Powered By Blogger

Monday, December 10, 2012

गद्दी में कॉमेडी सर्कस:

गद्दी में कॉमेडी सर्कस:
          1. हमारे एक सहकर्मी हमेशा ये जताने की कोशिश में लगे रहते हैं कि हम उन्हें "भाव" दें। इसके लिए ये हमेशा कथा करते रहते हैं कि वो डी.सी. के दोस्त हैं, मंत्री जी उनके साथ घूमते-फिरते हैं साथ बिठा कर व्हिस्की पीते-पिलाते हैं! जब भी कोई बात कीजिये उस विषय के विशेषग्य बन जाते हैं। उन्हें किचन के काम भी आते है और स्पेस साइंस के भी ज्ञाता हैं। कुरान, बाइबल और हिन्दू धर्मग्रंथों के ज्ञाता और कथा वाचक बन जाते हैं। कोई उनके मुंह नहीं लगना चाहता, पर जबरन बात छेड़कर हम पर हावी होने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनके मुताबिक उनके सम्बन्ध देश के शीर्षस्थ नेताओं, अभिनेताओं, खिलाड़ियों और सेलेब्रेटीजसे हैं, और ये उनके दुलरुवा भाई हैं, मित्र और सलाहकार हैं!! पर यहाँ हमारे साथ जॉब क्या करते हैं!__पैंट्री, और किचन सँभालते हैं। रसोइया !! ...हे भगवान्! इस लसूड़े से कैसे जान छूटे!? हमने तय कर लिया कि ससुरे को उसकी औकात दिखाएँ। हमने उसे सबक सिखाने की ठान ली। इसका मौका वो हमेशा देते ही रहते है, सिर्फ हमही मुलहिज़े में चुप रहते थे। आज ये चुप्पी हमने तोड़ी।

आज ये भांज रहा था : " तीन साल शाहरूख खान के साथ रहले हियई, ... शाह... "
तुरंत मनोज भईया ने पूछा : " उसका जूता साफ़ करते थे क्या?"

मरदूद का मुंह देखने लायक था। हम सारे साथी खूब हँसे।


          2. "इस साल- 2012" को काफी दिनों से पृथ्वी के लिए विनाशक बता कर दहशत का माहोंल बना दिया गया है। इस पर "2012" नाम से हॉलीवुड मूवी बन चुकी है, जिसमे पृथ्वी को नष्ट होते दिखाया गया है। इस भ्रांति ने महिलाओं को ज्यादा डराया हुआ है।

सहारा इंडिया का एजेंट: " भाभी आप इन्वेस्ट कीजिये ना, बहुत अच्छा प्लान है। पाँच साल में अढ़ाई गुना देगा।
भाभी : " नई रिंकू जी। परलय के बाद।"

       
          3. शहर में मेला/कार्निवाल लगा है, खूब मनोरंजन और तमाशे हो रहे हैं। कोई निशाना आजमा रहा है, कोई झूले पे चढ़ा किलकारियां भर रहा है। मोटकी चाची को वजन तौलने वाली मशीन ने रिझाया। चचा बोले अरे टूट जयितई मिसिनिया!! पर चाची नहीं मानी। और ए गो सिक्का ले के जैसे ही मशीन पर चढ़ीं, मशीन की बत्तियां बेलगाम होकर जलने-बुझने लगीं। मशीन के स्पीकर ने तीन बार बीप-बीप किया और अनुनयपूर्ण स्वर में बोला : " कृपया दो व्यक्ति एकसाथ मशीन पे न चढ़ें!!

कोई इम्तिहान पास करने की होड़ में मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स ज्वाइन नहीं किया। कमेंट्स कोई मार्क्स नहीं हैं जो न हो तो आपका किया हुआ महत्वहीन हो जायेगा। मेरा एक ही ढर्रा है: "जो मन भावे, सो तन लागे। ये सूचना के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र है, रेस ट्रैक नहीं। बस इतना ध्यान रहे कि मर्यादाओं का उलंघन न हो। 
यह एक सामान्य बात है और मेरा अपना कथन है। किसी व्यक्तिविशेष के लिए चेतावनी, या उपदेश नहीं है। कृपया भ्रम न पालें। आपका इसका मानना न मानना मुझे प्रभावित नहीं करेगा। मैंने बस इतना कहा है कि यहाँ कोई प्रतियोगिता नहीं हो रही है।

 

वीणा के ज़ख्म ! वीणा का दर्द !!

 10, दिसंबर, 2012    सोमवार,     लोहरदगा     शाम के साढ़े आठ बजे -


अभी-अभी मैंने वीणा के चोंथी बार सर्जरी हुए हाथ की फ्रेश ड्रेसिंग की। नई, चोंथी सर्जरी के ज़ख्म को देख कर दहशत से सिहर गया! 2 लम्बे-लम्बे कट हैं जिनमे कुल मिला कर 13 टाँके हैं। 12/12/12 को टाँके कटवाने का दिन है। इसी दिन (अफवाह के अनुसार) महाप्रलय का दिन भी है। चलिए किसी बहाने इस ऐतिहासिक तारीख से हमारा अविस्मरनीय सम्बन्ध बनने जा रहा है। मैंने वीणा के इस ज़ख्म की फोटो खीची है, आपसे शेयर कर रहा हूँ।
 देखिये ..........!!


क्यों ... घिन्न आ रही है? या तरस आ रहा है!?

तस्वीर तो शेयर कर लिए। क्या वीणा का दर्द भी शेयर कर पायेंगे!? नहीं। जो समझना था समझ भी गए होंगे। वीणा के लिए "गेट वेल सुन" की प्रार्थना भी आपने कर ली होगी।

 ये संजीदा विषय जड़ से ख़त्म हो, इस निवेदन के साथ आप सभी लोगों का धन्यवाद।
कुछ कहना-सुनना है तो वो भी कर लीजिये क्योंकि कुछ हंसी-ठिठोली करने का मन कर रहा है।

श्रीकांत  .







Saturday, December 8, 2012

"हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!"

ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!????

अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर जिम्मेवार है उसका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन।

नमस्ते महोदय !!

अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे।

सबसे अच्छी भाषा वोही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है।

ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।

जय हिन्द!!!

रवीश कुमार को मैसेज

 NDTV india के एंकर रवीश कुमार को मैंने facebook पर मैसेज भेजा है:

टीवी पर आप बड़े भाई लगते हैं, लेकिन आपको भईया कहूँ या "सर" मैं निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ। भईया कहने से इसलिए हिचक रहा हूँ कि कहीं आप ये न समझ लें कि कौन ज़बरदस्ती गले पड़ रहा है। और सर कहने से इसलिए हिचक रहा हूँ कि सर हमलोग स्कूल में मास्टर साहेब को कहते थे या आजकल डॉक्टर या अपने एम्प्लोयर को कहते हैं जो आप नहीं हैं। सर को श्रीमान कहने का रिवाज ख़तम हो गया है। आपको आपके नाम से संबोधित करने की क्षमता शायद मुझमे नहीं है। क्योंकि मैं कोई ख़ास क्या बढ़िया से आम आदमी भी नहीं हूँ। ट्विटर पर आपको पढ़ा। टीवी पर आपको पहली बार "रवीश की रिपोर्ट" में देखा। तभी से आपकी बातें बड़े मनोयोग से सुनता हूँ। NDTVindia पर prime-time, या "हमलोग" जब आप प्रस्तुत कर रहे होते हैं तब ज़रूर देखता हूँ।

facebook पर Add Friend पर क्लिक किया तो ये मैसेज प्रकट हुआ:
Friend requests are for connecting with people you know well, like classmates, friends, family and coworkers. Please don’t send this friend request unless you know this person personally. फलतः घबरा गया। कस्बा नाम से आपके ब्लॉग को पढता हूँ। आपसे प्रभावित हुआ, लगता है आप मेरी भाषा में मेरी शैली में मेरे लहजे में बोल रहे हैं। अतः आपसे जुड़ना चाहता हूँ। अगर आपको मेरा आपसे जुड़ने का ये प्रयास मेरी धृष्टता लगे तो क्षमा कीजियेगा। मैं facebook पर आपसे जुड़ना चाहता हूँ। मैं बहुत मामूली आदमी हूँ, या शायद फालतू। जो भी आपका निर्णय हो बताइयेगा ज़रूर। क्योंकि उत्तर न देना मेरा भ्रम तोड़ देगा कि....
वैसे मेरा नाम श्रीकांत तिवारी है। मैं लोहरदगा, झारखण्ड का निवासी हूँ। भोजपुरी भाषी हूँ। हिंदी में मैं अपनी अभिव्यक्ति को, स्वयं को अच्छी तरह लिख-बोल सकता हूँ। अंग्रेजी मुझे कम आती है, किसी तरह काम चला लेता हूँ।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable) का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो पहले अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है।

मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है।

अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

जय हिन्द


दिसंबर 2012 की शुरुआत :

दिसंबर 2012 की शुरुआत : पहला सप्ताह:

दिसंबर 2012 की शुरुआत होते ही अनेक तरह की बातें, घटनाएँ, शुरू हुईं।

जेम्स बोंड की नयी फिल्म SKYFALL नहीं देख सका। पर ....

1. वीणा के हाथ का ऑपरेशन, क्लिप और स्क्रूज निकलवाने राँची गया। 2 दिसंबर को कमल के साथ पुराने "उपहार सिनेमा", जो एक नए भब्य रूप "गैलेक्सिया मौल" में परिवर्तित हो चुका है, हमने आमिर , रानी, और करीना से सजी बहुप्रतीक्षित फिल्म "तलाश" देखी। उं हूं !! नहीं पसंद आया। इसमें दो ख़ास बातें अच्छी लगी: पहली - खाखी वर्दी में पहली बार आमिर और उनकी दमदार अदाकारी, दूसरी - नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का परफोर्मेंस। फिल्म सुपरनेचुरल विषयक है पर हॉरर मूवी नहीं! सस्पेंस थ्रिलर है पर रोमांचक नहीं! कोई षड्यंत्र नहीं! कोई खलनायक नहीं! कोई मनोरंजन नहीं।

2. 3-दिसंबर को वीणा के हाथ का ओप्रशन हो गया। क्लिप और स्क्रूज निकाल दिए गए।

3. धीरू को मैंने डांटा। शराब का दखल मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है।

4.  डुग्गु  और गुनगुन के साथ का आनंद मिला।

5.  मैंने अपने लिए कुछ रेडीमेड कपडे ख़रीदे।

6.  वीणा के नर्सिंग होम से छुट्टी मिलते ही मैं उसे लेकर लोहरदगा वापिस आ गया।

7. लोहरदगा पहुँचते ही बिजली संकट का सामना करना पड़ा।

8.  facebook पर लिखने के लिए मोबाइल का सहारा लेना पड़ा।

9. 5-दिसंबर से 7-दिसंबर तक बिजली गुल रही।

10. 6-दिसंबर का समाचार पत्र पढ़ कर पता लगा कि झारखण्ड सरकार द्वारा बिजली व्यवस्था निजी कंपनियों को सौंपने के विरोध में राज्यभर के विद्युतकर्मियों ने लाइटनिंग स्ट्राइक की घोषणा कर दी है।

11. बिजली न रहने के कारण मैं इस पृष्ठ पर न लिख सका और मुझे मोबाइल का सहारा लेना पड़ा। ये थोडा कठिन लगा।

12. बिजली कि ये कटौती काफी कष्टदायक रही। सभी बिजली के उपकरण ठप्प पद गए।

13. 7-दिसंबर को बिजली आ गई।

****************************

लोहरदगा, 08, दिसंबर, 2012 शनिवार : प्रातः  06 बजे सुबह :

अभी-अभी  समाचार पत्र के माध्यम से पता चला कि बिजली विद्युतकर्मियों की "कृपा" से नहीं बल्कि झारखण्ड हाईकोर्ट के सख्ती और धमकी और कड़े आदेश के बाद आई!

हाईकोर्ट ने जो टिपण्णी की, जो आदेश दिए समाचारपत्र के मुताबिक इस प्रकार है:
          "बिजली बोर्ड के कर्मचारियों को मनमानी करने की छूट नहीं है। बिजली आवश्यक सेवा है। इस वजह से कर्मचारियों को हड़ताल करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
          हड़ताल कर आम लोगों को उनके हाल पर छोड़ने वालों के खिलाफ लोगों का आक्रोश साफ़ है। यदि जनता जागी तो उन्हें (विद्युतकर्मियों को) बंगाल की खाड़ी में भी जगह नहीं मिलेगी। ऐसे लोगों को बिजली बोर्ड में रहने का अधिकार नहीं है।
          चीफ जस्टिस पीसी टाटिया और जया राय की अदालत ने शुक्रवार को बिजली कर्मियों की हड़ताल पर यह कड़ी टिपण्णी की। उन्होंने कहा कि यदि 10 मिनट में हड़ताल समाप्त नहीं हुई तो कर्मचारियों को बर्खास्त कर उन्हें दोबारा वापस नहीं लेने का आदेश भी दिया जा सकता है। अदालत का सख्त रूख देखने के बाद हडताली यूनियन ने 10 मिनट में हड़ताल समाप्त करने की बात कही। यूनियन ने कहा कि 10 मिनट में हड़ताल समाप्त हो जाएगी। ......
          कोर्ट ने कहा कि अपनी मांगे मनवाने के और भी तरीके हैं। बोर्ड के लोग भूख-हड़ताल कर सकते हैं। लेकिन बिजली जैसी आवश्यक सेवा ठप्प करने का उन्हें किसी ने अधिकार नहीं दिया। यह आवश्यक सेवा है। हड़ताल को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
          कोर्ट ने कहा कि कोई डॉक्टर किसी को ओक्सिजन लगाता है, उसके बाद कोई आदमी कहे कि ओक्सिजन मशीन उसकी है इस कारण वह इसे ले जायेगा, तो क्या उसे मशीन ले जाने की इजाज़त दी जा सकती है? इसीप्रकार बिजली बोर्ड के कर्मचारी जब चाहें बिजली की आपूर्ति करें, और जब चाहें बंद कर दें, तो इसे बर्दास्त नहीं किया जा सकता। मनमानी नहीं करने दी जा सकती।
      ****वाह!
जागो ग्राहक जागो!!!

-श्रीकांत तिवारी  





Monday, December 3, 2012

T A L A A S H ....!!!!! AAMIR KHAN KI ...

आमिर ! रानी !! करीना !!!
T  A  L  A  A  S  H  ...............!!!!!!!!!!!!!
02/12/2012 रविवार, रांची, गैलेक्सिया मल्टीप्लेक्स [पॉपकॉर्न]...पुराना "उपहार टॉकीज़", कमल के साथ।
















...

!
आमिर के प्यार और उनके स्टारडम के रौब में कुछ ज्यादा ही उम्मीद हो गई थी, इसलिए ...थोड़ी फीकी हो गई। 2012 के शुरू में विद्या बालन की "कहानी" जैसा सस्पेंस का इसमें अभाव लगा, आसरा ही लगा रहा कि अब चौंके-कि अब चौंके! ...कमजोर कहानी, कोई षड्यंत्र नहीं, कोई खलनायक नहीं, ...सिर्फ एक घटनाक्रम जिसकी तफ्तीश कोई रोमांच जगाने में असमर्थ है। आमिर की व्यक्तिगत ट्रेजेडी से सहानुभूति तो होती है, पर तसल्ली नहीं मिली।

हाँ! फिल्म की कहानी से उलझन बनी रही।

नवाज्ज़ुद्दीन सिद्दीकी (शानदार 'तैमूर') का क्या गुनाह था, जो उसके 'किलिंग' पर सिमरन(!) हमको तसल्ली महसूस कराना चाहती है, सिमरन की मौत से उसका क्या वास्ता था? सिमरन की मौत में उसका तो कोई कसूर नहीं था। फिर ...!? वो सिर्फ एक मौकापरस्त की भूमिका में होता है, फिर भी नवाज़ के यूँ जाया किये जाने पर दुःख होता है।

फिर देखूंगा तब समझ में आएगा। आमिर की खातिर एक बार इस फिल्म को ज़रूर देखें।

आमिर खाखी वर्दी में खूब जमे हैं। पर उम्मीद में ही फिल्म ख़त्म !! आमिर की फिल्म में सुपरनेचुरल  किरदार की मौजूदगी दिलीप साहब की मधुमती, या अन्य पुरानी सस्पेंस हिंदी फिल्मों के आगे कहीं नहीं ठहरती। हालाँकि यूँ तुलना ठीक नहीं है। क्योंकि कोई तुलना हो ही नहीं सकती।

आमिर का दमदार किरदार कहीं खो जाता है, अफ़सोस कि वो वापिस हासिल ही नहीं होता। आखिरकार आमिर फूट-फूट कर रोये। सुपरनेचुरल को प्रमाणिक करने वाली इस फिल्म में उत्सुकता, उत्कंठा का सर्वदा अभाव है।

...सच बोलें? नई मज़ा आया।(punchline).

-श्रीकांत तिवारी
अभिनन्दन अपार्टमेन्ट
फ़्लैट नंबर 304, तीसरी मंजिल,
कोकर, रांची .
झारखण्ड - 834001
भारत

Wednesday, November 21, 2012

कसाब को फांसी दे दी गई!

कसाब को फांसी दे दी गई!


आज सुबह सबेरे 07:30 बजे मुंबई 26/11 के हमले को अंजाम देने वाले आतंकी आमिर अजमल कसाब को यरवडा (महाराष्ट्र) जेल में फांसी दे दी गई! यह समाचार 26/11 के हमले में शहीद हुए वीरों के परिवार के साथ-साथ पूरे देश के लिए राहत और चैन की बात है। लेकिन बिना किसी पूर्व सूचना के अंजाम दी गई यह घटना कई सवाल खड़े करती है।

जहाँ सत्ताधारी यु.पी ए. की सरकार स्वयं अपनी पीठ थपथपायेगी, वहीँ विपक्ष इसे भी राजनीति की एक चाल बता कर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। आज बी.जे.पी. की हल्लाबोल रैली है, दूसरी राजनैतिक पार्टीयाँ और बी.जे.पी.कभी भी किसी भी हालत में यु.पी ए. की सरकार के इस कदम को मुक्त कंठ से नहीं सराहेगी, उसका आरोप होगा कि घोटालों से घिरी सरकार ने कसाब को (जल्दबाजी में) फांसी दे कर झूठी प्रसन्नता बटोरने की कोशिश की है। कोयला घोटाला, FDI, गैस ... blah blah blah  से संकट में पड़ी यु.पी ए. की सरकार ने कसाब को आनन-फानन में फांसी दे कर अपनी छवि सुधारने की कोशिश की है।

इसके बावजूद यह हमारे लिए खुशखबरी है और पाकिस्तान जनित आतंक को देश का जबाब है।

जय हिन्द!

श्रीकांत तिवारी 
21,नवम्बर`2012
लोहरदगा

Tuesday, November 20, 2012

क्या भूलूँ - क्या याद करूँ? 20 नवम्बर 2012

लोहरदगा, थाना टोली          20 नवम्बर 2012          09:57 प्रात:

17 नवम्बर से ले कर अभी तक बहुत कुछ हुआ है।

क्या भूलूँ - क्या याद करूँ?

बाल ठाकरे की अभूतपूर्व ऐतिहासिक अंतिम विदाई !? या ...
अमिताभ बच्चन का उदास गंभीर और सोच में डूबा चेहरा !? या ...
उद्धव ठाकरे का बिलख-बिलख कर रोना !? या ...
राज ठाकरे के घडियाली आंसू !? या ...
क्षणभंगुर छठ पूजा !? या ...
पटना के छठ घाट पर घटी दुखद दुर्घटना !? 
प्राण साहेब (92) के अटके प्राण ?

... हे भगवान् इनकी, हमारी, सबकी रक्षा करो
...
2012
2012
2012

इस मनहूस वर्ष को और कितनी जान चाहिए ?
2012 को और कितनी नर-बलि चाहिए ?
...

?

क्या इन्हें भूल कर "हुले-ले-ले" करने को ही जीवन कहते हैं ? 
You win some, you loos some, life goes on...
the clock is ticking...

- श्रीकांत तिवारी 


Saturday, November 17, 2012

बाल ठाकरे नहीं रहे !!!

बाल ठाकरे 



 
बालासाहेब केशव ठाकरे
...................................आज इस व्यक्तित्व का निधन हो गया। व्यक्तिगत रूप से मैं कभी भी इनसे और इनकी नीतियों और सिद्धांतों से पूर्णतया सहमत नहीं रहा, लेकिन इस महान योद्धा के नहीं रहने पर काफी दुःख और बेचैनी महसूस कर रहा हूँ।

ईश्वर इनकी आत्मा को शांति एवं सदगति प्रदान करें।

-श्रीकांत तिवारी 
17 नवम्बर`2012
लोहरदगा, झारखण्ड 

Wednesday, November 7, 2012

सारे कुत्ते तीर्थ करने चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा ?

ख़ास-विशेष मौकों पर अमीरों की फितरत है कि ये अपने स्टाफ को, चाहे वो किसी भी ओहदे का हो, बड़ी ही शिद्द्त (यतन) के साथ हमेशा ये याद दिलाते रहना, ये एहसास करते रहना कि "- तुम महसूस करो कि तुम निकृष्ट, निम्न, छोटे, और नौकरों की जामात के प्राणी हो, अपनी औकात में रहो-"...काफी अखरता है।

 दुःख तब और बढ जाता है जब उस गरीब की मामूली औकात उसके मुंह पे मारी जाती है।

 अमीरों के ऐसे रवैये से लगता है कि वो कह रहे हैं कि : "-सारे कुत्ते तीर्थ करने चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा!? -यही न!?

- श्रीकांत 

Sunday, October 21, 2012

ओह! यश जी!!!

ओह! यश जी!!!

आज यश चोपड़ा का दुखद निधन हो गया!'

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और सदगति प्रदान करें!
Yash Chopra
यश जी भुलाए न भूलेंगे!!!!
वक़्त,  दाग़, दीवार ...

...जब तक है जाँ !!!

श्रीकांत तिवारी 
21,अक्तूबर`2012

Friday, October 12, 2012

TCS फतह !!!

12/10/2012 शुक्रवार, लोहरदगा                    समय : रात्रि 11:45

जिम्मी ने TCS जीत लिया!
अभी-अभी जिम्मी ने फ़ोन कर ये जानकारी मुझे दी।
मैं अपने बेटे की इस कामयाबी पर उसे हार्दिक बधाई और अपना आशीर्वाद देता हूँ।






ईश्वर का कोटि-कोटि धन्यवाद।
ये बाबूजी का आशीर्वाद है!
13 तारिख दिन शनिवार, अक्तूबर 2012 को यह शुभ संवाद प्रसारित हुआ है, इसे कैसे मनहूस कहा जा सकता है!

-श्रीकांत तिवारी 

जिम्मी !

जिम्मी ! न रो बेटा !

           10/10/2012 को जिम्मी की आकांक्षाओं पर अप्रत्याशित आघात से मैं, वीणा, कमल, हम सभी दहल गए हैं! 
           न जाने क्या होने वाला है ...!?
           13 तारीख को तो वैसे ही बहुत मनहूस माना जाता है, और इसी दिन, जिम्मी के कहने के अनुसार, जो फैसला आने वाला है उस पर हमारे परिवार का भविष्य निर्भर है!  
           जिम्मी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ। अब उसी के मुख से शुभ सुनने की इच्छा है। जब भी फ़ोन की घंटी बजती है प्रत्याशा से मन भर आता है। आज पूजा में शंख की ध्वनि में मेरी आकांक्षाओं ने शब्द का रूप लिया और आंसू बन बह निकला। 
           शनिवार 13 तारीख 2012 _सुनने में ही भयावह लगता है! यह दिन हमारे जीवन का एक हर्षपूर्ण दिन बनेगा या गहन अवसाद का? एक-एक पल डर के साए में बीत रहा है।
           पर सौरभ की राय में बहुत सुखद संवाद की अपेक्षा है। सन्नी का भी यही मानना है।

- श्रीकांत तिवारी

Wednesday, September 26, 2012

पिआनो या फिल्मी जोक !?

पिआनो या फिल्मी जोक !? 
पाठक सर की जोकबुक से एक व्यंग्य लेख:
थोडा मुस्कुराने की रिहर्सल कर लीजिये, आने वाली खुशियों में अट्टहास पूरी तरह जेनुइन हो जाएगा!
(मूल लेखक श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक; मैंने 'ज़रा-सी' तब्दीली के साथ निम्नलिखित को यहाँ अक्षरशः, सिर्फ टाइप भर किया है।)

        
(आज से चालीस साल पहले की फिल्मों में):

आजकल की आधुनिक समाज का चित्रण करने वाली भारतीय फिल्मो में किसी न किसी सन्दर्भ में एक पार्टी का दृश्य ज़रूर रखा जाता है। और फिल्म में अगर कोई पार्टी का दृश्य  होता है तो उसमे पिआनो ज़रूर होता है। पार्टी के दृश्य में पिआनो उतना ही अनिवार्य है जितनी चाय में चीनी। अगर पार्टी के दृश्य में आपको कहीं पिआनो पड़ा दिखाई देता है तो समझ लीजिये कि कोई न कोई हिरोइन से गाना गाने की फरमाइश ज़रूर करेगा। कई बार फरमाइश करने के स्थान पर पार्टी में मौजूद कोई ज़रुरत से ज्यादा उत्साही सज्जन हिरोइन से बिना पूछे ही इस बात की घोषणा कर देते हैं कि अब हिरोइन सबको गाना सुनाएगी। हिरोइन का विरोध यहीं तक सीमित होता है कि वह एक-दो बार "ओह ! नॉट मी !" जैसा कुछ कहेगी और फिर शर्माती सकुचाती या तो खुद पिआनो पर जा बैठेगी और या तो उसकी कुछ सहेलियां उसे पकड़ कर ज़बरदस्ती पिआनो तक छोड़ आएँगी, बिलकुल यूँ जैसे पिआनो न हो, सुहाग शैया हो और हिरोइन जिसकी कल्पना मात्र मरी जा रही हो।
          पिआनो पर पहुँच कर हिरोइन गाना शुरू करने से पहले कुछ क्षण पिआनो के सुर छेड़ेगी जैसे पिआनो के सुरों में कोई नुक्स होने पर दूसरा पिआनो मंगवाए जाने की फरमाइश का इरादा रखती हो। पिआनो से संतुष्ट हो जाने के बाद वह पार्टी में मौजूद हीरो पर एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट डालेगी, फिर क्लोज-अप में हीरो और तीन-चार अन्य मुख्य पत्रों का प्रत्याशा में दमकता हुआ चेहरा दिखाया जायेगा और फिर हॉल में लता मंगेशकर की आवाज़ गूंजने लगेगी।गाने के साथ आपको दुनिया भर के साजों की कान फाड़ देनेवाली चीख पुकार सुनाई देगी, अगर नहीं सुनाई देगी तो केवल पिआनो की आवाज़।
          पार्टी में मौजूद एक्स्ट्राओं को अगर केवल मुस्कुराने और अपने स्थान पर स्थिर रहने का निर्देश नहीं दिया गया है तो और पार्टी में महिलाओं का आधिक्य है तो समझ लीजिये गीत का मुखड़ा समाप्त होते ही वे अपने सबसे करीब खड़े पार्टनर की बाहों में बाहें फंसायेंगे और चाबी लगे खिलोनों की तरह यूँ नाचने लगेंगे जैसे बिजली का स्विच ऑन करने पर कई रोशनियाँ एक साथ जल उठती हैं। ऐसी स्थिति में लता मगेश्कर का गीत में स्वरदान समाप्त होते ही हिरोइन भी उठ जाएगी और आतुरता से प्रतीक्षा करते हुए हीरो की बाहों में बाहें डाल कर नाचने लगेगी। ओर्केस्ट्रा बजता रहेगा लेकिन अब क्योंकि पिआनो बजानेवाली पिआनो पर मौजूद नहीं है इसीलिए ओर्केस्ट्रा के धीरे-धीरे फेड होते स्वरों पिआनो का स्वर भी सुनाई देने लगेगा।
          अगर गीत के साथ नृत्य का सिलसिला नहीं रखा गया है तो गीत समाप्त होते ही हॉल यूँ तालियों से गूँज उठेगा जैसे हॉल में मौजूद लोगों ने अपनी सारी ज़िन्दगी में उससे कर्णप्रिय गीत न सुना हो। हिरोइन पिआनो पर बैठी सिर झुका कर सबका अभिवादन करेगी , मुस्कुराएगी, शर्माएगी और फिर यूँ लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगेगी जैसे पिआनो बजा कर न हटी हो इंग्लिश चैनल तैरकर फिनिशिंग लाइन पर पहुंची हो।
          वास्तव में हिरोइन को गीत के फिल्मीकरण के दौरान पिआनो के पीछे बैठकर मुस्कुराने और खूबसूरत लगने के अतिरिक्त कुछ करना नहीं होता है। गाना तो लता मंगेशकर गा रही होती हैं और पिआनो के जिन सुरों पर हिरोइन की उंगलियाँ दौड़ती दिखाई जाती हैं, अगर उन्ही के स्वर को रिकार्ड कर लिया जाये तो हॉल में संगीत के स्थान पर हवाई हमले की चेतावनी के सायरन से मिलती जुलती आवाज़ गूँज उठे। इसीलिए अक्सर होता यह है कि आधे गाने या तो हिरोइन की उंगलियाँ पिआनो के किसी एक स्थान पर आकर स्थिर हो जाती हैं और या फिर किसी एक ही सुर के बखिये उधेड़ती दिखाई देती हैं। कभी-कभी यह संभव हो सकता है कि एक चैलेंज स्वीकार करने के नंदाज़ में हिरोइन के गाना समाप्त करते ही हीरो पिआनो पर आ बैठे और गाना शुरू कर दे और हिरोइन एक उपेक्षापूर्ण मुस्कराहट लिए उस गाने को यूँ सुने जैसे कह रही हो - " अरे जा जा, तू क्या गायेगा मेरे सामने, अर्थात मुहम्मद रफ़ी क्या गायेगा लता मंगेशकर के सामने!"
          पार्टी और पिआनो के इस सिलसिले में गम का गाना अक्सर हीरो के हिस्से में आता है। ऐसी स्थिति में खलनायक या प्रेमी नंबर दो - जो वक्तीतौर पर हिरोइन हासिल करने की दौड़ में आगे निकल गया है (और जिसके वजह से इस गाने की सिचुवेशन पैदा हुई है) - पार्टी में ज़रूर मौजूद होता है। गम के उस गीत के बोल बड़े ही निश्चित अर्थ का प्रतिपादन करने वाले होते हैं लेकिन प्रेमी नंबर दो पोज बनाने, मुस्कुराने और खुबसूरत लगने में इतना व्यस्त होता है कि वह गीत के माध्यम से क्या कहा जा रहा है, इस विषय में एकदम घोंघा बना रहता है। प्रेमी नंबर वन जब देवदासी पोज बना कर पिआनो पर गाता है की -" वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते"- तो हिरोइन तो फ़ौरन आकुल-व्याकुल होकर दिखाने लगेगी और गाने के आखिर तक ऐसे ही पोज मारती चली जाएगी लेकिन मजाल है कि प्रेमी नंबर दो के कान में जूँ  भी रेंग जाये ! वो तो महज़ गाना सुनेगा और मुस्कुराएगा, उसका भावार्थ समझने की मुकम्मल जिम्मेदारी तो हिरोइन को है!
          पिआनो मार्का दृश्यों को फिल्माने का एक कम प्रचलित तरीका यह भी होता है कि हिरोइन पिआनो पर कोहनियाँ टीकाकर और हीरो की आँखों में आँखें डाल कर गीत गाये इस इंतजाम में हीरो को अपना महत्त्व घटता दिखाई देने लगता है क्योंकि अधिकतर फिल्मे हीरो के दम पर ही बिकती हैं इसलिए हीरो को हरफनमौला दिखाना हमारी फिल्मों की परंपरा है, हीरो को गाना भी आता है, येही उन्हें काफी नहीं दिखाई देता, हीरो को गाने के साथ पिआनो खुद भी बजाना चाहिए चाहे अगले ही दृश्य में उसे हवाई जहाज उड़ाता दिखाया जाए! या फिर गंभीर ऑपरेशन करता दिखाया जाये!
          पार्टी के इन दृश्यों को देखकर ऐसा अनुभव होता है कि भारत में पिआनो जैसे नाजुक, पेचीदा, महंगे साज़ को सीखने की सुविधा हर किसी को सहज ही प्राप्त हो। हीरो चाहे कॉलेज का विद्यार्थी हो या पत्रकार हो या टैक्सी ड्राईवर हो या मिल वर्कर, कोई डॉक्टर, वकील, इंजिनियर या फौजी जवान हो, अगर फिल्म में पार्टी का द्रश्य है और पार्टी में पियानो मौजूद है तो गाना और पियानो बजाना उसे आना ही चाहिए।
          इस सिलसिले में यह कहने की ज़रुरत नहीं कि अगर पार्टी के सीन में पिआनो नहीं है, यह लगभग निश्चीत ही है कि गाना भी नहीं होगा। जिस प्रकार की वह नौकरी कर रहा होता है और जिस प्रकार की योग्यताओं का वह स्वामी दिखाया गया होता है उसे देखकर ऐसा नहीं मालूम होता कि कभी पिआनो की सूरत को करीब से देख पाने का भी अवसर मिला हो, उसे पूरी योग्यता से बजाना आना तो दूर की बात है।
पिआनो अगर यूँ ही फिल्म निर्माताओं का चहेता साज़ बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब फिल्म के क्रेडिट्स इस प्रकार दिखाया जाया करेंगे:
 मुहब्बत का नशा 
सितारे: 
सलमान खान
विवेक ओबेरॉय  
ऐश्वर्या राय 
और 
ग्रैंड पिआनो  
_________________________________
विनीत,
_श्रीकांत तिवारी .

Sunday, September 23, 2012

डॉ बिशु बाबु का निधन ...

                                                    ता 23 सितम्बर 2012 संध्या 07:50 लोहरदग



अभी एक घंटे पहले लोहरदगा के एक मात्र नामोनिहाद 82 वर्षीय बुजुर्ग डॉक्टर श्री पूर्णेंदु भूषण रॉय : जिन्हें जनता डॉ बिसु बाबु के नाम से जानती है, का निधन हो गया। स्व. पूज्य बाबूजी  फिर शिव बाबु के बाद श्री बिशु बाबु का निधन मेरी व्यक्तिगत बहुत बड़ी क्षति है जिसका शब्दों में वर्णन मुश्किल है। परमपिता परमेश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करें।

- श्रीकांत
                           
                               25/09/2012
                                                            लोहरदगा 

             मैंने स्वर्गीय डॉ बिशु बाबु की अर्थी को कंधा दिया और नम आँखों से उन्हें अंतिम बिदाई दी ...



- श्रीकांत .तिवारी 
      लोहरदगा 

Wednesday, August 8, 2012

स्वर्गीय राजेश खन्ना !!!

आशीर्वाद से श्रद्धांजलि तक स्व. राजेश खन्ना !!!
Born Jatin Arora
29 December 1942
Amritsar, Punjab, India
Died 18 July 2012 (aged 69)
Mumbai, Maharashtra, India
Residence Ashirwad, Mumbai, Maharashtra
Other names Jatin Khanna
Kaka
RK
Original King of Romance
The First Superstar of Hindi Cinema
Occupation Film actor, producer, Politician
Years active 1966–2012 (actor)
1991–1996 (politics)
1971–1995 (producer)
Spouse Dimple Kapadia (1973 - 2012)
Children Twinkle Khanna
Rinke Khanna
Signature Rajesh Khanna signature




















 .................!?
_श्रीकांत 

Friday, June 8, 2012

VIDYA BALAN विद्या बालन

विद्या बालन
इस वर्ष विद्या बालन की 2 फ़िल्में देखने को मिलीं, एक "THE DIRTY PICTURE", दूसरी "कहानी"! इन
दोनों फिल्मों में "कहानी" की कहानी ने मुझे वर्षों बाद फिर से हिंदी फिल्मों को देखने-सराहने के लिए विवश
कर दिया।

 विद्या बालन को हिंदी फिल्मों में आए अभी मुश्किल से 10 वर्ष हुए होंगे, इन्होने अपने अभिनय से जितना
प्रभावित किया और जो मुकाम पाया वो विद्या बालन के लिए तो ख़ुशी की बात है ही, हिंदी फिल्मों की दूसरी
अन्य अभिनेत्रियों के लिए एक सशक्त उदाहरण और इर्ष्या का विषय भी है।

 "कहानी" एक संग्रहनीय फिल्म है।  बहुत दिनों बाद किसी हिंदी फिल्म ने मुझे इस कदर प्रभावित किया कि मैं इसे संग्रह कर रखने का लोभ संवरण न कर सका। मौका मिलने पर इस फिल्म को ज़रूर देखें।

_श्रीकांत तिवारी.










 

Monday, May 28, 2012

Episode 04: "सत्यमेव जयते"

Every Life Is Precious

अचंभित हूँ "सत्यमेव जयते" का चौथा एपिसोड देखकर! डॉक्टर पर भरोसा अब करें तो कैसे!? दवावों की कीमतों के बारे में डा. शमित शेट्टी (राजस्थान) के खुलासे से सन्नाटे में आ गया। भारत और भारतीयता पर गर्व करें तो कैसे?