन मिली थी वो भी शिकायत कर रही थी, उसे जमुना बहन ने भी अपना दुखड़ा सुनाया था। गन्दगी और दुर्गन्ध से दोनों त्राहि-त्राहि कर रहीं थीं। दोनों तो कुछ दिन के लिए टेम्स में जा कर नहाने की सोच रही हैं।

आग भाई बगल में ही बैठे थे वे भी दुखित थे :"हान जी। सई बात अय। धरती बहन दे बासिंदों ने अब तक मुजको इतनी घी पिला दी अय कि पेट बिगड़ गया अय। जिसके वजह से मेरा रिंग टोन सिस्टम भी बिगड़ गया अय। मुझे भी आराम की ज़रुरत अय। कल मैं भी न जलूँगा।

अचानक आकाश भाई की गंभीर वाणी सुनाई दी :"प्रिय बन्धुवों मेरी परेशानी के बारे में किसे पता नहीं!? सोचता हूँ मैं भी अपनी चादर कुछ वक़्त के लिए समेत ही लूं!"

सूरज भाई ने फिर अपनी जिद्द दुहराई :"इस बात को गाँठ बाँध लीजिये सर जी, कल सचमुच मैं नहीं उगूंगा, बस!"

विष्णु भाई मुस्कुरा कर सूरज भाई से बोले :"मेरी एक शर्त है यदि आप मेरी इस शर्त को जीत कर दिखा दें तो यहाँ विराजमान सभी को अपनी-अपनी मनमानी करने की पूरी छूट होगी, अन्यथा कोई भी अपने-अपने कर्म की मर्यादा को तोड़ने की बात आइंदे फिर कभी भी नहीं करेगा।"

विष्णु भाई की बात पर समवेत स्वर में पूरी श्रद्धा से बात मंज़ूर हो गई, तब सबने विष्णु भाई से उनकी शर्त पूछी तो विष्णु भाई ने अपने इशारे से धरती माई की ओर संकेत कर कहा :"धरती बहन पर के उस स्थान को देखिये वहाँ एक व्यक्ति हथियार लेकर काफी देर से अडिग खड़ा है, आप उसे घर जाने को कहें, वैसे भी ये सबके घर लौटने का वक़्त है, यदि वो चला गया तो आप अपनी मनमानी करने के लिए आज़ाद होंगे। और इस कार्य को सूरज भाई आप करेंगे क्योंकि अपने काम से थक कर यह विवाद आपही ने छेड़ा है। बोलिए मंज़ूर है?"

सूरज भाई ताप से तमतमाते ताव में गरजे :"जी हाँ ! मंज़ूर है!" और सूरज भाई इस बाज़ी को जीतने निकल पड़े। उस व्यक्ति तक आते-आते, उनके जाने का वक़्त हो गया, हडबडाय से तेजी से आगे बढे तो अचानक 'वक्तेकालुकाल भाई' ने उन्हें ऊँगली की :"सूरज भाई ! नहीं! आप मेरी मर्यादा भंग नहीं कर सकते, वैसे भी अभी तक आपने शर्त नहीं जीती है, तब तक संयम में रहिये।" दांत किटकिटाते सूरज भाई अपनी निर्धारित गति से आगे बढे। उन्हें खूब कष्ट हुआ। आखिरकार वे उस व्यक्ति तक पहुंचे और हांफने लगे। गहरी सांस लेकर उन्होंने वहां के वातावरण का अवलोकन किया। देखा .......

...................छुट्टियों, त्योहारों और नव वर्ष के आगमन का सुहाना मौसम था। सांझ ढले दिनभर की थकान, और धूल-मिटटी और बदबू से भरे माहौल में कड़ी मेहनत से चिडचिडाये हुए सूरज भाई भुनभुनाते रहे, तभी उन्होंने उस व्यक्ति को देखा, जो रोज की भाँती आज भी जहां-का-तहां खड़ा था। वह वर्दी पहने हुए था। उसके कंधे पर बन्दूक लटकी हुई थी। वह (सतर्क और सावधान खड़ा होने के बजाय) निश्चिन्त, निर्भीक और बेबाक खड़ा था। उसके चेहरे पर कोई भी उत्कंठा के भाव के बदले उसका मुखमंडल वीरता के संतोषपूर्ण तेज़ से खिला हुआ था और उसकी ओजस्वी आँखे अपने चारों तरफ के वातावरण का पूरा अवलोकन कर रहीं थीं। सभी ऑफिस, स्कूल-कॉलेज और सभी कार्यालयों के लोग अपने-अपने घरों को लौटते हुए आगामी नए साल के स्वागत और जश्न की बातें करते हँसते-खिलखिलाते जाते थे, पर उनकी दृष्टि में वह जैसे अदृश्य-सा था। कोई उसकी तरफ ध्यान न देता था। पर वह सबको देख रहा था। अपनी इस उपेक्षा की उसे कोई परवाह प्रतीत नहीं होती थी। इसके बावजूद उसका यह प्रसन्नचित व्यवहार देखकर सूरज भाई से रहा न गया। आखीर उन्हें इसी व्यक्ति को डिगा कर तो शर्त जीतनी थी; उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा - ' क्यों भाई! तुम्हें घर नहीं जाना? दिनभर इस चिलचिलाती धुप में जलते रहे, कभी भूखे तो कभी प्यासे रहे, धूल-धुवां-बदबू और शोर ने तुम्हे जरा भी विचलित नहीं किया? रात की ठिठुरती ठण्ड भी झेलते हो, बरसात में भी तुम्हारी यही पोजीशन रहती है! घर जाओ भाई। रोज सुबह से तुम्हें देख रहा हूँ, जो अड़े खड़े हो कि खड़े ही हो!! किसी की तुम्हारी परवाह नहीं। पर लगता है तुम्हे सबकी बराबर परवाह है। आखिर तुम हो कौन? और ये सब क्यूँ बर्दाश्त किये अचल खड़े हो? सबके घर चले जाने का वक़्त हो गया है, सभी लौट रहे हैं, फिर तुम अपने घर क्यों नहीं लौट जाते? छुट्टियों और त्योहारों का समय है नए साल के ज़श्न का वक़्त है ,क्या तुम्हें मौज नहीं मनाना? न जाने कब से तुम्हें इसी दशा मैं रोज देखता चला आ रहा हूँ। और तुम यह हथियार क्यों लिए हुए हो? और ये तुमने कैसे कपड़े पहने हुए हैं!? यार, तुमसे पूछे बिना रहा न गया, जल्दी मुझे बताओ और अपने घर जाओ, क्योंकि मैं रुकने वाला तो नहीं हूँ, क्योंकि मुझे कल सुबह ही फिर वापस लौट कर आना हैं।  बताओ भाई और घर जाओ।

उस व्यक्ति ने हंसकर उत्तर दिया - "ये जो तुम रोज देखते चले आ रहे हो, ये मेरा कर्म है। यही मेरा धर्म है। मुझ पर धूल-धुवां-मिटटी-बदबू-शोर-ताप-धूप-गर्मी-सर्दी-वर्षा-आंधी-तूफ़ान-आपदा-विपदा और आक्रमण को झेलने की जिम्मेवारी है जिसकी मुझे ऐसी आदत पड़ गई है, ऐसा अभ्यास हो चुका है कि ये बाधाएं मैं सहजता से झेल लेता हूँ। जहां मैं खड़ा हूँ यह मेरे घर का द्वार है, ये जो इतने हँसते-गाते, खुशियाँ मनाते जन-समूह को देख रहे हो यही मेरा शरीर और इसके अंग हैं, जिनकी हिफाज़त और रक्षा मुझे करनी है अत: मैं यहाँ डटा खड़ा हूँ। मेरे जैसे और कई हैं, उनकी भी यही कहानी है। मैं जाऊँगा तो मेरी जगह उनमे से कोई यहाँ आ डाटेगा, क्योंकि यह हमारा शरीर है, एक जाएगा तो दूसरा आ जाएगा पर यह स्थान कभी एक क्षण के लिए भी खाली नहीं रहेगा, अभी मेरे जाने का वक़्त नहीं हुआ है अत: मैं यहाँ खड़ा हूँ। कोई मेरा भाई जब तक मेरी जगह पर आ कर मुझे सहजता से जाने को नहीं कहता और मेरी जगह पर उसी ज़ज्बे के साथ खड़ा नहीं हो जाता, मैं यहाँ से कभी नहीं जाता। मेरा कोई ख़ास धर्म नहीं! मेरी कोई ख़ास ज़ात नहीं। मेरी कोई ख़ास पहचान नहीं। मेरा कर्तव्य ही मेरा धर्म है। मेरा कर्म ही मेरी जात-गोत्र और मेरा परिचय है। हमें छुटियों, त्योहारों की उतनी ही कद्र और ज़रुरत है जितनी कि तुम्हे इस जन-समुद्र में दीख रहा है। हम हर त्यौहार मनाते हैं। हम सबको गले लगते हैं। हम नाचते और गाते हैं। हमारा हर दिन एक त्यौहार है। हर दिन एक मेला है। हम सबकी रक्षा करते हैं। हम सब की सुरक्षा करते हैं। मैं इस शरीर का अंगरक्षक हूँ। मुझे अपने कर्तव्य कर्म का पूरा भान है। मेरा घर मेरी माँ है। मेरा घर मेरी आन-बान और शान है। मैं यहीं डटा रहूंगा, ध्यान दो, यह शस्त्र तुम यहाँ सिर्फ मेरे कंधे पर देख रहे हो, क्योंकि यह सबको नहीं मिलता। यह बन्दूक मेरे पास मेरा शस्त्र है, क्योंकि मुझमे अपने देश के लिए मर मिटने का ज़ज्बा है, अत: मैं इसका उपयोग और इसके प्रभाव और इसके परिणामों को जानता हूँ, यह मेरे देश की सुरक्षा के लिए उठता है, ये जो जन-समुद्र तुम हँसते-खेलते देख रहे हो यह उनकी खुशियों की और उनकी सुरक्षा के लिए उठता है। अभी मैं यहीं डटा रहूँगा क्योंकि अभी मेरे जाने का वक़्त नहीं हुआ है। देख रहे हो उनकी हाथों में जलती हुईं मोमबत्तियों की कतार! इन मोमबत्तियों के लौ की ज्योत 'दामिनी' की प्रज्वलित ज्वाला है, जिसकी किरणों ने उम्मीद और आशाओं को और ज़ुल्म की पुरजोर मुखालफत को कायम रखा है, मुझे इस ज्योत को हमेशा प्रज्वलित किये रखने की जिम्मेवारी है, ये तुम और तुम्हारे साथी नहीं कर सकते, इसीलिए मैं यहीं डटा खड़ा रहूँगा। मेरा घर मेरा देश है। मेरे कपड़े मेरे शरीर का परिधान, मेरी पहचान और मेरा गौरव हैं। मैं इस देश का प्रहरी हूँ। क्योंकि मुझे सदा विजयी रहना है, इसलिए मुझे यहीं डटे खड़ा रहना है, मुझे कोई गिला नहीं बल्कि ख़ुशी है कि जहां मक्कार अधर्मी, अत्याचारी, अपराधी और इस देश के दुश्मन रजाइयों में दुबककर परिवर्तन के चिंतन का ढोंग कर रहे हैं, वहीं इस जगह पर मेरी ज़रुरत है, मैं इसलिए भी यहाँ खड़ा रहूँगा क्योंकि मुझे इनसे लड़ने-भिड़ने और जीतने की आदत पड़ गई है। तुम जाओ क्योंकि कल तुम्हे फिर लौट कर आना है। मेरी तरफ से तुम्हें नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ!"

सूरज भौंचक्का-सा मुँह बाए प्रहरी को एकटक देखता रहा फिर चेत कर पूछा -" तुम्हारा नाम क्या है भाई?"

हंस कर "प्रहरी" ने कहा - 'मेरा कोई नाम नहीं, मेरा और मेरे जैसे अन्य साथियों का बस एक ही नाम है -"प्रहरी!"'

"...! ..यह तुम्हारी जेब में कैसी किताब है? क्या तुम्हारा धर्मग्रन्थ है? - सूरज ने उत्सुकता से पूछा।

प्रहरी हंसा - "हा: हा: हा: ! नहीं, उपन्यास है।"

"वो क्या होता है?"

"मनोरंजन।"

"ओह! माने, ...सड़कछाप किताब! यानी कि कोई ज्ञान-ध्यान की बातें नहीं, कोई शिक्षाप्रद बात नहीं? ...जैसे फिल्मों में आइटम सौंग! आयं?"

"क्यों नहीं?"

"भ्रष्ट और अशलील, होगा!?"

"हो सकता है, पर ''दौलत-शोहरत-औरत'' की लालसा में लिप्त कलुषित समाज को आइना दिखाने के लिए, ठीक उसी तरह जैसे रावण, कंस, और दुर्योधन जैसों के कुकृत्य को दर्शाना पड़ता ही है। वैसे नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह नहीं है। कुछ शिक्षाप्रद संवाद भी होते हैं।"

"ऐसी पटरी पर, फूटपाथ पर बिकने वाली चीजों को विद्वजन तो छूते भी न होंगे!"

"संभव है। पर यह भी सुनलो कि उन्हीं तुम्हारे विद्वजनों की ग्रंथों को, जिन्हें पता नहीं खुद उन्होंने उस पर पड़ी धूल-मिटटी को कितने दिनों से उन्होंने झाड़ा भी न होगा। अरे विद्वजनों की छोडो,...उन्हें तो पटरी वाले भी नहीं पूछते।"

"वैसे क्या मिलता है इससे और सीखा क्या तुमने इससे?"

" गरीबों को, जो इसे लेकर इसका रसास्वादन करने वालों के लिए इसकी दूकान लगते हैं उन्हें रोज़गार! सीखने को भाईचारा-दोस्ती-सब्र-हिम्मत-ताकत-एकता-निष्ठा-तत्परता-नैतिकता-एकाग्रता-वीरता-सटीकता-आदमीयत-क्षमा-दया-त्याग-बलिदान-क़ुरबानी-मेहनत-लगन-प्यार-मोहब्बत-भाषानुवाद-बुद्धिमता-शान्ति-सद्भावना-समर्पण-सहयोग-समझदारी-हाज़िरजबाबी-हंसी-मज़ाक-सलीका-चंचलता-निश्छलता-चपलता-सतर्कता-सदाचार-ख़ुशी-ईमानदारी-शक्ति-प्रबलता-भक्ति-देशभक्ति-व्यावहारिकता-सेवा-सामाजिकता-आत्मसम्मान-और ...ख़ास करके याराँ नाल बहाराँ मेले मित्तरां दे !"... _ और दुश्मन को मुंहतोड़ जबाब देना।

हैरानी से सूरज भाई ने पूछा -"जैसे?" "कुछ बहादुरी की ही बतलाओ।"

प्रहरी ने जबाब दिया - "कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज़े सुखन। ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।", ''...भय काहू को देत नहि। नहि भै मानत आनि।'', ''....सिर दीने सिर रहत है, सिर राखे सिर जाए।'', ''...देहु शिवा वर मोहि ईहै शुभ कर्मन तें कबहूँ न टरौं, न डरों अरिसो जब जाई लरौं निसिचै करि अपनी जीत करौं। जब आऊ की अउध निदान बनै अथि ही रण में तब जूझि मरौं!!'',...''

"रुको-रुको-रुको!" हकबकाय सूरज भाई ने टोका - 'य ..यह तो धर्मग्रन्थ की बातें हैं! फिर ये पटरी पर क्यूँ बिकतीं हैं।"

"क्योंकि श्रीमान, पुस्तकालय तो अजायबघर-म्यूजियम बन कर रह गए हैं, अब तो अक्सर उनके बंद द्वार ही दीखते हैं। अत: इसके कद्रदान मंत्री-संत्री-अभिनेता-खिलाडी-डॉक्टर-वकील-सिपाही-चपरासी-रिक्शेवाले-ठेलेवाले-जमादार-पंडित-मुल्ला-पादरी-आम आदमी-ख़ास आदमी-और मेरे जैसे अनेक प्रहरी सभी पटरी पर ही आते हैं।"

"ये नाकद्री!!??"...(सूरज भाई : मन-हीं-मन : अजीब बिडम्बना है!) ''....क ..कौन हैं इसके रचयिता, इसके लेखक?"

प्रहरी ने सीना तान कर कहा - "मेरी ही तरह एक 'पाठक!'"

"ये किस विषय पर अपनी रचना लिखते हैं?"

"यथार्थ के विषय में।"

"संतों की तरह बोल रहे हो। तुम्हारे हाथ में अभी जो पुस्तक है उसका नायक कौन है, क्या कोई संत?"

"जी नहीं।"

"तो?"

"एक हत्यारा!"

सूरज भाई सन्न रह गए!-"मुझे दोगे/"

"खेद है, किन्तु नहीं। क्योंकि आपके हाथ लगते ही ये झुलस जाएगा। इसके लिए आपको इंसान बनकर इसी फूटपाथ और पटरी पर आना पड़ेगा।"

'.............................!" '...अच्छा:! चलता हूँ। हैप्पी न्यू इयर।"

"अच्छा!! उसपार इंग्लैण्ड पहुँचने से पहले ही तुम्हारे दिमाग पर भी इंग्लिश की पॉलिश फिर गई! हा: हा: हा:, थैंक्स, सेम टू यू !" 

'-----------------!'
 और इस तरह हारकर सूरज भाई अपनी राह चले गए इस संकल्प के साथ कि -'ड्यूटी में कोताही नहीं। विष्णु भाई फिर जीत गए!!!"

आकाश भाई ने हंस कर गंभीर नाद किया :
"नाना भाँती राम अवतारा।
रामायण स़त कोटि अपारा।।"
 

 प्रहरी प्रसन्नतापूर्वक, दृढ़ता से डटा रहा।

[लेखक की कलम अनवरत अपने पात्र की रचना में चलती ही रही..., चलती ही रही... ]

--इति--

 नए साल के आने का वक़्त हो चूका है। सभी को नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं!

_श्रीकांत .     


NOTICE : मैंने एसएमपी ग्रुप स्वेच्छा से छोड़ दिया है।

Monday, December 31, 2012

अलविदा 2012

 लोहरदगा,  31, दिसंबर, सन 2012   दिन : सोमवार     अभी सुबह के 08:15 बजे हैं       
(दैनिक हिन्दुस्तान में छपे पूर्व राज्यपाल श्री गोपाल कृष्ण गांधी के लेख से ...)
यह साल अब चंद घंटों का मेहमान है। यह हमारे आपके लिए कुछ बेहतर हो सकता था, लेकिन इसीतरह यह कहीं बदतर भी हो सकता था। हमें इस साल किसी जंग से दो चार नहीं होना पड़ा और न ही हमें भयानक सूखे या बाढ़ का शिकार बनना पड़ा, जो लाखों की तादाद में लोगों को उजाड़ देती है। इस वर्ष हमारा साबका सुनामी जैसी कुदरती आपदा से भी नहीं पड़ा, जो सैकड़ों जिंदगियां ख़त्म कर देती है और अनगिनत लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंकती है। इस साल हम किसी महामारी की चपेट में आने से भी बचे रहे। हम 1966 की 'कंचनजंगा' विमान दुर्घटना जैसे हादसों का शिकार बनने से भी इस वर्ष दूर रहे। उस दुर्घटना में होमी जहाँगीर भाभा समेत सौ से अधिक लोग मारे गए थे। यह साल 1985 जैसा दुखद वर्ष बनने से भी बच गया, जब एयर इंडिया का विमान-182 'कनिष्क' उड़ान के दौरान हवा में ही विस्फोट का शिकार हो गया था और उसमे मशहूर केमिकल इंजिनियर वाई नयुदम्मा समेत 329 जिंदगियां हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गईं थीं।

2012 इस लिहाज़ से भी खुशकिस्मत रहा कि इसे 1981 में बिहार में बागमती नदी पर हुई भीषण रेल दुर्घटना जैसी त्रासदी या फिर 1991 के गैसल व 1995 के फिरोजाबाद रेल हादसे जैसे हालात का सामना नहीं करना पड़ा। इन दुर्घटनाओं में सैकड़ों मुसाफिर काल के ग्रास बन गए थे। उनमे से न जाने कितने अपने काम जाने के लिए निकले होंगे, कितने काम की तलाश में जा रहे होंगे और कितने ही तीर्थयात्रा पर रहे होंगे। इस साल हमें 2004 के कुंबकोणम अग्निकांड सरीखे दर्दनाक हादसे हादसे की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ी, जिसमे 91 स्कूली बच्चे जिंदा जल गए थे या फिर पिछले साल की कोलकाता के एम्री हॉस्पिटल जैसी दुर्घटना से भी हम सुरक्षित रहे, जिसमे 73 मरीज़ व उनकी देखभाल करने वाले लोग जलकर या धुएं की घुटन से मारे गए थे। इस साल ने हमें राजनीतिक हत्याओं से दूर रखा, 26/11 जैसी त्रासदियाँ नहीं हुईं। और खुदा का शुक्र है कि देश के विभिन्न इलाकों में तनावों के बावजूद 2002 जैसे दंगों से हमारा सामना नहीं हुआ।

हम इन सबके लिए इस साल का शुक्रिया अदा कर सकते हैं। नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह बात नहीं है। लेकिन क्या दर्द का न होना ख़ुशी की आमद है? नहीं ! सियासत ने हमें इस साल कोई तसल्ली नहीं पहुंचाई। वैसे राजनीति कभी खुशियाँ बाँट सकती है? यह कुछ अविश्वसनीय-सा भले महसूस हो, मगर इस प्रश्न का जबाब है - हाँ, सियासत ऐसा कर सकती है।

यदि राजनीतिक पार्टियाँ लोकपाल बिल पर एकराय बना पातीं तो देश के लोगों को खुशियाँ मिलतीं। सगर सियासी जमातें यह कहतीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग हमारी पहली प्राथमिकता है और वे अपने-अपने संगठन के भीतर के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कोई पहल करती हुई दिखतीं, तो यकीनन देश को ख़ुशी होती। राजनीतिक दलों ने यदि यह भी बताया होता कि वे चुनाव खर्च के बारे में निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों का ईमानदारीपूर्वक, जिम्मेवारी व पारदर्शिता के साथ पालन करेंगे, तो उनका यह आचरण देश को प्रसन्न करता।

यदि हमारी संसद ने तीन तरह के अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय किया होता, यानी काल धन, अवैध खनन और गैरकानूनी हथियारों के खिलाफ वह कोई सार्थक कदम उठा पाती, तो देश को जरूर ख़ुशी मिलती। यदि हमारे सांसदों ने सदन की कार्यवाही को बाधित करने और उसका बहिष्कार करने की बजाय सत्ता पक्ष के आगे असुविधाजनक सवाल उछाले होते, तो देश को संतोष होता। लेकिन क्या हमारी संसद ने वैसा काम किया, जैसा उसे करना चाहिए था? यदि वह सचमुच नियमित बैठकें करतीं, मसलों पर गंभीर बहस करती, संजीदा क़ानून बनाती, तो देश जरूर खुश होता।

यदि नई पीढ़ी की राजनीति करने वाले युवा नेताओं ने चापलूसी की बजाय वफादारी के नए युग की शुरुआत की होती, घनिष्ठता की जगह बेबाकी व अवसरवादिता की बजाय सेवा की भावना दिखाई होती, तो देश को प्रसन्न होने का मौक़ा मिलता। राजनीति क्षेत्र ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लेकिन सच्चाई यह भी है कि जिस तरह हम सभी नागरिकों को एक खाँचे में नहीं रख सकते, वैसे ही सभी राजनेताओं को अक ही ब्रश से पेंट नहीं कर सकते। हम और राजनीतिक वर्ग, दोनों ही एक-दुसरे को नीचे ले जा रहे हैं।

जहां राजनीति ने 2012 में हमें निराश किया, वहीं प्रतिस्पर्धाओं से भरे एक अन्य क्षेत्र ने देश को जश्न मनाने के पल दिए और वह क्षेत्र है - खेल। विश्वनाथन आनंद ने जहां विश्व चैम्पियन का ताश अपने नाम बरकरार रखकर हमारे आहात मन के लिए मरहम जुटाया, तो वहीं इस साल के ओलंपिक में मैरीकोम ने बॉक्सिंग, साइना नेहवाल ने बैडमिन्टन में कांस्य पदक जीतकर हमारी ज़िन्दगी में चमक बिखेरी।

खेलों का हमारी ज़िन्दगी पर कितना असर है, इसे हम अक्सर कम करके आंकते हैं। इस महीने की शुरुआत में नीलगिरी की पहाड़ियों के बीच बने एक खूबसूरत स्कूल विद्या वनम में जाने के विषय में पूर्व गवर्नर साहब ने लिखा है कि वे वहाँ गए थे, जिसके बारे में इन्होने बताया है कि :इसमें पढने वाले साठ फ़ीसदी बच्चे ईरुला जनजाति के हैं। उन्हें तमिल और अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है और वे हिंदी भी काफी कुछ समझते-जानते हैं। गवर्नर साहब ने उनसे एपीजे अब्दुल कलाम की तरह सवाल किया, 'आप क्या बनना चाहते हैं?' कई हाथ ऊपर उठ आए। उन्हें लगा कि जिस तरह कलाम साहब को जवाब सुनने को मिलते थे, वैसे ही उत्तर उन्हें भी सुनने को मिलेंगे - डॉक्टर, इंजिनियर, आईटी एक्सपर्ट, वैज्ञानिक, कभी-कभी राजनेता। लेकिन नहीं। बेहद सधी हुई अंग्रेजी में एक बच्चे ने कहा - सर, फुटबॉल प्लेयर बनना चाहता हूँ। गवर्नर साहब ने पूछा, 'आपका पसंदीदा फुटबॉलर कौन है?' उसने कहा - 'मैसी।' एक और बच्चा गवर्नर साहब के करीब आया। उसने कहा कि वह वौलिबौल खिलाड़ी बनना चाहता है। तीसरे का जवाब सुनकर गवर्नर साहब चौंक-से गये। 'सर, मैं पक्षी विज्ञानी बनना चाहता हूँ। मुझे सालीम अली जैसा बनना है।' गवर्नर साहब को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ - सालिम...? एक बच्ची ने कहा - मैं डांसर बनना चाहती हूँ। उस छोटी-सी लड़की के भीतर एक बालसरस्वती, एक रुकमिणी देवी थीं। शायद आगे चलकर उसके भीतर से कोई विश्वविख्यात संगीतकार निकले।

उस स्कूल में एक प्रदर्शनी लगी थी, उसमें हिंदी का भी एक स्टाल लगा था। एक हिंदी पोस्टर के पास खड़ी लड़की से गवर्नर साहब ने पूछा - 'व्हाट इज योर नेम?' उसने गवर्नर साहब की तरफ देखा और बगैर किसी हिचक के कहा - 'मेरा नाम दिव्या है।' एक तमिल लड़की के मुँह से खड़ी बोली हिंदी सुनकर गवर्नर साहब, बताते हैं की उन्हें लगा, - 'मुझे सामंजस्यवादी शक्ति का एहसास हुआ। लम्बे अंतराल के बाद उन्हें ऐसा अनुभव हुआ था। उन्होंने अपने-आप से कहा कि - ये बच्चे ही असली भारत हैं।'     - गोपालकृष्ण गांधी .


इस लेखमाला के लिए श्री गोपाल कृष्ण जी गांधी (पूर्व गवर्नर; पश्चिम बंगाल) एवं दैनिक हिन्दुस्तान का मैं ह्रदय से आभारी हूँ। इस लेखमाला से ही मुझे आज फिर से सीखने को मिला कि - "नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह नहीं है। तथा "इस साल ने हमें कई खुशियाँ और नीराशायें दीं, लेकिन अगर आप इस देश के बच्चों से मिलें, तो आपको लगेगा कि उम्मीद पालने के लिए अभी बहुत कुछ है।

इस वर्ष हमने न जानें कितने ही रत्नों को हमेशा के लिए खो दिया, उनके प्रति अपनी हार्दिक संवेदना के प्रति यही कहना चाहूँगा कि हम इस देश और इसकी जनता के लिए किये गए उनके महान कर्मों एवं अभूतपूर्व अमर योगदान को और उनके द्वारा समर्पित असंख्य प्रसन्नता को सुखद यादगार बनाये रखें, जिससे हमारी हिम्मत, मेहनत, ताकत और एकता को बनाए रखने का बल मिलता रहे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सादर नमस्कार।
नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,
आपका अपना भाई,
श्रीकांत तिवारी .

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा - पांचवां दिन

25-12-12  मंगलवार, जगन्नाथ पुरी 

पुरी से भुवनेश्वर : वापसी का दिन :

आज सुबह जब मेरी नींद खुली, मैंने देखा अधिकाँश (बच्चों को छोड़कर) जगे हुए हैं। हालांकि हमने अपनी सारी पैकिंग रात में ही कर ली थी, फिर भी सभी को चौकस करने में कुछ वक़्त लगा। तभी पुजारी मामा, मामी के साथ आ गए। दरअसल पुजारी मामा ने ही हमारे लिए होटल में कमरा और घूमने के लिए गाडी का इंतज़ाम पहले ही करवा दिया था। उनके सानिध्य से हमें बहुत ही प्रसन्नता और सुखद अनुभूति हुई। चाय-नाश्ते के बाद मामा-मामी अपने होटल चले गए।

फिर हम सी-बीच पर चले गए। जहां हमने जलनिधि, सागर महान को नमस्कार कर आशीर्वाद लिया और होटल आकर चेकआउट फाइनल कर के हम भुवनेश्वर के लिए रवाना हो गए। अत्यधिक लगेज के कारण कुछ दिक्कत तो हुई पर हमने मैनेज कर लिया। भुवनेश्वर जाते रास्ते में हम श्री साक्षी-गोपाल के मंदिर में दर्शन को गए जहाँ पण्डों ने हमें घेर लिया और बिना हमारे आग्रह और इजाज़त के हमें इधर-उधर ले जाने लगे। हमें शंका हो गई कि हम ठगों के बीच फंस गए हैं। हमारी शंका निर्मूल नहीं थी। एक पण्डा जी हमें दर्शन करने से पहले "रजिस्ट्रेशन ऑफिस" में ले आये और वहाँ मौजूद पण्डा जी (क्लर्क) ने तुरंत अपने डेस्क में से खाता-बही निकाल कर हमें 'दर्शन करने देने के' अपने "रेट" को बतलाने लगे। डेढ़ लाख! दो लाख। फिर हज़ार, फिर सौ ...!! मैं उठ कर पण्डों के विरोध के बावजूद, कमल और बाकी लोगों की तरफ संकेत कर स्वयं मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर गया। वहाँ पहले से मौजूद दर्शनार्थियों में जा मिला, जहाँ, वहाँ मौजूद पण्डों ने मुझे उपस्थित भक्तों के परिवार का सदस्य समझा, इस प्रकार मैंने भगवान् के दर्शन किये और अपनी बुद्धि के बराबर भगवान की स्तुति-प्रार्थना और निवेदन किया मंदिर की परिक्रमा की और बाहर निकल आया। बाहर जहां हमने अपने जूते-चप्पल उतार कर रखे थे वहां बैठी खाखी वर्दी-सी ड्रेस पहने एक महिला बैठी थी, वो मुझसे प्रति जूते के 10 रुपये मांगने लगी। मेरा जी उचाट हो गया और मन वितृष्णा से भर गया। अफ़सोस से सिर हिलाते मैंने उस महिला से कहा कि अभी सेठ जी आ रहे हैं, उनसे माँगना थोडा ज्यादा ही मिलेगा, ...और मैं वापस आकर गाड़ी में बैठ गया। जिम्मी से मैंने कह दिया कि सभी को कह दे कि मैं बाहर गाडी में बैठा हूँ, वे भी शीघ्र वापस आ जाएँ। लेकिन उन्हें आने में वक़्त लग गया, जिससे मुझे चिंता होने लगी।। उनके आने पर मैंने देर की वजह पूछी तो उनके बताये पता चला कि पण्डों ने सभी को घेर लिया था, जिनसे इनकी काफी बकझक हुई थी। पण्डे अपनी मनोवांछित रकम की मांग पर अड़ गए थे और उनका कहना था कि पैसे चुकाए बिना वे किसी को नहीं जाने देंगे !! इस बात पर कमल को काफी कष्ट हुआ और महिलायें भी काफी त्रस्त हो गयीं थीं। आखिरकार 365/ रुपये दे कर कमल ने जान छुड़ाई!! तब हमने फैसला कर लिया कि अब हम इस यात्रा में किसी मंदिर में नहीं जायेंगे।

भारी मन से हम भुवनेश्वर के लिए चले। रास्ते में हमने धौलागिरी देखा। फिर भुवनेश्वर पहुँच कर एक रेस्टुरेंट में हमने लंच किया। फिर खण्डगिरी देखा। इतने में काफी शाम हो गई थी जिसके वजह से  हम अपनी महिलाओं को अपने वादे के मुताबिक शौपिंग नहीं करा सके। गाडी का समय हो गया था। अत: हम भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पहुंचे। और प्लेटफोर्म पर एक खाली स्थान देख कर गाड़ी से सभी सामान उतारकर उस स्थान पर रखकर वहीँ बैठ गए और गाडी की प्रतीक्षा करते समय बिताने के लिए प्लेटफोर्म पर घूमने लगे। भुवनेश्वर का रेलवे प्लेटफोर्म काफी स्वच्छ और सुन्दर लगा। यहाँ हमने चारु ड्राईवर को उसके गाडी का किराया और कुछ बख्शीश दे, उसका शुक्रिया अदा कर विदा कर दिया।

ठीक शाम के 7 बजे हमारी गाड़ी "गरीबरथ" प्लेटफोर्म नंबर-1 पर आकर खड़ी हो गयी। G7-बोगी पर पहुँच कर हम गाड़ी पर सवार होकर अपने सामानों को व्यवस्थित करके बैठ गए। गाड़ी अपने नियत समय पर राँची के लिए खुल गई।

अभी रात के 10:15 बज रहे हैं। मैं उपरले बर्थ पर बैठा इन पंक्तियों को अपनी नोटबुक में कलम से लिख रहा हूँ। गाड़ी अपनी पूरी रफ़्तार से राँची की ऑर भागी जा रही है। .......................!

गुड-नाईट,
जय जगन्नाथ।
_श्रीकांत तिवारी .
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26-12-2012 बुधवार, हटिया स्टेशन (रांची) प्रातः 06:15

हम सकुशल वापस आ गए। यहाँ धीरू हमारी गाड़ी लेकर आया है। मुझे लड्डू को ठीक 9 बजे स्कूल पहुंचाना है। क्योंकि उसकी परीक्षा है। मैं, माँ, वीणा, लड्डू और धीरू ने लोहरदगा के लिए प्रस्थान किया । रास्ते में कमल का फोन आया मैं अपना बैकपैक (बैग) ट्रेन में ही भूल आया था ("...मेरी चौंथी धक्क!!) जिसे वो संभाल कर राँची ले जा रहा है। आखिर थोड़ी ही देर बाद मुझे डॉक्टर से आँख दिखा कर नया चश्मा लेना था, सो वापस रांची आना ही था। लड्डू को स्कूल पहुंचा कर हम घर आ गये।

01 बजे दोपहर को मैं धीरू के साथ फिर रांची चला गया।

.....................................इति.......................................

श्रीकांत .

Sunday, December 30, 2012

दोस्तों ! साथियों !! मेरे प्रिये भाइयों !!!

दोस्तों ! साथियों !! मेरे प्रिये भाइयों !!!

अभी दिवंगत दामिनी बहन, हमारे देश की बच्ची जिस ज़ुल्म की भेंट शहीद हो गई, ये वक़्त जश्न का नहीं युद्ध का है। गुराँ दे सींघों के जागने का है। उस बच्ची को न्याय दिलाने का है। इसके लिए हमें भी कुछ करना ही पड़ेगा। हम पाठक सर के बन्दे हैं। क्या हम यूँ ही शर्मिंदा होते रहें और आस लगाए रहें कि कहीं से कोई कपनिक पात्र आकर हमें कहेगा कि "ठण्ड रख, मैं हूँ ना।" और हमारी लड़ाई वो लडेगा, हम सिर्फ उसके कारनामे पढेंगे और खुश होकर निहाल हो जायेंगे। ना जी ना ! ऐसे भ्रम में मत पड़िए। खुद को गुराँ दा सिंह समझो, बनो और लड़ो। "विमल" तुम बनो, तुम बनो, वो भी बने, ये भी बने और मैं भी बनू ताकि पाठक सर की कल्पना शर्मिंदा न हो। _ विमल को शान्ति और चैन की तलाश है, पर प्रारब्ध वश वो विवश है, और लड़े ही जा रहा है, लड़े ही जा रहा है ....और यही इस पात्र की नीयति भी है। पर वास्तविकता में हमारी भी क्या यही नीयति है? कोई चिकित्सक है, कोई सिपाही है, कोई क्लर्क है, कोई एकाउंटेंन्ट है, कोई इंजिनियर है, कोई शायर है, कोई लेखक है, कोई सीधा-सदा गृहस्थ है। पर सबका वजूद तो है न। क्या जो दिल्ली में हैं उन्हीं का प्रदर्शन न्यूज़वर्दी है, बाकी के देशवासी क्या संज्ञाशून्य हो गए हैं। नहीं बंधुओं, ऐसी बात नहीं है। हम सुदूर प्रांत के वासी भी इस निर्दयिता से उतने ही आहात हैं जितने की राजधानीवासी।

...तो फिर हमें करना क्या चाहिए?

यहाँ हम अपने-अपने स्तर पर सुनील बन सकते हैं, रमाकांत बन सकते हैं, अर्जुन बन सकते हैं, जौहरी और उसके अन्य साथियों की तरह बन सकते हैं, और कुछ नहीं तो आदमी की औलाद एक सजग, जागरूक नागरिक भी बन सकते हैं या नहीं? अगर हाँ ! तो मिलाइये हाथ और अपने-अपने स्तर पर जिससे जो हो सके जो भी वो कर सके करे, न कर सके तो शर्म से डूब मरे।

"आज मैं श्रीकांत तिवारी इस मंच पर अपने स्वर्गीय पूज्यवर बाबूजी की कसम खाता हूँ कि अशलीलता को बढ़ावा देने वाली किसी भी वस्तुओं को हाथ नहीं लगाऊंगा। अपने आप को और अपनी अंतरात्मा को स्वक्ष रखूँगा। मेरे संकलनों में से, यदि कुछ अशलील होगा तो उसे जला कर ख़ाक कर दूंगा, उसका समूचा वजूद मिटा दूंगा। अभी इसी समय से मैं ऐसा कर दिखाने का संकल्प लेता हूँ। मैं कसम खाता हूँ कि अपनी बहन बेटियों की सदा रक्षा करूँगा, उनकी ही नहीं अगर मेरे आस-पास ऐसी घटना होती पाई गई तो इसका पुरजोर विरोध करते अपनी जान की परवाह किये बिना हुए उस ज़ालिम से भीड़ जाऊँगा जो ऐसा जघन्य कृत्य करता पाया जाएगा। आज के बाद मेरे घर से, मेरे संकलनों से कोई भी अशलील वस्तु यदि होगी तो उसका वजूद ख़त्म समझिये। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी मेरे संग्रहित संकलनों को देखकर शर्मिंदा हो और फफक कर रोते हुए मुझे कोसे कि :"छिः!!बाबूजी के पास कैसी गन्दी-गन्दी चीजें हैं!" मैं जनेउधारि ब्राम्हण हूँ, मैं गंगा मईया की शपथ लेता हूँ कि मैं गऊ का माँस खाऊं जो इस प्रकार की अशलील वस्तुएं मेरे पास से पाए जाएँ!"

अगर आपको इस संवाद से "आपके इस SMP मंच का डिसिप्लिन" भंग होता फील हो अगर आपको लगे कि मैं इस मंच को एक "पर्सनल ब्लॉग" की तरह इस्तेमाल कर रहा हूँ तो, मुझे इस मंच पर एक क्षण के लिए भी नहीं रहना। बिना सूचित किये मेरा नाम इस मंच से काट दीजिये, मैं खुद ऐसे मंच पर नहीं रहना चाहता। ...पर ...यदि आपको यह सही लगता है तो इस संवाद को Like क्लिक करने से पहले, कुछ "कमेंट" करने से पहले ये बताने की कृपा अवश्य करें कि आपने 'दिवंगत दामिनी' के दुःख से संतप्त हो कर क्या संकल्प लिया है, और प्लीज़  ...प्लीज़ इसे मज़ाक समझ कर इस संवाद की खिल्ली उड़ने की ज़रुरत पड़े तो पहले मेरे नाम पर स्याही पोत दीजियेगा, (जो पहले से ही पुती हुई है)।

पाठक सर के उपन्यास सिर्फ मनोरंजन मात्र नहीं हैं जिसके 80/- रुपये मूल्य चूका कर हम उनपर कोई एहसान करते हों। उनके उपन्यास की शिक्षाप्रद संवादों को याद कीजिये फिर बतलाइये कि ये हमारे धर्मग्रंथों से कहाँ भिन्न है?  मैं फिर अपने शब्द दुहराता हूँ: : पाठक सर के उपन्यास मेरे लिए उपनिषद के सामान पूज्यनीय है और मैं उनका उपासक था , हूँ और जब तक जिंदा हूँ पाठक सर का उपासक बना रहूँगा।

एक और बात जिनके पास विमल पूरी-की-पूरी सिरीज़ हो फिर नबर वन से स्टार्ट करें और सदा नगारा कूच का तक पहुंचें, इस पढ़ाई के दरम्यान आप जिन अनुभूतियों को महसूस करें उसे, अगर तब तक मैं इस मंच पर मौजूद रहा तो मुझसे और समस्त SMP परिवार के साथ शेयर करें।

राजेश परासर भाई की ये बात मुझे पसंद आई, (भले ही ऐसा न हो) कि प्रदर्शन सड़कों पर क्यों उस जेल पर धावा ही क्यों नहीं जहां वो दरिन्दे कैद हैं! इसमें मैं अपने एक स्टाफ की बात बताना चाहता हूँ उसी के अंदाजेबयां में : " भईया, जानते है, उ सालन के तो अईसन काल कोठरी में बंद करे देवे के चाहीं जहां एक्को लाईट "भों ....वालन" के नई दिक्खे। खाली बाहरेहें से खाना-पानी भित्तरे फेंक देवे के चाहीं। सालन के उहे अंधार कोठरी में सब्भे करम करे पड़े। हुंवें हगें-मूते-सुते-खाएं, लेकिन जिंदा रक्खल जाय, मरे न देवे!"

_श्रीकांत .

अमिताभ बच्चन के नाम श्रीकांत तिवारी का खुला पत्र - एक गुहार ...

आदरणीय श्री अमिताभ भईया !

आपके विडियो पोस्ट में आज देश की बेटी, हमारी बहन "दामिनी"/"अमानत", जो अपने ही शहर में अपने ही भाइयों की दरिंदगी की शिकार बन गई, जिसके जीने के ज़ज्बे ने और अपराधियों को सजा दिलाने की हिम्मत ने पूरे देश को आक्रोश के एक सूत्र में पिरो दिया है। उसका यह ज़ज्बा निश्चय ही व्यर्थ न जाएगा।


मेरे माननीय भईया ! क्षमा याचना के साथ मैं पूछना चाहता हूँ की क्या हमारे हिंदी फिल्मोद्योग की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो पोर्नस्टार्स, अशलील कलाकारों को उनकी फिल्मों को प्रतिबंधित करे? क्यों हमारे हिंदी फिल्म निर्माता खुला सेक्स, गन्दी वाहियात फ़िल्में सस्ते भाव में देश की मासूम और पहले से ही अधमरी जनता को, परोसे जा रहे हैं? क्या उन्हें कभी अक्ल नहीं आएगी? क्या यही उनकी नैतिकता है कि अशलील फिल्म बनाना और दरगाह में जाकर उस भद्दी फिल्म की सफलता की दुआ मांगना !!!??? क्या ऐसी फिल्मो का निर्माण और प्रदर्शन निंदनीय नहीं है? क्या ये शैतान की भयावह वहशियानापन में और उसकी भड़काई हुई आग में घी की आहूति दे कर उसको और ताकतवर और भयानक बनाने के लिए हवन करने जैसा दुष्कृत्य नहीं है? क्या ये आदमी के भीतर बैठे शैतान को उकसाने और ज़ुल्म ढाने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है? क्या चाहता है बॉलीवुड? _ कि उनके द्वारा निर्मित अशलील सेक्स-विषयक फिल्मों के  लज्जाजनक पोस्टरों से अटे पड़े शहर को अपनी महिलाओं के साथ निहारें और शर्म से मर जांये? हम अब बिकिनी में अपनी दीदियों, बहनों और माओं को देखें, और सेक्स की कल्पना को हकीक़त में आजमाने के लिए "दामिनी" जैसी बच्चियों पर टूट पड़ें? पोर्न अभिनेत्रियों को भारत की नागरिकता दे कर क्या सरकार ने समाज सुधार का काम किया है? क्या भारतीय नागरिकता पाकर ऐसी अशलील महिला अभिनेत्री के अभद्र कार्यकलाप बंद हो गए? क्या वह आदर्श भारतीय नारी का प्रतीक बन गई? क्या उसका भद्दा इस्तेमाल करना फिल्म निर्माताओं ने बंद कर दिया? नहीं। नहीं भईया नहीं।


कुछ उन्हें भी नसीहत देने की कृपा कीजिये। आदमी जब तक अपने खुद के भीतर बैठे वहशी शैतान को काबू नहीं करेगा ऐसी घिनौनी और देश को शर्मसार करने वाली घटनाओं को भगवान् भी नहीं रोक पायेगा। फिल्म निर्माताओं से मेरा हाथ जड़कर विनम्र निवेदन है कि विदेशों से आयातित अशलील महिलाओं का बहिष्कार कर उन्हें वापस उनके अपने पसंद के गंदे घरों को चले जाने को कहने की मामूली हिम्मत भी तो दिखाएँ। 

अपराधियों पर अंकुश लगाने के जितने क़ानून बनाए जाते हैं, अपराधी उससे आगे बढ़कर क़ानून का मज़ाक उड़ाने और बच निकलने के उतने ही तरीके ईजाद कर लेते हैं। क्या शराब पर प्रतिबन्ध लगाने से शराब का उत्पादन और उसका गलत उपभोग/उपयोग रूक गया? क्या पान-गुटखा-तम्बाकू पर प्रतिबन्ध लगाने से इनका उत्पादन और खुलेआम बिक्री और इस्तेमाल बंद हो गया? क्या उपदेश सुनकर गुंडे साधू बन रहे हैं? जी नहीं। ऐसा कुछ नहीं होगा। तब तक नहीं होगा जब तक इंसानी फितरत नहीं बदलेगी। दुनिया की कोई सरकार ऐसे घिनौने और दहला देने वाले और समूचे इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटनाओं को नहीं रोक पाएगी। जब हम खुद नहीं सुधरेंगे तो दूसरों को सुधरने की क्या नसीहत दे पायेंगे!? हमें इन दुखद घटनाओं से बचने और इन्हें रोकने के लिए पहले तो खुद को सुधारना होगा, फिर जहां तक हमारी ताकत हमारा साथ दे हमें अपने आस-पास घटती ऐसी वारदातों को रोकने के लिए लड़ना ही पड़ेगा। कोई सरकार कोई क़ानून इसमें हमारी सहायता नहीं कर सकती। अब यह सबकुछ हम पर और हमारी मानसिकता पर निर्भर है। अत: आप पूछेंगे कि पोर्न स्टार को निकाल देने भर से क्या अशलीलता का घिनौना प्रदर्शन रूक जाएगा? भईया, मेरा जबाब है कि ये एक पहल तो होगी। एक मिसाल तो बनेगी। इसके कुछ सुखद परिणाम की आशाएं तो बनेंगी।


अमिताभ भईया ! आप हमारे अभिभावक हैं। आपके इस स्थिर-चित्र के साथ आपकी आवाज़ का विडियो पोस्ट देखकर हमें यही लगा कि आप दामिनी के साथ घटी दरिंदगी और उसके दुखद प्रताड़ना और मृत्यु से अत्यंत दुखी हैं। यह एक गम से भीगे एक अभिभावक का करुण रूदन था, आपही की तरह हम भी ग़मगीन हैं और मारे विवशता के खून के आँसू रो रहे हैं। पर आप न किसी विवशता में जकड़े हैं और न ही हमारी तरह मजबूर हैं। आपके शक्तिशाली शाख्शियत और व्यक्तित्व की ताकत को हम जानते हैं। आप एक हुंकार लगा देंगे तो समूचा देश आपके पीछे आपका अनुकरण करता चला आएगा। आप हिंदी फिल्मोद्योग के सबसे मज़बूत आधार-स्तम्भ हैं। क्या हमें ये विवेचना और विश्लेषण करने की ज़रुरत है कि अमिताभ बच्चन की ताकत क्या है? क्या आप हनुमान जी की तरह अपना बल भूल गये हैं जिन्हें उनका बल याद दिलाने के लिए किसी को जामवंतजी बनना पड़ेगा? आपके प्रभाव से हिंदी फिल्मोद्योग क्या अनजान है, इतना धृष्ट है कि आपकी बात न मानी जायेगी? सिर्फ सरकार ही सबकुछ नहीं कर सकेगी। हमें, आपको भी कुछ करना पड़ेगा। अत: आपसे मेरी प्रार्थना है कि आप अपने बॉलीवुड को भी सुधारने की पहल करने की कृपा करे।


खुद को पहले सुधारने की जो बात मैंने कही है वो सिर्फ कथन मात्र न समझे। मैं आज, अभी ये संकल्प लेता हूँ कि मेरे अपने घर में यदि कोई अशलीलता को बढाने, भड़काने वाली वस्तु का वजूद मिटा दूंगा, ताकि मेरी संतान, मेरी बेटी गुनगुन (शरिष्ठा / SHARISHTHA) भगवान् न करे, उन्हें देखकर ये कहें कि "...छिः ! बाबूजी ने कितनी गंदी चीजों का संकलन कर रखा है!!" मैं सबसे पहले स्वयं को संयमित कर घर की सफाई करूँगा और ऐसी घटिया-अशलील वस्तुओं का, यदि वो मेरे घर में हैं, तो उन्हें अभी तुरंत जलाकर ख़ाक कर दूंगा। मैं जनेउ धारी ब्राम्हण हूँ, मुझे कसम है मेरे स्वर्गीय बाबूजी की कि मैं गऊ का माँस खाऊं जो कभी ऐसी शर्मनाक वास्तु मेरे पास से निकले। कसम है बाबूजी की। ,वो वस्तु चाहे बेशकीमती हो या न हो, नष्ट कर दूंगा। हमेशा के लिए उनका वजूद मिटा दूंगा। पर अपनी बेटी को शर्मिंदा नहीं होने दूंगा। बल्कि वो हिम्मती और जुझारू बनेगी जो इन दरिंदों से अपनी खुद की और अपने जैसी देश की बहन बेटियों की रक्षा के प्रति सजग बनेगी।

"कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज़े सुखन।
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।"
-----------------------------------(श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक की पुस्तक से).

सादर प्रणाम।
आपके सहयोग की अपेक्षा में 
आपका छोटा भाई,
श्रीकांत तिवारी, 
थाना रोड, लोहरदगा (झारखण्ड) 835302 भारत .





 अभी-अभी आपके पोस्ट को पढ़ा जिसमे "डर्टी पिक्चर" और "सनी लिओने" का जिक्र किया गया है। पढ़कर दिल को बहुत सुकून मिला कि मेरी बात को आपके सम्मुख कुछ कद्र मिलेगी। कुछ ही दिन हुए हैं मैंने facebook पर लिखा हुआ है, जिसे यदि आप थोडा वक़्त दें सकें तो शायद मेरी आवाज़ आपकी आवाज़ में मिलकर कुछ बलवती हो सकेगी:


Saturday, December 29, 2012

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा - चौथा दिन

24-12-2012  सोमवार,  जगन्नाथ पुरी 

आज का दिन कुछ विलम्ब से शुरू हुआ। हमारे सो कर उठने में देर की वजह से उदीयमान सूर्य का दर्शन हम सी-बीच पर नहीं कर सके। फिर भी सभी तैयार हो कर सी-बीच पर जा पहुंचे। वहां अभी और भीड़ बढ़ गई थी। छुटियाँ मनाने देश के अनेक हिस्से से ख़ास कर कोलकाता (पश्चिम बंगाल) से आये अधिकांश लोगों की भीड़ थी। हमने रोजाना की तरह बीच पर मछुवारों और मलाहों के कार्यकलापों और मेहनत और उससे प्राप्त जीव-जंतुओं और समुद्री, जलीय अनेक सामानों को देखा। माँ, वीणा और रूपा ने इनमे खूब दिलचस्पी ली और कुछ मोतियाँ खरीदीं। चिलिका में मोती खरीदने में उन्हें बढ़िया चूना लगा था, सो सी-बीच पर उन्हीं वस्तुओं को आधे से भी कम कीमत पर मिलता पा कर जहाँ वे खुश थीं वहीं उन्हें पिछले दिन के ठगी से गुस्सा और अफ़सोस हो रहा था।

काफी वक़्त सी-बीच पर गुजरने के बाद हम होटल वापस आये और समुद्र स्नान के लिए इस बार हम मॉडल-सी-बीच पर गए। वहां ज्यादा भीड़ नहीं थी। बने हुए शेड के नीचे चादर बिछा कर इस बार अपना बाकि बचा बाइफ़ोकल चश्मा मैंने रूपा को संभल कर रखने के लिए दे दिया। और दौड़कर पानी में बच्चों के साथ घुस गया। यहाँ लहरों के दूर में ही गिर कर टूट जाने के कारण उनका वेग किनारे पर आते-आते कमज़ोर पड़ जाता था। गहरे पानी में भी एक सामान्य तालाब जैसा फील हो रहा था। हमें यहाँ उतना मज़ा नहीं आया जितना पहले "गोल्डन बीच" (हमारे होटल के नजदीक वाला) पर आया था। लेकिन महिलाओं को यही पसंद आया जिसका उन्होंने खूब आनंद लिया। हम सभी माँ, वीणा, रूपा और सभी बच्चों ने तक़रीबन 2-घंटे तक समुद्र स्नान का मज़ा लिया। खूब खेले-कूदे। सी-बीच की रेत पर लेटकर स्निग्ध धुप का आनंद लेते समय जिम्मी और सन्नी और गुनगुन ने लड्डू को, कमल को और मुझे बालू से (सर्फ सर छोड़कर) पूरा ढक दिया। तभी वीणा ने मेरे मुँह में कुछ चने दाल दिए जिन्हें मैं चबाने लगा। ये देखकर माँ हंसने लगी। मेरे ऊपर इतना बालू पड़ा हुआ था कि जब उठाना चाहा तो विशेष शक्ति लगानी पड़ी। बालू से निकलकर मैं फिर पानी में कूद गया और खूब डुबकियाँ लगाईं। साफ़ नीले पानी में नहाने का मजा आ गया। तभी मुझे याद आया कि मेरे शॉर्ट्स की जेब में खर्च के रुपये थे ! हाय बाप !! तीसरा धक्क !!! मैंने चेक किया, पैसे सलामत थे क्योंकि जेब का बटन बंद था। फिर सभी मुझे कोसने लगे। मैं खेद से सिर हिलाते पानी से लिथड़े पैसे वीणा को दिए, जिन्हें वो खोल कर धुप में सुखाने लगी। लगता था जैसे वो पैसों की दूकान लगाए बैठी हो! मन में आया कि पूछूं :" बाई ! ये पाँच सौ वाले का कितना दाम है!?" पर वो और भड़क जाती इसलिए चुपचाप फिर समुद्र के कूद गया।

स्नान से लौटकर हम झटपट तैयार हुए और चेरू ड्राईवर के साथ गाड़ी में कोणार्क के लिए रवाना हो गये। कोणार्क में हमने एक गाइड (नाम : प्रताप) ठीक किया जिसके सहायता से हजारों लोगों की लम्बी लाइन के बावजूद हमें आसानी से प्रवेश टिकट मिल गया। गाइड की कमेंट्री के साथ हमने पूरे मोन्यूमेंट को अच्छी तरह से देखा। खूब तस्वीरें लीं गईं। हैण्डीकैम से विडियो शूट किया। वहां भी शंख हमें मुनासिब दाम पर नहीं मिला। तब कमल ने बताया कि पिछली शाम को सी-बीच पर वीणा ने एक शंख पसंद करके दाम पटा भी लिया था लेकिन वो और कम कीमत देना चाहती थी तो दूकानदार ने देने से इनकार कर दिया था। तब चेरू ने कहा कि पुरी में मंदिर के सामने के बाज़ार में हमें मुनासिब दाम पर इससे भी बढ़िया शंख मिल जायेगा।

हम पुरी वापस आ गए। और मंदिर के सामने खूब भटकने के बाद एक  जगह "सौदा" पट गया, और मुझे मेरा शंख मिल गया।

इसके बाद हम वापस अपने होटल के पास "गोल्डन सी-बीच" के मेले में चले गए जहाँ बच्चों के साथ मैं रोलर-कोस्टर, जिसे हम अपनी जुबान में "रमढुलुवा" कहते हैं, पर चढ़ा। ऊंचाई से सी-बीच का मनभावन नज़ारा देखकर दिल झूम गया। अफ़सोस कि मेरे हाथ में उस वक़्त कैमेरा नहीं था। झूले का मज़ा मुझे मेरे बचपन की याद करा गया।

वहीं बीच पर किनारे लगी कुर्सियों पर बैठकर कुछ खाते-पीते हम समुद्र को और उसकी गरजती लहरों को देखकर आनंदित होते रहे।

फिर होटल वापस।

गुड नाईट।
जय जगन्नाथ!
_श्रीकांत .
..........................................................................जारी

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा -तीसरा दिन

23-12-2012 रविवार ; जगन्नाथ पुरी 

...आज की मेरी शुरुआत हुई बीच पर उदीयमान सूर्य के दर्शन और वाक से। मैं, कमल और लड्डू बीच पर गये, बाकी कोई उठाये न उठा।

बीच पर का भोर का नज़ारा और उसका अलौकिक वातावरण मेरे लिए अवर्णनीय है, मैं स्वयं को इसके काबिल नहीं पाता कि इसके सम्बन्ध में कुछ कसीदे पढूं या लिख सकूँ। बस यही कह सकता हूँ : अदभुत ! विहंगम ! भब्य ! विशाल ! आदि ! अगाध ! अबाध ! अनंत ! प्रलयंकारी ! जीवदायिनी ! शांत ! एक कविता ! एक गाथा ! एक पूरा महाकाव्य ! और सम्पूर्ण जीवन का सार ! समुद्र, महासमुद्र ...दुस्तर, दुर्गम, अपार ..........!!

हम बीच पर खूब दूर तक अपने हाथ में अपने जूते थामे नंगे पाँव सुबह की नर्म रेत पर घूमते-टहलते भोर की ताज़ी हवा में सांस लेते-छोड़ते काफी दूर तक चले गये। दूर समुद्र के गहरे पानी में तैरते मछुवारों और मलाहों के मेहनत-मशक्कत को निहारते हमें नई अनुभूति का आनंद मिल रहा था। अपने जाल, जिसे मछुवारों और मलाहों ने रात की मेहनत से डाला था अब उसे वो कई जने आपस में मिलकर उसे खींच रहे थे। यूँ समेटी गई जाल में कई तरह के समुद्री जलीय जीव-जंतु, मछलियाँ, केंकड़े, झींगे, सीप, शंख, मूंगे, मोती मिले जिसे हम देख कर हैरान भी हुए और हर्ष भी हुआ। मैंने एक गंभीर शब्द करने वाला कंटीला शंख खरीदा। फिर वहीँ बीच पर चाय का लुत्फ़ उठाया। लौटने पर मैंने डुग्गु के सामने बैठ कर जोर से शंख बजाया, मारे डर के डुग्गु रोने-चीखने लगा।

आज हमने चिलिका झील की सैर को निकल पड़े। हमारा ड्राईवर "चेरू" बड़ा ही दक्ष ड्राईवर था, और पुरी का चप्पा-चप्पा जानता था। उसने हमें रास्ते में पड़ने वाले कई और दर्शनीय स्थलों, मंदिरों को दिखाया। इस दरम्यान रास्ते  चेरू ड्राईवर हमें एक मंदिर में ले गया, जिसके दर्शन के बाद जब हम चिलिका जाने के लिए जैसे ही गाडी में बैठे वीणा की तबियत अचानक बिगड़ गई। आधे घंटे हम परेशान रहे। वीणा जब संभली तो उसे याद भी नहीं था कि उसके साथ क्या बीती थी ! यहाँ तक कि उसे सुबह मुझसे हुई अनेक और बातें भी याद नहीं थी!! ............!!!

हम चिलिका पहुंचे। खाने-पीने का सामन ख़रीदा। बोट की टिकट कटाई और एक बोट पर सवार होकर हमने पूरे 5-घंटे झील में बोटिंग करते गुजारा। एक जगह, काफी इंतज़ार के बाद हमें पानी में हलचल होती दिखी, डोल्फिने पानी के नीचे से ऊपर नहीं आ रहीं थी। आज उनका मिजाज़ बहार आने का नहीं था, फिर भी पानी के नीचे से डाइव मरते एक डोल्फिन की दुम दिखी और हम हर्ष से यूँ चिल्लाये जैसे वो हमारी गोद में आ बैठी हो। काफी देर हो चुकी थी, सबको भूख भी सता रही थी। आते वक़्त रास्ते में हमने चेरू के बतलाये एक रेस्टुरेंट में पहले ही खाने का आर्डर दिया हुआ था। खाना हमें तैयार मिला। भोजन के बाद हम वापस पुरी लौट आये और सी-बीच पर लगे मेले में घूमने लगे। मेरा एक बढ़िया वाला, खूब ज़ोरदार आवाज़ करने वाला, भारी, चिकना असली समुद्री शंख लेने का बहुत मन था, इसे सभी शुरू से जानते थे, सो सबने वहाँ लगे बाज़ार में शंख ढूंढना शुरू किया, जब कोई पसंद आता तो उसकी कीमत सुन कर मन उतर जाता था, क्योंकि मोल-मोलाई बाद भी जो रकम तय होती वो भी हमसे चुकाया न जा सकता था। यूँ ही बीच पर ही कुछ खाया। किसी का खाना खाने का मन नहीं था। अत: हम होटल वापस आ गए। और बिस्तर के हवाले हो गये।

गुड नाईट,
जय जगन्नाथ!
_श्रीकांत .
...................................................................................................जारी 

दिल्ली गैंग-रेप की शिकार बच्ची का सिंगापूर के हस्पताल में निधन

अभी-अभी (सुबह 10:33 बजे) ये दुखद समाचार मेरे मोबाइल पे मिला कि दिल्ली गैंग-रेप की शिकार बच्ची का सिंगापूर के हस्पताल में निधन हो गया !! ...........!! टीवी और इन्टरनेट पर यह दुखद समाचार प्रसारित हो रहीं है।
भ्रष्टाचार ! आतंक ! हत्या !! बालात्कार !!! से त्रस्त मैं तुम्हारी भारत माँ का ध्वज ! तुम्हारी आन-बान और शान सहित तुम्हारी वीरता का प्रतीक ! तुम्हारा तिरंगा ! शर्म और तुम्हारी निश्कर्मन्यता की कालिख से आज मैला हो चूका हूँ। मुझे मेरा हक और इन्साफ चाहिए! मुझे मेरा दामन साफ़ करके दो!

आज मुझे कोई ख़ुशी प्रसन्न नहीं कर पाएगी।
बहुत ही अफ़सोस, दुःख, निराशा-हताशा मिलकर क्रोध के रूप में मेरे प्राण क्षीण कर रहे हैं। इस विवशता और अपनी कमजोरी पर मुझे अत्यंत खेद है।

श्रीकांत  .


श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा - दूसरा दिन

22-12-12 शनिवार ; जगन्नाथ पुरी :

आज सुबह हम सकुशल 'पुरी' पहुँच गये। स्टेशन पर मोटर गाडी हमें हमारे होटल ले जाने के लिए उपलब्ध थी। हम जैसे ही चेक इन किये बच्चों, ख़ास कर जिम्मी, ने सबसे पहले सभी बात छोड़ कर सी-बीच जाने की जिद्द पकड़ ली। मैं भी उन्हीं के सुर-में-सुर मिलाकर बातें करने लगा। अन्ततः सी-बीच पर जाने का फैसला सर्वसम्मति से पास हुआ, सभी ने सी-बीच, समुद्र स्नान के मुनासिब कपडे पहने/बदले, मैंने डुग्गु को कंधे पर बिठाया और सी-बीच के लिए निकल पड़े। हम सभी पैदल ही सी-बीच पहुँच गये। वहाँ पहुँचते ही मैं नन्हा बच्चा बन गया।

सी-बीच पर मेला जैसा दृश्य था, अपार भीड़ थी, हर्षित-उल्लसित जन-समूह के अभूतपूर्व मनमोहक दृश्य से हमारी सारी थकान मिट गई। भीड़ और पानी में किलोल करते हज़ारों लोगों की मौजूदगी के बावजूद सी-बीच खाली-खाली लगता था।

मुझे नेत्र दोष है। नेत्र विकार मुझे बचपन से है जिसके कारण मैं हर वक़्त चश्मे का मोहताज़ हूँ। मुझे 2-प्रकार के चश्मे पहनने पड़ते है। एक फोटोक्रोमैटिक ड्राइविंग इत्यादि के लिए, दूसरा बाइफ़ोकल पढने-लिखने के लिए। बीच पर मैं फोटोक्रोमैटिक चश्मे को पहने गया, जिसे मैं हमेशा पहनता हूँ, जिसकी मुझे आदत पड़ गई है। महिलाओं ने रेत पर चादर बिछाई, एक रंगीन छतरी वाले से बड़ा छाता लेकर रेत में खड़ाकर उसकी छाँव में सभी अपने कपडे बदलने लगे। मैंने अपना T-शर्ट और जूते महिलाओं के पास रखा और जिम्मी, सन्नी, लड्डू और गुनगुन के पीछे किलकारियां मरता भागा। मैं उन्हें लगातार हिदायतें दे कर कंट्रोल में रह कर स्नान करने और खेलने-कूदने को कह रहा था। गुनगुन पानी में जाने से डर रही थी और गीले रेत पर कूद-फांद रही थी। तभी माँ आ गई और सभी बच्चों के सिर को निवछ-निवछ कर जय गंगा माइया कहकर समुद्र में सिक्के अर्पण करने लगी। मैं भी धार्मिक भाव से "जलनिधि" की स्तुति करने लगा, और मंत्रोच्चार कर नतमस्तक हो गया। तभी माँ ने मेरे सिर को निवछकर सिक्के समुद्र में उछालना चाहा, पर मैंने देखा कि वो सिक्कों को ज्यादा दूर नहीं फेंक पा रही थी सो, मैंने माँ के हाथ से सिक्के लेकर जयजयकार का उदघोष करते हुए जोर से सिक्कों को दूर तक समुद्र के अर्पण कर दिया। उसके बाद फिर मेरी उधम शुरू हो गई, बच्चों के साथ मैंने जमकर डुबकियाँ लगाईं। अचानक मुझे कुछ गडबडी का अहसास हुआ! मुझे हमारा शेड, माँ, वीणा, रूपा, डुग्गु नज़र नहीं आ रहे थे। मुझे सबकुछ धुंधला-धुंधला दिख रहा था!! ...हाय बाप ! ...मेरा चश्मा !! ...मेरा चश्मा !!! बड़ी-बड़ी लहरों से उलझते-उठते-गिरते-पटकाते मैं नीचे पानी  अपने दोनों हाथों की उँगलियों से रेत को बुरी तरह खंसोटने लगा, तब तक मेरी गुहार बच्चों ने भी सुन ली थी, वे भी मेरा चश्मा ढूँढने लगे, किनारे से माँ, वीणा भी आ गईं और मुझे डांटने लगीं। हमने खूब ढूंढा पर अफ़सोस मेरा चश्मा समुद्र के अर्पण हो चूका था। जलनिधि ने मुझसे मेरा चश्मा चीन लिया (पहनेंगे क्या?)_ ! ये थी हमारी पहली "धक्क"!! इसी बीच एक बड़ी लहर की मार लड्डू से झेला न गया और वो बुरी तरह त्योराकर गिरा और पानी में डूबने-उतराने लगा। हमने उसे संभाला। हमने उसका हाल पूछा तो पाया कि बच्चे के घुटने बुरी तरह ऐंठ गए थे और उसे गहरी पीड़ा हो रही थी, वो ठंढ और भय के कारण थरथर काँप रहा था। हम उसे किनारे अपने शेड के पास ले गए, कमल ने उसके घुटने की मालिश की, उसे पैर झटकने में दर्द हो रहा था और उससे चला नहीं जा रहा था। ये थी हमारी दूसरी "धक्क!!" हमने धुप में उसे बिठाया और उसके घुटने के मुआयने से जाना कि किसी किस्म का फ्रैक्चर नहीं था। नसों में खिंचाव आ गया था। धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी। तभी गुनगुन की नज़र एक ऊँट पर पड़ी। सजा-धजा ऊँट गुनगुन को बहुत सुन्दर लगा, वो उसकी सवारी के लिए मचलने लगी। जिम्मी-सन्नी समुद्र में मगन थे इसलिए हमने लड्डू को गुनगुन के साथ ऊँट पर चढ़ाया। ऊँट वाले ने सीढ़ी लगाकर बच्चों को चढ़ने में मदद की। ये देख मुझे भी ताव आ गया और सीढ़ी की सहायता से ऊँट पर जा बैठा। मुझे चढ़ते देख वीणा ने कहा :" अरे, आप कहाँ चढ़ रहे हैं! ऊँटवा इतना भारी बोझा सहने सकेगा का !?" सभी हंसने लगे। ऊँट जैसी आगे चला उसकी डगमग से गुनगुन चिल्लाने लगी, फिर मेरे पुचकारने पर, लड्डू के कहने पर वो शांत हुई और ऊँट की सवारी का भरपूर आनंद लेने लगी। ऊँट की सवारी के बाद हम सभी और बारी-बारी सभी महिलाओं ने समुद्र स्नान का खूब आनंद उठाया।

वीणा, सन्नी, लड्डू और गुनगुन का यह पहला अनुभाव था "समुद्र दर्शन, और स्नान का!" वीणा ने काफी डरते-डरते, कुछ समुद्र के विकराल स्वभाव को देखकर, कुछ अपने "4-चार ऑपरेशन; सर्ज़री" झेल चुके ज़ख़्मी बाएं हाथ की वजह से, इनके बावजूद उसकी प्रसन्नता से हम भी प्रसन्न थे, हमने खूब मस्ती की। गुनगुन रेत से पहाड़, इत्यादि बनाती और लहरें उन्हें तोड़कर अपने साथ बहा ले जातीं। अब लड्डू भी समुद्र स्नान को एन्जॉय करेने लगा। नए ख़रीदे डिजिटल कैमेरे से खूब तस्वीरें खींची गईं। कमल ने जिम्मी से अपना खुद का फोटो खीचने को कहा और 1979 की अपनी चिपरिचित मुद्रा में कमर पर हाथ रखकर सिर्फ चड्ढी में खड़ा हो गया। इस तस्वीर को जब हमने देखा तो खूब हँसे, 1979 का नन्हा "गबुदन", अभी एक दुधारू गाय की तरह दिख रहा था।

अब रूपा भी कमल के साथ पानी में आ गई। डुग्गु को वीणा ने संभाला। रूपा पहले डरते-डरते, फिर खुश हो कर समुद्र स्नान का आनंद लेने लाफि। फिर माँ भी आ गई, पर लहरों के थपेड़ों के आगे उसकी पेश नहीं चल रही थी और हमारे करीब नहीं आ पा रही थी। हमने माँ को संभाल कर अपने नहाने वाले सुरक्षित स्थान तक ले आये। उसे स्वतंत्र छोड़ कर हम खेलने लगे। तभी एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हमसे फोटो की रिक्वेस्ट करने लगा। तब हमने वीणा को भी फिर पानी में बुला लिया, लड्डू डुग्गु के साथ रहा। इस दरम्यान माँ कई बार गिरी-उठी, जैसे ही फोटोग्राफर ने रेडी बोलता, लहरों के जोरदार थपेड़े हमें बिखेर देते थे, एक बड़ी लहर के जोरदार धक्के से माया 30-फुट दूर किनारे तक बहती चली गई, माँ को यूँ बहते किनारे की ओर जाते देख सभी खूब हँसे, माँ भी हंसने लगी। हँसते हुए उठकर हम फिर जमा होते और फोटोग्राफर हमसे पोज़ बनाने को कहता। वीणा इससे थोड़ी अनसा गई। फिर भी कुछ तस्वीरें खिंच गईं। फिर माँ, वीणा और रूपा शेड में चली गईं।

खारे पानी से मुँह का स्वाद बिगड़ गया था, सो हमने सी-बीच पर बिकते खाद्य-पदार्थों में से कुछ नमकीन और कुछ रसगुल्ले और दूसरी मिठाइयाँ खाईं। फिर बदन सुखा कर रेत झाड़कर कपडे पहन कर हम होटल लौटे जहाँ मैंने गर्म पानी से फिर स्नान किया। खाना खाए। सभी इतने थक चुके थे कि बिस्तर में ही पनाह सूझी। सभी गहरी नींद में सो गए।

शाम में धुले हुए स्वच्छ वस्त्र पहन कर हम सभी श्रीजगन्नाथजी के मंदिर, पूजा और दर्शन के लिए गए। हमारे ड्राईवर ने एक पण्डे को बुलवाया और हमें उसके हवाले कर दिया। पण्डा श्री जगन्नाथ प्रतिहारी जी उर्फ़ हाड़ू पण्डा जी ने हमें सबकुछ समझाया कि कहाँ क्या करना है और कहाँ क्या नहीं करना है। पार्किंग एरिया से हम पैदल ही भगवान के दर्शनों को चल दिए। वहाँ सभी ने जूते-चाप्पल जमा कर टोकन लिया। एक नल के पास जाकर हाथ-पैर धोए, सर पर जल छिडका और हाड़ू पंडा जी के निर्देशानुसार उनके पीछे-पीछे चले। पण्डा जी ने हमसे चढ़ावे की बात की, दक्षिणा की रीत समझाई तो घर का कर्ता होने के कारण मुझे पण्डा जी रजिस्ट्रेशन ऑफिस में ले गए जहां 501/-रुपये से ले कार एक (मेरे लिए) अविश्वसनीय राशि के चढ़ावे और उसकी रीत समझाई। मैंने अपनी ताकत-हिम्मत और औकात के अनुसार एक राशि पर अपनी सहमती दी तो रजिस्ट्रेशन ऑफिस के कर्मचारी और श्री हाड़ू पण्डा जी ने मुझसे तर्क-कुतर्क, वाद-विवाद और समझौवल-मानौवल करने लगे। उनके आगे मेरी पेश न चल सकी, आखिरकार एक उन्हीं के निर्दिष्ट राशि पर कि इससे मुझे, मेरे समस्त परिवार को, मेरे पुरखों को क्या-क्या मिलेगा, मैंने अपनी हामी भरी। तब_! बकायदे मेरे पूरे परिवार के सदस्यों का स्वर्गीय पूज्यवर बाबूजी के नाम के साथ सभी का नाम रजिस्टर हुआ। और हमें दर्शन की परमिट मिल गई। मंदिर में जहां भगवान् स्वयं बहन सुभद्राजी और भईया बलभद्रजी के साथ विराजमान हैं, जब हम वहां पहुंचे तो पाया भगवान् और उनके भक्तों के बीच एक लम्बा फासला है और मुख्य द्वार पर बॉक्सर और बाउंसर जैसे मुस्टंडे पण्डों के वेष में तैनात हैं, कुछ उम्रदराज़ पण्डे द्वार पर फर्श पर ही पसरे हुए हैं, और भगवान इनके बंदी और कैदी बने हुए है। पंडों और दर्शनार्थियों में बकायदे झगडा-झन्झट हो रहा है, पण्डे बेरहमी से दर्शनार्थियों को धकिया रहे थे। हमने हाड़ू पन्दा जी के समझाए मुताबिक प्रवेश करना चाहा तो नीचे बैठे एक वृद्ध पण्डे ने बेरहमी से मुझे धकेल दिया। तभी हाड़ू पण्डा जी ने कुछ संकेत दिया, हमें कहा गया यहीं से दर्शन कर लो, सो बारी-बारी हमने की। फिर हम वहां से निकले तो मुझे मेरे भगवान् के मनोवांछित दर्शन संयोगवश बड़ी सुलभता से हो गई! वो थे वट-वृक्ष के पत्ते पर विराजमान श्रीकृष्ण !! मैंने आज्ञा लेकर भगवान् के चरण पकड़ लिए। मन भारी हो गया। फिर सभी से उनके दर्शन किये। फिर हमें माँ लक्ष्मी के मंदिर में ले गए, जहाँ का नज़ारा ऐसा था की "टिकट" देखकर प्रवेश की आज्ञा मिलती थी। द्वार को घेरे खड़े पण्डों ने एक बड़ा सा परात रखा था, जिसमे बिना "बड़े नोट" डाले बगैर प्रवेश वर्जित था, सभी निराश होकर वापस होने लगे तभी मैंने मन-ही-मन दृढ निश्चय लेकर परात में एक सौ रुपये का नोट डाला, तुरंत मुझे दाखिला मिल गया। मैं माँ लक्ष्मी के भब्य विग्रह के आगे भाव-विह्वल खड़ा होकर स्तुति करने लगा। वहां एक 22/24 वर्षीय युवक पण्डा बना बैठा था उसने बिना मेरे कहे, बिना मुझसे पूछे मेरे से कुछ कर्मकांड कराने लगा। फिर बारी आई मोल-भाव की! तुरंत हमारे हाड़ू पण्डा जी प्रकट हुए और युवक को संकेत किया। युवक एक ख़ास रकम का खूंटा गाड़ कर जिद्द करने लगा, मैंने उनकी बड़ी मिन्नतें की। कोई सुनवाई नहीं। आखिरकार मैंने जब अपनी जेब झाड दी तो मेरे पास सिर्फ एक 50/ रूपए का नोट भर बचा था!! वहां से निकला तो सभी मुझपर टूट पड़े, :"क्या ज़रुरत थी अन्दर जा कर पैसे चमकाने की!!??" मैं उन्हें कैसे समझाता की "माँ" अनमोल है। मैं संतुष्ट था। कोई शिकायत नहीं।

हाड़ू पण्डा जी ने हमारे चढ़ावे की, मेरे आग्रह पर, 2 पैकिंग बनवा लाये थे। और एक मिटटी की हांड़ी में "महाप्रसाद" लेते लाये थे जो शुद्ध घी में पकी खिचड़ी थी। हमने प्रसाद पाया। भगवान् को पुनः नमस्कार किया, हाड़ू पण्डा जी की "फीस", मेरे कहने पर, कमल ने चुकाई। फिर हम वापस लौट चले। मन बहलाने के लिए हम सी-बीच पर आ गए। वहां के मेले जैसे माहौल में हमारा दिल फिर प्रसन्न हो गया। घूम-फिरकर हम वापस होटल लौट आये। रात्रि भोजन (शाकाहारी) होटल में ही हुआ। यूँ हमारा आज का दिन बीता।

गुड-नाईट!
जय जगन्नाथ!  
_श्रीकांत .



श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा - पहला दिन

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा 21,दिसंबर,2012 से ... 26,12,12 तक :-

21-12-2012 पहला दिन,  हटिया (राँची) स्टेशन  :
इस समय हमारी ट्रेन 'हटिया-पूरी, तपस्विनी एक्सप्रेस एक अनजान हाल्ट पर खड़ी है, समय सायं 08:44 ...

               यात्रा की तैयारी कल दिनभर और देर रात तक करने के बाद __ आज 21,12,12 को सुबह 5 बजे ही मैं जाग चूका था। माँ के तरफ से आती आहटों की आवाज़ से लग रहा था कि घर को झाड़ू से बुहारने लगी थी। हमारे कमरे में माँ ने प्रवेश किया :"...वीणा! जाअगा ! बिहान हो गइल।" वीणा :"हाँ माँ ! मैं नींद में होने का बहाना करते यूँ ही बडबडाया :"अर्रे ! क्या हुआ? अँधेरे में कहाँ जा रही हो, देखो ठीक से जाना, बत्ती जला दूं या साथ चलूँ, गिरना मत।" वीणा :"चुप रहिये, बकर-बकर मत करिए, अभी आप सुतले रहिये चुपचाप।" ...और फिर राँची प्रस्थान की तैयारी होने लगी। मैंने निश्चय किया था कि शिट-शेव-शावर राँची में ही करूँगा। सिर्फ ब्रश किया और कपडे पहन कर सभी सामानों को चौकस करने लगा कि सबकुछ सोचे-विचारे योजना और बच्चों के शौक और फरमाइशों के मुताबिक सबकुछ ठीक था या नहीं। फिर सभी तैयारी हो जाने के बाद माँ ने धीरू (मेरे मौसेरा भाई) को आवाज़ दी :"धीरू ........", धीरू :"हं हं, जागल बनी, एकदम रेडी।" चूंकि राँची में भी काम था अत: हमने ज्यादा देर नहीं की। धीरू के तैयार होकर गाड़ी द्वार पर लाने तक मैं स्व. पूज्यवर बाबूजी की मूर्ती के सामने बैठकर स्तुति-प्रार्थना करने लगा। तब तक सभी सामन गाड़ी में रखा जा चुका था। मैंने मलुवा और उसके बच्चों को दुलार किया, फिर हमने घर को चेक करके लॉक किया, धीरू ने ड्राइविंग संभाली, तभी मैं गद्दी चला गया, और मोहन चाचा से मिलकर शीघ्र लौटकर गाड़ी में बैठा और पेन-ड्राइव लेकर ऑडियो सिस्टम को अपने पसंदीदा ट्रैक पर सेट कर दिया। धीरू ने गाड़ी स्टार्ट की और श्री गौरी-गणेश-महेश की जय, भईया बलभद्र जी, बहिनी सुभद्रा जी, श्री-जगन्नाथ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी की जय बोलकर हम निकल पड़े। गाडी में जो पहला गाना बजा वो मनोज कुमार के एल्बम से "_ मेरा रंग दे बसंती चोला" से शुरू हुआ। मधुर संगीत का आनंद लेते हम राँची फ्लैट पर पँहुच गये। वहाँ हमने अपनी तैयारी रिफ़्रेश की। मैंने शेव किया, शिट कहीं सटक गया था, फिर शावर की जगह लोटा-बाल्टी से ही हर-हर गंगे बोल कर स्नान किया। नाश्ते के बाद हम मार्किट निकलने ही वाले थे कि जिम्मी अपनी चप्पल को मरम्मत कराने मोची के पास चला गया। उसके जाते ही जब मैं जूता पहन रहा था कि पाया कि उसका सोल (हील के पास से), बुरी तरह उखड कर लटका हुआ था! "...हं ...हं ...हं, कल मलुवा को मारने के लिए दौडाए थे और मैं गिरते-गिरते बचा था, ज़रूर उसी वक़्त जूते का सोल उखड़ गया होगा। अब तो समस्या हो गई। जिम्मी जा चूका था, अचानक लौट आया। बोला मोची कहीं नहीं है, शायद आज आया ही नहीं। तब धीरू ने एक झोले में सभी टूटे जूते-चप्पलों को लेकर गया और आधे घंटे में मरम्मत करा कर वापस आ गया। फिर जिम्मी, धीरू और मैं शोपिंग के लिए बाज़ार चले गए।हमारे पास कोई ढंग का कैमेरा नहीं था, अत: रूपा की इच्छा थी कि एक अच्छी क्वालिटी का डिजिटल कैमेरा हमारे साथ होना चाहिए। जिम्मी ने अपने स्किल्स से एक बढ़िया कैमेरा खरीदवा दिया, जो सबको खूब पसंद आया। सिवाय वीणा के। उसकी नज़र में ये फिजूलखर्च था। जिम्मी ने अपने लिए और अपने छोटे भाइयों के लिए शोर्ट पैन्ट्स खरीद्वाये। तबतक घडी डेढ़ - पौने दो बजाने लगी थी और रह-रह कर मोबाईल बजने लगा, कभी वीणा, तो कभी कमल। हम शीघ्रता से घर पहुँचे। फिर सभी सामान गाडी में लाद गया, जिससे पूरी गाड़ी भर गई। जैसे-तैसे एडजस्ट होकर हम निकल पड़े। इस बार मैंने ड्राइव की। हम हटिया स्टेशन सवा तीन बजे पहुँच गए। 04:05 में गाड़ी खुलने वाली थी। गाड़ी प्लेटफोर्म नंबर-1 पे खड़ी थी। कमल ने और मैंने सबको निर्देश दिया और सभी ने मिल-बाँट कर सभी सामान उठाया प्लेटफोर्म की तरफ बढे। माँ ने गुनगुन को डांट-डपट कर कंट्रोल में रखा। मेरे आगे जिम्मी, सन्नी, लड्डू, रूपा जिसकी गोद में डुग्गु था, चले। मेरे पीछे माँ, वीणा, कमल और धीरू थे। कमल सबको बार-बार बोल रहा था कि हमारी बर्थ बोगी नंबर S-8 में है। S-8 तक सामान के साथ लंबा वाक करना पड़ा, जिसके कारण कभी कोई आगे हो जाता था तो कभी कोई पीछे रह जाता था, फिर भीड़ में गर्दन उचका कर उन्हें देखकर संतोष से S-8 की तरफ चले। पहुँचने पर सबसे पहले जिम्मी,सन्नी, लड्डू और गुनगुन S-8 में प्रवेश किये। उनके पीछे रूपा थी जिसे मैंने कहा :"रूपा ! यही S-8 है, चढ़ो-चढ़ो!" रूपा ने कहा कि वो बोगी के अगले दरवाजे से प्रवेश करेगी, क्योंकि उधर से हमारी बर्थ नजदीक थी, वो डुग्गु को गोद में लिए हुए बोगी में प्रवेश कर गई, तबतक वीणा ठीक मेरे पीछे थी। मैंने अपने हाथ के सभी सामान बोगी पर चढ़ाया फिर खुद चढ़ा, मुझे पूरा भान था कि वीणा ठीक मेरे पीछे है और मुझे फौलो कर रही है, वो मेरे पीछे आ जायेगी। फिर उसके पीछे कमल, माँ और धीरू तो थे ही। मैंने अपना सामान फिर उठाया और अपने नंबर वाली बर्थ के पास पहुंचकर देखने लगा कि सभी जन आ चुके हैं या नहीं। तभी माँ ने कहा :"अर्रे! बीना केने गईली, आह ददा छोड़ देला स का उनका !?" अचानक सभी हैरान-परेशान वीणा को ढूँढने लगे। वीणा बोगी में कहीं नहीं थी !! हम सभी मर्द बोगी से बाहर निकल कर प्लेटफोर्म पर पागलों की तरह वीणा को ढूँढने लगे। मैं और कमल आगे बढे, काफी दूर इंजन के पास से कमल ने हाथ हिलाकर मुझे इशारा किया कि वो वीणा के साथ आ रहा है। "हाय बाप ! वीणा इंजन के पास तक चली गई थी !"वो जब आ कर हमसे मिली तो हम आपस में शोर-शराबा करने लगे। वीणा का चेहरा फक्क पड़ा हुआ था। जब बोगी में उसे माँ और रूपा के पास लेकर पहुंचे तो वहां नया शोर-शराबा हुआ। ...फिर शांत। सबकुछ एडजस्ट और सभी कोई सैटलडाउन हो चुके थे। मैं और धीरू कुछ सॉफ्ट ड्रिंक्स लेने चले गए। तभी गाड़ी  के हूटर ने आवाज़ दी और हम सभी गाड़ी में अपनी सीट पर आ बैठे। धीरू ने भावभीने होकर सबको हैप्पी जर्नी कहा और बड़ों को प्रणाम कर बोगी से नीचे उतर कर खिड़की के पास आकर बच्चों और डुग्गु को दुलार किया, तभी गाडी सरकने लगी। धीरू ने हाथ हिलाते हमें विदा किया। गाडी खुल चुकी थी। मैंने मन-ही-मन इश्वर को याद किया और "रक्षा करो, करते रहना" की गुहार लगाईं। यात्रा शुरू हो शुकी थी। हम श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा पर रवाना हो चुके है। तभी एक नंबर सिक्स (हिजड़ा) आता दिखा। मैंने सबको सावधान किया। नंबर सिक्स (हिजड़ा) हमारे पास आया। उसने शेव की हुई थी और लिपस्टिक, काजल, बिंदी वगैरह धारण कर साड़ी पहने हुए था। उसके बांये हाथ की सभी उँगलियों में 20-10 के नोट लगे हुए थे जिन्हें अपनी अदाओं के साथ दिखलाकर हमसे पैसे मांगने लगा और दुआएं देने लगा। मैंने उसे एक 10 का नोट थमाया। उसने अपने तरीके से मुझे और मेरे आस-पास बैठे सभी जन को दुआएं दीं और ऊपर वाले बर्थ पर बैठे जिम्मी,सन्नी, लड्डू और गुनगुन से पैसे मांगने लगा तो वीणा ने उससे कहा की ये सभी हमारे ही बच्चे है, सो जो दिया वो सबकी तरफ से है। नंबर सिक्स (हिजड़ा) ने वीणा के मुंह के सामने अपनी बहुचर्चित ढंग से हाथ से ताल ठोक कर कहा :"आय हाय ! ये कहाँ से आई रे बाबा इ मीना कुमारी!" हमारी बेसाख्ता हंसी छूट पड़ी। फिर वो, नंबर सिक्स (हिजड़ा) लहराते बल खाते लचकते-मचकते आगे चला गया। पुरे रास्ते हम वीणा को मीना कुमारी बोलकर चिढाते रहे।

                    खाते-पीते, हँसते-गाते, मौज मानते,खेलते-खिलाते हमारा सफ़र शुरू हो चूका था। अभी हमारी गाडी राउरकेला से आगे झारसुगड़ा स्टेशन से खुली है। अभी जब मैं लिख रहा हूँ, समय है रात्रि 09:40PM.

शुभ रात्रि।
जय जगन्नाथ।
------------------------------------------------जारी ...

Friday, December 28, 2012

बादशा बेटे , पूरी में सचमुच मुझे बहुत गुस्सा आ गया था। वहीं साक्षी-गोपाल मंदिर में तो पण्डों ने मिलकर इस बुरी तरह हमें घेर था कि मुझे भागने में ही पनाह दिखाई दी। कमल फंस गया था, कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे हमें बंधक बना लिया गया है जो अब उनके मुंहमांगे दाम चुकाए बगैर खैर नहीं, आखिकार उन्होंने काफी दुर्व्योहार किया और मजबूरन हमें पैसे चुका कर ही मुक्ति मिली। इसके बाद हम फिर किसी मंदिर में नहीं गए।

हाँ ! सी बीच पर घूमना-टहलना, समुद्र स्नान का हमने खूब आनंद उठाया। कमल की एक तस्वीर सिर्फ तुम्हारी दिलचस्पी के लिए पोस्ट कर रहा हूँ। 1979 के दिसंबर में इसी पोज़ में एक काला ब्लेज़र पहने इस लड़के की फोटो आज भी खूब पसंद है, पर 2012 दिसंबर में इस ''बच्चे'' को (after metamorphosis) देखकर बतलाओ कि ये आदमी है या दुधारू गाय !!?

__श्रीकांत मामा


Thursday, December 27, 2012

पुरी यात्रा से लौट आये

27,दिसंबर,2012  "अभिनन्दन", कोकर, राँची     07:20 प्रात: 
   
               हम कल 26`दिसंबर को पुरी यात्रा से लौट आये। कल लड्डू का यूनिट-टेस्ट था जिसके वजह से हम हटिया स्टेशन जहाँ धीरू गाडी लेकर आ गया था, से ही लड्डू को साथ लेकर लोहरदगा भागे-भागे पहुंचे।लड्डू को उसके क्लास-रूम में पहुँचाने गए तो प्रिंसिपल सर से सीधे टकराय, ठंढ से हाथ मलते, मुंह से भाप छोड़ते बोले : " कहिये तिवारी जी ! आज ठंढ की वजह से आपको खुद बच्चे को लेकर आना पड़ा! बहुत ठंढ है आज, इसीलिये मैंने 1 घंटे के लिए क्लास रुकवा दी है, कुछ धुप आ जाय तो फिर बाकि क्लास शुरू होंगे। (लड्डू से) तुम अपनी क्लास में जाओ, तुम्हारा टेस्ट शुरू हो गया होगा, तुम जाओ। ...हाँ! तिवारी जी! और सब कुछ ठीक है न!" मैंने उनका शुक्रिया अदा किया और वापस स्कूल से बहार आ गया। हम घर पहुंचे। घर खोलते ही मलुवा हम पर झपटी और सभी को सूंघने-चाटने की कोशिश करने लगी और लोटकर, कूदकर अपना अनुराग जताने लगी। गाड़ी से सामन उतारने से पहले हम मलुवा के बच्चों को ढूँढने लगे, उसी से पूछने लगे : "अरे, बचवन कहाँ गे? मलुवा ने अपनी भाव-भंगिमा से उत्तर दिया होगा पर हम कभी उसके पीछे तो वो कभी हमारे पीछे, ...फिर मलुवा को पिछुवाते हम ऊपर छत पर पहुंचे। जाड़े की स्निग्ध धुप में बिछे एक बोरे पर पांचो बच्चे एक-पर-एक चिपके हुए एक-दुसरे से सटे हुए अपनी महीन आवाज़ में चूँ-चूँ  कर रहे थे। मन हर्षित हो गया। उनके साथ थोडा खेलकर वक़्त बिताकर झट से नहाया और पूरी जी से प्राप्त प्रसाद को स्थापित कर मैंने "माँ" की पूजा की और उनके आगे सबकुछ अर्पण कर अपनी झोली फैलाकर नतमस्तक हो गया। पूजा के बाद नाश्ता फिर वापस राँची भागा। मेरा अपना 'रेगुलर' चश्मा पूरी समुद्र के अर्पण हो गया था जिसके कारण राँची में मैं नया चश्मा बनवाने अशोक ऑप्टिकल्स गया और अपने चश्मे के नंबर का प्रोग्रेसिव लेंस में फोटो-क्रोमेटिक चश्मे के बारे में दरियाफ्त की। अभी मैं 2-चश्मे यूज़ करता हूँ। एक लौंग-डिस्टेंस के लिए दूसरा लिखने-पढने के लिए। ये थोडा मुश्किल लगता है, क्योंकि इस अदला-बदली में 3 चश्में गिरकर टूट गए थे अत: मेरा विचार था कि एक ही लेंस, एक ही चश्मे से मेरी समस्या का निदान हो जाय, ...लेकिन जो कीमत (बिना फ्रेम के, सिर्फ ग्लास का) बताई गई, मेरे छक्के छूट गए!! मुँह बनाय घर पहुँचा। किसी तरह दिन बीते। शाम में हमने "दबंग 2"  देखि। घर आकर कंप्यूटर चालु किया तो लिंक फेल पाया। तब नए कैमरे से ली गई यात्रा की तस्वीरें कंप्यूटर में डाला और देखा। अभी इस नये कैमरे को समझने में मुझे समय लगेगा।

              श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा में पूजा-आराधना-प्रार्थना-निवेदन-दर्शन-स्तुति एवं प्रसाद प्राप्ति से मिलने वाली अलौकिक संतुष्टि के सन्दर्भ में मैं कुछ कहे बिना नहीं रह सकता। इसे अभिव्यक्त करने में मुझसे हो सकता है कहीं धृष्टता का आभास हो अत: मैं मनोज कुमार की फिल्म :यादगार" से महेन्द्र कपूर का गाया और मनोज कुमार पर फिल्माया गीत/गाने का सहारा लेता हूँ, जो कम-से-कम मेरी कुछ भड़ास को शांत करते हुए काफी आर्त-भाव से मेरी अभिव्यक्ति को सटीक शब्द देती है:

" आए जहां भगवान् से पहले किसी धनवान का नाम,
उस मन्दिर के द्वार खड़े सब रोवें कृष्ण और राम !
धनवान को पहले मिले भगवान् के दर्शन,
दर्शन को तरसता रहे जो भक्त हो निर्धन !
ये दक्षिणा की रीत, ये पण्डों के छलावे,
दुकान में बिकते हुए मन्दिर के चढ़ावे !
ऐसे ही अगर ............................................................,
ऐसे ही अगर धर्म का व्यापार चलेगा,
भगवान् का दुनिया में कोई नाम न लेगा !
ऐसे जगह पे जा के तू कुछ भी न पायेगा,
भगवान् ऐसा मन्दिर खुद छोड़ जाएगा !
.......................................छोड़ जाएगा !!
.......................................छोड़ जाएगा !!!"

धनवान पूछता है : " भगवान् .... मंदिर में नहीं तो और कहाँ मिलेगा?"

"वो खेत में मिलेगा, खलिहान में मिलेगा,
भगवान् तो ऐ बंदे ....., इंसान में मिलेगा !"
...

हो सकता है मेरी निष्ठा में ही कोई खोट हो,
अभी भोर भये कमल के कंप्यूटर पर यहाँ लिख रहा हूँ। लोहरदगा जाकर समूचा वृत्तांत लिखूंगा।

 सादर प्रणाम।
_श्रीकांत . 

Friday, December 21, 2012

"जादूगरनी"

सबको सादर प्रणाम।

अभी मैं पाठक सर की काफी पुरानी लेकिन बहुत ही फेमस नोवेल "जादूगरनी" के बारे में सोच रहा हूँ। जिस वक़्त ये उपन्यास मार्केट में आया था शायद, शायद  मैं -I.Sc`1st Yr. में था। वो वक़्त ही कुछ और था ...!! समय था सन 1980...
...हमारे शहर में शुरू से ही मात्र एक ही बुक स्टाल था जो उनके दो भाइयों में बंटवारे के बाद अब दो दुकाने हैं, पहले इस दूकान के बुजुर्ग मालिक जीवित थे तब इनकी दूकान हमारे क्वार्टर (स्व. बाबूजी के समय से अभी तक) के समीप हुआ करता था। अब नहीं है। बाबूजी के प्रेमी-प्रतापी प्रभाव के कारण दुकानदार हमें किताबें-कॉमिक्स (भाड़ा वो बाबूजी से चार्ज कर लेता था) पढने के लिए दे दिया करता था। उस समय अपनी उम्र के हिसाब से हम (सभी भाई-बहन) कॉमिक्स और किताबें छाँट कर उठा लाते थे। मैं शुरू में "लोटपोट", "पराग", "नंदन", "मधु-मुस्कान:, "इंद्रजाल कॉमिक्स", "अमर चित्र कथा" पढता था, ...फिर धीरे-धीरे मनोज बाल पॉकेट बुक्स ......, फिर  v p sharma की विजय-विकास सीरीज की किताबों में दिलचस्पी हो गई थी। जब थोड़े और बड़े हुए तो कभी-कभार अब नज़रें कुछ ज्यादा की तलाश में भटकने लगीं थीं ... हर बार मेरी नज़रों के सामने रहते हुए भी जिनकी तरफ कभी ध्यान नहीं दिया था,..कभी कर्नल रंजीत, कभी मेजर बलवंत,...अला-बला,..से होते सुरेन्द्र मोहन पाठक के तरफ मेरा ध्यान गया किताब पर छपे एक स्लोगन पर जिसे उस वक़्त मैंने पब्लिसिटी स्टंट समझा ..मैंने पढ़ा : "सोहल की सनसनीखेज़ दुनिया!", "विमल का विस्फोटक संसार!" वो किताब मैंने उठाई उसके पन्ने पलटे और किसी पृष्ठ की चंद लाइने पढ़ीं, पाया की भाषा उर्दूदां है, मैंने छोड़ा फिर पकड़ा फिर उठाया, पता चला ये उपन्यास अपनी कथा का दूसरा भाग है; तब किताब के आखिर में छपे सन्देश से उसके पहले भाग का नाम पढ़ा और उसे ढूँढने लगा, सैंकड़ों किताबों के अम्बार में वो मुझे न मिला तो दुसरे भाग को भी छोड़ दिया। लेकिन मेरा ध्यान इस लेखक की लेखन शैली की तरफ बार-बार जाता रहा। आखिरकार मैंने निश्चय ले कर सुरेन्द्र मोहन पाठक का एक भाग में सम्पूर्ण किताब में से एक चुना वो था "लेट न्यूज़", जिसे मैंने वक़्त गुजारी के ख्याल से पढना शुरू किया; वक़्त गुजरा और क्या खूब गुजरा! अगले दिन किताब वापस करने का दिन था वरना 20 पैसे एक्स्ट्रा लग जाते, मैंने रातों-रात वो किताब पढ़ डाली। और फिर सुनील से हुई मुलाक़ात ने मुझे सुरेन्द्र मोहन पाठक को और पढने की प्रेरणा दी। अगले दिन किताब लौटने जब गया तब किताबों की भीड़ में वो किताब दिखी जो ढूंढें नहीं मिल रही थी। वो था "चेहरे पर चेहरा", किताब के कवर पर एक खूबसूरत लड़की का चेहरा यूँ छापा गया था कि वो छिले हुए सेब के छिलके से स्पाइरल बने सेबनुमा लड़की का चेहरा बन गया था, जिसके बगल में एक गन रखी हुई थी। सबसे बड़ी चीज थी उस पर छपा लेखक के नाम के फॉन्ट की थ्री-डाईमेनशनल आकृति! मुझे रोमांच हो आया। मैंने दोनों भाग उठा लिए रजिस्टर करवा कर घर पर रख कर कॉलेज चला गया। दिन भर मेरे जेहन में किताब का कवर घूमता रहा। आखिरकार वह समय आया जब मैंने इसे पढना शुरू किया। ...सब समझ में आ रहा था ! ...पर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कई स्थान पर ऐसा लगा जैसे ...ये पहला भाग नहीं है!...ज़रूर इसके पहले भी कोई कहानी है ...जिसका इशारा न समझ में आने वाली पूर्व-घटित घटनाओं, और कई पूर्व पात्रों के नाम जो इस उपन्यास में हाज़िर नहीं थे पर उनके जिक्र का ज़ोरदार दखल था जो और भी कहानी पीछे है जिन्हें पढना पड़ेगा - की ओर साफ़ संकेत करतीं थीं। मुझसे आगे पढने में वो मज़ा नहीं आ रहा था। पर किसी तरह पढ़ा। और बौरा गया। मुझे एक जिद्द ने अपने वश में कर लिया की विमल की कहानी मैं शुरू से पढूंगा। इस जिद्द को पूरा करने में मुझे 13 साल लग गए। इस बीच सुनील से और रमाकांत से मेरी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी। फिर हाथ में आई वो किताब जिसने उपन्यास पढने के मेरे सारे कांसेप्ट को झिंझोड़ कर, बदल कर रख दिया। वो किताब बल्कि आज की तारीख में मैं उसे इंडियन क्राइम फिक्शन की दुनिया का माइलस्टोन मानता हूँ , जो थी : "मीना मर्डर केस!", साहबान वो दिन है और आज का दिन, पाठक साहब के अलावे "हिंदी क्राइम फिक्शन " के किसी दुसरे लेखक को मैंने छुआ भी नहीं है।

फिर मुझे पढने को मिला "जादूगरनी"! आज इस उपन्यास की बहुत याद आ रही है, क्योंकि ''सदा नगारा कूच'' का में भी कुछ ऐसी ही मिलती-जुलती घटना दर्शाई गई है। पर ये उपन्यास आज ओपन मार्केट में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। .....हमारे शहर का हमारा वो बचपन का बुक स्टाल उजड़ चूका है, इस शहर में अब जहां तक मेरा सर्वे कहता है, किसी भी भाषा का कोई उपन्यास, कोई भी नहीं पढता। बुक स्टाल दो भाइयों में बांटकर अब अखबार एजेंसी की दुकान बन कर रह गई है जहां न अब कोई उपन्यास है, न कॉमिक्स न कोई चंदामामा, नंदन, पराग, चम्पक, लोटपोट, मधु-मुस्कान, इंद्रजाल कॉमिक्स, अमर चित्र कथा, ..... सभी पतली हवा में विलीन हो चुकीं हैं। इस शहर में मैं अकेला शख्श हूँ जिसके पास ये शौक नहीं नशा नहीं बल्कि नशे से गुस्से से फ्रश्टेशन से डिप्रेशन से लड़ने की दवा है, मेरे पास सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यासों की अच्छी-खासी हेल्दी लाइब्रेरी है। इस दवा का ही असर है कि इस पृष्ठ पर सु.मो.पा. परिवार का एक अदना सदस्य हूँ, और सुरेन्द्र मोहन पाठक अब एक नाम नहीं एक लेखक मात्र नहीं बल्कि मेरे पूज्यनीय अभिभावक समान आदरनीय आराध्य उपनिषद हैं जिनका मैं उपासक हूँ, जिनकी किताबों को मैंने सालों-साल की मेहनत और लगन से इक्कट्ठा किया है। विमल के सभी उपन्यास बकायदे नंबर लिख कर अलग से रखा गया है। भाड़े पर किताब पढना मैंने तब छोड़ा जब मुझे उनकी कहानी दिमाग में घुमड़-घुमड़ कर बारम्बार याद आती और मुझे सताती। तब मैंने फैसला किया कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास जो मुझे पसंद है वो अब हमेशा मेरे अंग-संग रह्रेगा। इस तरह मैंने उन्हें खरीदना शुरू कर दिया। पैसे की तंगी हुई तो उधार पर ले लिया कई-कई महीनों तक उधार खाता चलता रहा, लेकिन तारीफ़ है दुकानदार की कि उसने तकादा कर के कभी मुझे शर्मिंदा नहीं किया। घर में बहना बना कर पैसे जमा कर दिया पर सुरेन्द्र मोहन पाठक की किसी भी उपन्यास को कभी मैंने लौटाया नहीं। इसके बावजूद "_विमल (सिरीज़) को छोड़कर_" बहुत सारी किताबे अब भी जेहन में दस्तक दे रही हैं जो मेरे पास नहीं है, जैसे की मैंने शुरुआत में ही कहा है 1. जादूगरनी, 2.अँधेरी रात, 3.खाली मकान, 4.स्टार नाईट क्लब, 5. विश्वास की हत्या, 6.डायल-100 इसके बारे में सुना था कि इस पे फिल्म बनेगी, 7. धोखाधड़ी ...इत्यादि। शायद SMP लाइब्रेरी से मिलेगी जिसका सुजाव आपने मुझे दिया है। कोशिश ज़रूर करूँगा।

आज पाठक सर की किताबें हासिल करने के लिए, प्रकाशन की जानकारी मिलने पर कि बुक मार्केट में आ गई है, मुझे बाकायदे ऑफिस से छुट्टी ले कर (मेरी जॉब/नौकरी 365 दिन 24 घंटे हमेशा अलर्ट वाली है;) रांची जाना पड़ता है। बदकिस्मती देखिये की राजधानी रांची में बुक स्टालस सिर्फ 2 जगह पर है और कुल मिलकर दुकाने मात्र 3"तीन" ही है। एक रेलवे स्टेशन पर का व्हीलर, बाकी के 2 शहर के दुसरे छोर पर 7 कि.मी. दूर !! मेरे रांची स्थित फ्लैट के दो बिलकुल विपरीत दिशाओं में !! अक्सर मैं स्टेशन के व्हीलर से ही किताबें खरीदता हूँ। कई बार तो ऐसा हुआ है कि एक ही महीने में जब भी किसी अन्य काम से रांची गया व्हीलर वाले भैया/काका से आदतन पूछ बैठता हूँ :" जी भइया, सुरेन्द्र मोहन पाठक की नई नोवेल ...." उत्तर :"अभी परसुवें न डब्बल गेम लेगे हैं, एतना जल्दी कहियो नया आया है कि आ जावेगा? ..!!"

23, दिसंबर 2012, रविवार को जो सुरेन्द्र मोहन पाठक परिवार मिलन समारोह होने जा रहा है। इसकी सूचना मुझे ग्रुप ज्वाइन करने के बाद मिली। और परसों ही तो मैंने ग्रुप ज्वाइन किया है। इसके पहले ही कई तरह के और कार्यक्रमों का निर्धारण हो चूका था ऑफिस से मुझे ऑर्डर्स मिल चुके थे। इसी दरम्यान मेरे बच्चों की छुट्टियों की घोषणा तय थी, मेरे अनुज और समूचे परिवार ने मिल कर जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा का प्रोग्राम बना कर टिकट्स भी ले चुके थे। जैसे ही मैंने SMP fb फॅमिली - ग्रुप ज्वाइन किया तो मुख पृष्ठ पर ही इस आयोजन की घोषणा का संवाद देखा। अब आप स्वयं सोचें इतने शार्ट नोटिस पर मेरे जैसा अदना आदमी जिसकी आमदनी गृहस्थी और बच्चों की शिक्षा में खर्च हो जाती है वो हजारों मील दूर से भीड़ भरी दुनिया में तुरंत टिकट भी कहाँ से पावे, आना बड़ी बात है।

लेकिन यदि आप सभी कृपा करें तो शायद मेरी हाजिरी भी पाठक सर की सेवा में लगा देने की कृपा करें। इसे मेरा नेवेदन समझें और कृपया पाठक सर को याद कर के मेरी क्षमा याचना के साथ उनको मेरा चरण स्पर्श कह देने की महत्ती कृपा करेंगे।

चूँकि यात्रा की तैयारी और पूरी पैकिंग करने हैं, सुबह ही निकलना है; अभी पाठक सर के कम-से-कम 3 उपन्यास ज़रूर साथ होंगे। अब 7/8 दिनों तक मैं आपसबों को "तंग" नहीं करूँगा। एक बात मैं बड़े हिचक के साथ कहना चाहता हूँ कि पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि मैं आप लोगों को बहुत ही मिस करूंगा। अब विदा लेना चाहूँगा। सपरिवार सुबह 8 (आठ) बजे खुद 75 कि मी ड्राइव कर के जाना है। रांची वाले फ्लैट पे रुकना है जहां मेरे कॉलेज की छट्टियों से लौटे 2 बेटे मेरे छोटे भाई और बहु हैं। गाड़ी शाम में 4 बजे की है।

सप्रेम सादर नमस्कार के साथ दोनों हाथ जोड़ कर ह्रदय से लगा कर सबका अभिनन्दन करता हूँ।  23,दिसंबर के मिलन समारोह के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ! सादर प्रणाम।

बोले भईया बलभद्र जी की जय ! बोले बहिनी सुभद्रा जी की जय !! बोलो भगवन श्रीकृष्णचन्द्र जी की जय !!!

श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का अनन्य भक्त
-अकिंचन_
श्रीकांत .
लोहरदगा दिनांक :21, माह : दिसंबर (12), वर्ष : सन 2012   समय रात्रि : 00.27(AM)
              


अब मैं एसएमपी ग्रुप का मेंबर नहीं हूँ। मैंने स्वेच्छा से ये ग्रुप छोड़ दिया है।

Thursday, December 20, 2012

जाड़े की स्निग्द्ध धुप हो, एक कुर्सी पर बैठ मुंडेर पर पैर लम्बी किये रखे हों, कुछ खाने-चुभलाने का इंतज़ाम हो, एक हाथ में जाम हो और दुसरे में श्री पाठक सर जी का "इन्तकाम" हो तो कौन इसकी ठंढी शीतल छाँव से वंचित होना चाहेगा!
...पर यह सारा मज़ा तुरंत काफूर हो जाता है, आँखें भीग आती हैं, हाथों में तनाव और जबड़े भींचने लगते हैं, दांत किटकिटाने लगते है; फिर बेबसी के मारे आँसू ढलक आते हैं जब कल ही हुई दिल्ली गैंग रेप की घटना याद आती है !!

Wednesday, December 19, 2012

प्रिय विशी भाई!
सादर सप्रेम नमस्ते,

आज मेरे सुबह के पोस्ट की वजह से SMP fb फॅमिली ग्रुप में आप सहित सबका आक्रोश बल्कि क्रोध में हुए अंधे आक्रोश से मेरा सामना हुआ। किसी आदमी के एक वाक्य से उसके समूचे वजूद और उसकी दिमागी सोच-समझ और क्षमता का अंदाज़ा लग जाता है, फिर SMP fb फॅमिली ग्रुप में तो मैं कल भारती हुआ और मुझे आज ही 'निकल जाओ वर्ना निकाल दिए जाओगे' का नोटिस भी मिल गया, क्योंकि मैंने सिर्फ एक लाइन ही नहीं पूरी व्याख्या ही छाप दी! ये मेरी अस्पृश्यता, अछूत-पन का इससे बड़ा और क्या परिणाम हो सकता है जिसे पूरी-की-पूरी इंस्टीच्युशन के एक-एक सदस्यों द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। ये मेरे अपने कुकर्मों का फल है। जो जैसा बोवेगा वो वैसा ही तो कटेगा। सो फल मुझे मिला। सो फल मैंने काटा और बाकायदा उसका बढ़िया मज़ा चखा। पर लगता है अभी सबकी भड़ास पूरी नहीं निकली है।

मुझे क्षमा याचना का सुजाव, आपके माननीय साथी और सदस्य "KBC जी"  ने दिए, मैंने उनकी बात का अनुसरण करते हुए कि "मुझसे नहीं पूरे ग्रुप और विशेष कर श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी से माफ़ी मांगिये", मैंने समस्त "SMP fb फॅमिली ग्रुप" और स्वयं मेरे पूज्यनीय श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी से उसी पृष्ठ पर क्षमा मांगी है।
पर माफ़ी देने का सबका अंदाज़ देखिये ! कैसे मुझे ह्युमिलियेट किया गया है! उनका भी जिन्होंने मुझे ये आइडिया दिया था; कुल भूषण चौहान! कहते हैं :"job accomplished." जिनकी चिंता है कि वो मुझे झाड़ियों के पीछे ले जा कर अपनी मनमानी न कर सके!! साइबर क़ानून के आप विद्वान् है, इस विषय के पंडित है, आप ही फैसला कीजिये कि इसी मंच पर "वायोलेशन" किसने कितना किया है, ज़रा और आगे पढ़िए:

आज मैं जो - जब, पाठक साहब का उपन्यास पढ़ रहा होता है तो सहज ही अपने-आप को कथानक के नायक के रूप में खुद का तस्सवुर कर लेने की, अब तो यही कहूँगा कि, हिमाकत कर बैठता है !! सो !!! आज पता चला कि कितनी बड़ी ये मानसिक बिमारी है। मुझे रिहैबिलिटेशन सेंटर के लायक केस माना गया। पवन शर्मा ने पोस्ट में मुझे बदतमीज़ कहा, ये जानते हुए कि किसी को बदतमीज़ कहना सबसे बड़ी बदतमीजी होती है। बाकियों ने मेरे पोस्ट को अपने पर फोकस बनाने का घटिया प्रयास कहा गया, अलिखित-अघोषित भद्दी-भद्दी गालियाँ दीं गईं। पर शायद वो सब SMP fb फॅमिली ग्रुप के नियमों का उल्लंघन नहीं करतीं! हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि यदि अपने आराध्य देव का अपमान होता देखो तो अपमान करने वाले की जीभ काट लो या फिर वह स्थान त्याग दो। आज उस धर्म का पालन पूरे जोशो-खरोश से किया जाता दिखा। बधाई !

किसी ने मुझे ही दिल्ली गैंग रेप काण्ड का बालात्कारी कह दिया। पवन शर्मा ने मुझे ग्रुप से निकाल देने के लिए "मेरा ज़नाज़ा धूम से निकलने" की घोषणा की है। पवन शर्मा का वह पोस्ट अभी ज्यों-का-त्यों स्टैंड है। मैंने उन्हें मोस्ट वेल्कम बोला है। कोई एक्सपर्ट साहब मेरे लिए अपने इलाके की गन्दी-भद्दी गालियों से न नवाज़ पाने के लिए दुखी है। कोई मुझे पीटना चाहता है। इतने सम्मानित और सुरक्षित हैं सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब इस मंच के सदस्यों द्वारा, आज खुलासा हुआ !!!

मेरी समझ में आया कि मेरी जैसी मानसिकता वाले दरअसल बड़े कायर होते हैं। अन्यथा मैं डटा रहता और देखता कि कोई मेरा क्या उखाड़ लेने की कूवत रखता है, क्योंकि क्या जानते हैं ये "भाई लोग" मेरे बारे में जो अपनी मांद में से मुझ पर गुर्र्रा रहे है!? इनसे और उलझकर ऐसा कर के मैं क्या पा लेता? बल्कि ये कहिये कि सबकुछ खो देता। कहते हैं किसी को बेईज्ज़त करना उसको मृत्यु दण्ड देने के सामान है। पौराणिक ज़माने में ऐसा होता था कि अपराधी को बीच चौराहे पर खूंटे से बाँध दिया जाता था और सारी जनता उस पर थूकती थी, फिर उसे बहिष्कृत कर दिया जाता था।


मेरी पत्नी, माँ और मेरे बेटे सुबह से मुझे बेईज्ज़त और जलील होता देख रहे हैं, ज़िल्लत क्या होती है इन्हें पहली बार असलियत में देखने को मिल रही है इसलिए हक्के-बक्के हैं। इन्होने अभी तक मेरे कमरे में पाठक साहब के मंदिर के आगे नतमस्तक उपासक के रूप में ही देखा है इसलिए इन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि मेरी अपनी जल्दीबाजी में हो चुकी भयानक भूल का अपराधी बन बैठा हूँ जिसकी सजा भुगत रहा हूँ। अब उनकी जिद्द है की मैं ये ग्रुप छोड़ दूँ पर उनके लाख कहने पर भी मैं ये ग्रुप नहीं छोड़ना चाहता। सभी कल से पूछ रहे हैं कि आखिर मैं क्या कर रहा हूँ। ...यही कि देखूं क्या-क्या और होता है।

आपकी पहली प्रतिक्रिया मैंने पढ़ी थी, वो शायद हट गया है, उसे पढ़ते वक़्त मैं रो पड़ा। आपकी संयमित और आश्वस्त करने वाली ही जुबान/जुबां की ही मैं प्रतीक्षा कर रहा था। आपसे जब से, चंद शब्द ही सही, बातें हुई हैं उससे आपके प्रति स्वाभाविक स्नेह और अनुराग पैदा हो गया है। जबकि पवन शर्मा की बातों का अंदाज़ यूँ है जैसे वे इस ग्रुप के दंडाधिकारी हैं, अत: उनकी धौंस भरी संवाद अदायगी ध्वनित नहीं होती!? इस व्यक्ति ने अपने दुसरे कमेन्ट से ही जैसे मुझ पर चाबुक तान लिया हुआ है, और अपनी मोनिटरी के नीचे रखना चाहता है।

विशी भाई! मैं और कटुता बढ़ाना नहीं चाहता। जिसका प्रमाण मेरी क्षमा प्रार्थना है, लेकिन उसके बदले में जिस दुर्व्योहार का घटिया प्रदर्शन सामने आया है कि कोई भी यहाँ, आपके सामान, साफ़ मन का नहीं है। ठीक है। सही है। ये मंच प्यार बांटने का मंच है, मेरे दिल में भी बहुत प्यार है। मैं बाटूंगा। मिलने आऊंगा। और सबके साथ पटियाला पैग शेयर करूँगा, पर जब तक कुछ समय साथ नहीं बिताया जाए घनिष्ठता कैसे होगी। मैंने एक भूल-वश भयंकर गलती की, मुझे दोषी पाया गया, सजा सुनाई गई। फिर माफ़ी की दरख्वास्त दाखिल्दाफ्तर करने का सुझाव दिया गया। मैंने सबका फैसला सिर-माथे लिया। माफ़ी मांग ली। पर अभी उनसे माफ़ी मिलना बाकी है वास्तव में जिनके सम्मान में इस मंच का निर्माण किया गया है। उससे पहले ही सबने मेरी खिल्ली उडानी शुरू की और मेरी पोस्ट की गई तताकथित विवादित पोस्ट को साबित कर दिखाया, कि जिस ग़लतफ़हमी में मैंने भूल की वो दरअसल भूल नहीं बूल्ज़ आई लाइक शॉट थी। ये मेरी जीत है।

मैं आपके तरफ अपना हाथ बढ़ा रहा हूँ। इस बढे हुए हाथ को निश्छल मन से बिलकुल निश्चिन्त हो कर थाम लीजिये। ऐसा कर के आप मेरे मित्र तो बनेंगे ही मैं भी आप जैसा बेमिसाल दोस्त पा कर सुखी हो जाऊँगा। मेरी दोस्ती का हाथ थाम कर आप एक तरह से मुझपर एहसान करेंगे जिसे मैं ताजिंदगी नहीं भूलूंगा। आप कहते हैं आप मुझसे उम्र में छोटे हैं लेकिन व्योहारिकता के मामले में मैं आपके आगे कुछ भी नहीं। यही सोच कर दोस्त बन जाओ दोस्त कि ये पाठक जी के अलफ़ाज़ हैं : कि आज के बेमुरव्वत ज़माने में दोस्ती जैसी बेमिसाल चीज़ बड़ी मुश्किल से मिलती है, मैं तो आपके खजाने में इजाफा ही करने की गुजारिश कर रहा हूँ। पर इसका फैसला तो आप ही को लेना है। आपकी दोस्ती से मैं अच्छा सदस्य बने रह कर ग्रुप के लिए अपना मुझसे जो भी हो सकेगा, योगदान दूंगा। यही प्रार्थना हर तरह की क्षमा याचना के साथ राजेश पराशर जी से भी है जिन्हें इसलिए शर्मिन्दा होना पड़ा है कि इस ग्रुप में उन्होंने मुझे ADD किया, जो उनकी जुबान में फटा हुआ 'पंखा' है, जिसकी मजम्मत की जानी चाहिए। हसन ज़हीर साहब भी जो जिस पर अपने हाथ न आजमा सके, बहती गंगा में हाथ न धो सके।

अगर विशी भाई, मेरी ये दोस्ती प्रार्थना आपने क़ुबूल कर ली तो मैं सारी शिकायतें भूल कर निर्मल मन से कल के उदीयमान सूर्य भगवान् को प्रणाम करूँगा।  पहले आप से रिश्ता पूरी पक्के तौर पे तो जुड़ जाय। ये मेरा इम्तिहान का वक़्त है। समय ...समय ....

सबके सुख और निर्मल मन की कामना के साथ_ फिर से सभी से क्षमा याचना के साथ_

आज का सजायाफ्ता गुनाहगार,
आपका सबका अपराधी_ 19/12/2012 सायं 08:42
श्रीकांत .
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विशी सिन्हा का पत्रोत्तर :
Shrikant Tiwari जी...
Vishi Sinha 1:52am Dec 20
Shrikant Tiwari जी

सादर नमस्कार,

पहले मैं एक बात मैं साफ़ कर देना चाहता हूँ कि मैं और ये ग्रुप जिसे हम 'पाठक-प्रशंसक-परिवार' कहते हैं, एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते. We are inseparable. अगर मेरा परिवार आपकी नज़रों में गलत है तो मैं भी गलत हूँ. अगर आपको मुझमें कोई भी अच्छाई नज़र आती है, तो यकीन जानिये, ये मेरा परिवार मुझसे भी कहीं ज्यादा ज़हीन और संजीदा सदस्यों की जमात है.

अगर मुझे मेरे परिवार के साथ सम्पूर्णता में अपनाने के लिए आपका दोस्ती का हाथ अभी भी बढ़ा हुआ है, तो मुझे ख़ुशी से आपकी दोस्ती कुबूल है.
मुझे उम्मीद है, सुबह के सूर्य के साथ आप सारी शिकायतें भूलकर निर्मल मन से एक नयी शुरुआत करेंगे.

और जैसा ऊपर डॉक्टर राजेश पराशर जी ने कहा, और मुझे भी यकीन है, इस प्रकरण और इससे जुड़ी कड़वी यादें मिटा दी जायेंगी, भुला दी जायेंगी और हमारे दिलों में सिर्फ और सिर्फ अच्छी यादें रह जायेंगी.

एक नए सूर्योदय की प्रतीक्षा में,

- विशी
 
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प्रभात 06:21     20,दिसंबर,2012  गुरुवार 
"गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागुन पाएँ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताए।।"
-ॐ गूँ गूरूवे नमः।
ओए  विशी भाई तुसी तो छा गए मालको!!
 उत्तर के लिए धन्यवाद।
हाँ ! मेरा हाथ अभी भी पूरे निर्मल मन से आपको पूरे'पाठक-प्रशंसक-परिवार' के समस्त सदस्यों के  साथ सम्पूर्णता में अपनाने के लिए मेरा दोस्ती का हाथ अभी भी बढ़ा हुआ है!
 नया सूर्य उदित हो चूका है ! उसके आगे मैं नतमस्तक हूँ।
"ज्योतिर्गानान्पतेये दिनाधिपतए नमः।।"
और जैसा ऊपर डॉक्टर राजेश पराशर जी ने कहा, और मुझे भी यकीन है, इस प्रकरण और इससे जुड़ी कड़वी यादें मिटा दी जायेंगी, भुला दी जायेंगी और हमारे दिलों में सिर्फ और सिर्फ अच्छी यादें रह जायेंगी।
आमीन।
शुभाकंछी 
- श्रीकांत .