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Thursday, December 13, 2012

अदभुद अनुभव !

एक फिलोसोफिकल बात; (काल्पनिक नहीं, हकीक़त !) :
सुरेन्द्र मोहन पाठक शाम के ऑफिस आवर में ही अपने एक घनिष्ठ मित्र के दफ्तर पहुँच कर बोले :"चलो कहीं सेलेब्रेशन हो जाय!"
मित्र हकबकाय :"अभी?"
पाठक जी :"हाँ ! उठो जल्दी।"
मित्र :"पर किस बात का सेलेब्रेशन है? कुछ तो पता चले!"
पाठक जी :"तुम चलो तो, वो भी पता चल जाएगा।"
मंत्रमुग्ध मित्र उठे और पाठक जी के साथ हो लिए। दोनों मित्र एक बार में पहुंचे और ड्रिंक्स का आर्डर दिया। मित्र से रहा न गया, उन्होंने फिर पूछा :"यार ! कुछ तो हिंट दो आखिर किस बात का सेलेब्रेशन है?"
पाठक जी :"ड्रिंक्स आने तक सब्र करो।"
आखिर ड्रिंक्स सर्व हुई। दोनों ने चियर्ज़ बोला। मित्र ने फिर आग्रह किया :"अब तो बताओ!"
पाठक जी ने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया:"आज मेरी बची हुई ज़िन्दगी का पहला दिन है।"

..........ये मेरे लिए एक नया अनुभव था !!


जबतक जिओ हर दिन को एक नई उर्जा और उमंग के साथ जिओ।
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अदभुद अनुभव !
बात 05,दिसंबर,2012 की है:
 
वीणा का जिस नर्सिंग होम में ईलाज हुआ उसके बाहर एक फ्रूट जूस कोर्नर है। नर्सिंग होम से निकल कर हमलोग वहाँ गए और अपनी-अपनी पसंद के जूस का आर्डर दिया। मैं थोडा थका सा था और मुझे गर्मी भी लग रही थी इसलिए मैं जूस वाले की दुकान के अन्दर जाकर ठंडी छाँव में एक छोटे से बेंच के सीमित स्थान पर बैठ गया। जूस वाला पहले से खड़े ग्राहकों को निपटा रहा था। वीणा, माँ और धीरू को मैंने अन्दर आने का ईशारा किया, पर उन्होंने मना कर दिया। मैं अभी ठीक से रिलैक्स हो भी न पाया था कि देखा एक 65-70 वर्षीय कृषकाय बुजुर्ग थोडा लड़खड़ाते छड़ी टेकते हुए अन्दर आने की कोशिश कर रहे थे। मैंने उनके बैठने के जगह के वास्ते अगल-बगल देखा। एक और नवजवान बेंच पर बैठा था। मैंने बुजुर्गवार के बैठने के लिए अपनी जगह छोड़ दी और उठ खड़ा हुआ। बैठा हुआ नवजवान खाली हुई जगह पर और पसर गया। तब बुजुर्गवार थोड़े गडबडाए कि कहाँ बैठें। ये देखकर मैंने नवजवान की पीठ पर हाथ रखा और उसकी बांह पकड़ कर बुजुर्गवार की ओर इशारा कर उससे निवेदन किया कि :"प्लीज इनको बैठने दीजिये। नवजवान तुरंत उठ गया। बुजुर्गवार खाली हुई बेंच पर बैठ गए, उन्होंने काफी सुकून पाया। मैं जूस कोर्नर से बाहर निकल कर माँ और वीणा के पास धूप में खड़ा हो गया। हमारी जूस आई और हम जूस का आनंद लेने लगे। तभी जूस वाले ने मुझे पुकारा :"भईया ! आपको ई बुला रहे हैं।" मैंने पूछा कौन, तो उसने बुजुर्गवार की तरफ इशारा किया और अपने काम में मशगूल हो गया। मैं बैठे हुए वृद्ध सज्जन के पास पहुंचा तो उन्होंने हाथ के ईशारे से मुझे अपनी ओर झुकने के संकेत दिया। में झुका :"जी!?"

वृद्ध बोले :"हम आपको कुछ नुस्खा बता रहे हैं कर के देखिएगा बहुत फायदा होगा।" और उन्होंने मुझे स्वास्थ्य सम्बब्धी कुछ नुस्खे बताय, बोले :"आजमा के देखिएगा।" और अंत में अपने दोनों हाथों से उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, मेरे सिर को सहलाया और बोले :"जाइए मेरा आशीर्वाद है।"


......अभिभूत, ......मंत्रमुग्ध !!!.......... मैं अभी भी रोमांचित हूँ। 

झुलसे हुए कान

एक आदमी अपने दोनों झुलसे हुए कानों के साथ कराहता हुआ डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर उसकी उस दशा पर बहुत हैरान हुआ। उसने बड़ी सहनुभूति से उसे पास बिठाया और पूछा : " ये कैसे हुआ!?"
मरीज़ ने दयनीय स्वर में अपना दुखड़ा सुनाया : " सर, शाम को जब मैं ऑफिस से लौटा तो देखा मेरी बीबी बच्चों के कपड़े प्रेस कर रही थी। मैंने उससे चाय बना कर लाने को कहा और वहीं पास में रखे टेलीफोन के बगल की कुर्सी पर बैठ गया। देर होते देख मैंने बीबी से फिर कहा :"अरे, जल्दी चाय कहे नहीं देती है?"  बीबी झुंझलाती हुई गर्म आइरन को टेलीफोन के बगल में रखकर किचन में चली गई। थोड़ी देर में ही टेलीफोन की घंटी बजी और बेध्यानी में गलती से गर्म आइरन के हैंडल को टेलीफोन का रिसीवर समझ कर मैंने उठाया और दाहिने कान से सटा लिया, जिसके कारन मेरा दाहिना कान झुलस गया! मेरी चीख सुनकर बीबी भागती हुई किचन से आई और मेरी हालत देखकर उल्टा मुझी को फटकारने लगी कि मुझे बिकुल अकल नहीं है। उसने टेलीफोन को आयरन के दुसरे बगल में रख दिया फिर मेरे कान पर बरनौल लगाया और मेरी कुर्सी को घुमाकर मुझे बिठाया और वापस किचन में चली गई।"

डॉक्टर :"च! च!! च!!! लेकिन दूसरा कान कैसे जला??"
मरीज़ :"उसी कमीने ने दुबारा फोन कर दिया !!!"

 लेखक : श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक.

Wednesday, December 12, 2012

12वाँ वर्ष! 12वाँ महीना! 12वाँ दिन! 12वाँ घण्टा! 12वाँ मिनट! 12वाँ सेकेण्ड! सबको मुबारक!
 -श्रीकांत तिवारी 

Tuesday, December 11, 2012

"मोबईलेरिया!"

एक व्यक्ति पेट की अलामत की शिकायत के साथ डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया अपनी बगल की टूल पर उसको बैठने को कहा। कुछ पूछने से पहले डॉक्टर असमंजस में पड़ा, उसने जोर-जोर से सांस खींच कर अपने चैम्बर की हवा को सूंघा। एक न पहचान में आने वाली अजीब सी गंध से चैम्बर भरा पड़ा था। तभी मरीज़ की कराह से उसका ध्यान नार्मल ट्रैक पर आया। उसने सहानुभूति से पूछा : "हाँ जी बोलिए क्या तकलीफ है, क्या हुआ है आपको?"
मरीज़ : "मोबईलेरिया!"
डा. अचकचाया : "जी! क्या ! क्या फरमाया?"
मरीज़ : "मोबईलेरिया, सर!"
डा. : "ये कैसी बिमारी का नाम ले रहे हैं आप!! क्या होता है इस बिमारी में?"
मरीज़ : "एक तरह का गैस्ट्रिक है, सर!"
डा. : "अच्छा!! क्या होता है इनमे?"
मरीज़ : "बहुत अजीब-अजीब सा हो रहा है सर!"\
डा. : "जैसे क्या? खुल कर पूरी बात अच्छी तरह बतलाइये।"
मरीज़  : "सर, पेट का सेटिंग सिस्टम बिगड़ गया है। हम बार-बार रिसेट करते हैं लेकिन फिर बिगड़ जाता है। साइलेंट मोड में रखते हैं, लेकिन फिर अपने-आप वापस जेनरल मोड में आ जाता है। भोल्युम अपने-आप घटते-बढ़ते रहता है। भाइब्रेशन अचानक बढ़ जाता है, कभी-कभी खतरनाक ढंग से भाईब्रेट करता है। रिंगटोन पर से कंट्रोल एकदम्मे ख़तम हो गया है। पता नहीं कइसा-कइसा नया-नया रिंगटोन अपने-आप बजने लगता है।  फूस-फूस मोड से अपने-आप भड़-भड़ भाईब्रेट मोड में आ जाता है, और नया-नया ट्यून बजने लगता है। बहुत तकलीफ में हैं सर कुछ इलाज कीजिये। इसका सौफ्टवेयर बेकाबू हो गया है, कभियो कुच्छ हो सकता है।"
डा.  : "...अच्छा-अच्छा ! ...एक बात बताइये, जबसे आप चैम्बर में घुसे हैं एक अजीब सी गंध इसमें भर गई है, वो क्यूँ, घाव-वुव हुआ है क्या?"
मरीज़ : "नई,...उ ...उ सर, एम्बी-प्योर लगाय हुए हैं !!" .........परर्रर्रर्रर्र  ....पुईं ...ठस्स ...ठुस्स ...धडाम।

और डॉक्टर चारों खाने चित्त।
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गद्दी चक्कलस !

गद्दी चक्कलस !

हमेशा से ऐसा देखने को मिला है कि एक साथ एक ही जगह काम करने वाले कर्मचारियों की आपस में नहीं पटती हैं। लड़ते-झगड़ते और हमेशा बकझक करते आम देखे जाते हैं। हमारे यहाँ भी ऐसा ही है। मोहन और केदार हमेशा एक दुसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। एक दुसरे से इतने आज़िज़ आ चुके हैं कि एक दुसरे की मौत की कामना करने लगे हैं। लेकिन साथ काम करने की मजबूरी है, इसलिए न चाहते हुए भी एक दुसरे को झेलते हैं, और बकझक जारी रखते हैं। मोहन को चिढ़ाने का शगल है। कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। सिर्फ केदार को ही नहीं गद्दी कंपाउंड में घुसने-निकलने, हर आने-जाने वालों से टोका-टोकी इनकी आदत है। केदार मोहन से दूर-दूर रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन मोहन कोई-न-कोई मौका निकल कर केदार को छेड़ ही देते हैं। और बकबक शुरू! अभी "_2012_" में महाप्रलय की चर्चा ज़ोरों पर है, हरकोई इसपर अपना-अपना ज्ञान बघारने में लगा हुआ है। मोहन और केदार भी इस बात पर नजर रखे हुए हैं और फ्री में हमें इसका लेटेस्ट उपडेट देते रहते हैं। केदार सोचते हैं कि मोहन जब मरेगा तो उनकी शवयात्रा कैसे ओर्गेनाइज़ करना है। पर मोहन भी हाज़िरजबाबी के महारथी हैं। अतः रोज़ कुच्छ-न-कुच्छ चुटीली बात होती ही रहती है। कल शाम केदार गद्दी में अपना ज्ञान बखान रहे थे........

केदार : " आज के  परभात खबर में फिर छापले हलऊ, संभावना तो हई।"

दूर बइठे मोहन ने चुटकी लेने के लिए केदार को छेड़ा : " आँय ! का छपल था, बताइये।"

केदार चिढ़ कर :" नई बताएँगे! आपको काहे बतायं? जानना है तो अपना पेपर मंगवा के काहे नई पढ़ लेते हैं! काहे, मुंह पोंछने वास्ते पेपर लेते हैं का?"

मोहन : " अरे बता दीजियेगा तो का हो जायेगा?"

केदार : " न हम नई बताएँगे। खासकर के आपको!"

मोहन : " काहे, अकेले मरिएगा का!?"

मोहन के इस व्यंग्य पर सभी इतनी जोर से और देर तक हँसे की गद्दी की दीवारें अट्टहास झनझना गयीं। केदार अपनी झेंप छिपाने के लिए काम में पनाह तलाशने लगे, पर हँसे बिना वो भी न रह सके।

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जिम्मी : "पापा ! क्या कर रहे हैं?"
पापा : " एमा वाटसन या क्रिस्टीन स्टीवर्ट जैसी लड़की खोज रहे हैं।"
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दादागिरी, रंगदारी, बोकरादी, बोसगिरी को कभी-कभी अच्छा जबाब मिलता है। और तताकथित स्वनामधन्य दादा, रंगदार, बोकराद और खुद को ख़ुदा से भी दस हाथ ऊंचा समझने वाले अपना सा मुंह ले कर रह जाते हैं।

लोक-सभा के चुनाव के वक़्त, स्थान -चतरा (पलामू), कैशियर के साथ:
             रात के साढ़े बारह बजे किसी ने जोर से दरवाजा भडभड़ाया, फिर जोर से नशे में धूत्त थरथराती आवाज़ में पुकारने लगा : " एई!" "..एजी!!" "...अई मनोज जी !!!" "मनोज जिह !!!!" "अरे दरवाजा खोलिए।" "जरुरी काम है। एई !!!!!!" "अरे खोलियेह !!!!!!" खट-खट-खट, ...हड़-हड़-हड़, ...! "होह !!!!"  

मनोज जी थकान की वजह से आई घोर नींद से जागे। " ....हाँ! हाँ!! !कौन?"

आगंतुक : "अरे खोलिए पइसा लेना है।"

मनोज : "भाई, सबेरे नौ बजे ऑफिस में आइये, अभी यहाँ स्टाफ और रजिस्टर वगैरह नहीं है।"

आगंतुक : "अरे देत्त ! बोले न ज़रूरी है। 'बाबु ' का पुर्जा है, बोले अभिये ले लेने वास्ते, बिहानेहें मनिका जाय ला औडर दिए हैं। अभी नई दीजियेगा तो कइसे होगा? जल्दी खोलिए अउ पइसा दीजिये नई तो फेरा में फंस जियेगा!"

-ये सुनकर मनोज और मौजूद दो अन्य सहकर्मी सकपकाय। पर कुछ सोच कर मनोज ने दरवाजा खोल दिया और बत्ती जलाई। देखा कि सामने नशे में लेरुआईल, झूमता-डोलता मैला-कुचैला लाल-लाल आँखें मिचमिचाता काला-कलूटा मैला सा एक आदमी खड़ा था। दारू का भभूका मनोज के मुंह पर पड़ा, मनोज ने उसे पहचाना। वो रोज मांगने-खाने वाला आदमी था जो मालिक का चाटुकार था, जिसे मालिक का मुंहलगा होने के कारण और चुनावी माहौल में वक्ती तौर पर हासिल संगत और साथ घूमने-फिरने से इतराने का मौका मिल गया था। और चुनावी वातावरण में खुद को V.I.P. समझने लगा था। सबको अपनी धौंस में लेने की कोशिश से बाज नहीं आता था। मनोज उसके सम्मुख हुए।

मनोज : "हाँ बोलिए।"
आगंतुक : "बोलिए का !! ई पुर्जा धरिये अउर पइसा दीजिये।"
मनोज : " ये ऑफिस नहीं है, ये हमारे सोने का कमरा है। ऑफिस यहाँ से दूर है। यहाँ हम पैसा कहाँ से लाकर दें आपको एतना रात में? इतना ही ज़रूरी था तो जब शाम में ऑफिस में ही पुर्जा पास हुआ, वहीँ हम थे, सभी तरह का पुर्जा का पैसा चुकती दिया जा रहा था, वहाँ उसी समय काहे नहीं ले लिए? अब अभी आधा रात को आपको पैसा और काम याद आ गया!?
आगंतुक : " उ सब हम नई जानते हैं, इ पुर्जा पकड़िये और शांति से पइसा दीजिये नई त बोले न फेरा में फंस जाईयेगा।"

तबतक बाकि दोनों साथी भी जाग चुके थे।

मनोज : " क्या। कइसा फेरा में फंस जायेंगे"
आगंतुक : "अगिला दिन दिखाई नहीं दीजियेगा।"

एक साथी ने आगंतुक से पुर्जा ले कर उसका मुआयना किया, 'बाबु' का दस्तखत किया हुआ ऑर्डर था :  "25/- रूपया दे देंगे।" _ इधर बहस जारी थी।

मनोज : "क्या कर लीजियेगा?"
आगंतुक : "छव इंच छोटा कर देंगे, समझे! अभी आप चीन्हे नहीं हैं।"
मनोज : "अरे आपको कौन नहीं चिन्ह्ता है! ई सब आपका रोज का धंधा है। रहा सवाल छव इंच छोटा करने का तो आपका जइसा आदमी को तो हम कब से खोज रहे हैं। हम भी आजिज़ आ गए हैं ई ज़िन्दगी से ! जल्दी ई काम करिए नई तो भुजलिया भोथडा जायेगा। एक किरपा आउर कीजियेगा, हमारा दू गो बेटा है उनका लिखाई-पढ़ाई और सब तरह के जिम्मेवारी ले लीजिये उनको पालने-पोसने का जिम्मा ले लीजिये हम अभिये अपना गर्दन आपके हवाले करते हैं, लेकिन ये पुर्जा सबेरे ऑफिस टाइम में ऑफिस से ही भंजाने सकिएगा। चल्ल ! कर छव इंच छोटा !!"

एक साथी ने उसे धकेल कर बहार निकला। नशे में वो भरभरा कर गिरा। उसका पुर्जा उसके ऊपर उछाल कर दरवाजा बंद कर दिया गया। उसके बाद वो आदमी फिर कभी दिखाई नहीं दिया। पता चला कि सबेरे ही वो पुर्जा किसी को देकर पैसे लेकर जा चूका था।
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 लोहरदगा में कल शाम से घने काले बादल घिर आये हैं, झमाझम पानी बरस रहा है, खूब जोर से बिजली चमक रही है और बादल के घनघोर गर्जन भारी बरसात की धमकी दे रहे हैं। मलुवा और उसके बच्चों को ऊपर से नीचा उतार लाया हूँ। पुवाल को बोरी में भर कर उससे गद्दा बनाकर सीढ़ी के नीचे रख कर बच्चों को स्रुरक्षा में रखा  है। मलुवा इस नए गद्दे पर आराम से बैठी अपने बच्चों को संभाले हुए है। लेकिन दरवाजे पर होती हर आहट और आने-जाने वालों पर जोर से भूंक रही है। इससे माँ मलुवा पर बमक रही है। वैसे माँ मलुवा को उसकी लापरवाही पर उसे डांट भी रही है कि वो बच्चों का ख्याल रक्खे। अब कूकुर से के बतियावे।

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Monday, December 10, 2012

गद्दी में कॉमेडी सर्कस:

गद्दी में कॉमेडी सर्कस:
          1. हमारे एक सहकर्मी हमेशा ये जताने की कोशिश में लगे रहते हैं कि हम उन्हें "भाव" दें। इसके लिए ये हमेशा कथा करते रहते हैं कि वो डी.सी. के दोस्त हैं, मंत्री जी उनके साथ घूमते-फिरते हैं साथ बिठा कर व्हिस्की पीते-पिलाते हैं! जब भी कोई बात कीजिये उस विषय के विशेषग्य बन जाते हैं। उन्हें किचन के काम भी आते है और स्पेस साइंस के भी ज्ञाता हैं। कुरान, बाइबल और हिन्दू धर्मग्रंथों के ज्ञाता और कथा वाचक बन जाते हैं। कोई उनके मुंह नहीं लगना चाहता, पर जबरन बात छेड़कर हम पर हावी होने की कोशिश में लगे रहते हैं। उनके मुताबिक उनके सम्बन्ध देश के शीर्षस्थ नेताओं, अभिनेताओं, खिलाड़ियों और सेलेब्रेटीजसे हैं, और ये उनके दुलरुवा भाई हैं, मित्र और सलाहकार हैं!! पर यहाँ हमारे साथ जॉब क्या करते हैं!__पैंट्री, और किचन सँभालते हैं। रसोइया !! ...हे भगवान्! इस लसूड़े से कैसे जान छूटे!? हमने तय कर लिया कि ससुरे को उसकी औकात दिखाएँ। हमने उसे सबक सिखाने की ठान ली। इसका मौका वो हमेशा देते ही रहते है, सिर्फ हमही मुलहिज़े में चुप रहते थे। आज ये चुप्पी हमने तोड़ी।

आज ये भांज रहा था : " तीन साल शाहरूख खान के साथ रहले हियई, ... शाह... "
तुरंत मनोज भईया ने पूछा : " उसका जूता साफ़ करते थे क्या?"

मरदूद का मुंह देखने लायक था। हम सारे साथी खूब हँसे।


          2. "इस साल- 2012" को काफी दिनों से पृथ्वी के लिए विनाशक बता कर दहशत का माहोंल बना दिया गया है। इस पर "2012" नाम से हॉलीवुड मूवी बन चुकी है, जिसमे पृथ्वी को नष्ट होते दिखाया गया है। इस भ्रांति ने महिलाओं को ज्यादा डराया हुआ है।

सहारा इंडिया का एजेंट: " भाभी आप इन्वेस्ट कीजिये ना, बहुत अच्छा प्लान है। पाँच साल में अढ़ाई गुना देगा।
भाभी : " नई रिंकू जी। परलय के बाद।"

       
          3. शहर में मेला/कार्निवाल लगा है, खूब मनोरंजन और तमाशे हो रहे हैं। कोई निशाना आजमा रहा है, कोई झूले पे चढ़ा किलकारियां भर रहा है। मोटकी चाची को वजन तौलने वाली मशीन ने रिझाया। चचा बोले अरे टूट जयितई मिसिनिया!! पर चाची नहीं मानी। और ए गो सिक्का ले के जैसे ही मशीन पर चढ़ीं, मशीन की बत्तियां बेलगाम होकर जलने-बुझने लगीं। मशीन के स्पीकर ने तीन बार बीप-बीप किया और अनुनयपूर्ण स्वर में बोला : " कृपया दो व्यक्ति एकसाथ मशीन पे न चढ़ें!!

कोई इम्तिहान पास करने की होड़ में मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स ज्वाइन नहीं किया। कमेंट्स कोई मार्क्स नहीं हैं जो न हो तो आपका किया हुआ महत्वहीन हो जायेगा। मेरा एक ही ढर्रा है: "जो मन भावे, सो तन लागे। ये सूचना के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र है, रेस ट्रैक नहीं। बस इतना ध्यान रहे कि मर्यादाओं का उलंघन न हो। 
यह एक सामान्य बात है और मेरा अपना कथन है। किसी व्यक्तिविशेष के लिए चेतावनी, या उपदेश नहीं है। कृपया भ्रम न पालें। आपका इसका मानना न मानना मुझे प्रभावित नहीं करेगा। मैंने बस इतना कहा है कि यहाँ कोई प्रतियोगिता नहीं हो रही है।

 

वीणा के ज़ख्म ! वीणा का दर्द !!

 10, दिसंबर, 2012    सोमवार,     लोहरदगा     शाम के साढ़े आठ बजे -


अभी-अभी मैंने वीणा के चोंथी बार सर्जरी हुए हाथ की फ्रेश ड्रेसिंग की। नई, चोंथी सर्जरी के ज़ख्म को देख कर दहशत से सिहर गया! 2 लम्बे-लम्बे कट हैं जिनमे कुल मिला कर 13 टाँके हैं। 12/12/12 को टाँके कटवाने का दिन है। इसी दिन (अफवाह के अनुसार) महाप्रलय का दिन भी है। चलिए किसी बहाने इस ऐतिहासिक तारीख से हमारा अविस्मरनीय सम्बन्ध बनने जा रहा है। मैंने वीणा के इस ज़ख्म की फोटो खीची है, आपसे शेयर कर रहा हूँ।
 देखिये ..........!!


क्यों ... घिन्न आ रही है? या तरस आ रहा है!?

तस्वीर तो शेयर कर लिए। क्या वीणा का दर्द भी शेयर कर पायेंगे!? नहीं। जो समझना था समझ भी गए होंगे। वीणा के लिए "गेट वेल सुन" की प्रार्थना भी आपने कर ली होगी।

 ये संजीदा विषय जड़ से ख़त्म हो, इस निवेदन के साथ आप सभी लोगों का धन्यवाद।
कुछ कहना-सुनना है तो वो भी कर लीजिये क्योंकि कुछ हंसी-ठिठोली करने का मन कर रहा है।

श्रीकांत  .







Saturday, December 8, 2012

"हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!"

ऐसी भाषा का क्या फायदा जिसके लिए हर वक़्त डिक्शनरी खोल कर रखना पड़ता है!? जिसे आप खूब जतन से लिखें और बोलें पर उसका कोई कद्र न करे!????

अच्छा है। हमारे पास विकल्प है अपनी पसंदीदा भाषा में अपनी बात कहने का मौका है। इस सुविधा के लिए जो इंजिनियर जिम्मेवार है उसका कोटि-कोटि नमन और अभिवादन।

नमस्ते महोदय !!

अंग्रेजी भले भाँड में न जाये, पर हिंदी पर ऐतराज़ बंद करे।

सबसे अच्छी भाषा वोही है जो आपको अपने आपको अभिव्यक्त करने का सबसे शानदार और सबसे आसान अवसर देता हो। मैं अंग्रेजी नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं, इसका ये मतलब नहीं कि मैं बेवक़ूफ़ हूँ।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारा दिया था "हिंदी - हिन्दू - हिन्दुस्तान!" आज के परवेश में इसे सेक्युलरवाद से जोड़कर इसकी खिल्ली उडाना सबसे आसन काम है, पर इसकी मजबूती, गरिमा और विशालता को चुनौती देना इतना आसान नहीं है।

ध्यान रखियेगा, अगर आप हिन्दुस्तानी हैं।

जय हिन्द!!!

रवीश कुमार को मैसेज

 NDTV india के एंकर रवीश कुमार को मैंने facebook पर मैसेज भेजा है:

टीवी पर आप बड़े भाई लगते हैं, लेकिन आपको भईया कहूँ या "सर" मैं निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ। भईया कहने से इसलिए हिचक रहा हूँ कि कहीं आप ये न समझ लें कि कौन ज़बरदस्ती गले पड़ रहा है। और सर कहने से इसलिए हिचक रहा हूँ कि सर हमलोग स्कूल में मास्टर साहेब को कहते थे या आजकल डॉक्टर या अपने एम्प्लोयर को कहते हैं जो आप नहीं हैं। सर को श्रीमान कहने का रिवाज ख़तम हो गया है। आपको आपके नाम से संबोधित करने की क्षमता शायद मुझमे नहीं है। क्योंकि मैं कोई ख़ास क्या बढ़िया से आम आदमी भी नहीं हूँ। ट्विटर पर आपको पढ़ा। टीवी पर आपको पहली बार "रवीश की रिपोर्ट" में देखा। तभी से आपकी बातें बड़े मनोयोग से सुनता हूँ। NDTVindia पर prime-time, या "हमलोग" जब आप प्रस्तुत कर रहे होते हैं तब ज़रूर देखता हूँ।

facebook पर Add Friend पर क्लिक किया तो ये मैसेज प्रकट हुआ:
Friend requests are for connecting with people you know well, like classmates, friends, family and coworkers. Please don’t send this friend request unless you know this person personally. फलतः घबरा गया। कस्बा नाम से आपके ब्लॉग को पढता हूँ। आपसे प्रभावित हुआ, लगता है आप मेरी भाषा में मेरी शैली में मेरे लहजे में बोल रहे हैं। अतः आपसे जुड़ना चाहता हूँ। अगर आपको मेरा आपसे जुड़ने का ये प्रयास मेरी धृष्टता लगे तो क्षमा कीजियेगा। मैं facebook पर आपसे जुड़ना चाहता हूँ। मैं बहुत मामूली आदमी हूँ, या शायद फालतू। जो भी आपका निर्णय हो बताइयेगा ज़रूर। क्योंकि उत्तर न देना मेरा भ्रम तोड़ देगा कि....
वैसे मेरा नाम श्रीकांत तिवारी है। मैं लोहरदगा, झारखण्ड का निवासी हूँ। भोजपुरी भाषी हूँ। हिंदी में मैं अपनी अभिव्यक्ति को, स्वयं को अच्छी तरह लिख-बोल सकता हूँ। अंग्रेजी मुझे कम आती है, किसी तरह काम चला लेता हूँ।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ।

मैं हिंदी को मानने वाला व्यक्ति हूँ। अपनी उपासना मैं हिंदी में करता हूँ। असली बात तो ये है कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती। आप में से कुछ लोगों के लिए मुझ जैसे अंग्रेजी न जानने वालों के लिए अस्पृश्यता (Untouchabilty / Untouchable) का आभास होता होगा। पर मुझे इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं है। अन्य साधनों की तरह अंग्रेजी का प्रयोग मैं कम करता हूँ। और मेरा हमेशा ये प्रयास रहेगा कि में हिंदी "देवनागरी" में ही लिखुँ , और लिखुँगा। किन्हीं को ऐतराज़ हो तो पहले अपनी स्थिति और अवस्था को पहले जांच लेवें, और आईने में अपनी शक्ल देख लेंवें। अगर हिंदी भाषी भारतीय हैं, तो आपकी मोनोदशा खेदजनक है, पर शायद इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता _ये ज्यादा खेदजनक है।

मुझे अंग्रेजी नहीं आती पर आप लोगों के लेखन के खिलाफ मैं बिलकुल नहीं हूँ। कुछ जतन कर के काम चला लेता हूँ। क्योंकि चलाने की मजबूरी है। श्रीमान को सर हिंदीवाले भी बोलते हैं, इसलिए ज्यादा माथा खराब करने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

आप जारी रहिये। हिंदी की कद्र करने की कोशिश कीजिये। वैसे ये आपलोगों के लिए मुश्किल काम है।

अंग्रेजी का जामा पहनकर आप खुद को परिष्कृत समझें। पर हिंदी लेखन को हिकारत से देखने की धृष्टता न करें।

जय हिन्द


दिसंबर 2012 की शुरुआत :

दिसंबर 2012 की शुरुआत : पहला सप्ताह:

दिसंबर 2012 की शुरुआत होते ही अनेक तरह की बातें, घटनाएँ, शुरू हुईं।

जेम्स बोंड की नयी फिल्म SKYFALL नहीं देख सका। पर ....

1. वीणा के हाथ का ऑपरेशन, क्लिप और स्क्रूज निकलवाने राँची गया। 2 दिसंबर को कमल के साथ पुराने "उपहार सिनेमा", जो एक नए भब्य रूप "गैलेक्सिया मौल" में परिवर्तित हो चुका है, हमने आमिर , रानी, और करीना से सजी बहुप्रतीक्षित फिल्म "तलाश" देखी। उं हूं !! नहीं पसंद आया। इसमें दो ख़ास बातें अच्छी लगी: पहली - खाखी वर्दी में पहली बार आमिर और उनकी दमदार अदाकारी, दूसरी - नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का परफोर्मेंस। फिल्म सुपरनेचुरल विषयक है पर हॉरर मूवी नहीं! सस्पेंस थ्रिलर है पर रोमांचक नहीं! कोई षड्यंत्र नहीं! कोई खलनायक नहीं! कोई मनोरंजन नहीं।

2. 3-दिसंबर को वीणा के हाथ का ओप्रशन हो गया। क्लिप और स्क्रूज निकाल दिए गए।

3. धीरू को मैंने डांटा। शराब का दखल मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है।

4.  डुग्गु  और गुनगुन के साथ का आनंद मिला।

5.  मैंने अपने लिए कुछ रेडीमेड कपडे ख़रीदे।

6.  वीणा के नर्सिंग होम से छुट्टी मिलते ही मैं उसे लेकर लोहरदगा वापिस आ गया।

7. लोहरदगा पहुँचते ही बिजली संकट का सामना करना पड़ा।

8.  facebook पर लिखने के लिए मोबाइल का सहारा लेना पड़ा।

9. 5-दिसंबर से 7-दिसंबर तक बिजली गुल रही।

10. 6-दिसंबर का समाचार पत्र पढ़ कर पता लगा कि झारखण्ड सरकार द्वारा बिजली व्यवस्था निजी कंपनियों को सौंपने के विरोध में राज्यभर के विद्युतकर्मियों ने लाइटनिंग स्ट्राइक की घोषणा कर दी है।

11. बिजली न रहने के कारण मैं इस पृष्ठ पर न लिख सका और मुझे मोबाइल का सहारा लेना पड़ा। ये थोडा कठिन लगा।

12. बिजली कि ये कटौती काफी कष्टदायक रही। सभी बिजली के उपकरण ठप्प पद गए।

13. 7-दिसंबर को बिजली आ गई।

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लोहरदगा, 08, दिसंबर, 2012 शनिवार : प्रातः  06 बजे सुबह :

अभी-अभी  समाचार पत्र के माध्यम से पता चला कि बिजली विद्युतकर्मियों की "कृपा" से नहीं बल्कि झारखण्ड हाईकोर्ट के सख्ती और धमकी और कड़े आदेश के बाद आई!

हाईकोर्ट ने जो टिपण्णी की, जो आदेश दिए समाचारपत्र के मुताबिक इस प्रकार है:
          "बिजली बोर्ड के कर्मचारियों को मनमानी करने की छूट नहीं है। बिजली आवश्यक सेवा है। इस वजह से कर्मचारियों को हड़ताल करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
          हड़ताल कर आम लोगों को उनके हाल पर छोड़ने वालों के खिलाफ लोगों का आक्रोश साफ़ है। यदि जनता जागी तो उन्हें (विद्युतकर्मियों को) बंगाल की खाड़ी में भी जगह नहीं मिलेगी। ऐसे लोगों को बिजली बोर्ड में रहने का अधिकार नहीं है।
          चीफ जस्टिस पीसी टाटिया और जया राय की अदालत ने शुक्रवार को बिजली कर्मियों की हड़ताल पर यह कड़ी टिपण्णी की। उन्होंने कहा कि यदि 10 मिनट में हड़ताल समाप्त नहीं हुई तो कर्मचारियों को बर्खास्त कर उन्हें दोबारा वापस नहीं लेने का आदेश भी दिया जा सकता है। अदालत का सख्त रूख देखने के बाद हडताली यूनियन ने 10 मिनट में हड़ताल समाप्त करने की बात कही। यूनियन ने कहा कि 10 मिनट में हड़ताल समाप्त हो जाएगी। ......
          कोर्ट ने कहा कि अपनी मांगे मनवाने के और भी तरीके हैं। बोर्ड के लोग भूख-हड़ताल कर सकते हैं। लेकिन बिजली जैसी आवश्यक सेवा ठप्प करने का उन्हें किसी ने अधिकार नहीं दिया। यह आवश्यक सेवा है। हड़ताल को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
          कोर्ट ने कहा कि कोई डॉक्टर किसी को ओक्सिजन लगाता है, उसके बाद कोई आदमी कहे कि ओक्सिजन मशीन उसकी है इस कारण वह इसे ले जायेगा, तो क्या उसे मशीन ले जाने की इजाज़त दी जा सकती है? इसीप्रकार बिजली बोर्ड के कर्मचारी जब चाहें बिजली की आपूर्ति करें, और जब चाहें बंद कर दें, तो इसे बर्दास्त नहीं किया जा सकता। मनमानी नहीं करने दी जा सकती।
      ****वाह!
जागो ग्राहक जागो!!!

-श्रीकांत तिवारी  





Monday, December 3, 2012

T A L A A S H ....!!!!! AAMIR KHAN KI ...

आमिर ! रानी !! करीना !!!
T  A  L  A  A  S  H  ...............!!!!!!!!!!!!!
02/12/2012 रविवार, रांची, गैलेक्सिया मल्टीप्लेक्स [पॉपकॉर्न]...पुराना "उपहार टॉकीज़", कमल के साथ।
















...

!
आमिर के प्यार और उनके स्टारडम के रौब में कुछ ज्यादा ही उम्मीद हो गई थी, इसलिए ...थोड़ी फीकी हो गई। 2012 के शुरू में विद्या बालन की "कहानी" जैसा सस्पेंस का इसमें अभाव लगा, आसरा ही लगा रहा कि अब चौंके-कि अब चौंके! ...कमजोर कहानी, कोई षड्यंत्र नहीं, कोई खलनायक नहीं, ...सिर्फ एक घटनाक्रम जिसकी तफ्तीश कोई रोमांच जगाने में असमर्थ है। आमिर की व्यक्तिगत ट्रेजेडी से सहानुभूति तो होती है, पर तसल्ली नहीं मिली।

हाँ! फिल्म की कहानी से उलझन बनी रही।

नवाज्ज़ुद्दीन सिद्दीकी (शानदार 'तैमूर') का क्या गुनाह था, जो उसके 'किलिंग' पर सिमरन(!) हमको तसल्ली महसूस कराना चाहती है, सिमरन की मौत से उसका क्या वास्ता था? सिमरन की मौत में उसका तो कोई कसूर नहीं था। फिर ...!? वो सिर्फ एक मौकापरस्त की भूमिका में होता है, फिर भी नवाज़ के यूँ जाया किये जाने पर दुःख होता है।

फिर देखूंगा तब समझ में आएगा। आमिर की खातिर एक बार इस फिल्म को ज़रूर देखें।

आमिर खाखी वर्दी में खूब जमे हैं। पर उम्मीद में ही फिल्म ख़त्म !! आमिर की फिल्म में सुपरनेचुरल  किरदार की मौजूदगी दिलीप साहब की मधुमती, या अन्य पुरानी सस्पेंस हिंदी फिल्मों के आगे कहीं नहीं ठहरती। हालाँकि यूँ तुलना ठीक नहीं है। क्योंकि कोई तुलना हो ही नहीं सकती।

आमिर का दमदार किरदार कहीं खो जाता है, अफ़सोस कि वो वापिस हासिल ही नहीं होता। आखिरकार आमिर फूट-फूट कर रोये। सुपरनेचुरल को प्रमाणिक करने वाली इस फिल्म में उत्सुकता, उत्कंठा का सर्वदा अभाव है।

...सच बोलें? नई मज़ा आया।(punchline).

-श्रीकांत तिवारी
अभिनन्दन अपार्टमेन्ट
फ़्लैट नंबर 304, तीसरी मंजिल,
कोकर, रांची .
झारखण्ड - 834001
भारत

Wednesday, November 21, 2012

कसाब को फांसी दे दी गई!

कसाब को फांसी दे दी गई!


आज सुबह सबेरे 07:30 बजे मुंबई 26/11 के हमले को अंजाम देने वाले आतंकी आमिर अजमल कसाब को यरवडा (महाराष्ट्र) जेल में फांसी दे दी गई! यह समाचार 26/11 के हमले में शहीद हुए वीरों के परिवार के साथ-साथ पूरे देश के लिए राहत और चैन की बात है। लेकिन बिना किसी पूर्व सूचना के अंजाम दी गई यह घटना कई सवाल खड़े करती है।

जहाँ सत्ताधारी यु.पी ए. की सरकार स्वयं अपनी पीठ थपथपायेगी, वहीँ विपक्ष इसे भी राजनीति की एक चाल बता कर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। आज बी.जे.पी. की हल्लाबोल रैली है, दूसरी राजनैतिक पार्टीयाँ और बी.जे.पी.कभी भी किसी भी हालत में यु.पी ए. की सरकार के इस कदम को मुक्त कंठ से नहीं सराहेगी, उसका आरोप होगा कि घोटालों से घिरी सरकार ने कसाब को (जल्दबाजी में) फांसी दे कर झूठी प्रसन्नता बटोरने की कोशिश की है। कोयला घोटाला, FDI, गैस ... blah blah blah  से संकट में पड़ी यु.पी ए. की सरकार ने कसाब को आनन-फानन में फांसी दे कर अपनी छवि सुधारने की कोशिश की है।

इसके बावजूद यह हमारे लिए खुशखबरी है और पाकिस्तान जनित आतंक को देश का जबाब है।

जय हिन्द!

श्रीकांत तिवारी 
21,नवम्बर`2012
लोहरदगा

Tuesday, November 20, 2012

क्या भूलूँ - क्या याद करूँ? 20 नवम्बर 2012

लोहरदगा, थाना टोली          20 नवम्बर 2012          09:57 प्रात:

17 नवम्बर से ले कर अभी तक बहुत कुछ हुआ है।

क्या भूलूँ - क्या याद करूँ?

बाल ठाकरे की अभूतपूर्व ऐतिहासिक अंतिम विदाई !? या ...
अमिताभ बच्चन का उदास गंभीर और सोच में डूबा चेहरा !? या ...
उद्धव ठाकरे का बिलख-बिलख कर रोना !? या ...
राज ठाकरे के घडियाली आंसू !? या ...
क्षणभंगुर छठ पूजा !? या ...
पटना के छठ घाट पर घटी दुखद दुर्घटना !? 
प्राण साहेब (92) के अटके प्राण ?

... हे भगवान् इनकी, हमारी, सबकी रक्षा करो
...
2012
2012
2012

इस मनहूस वर्ष को और कितनी जान चाहिए ?
2012 को और कितनी नर-बलि चाहिए ?
...

?

क्या इन्हें भूल कर "हुले-ले-ले" करने को ही जीवन कहते हैं ? 
You win some, you loos some, life goes on...
the clock is ticking...

- श्रीकांत तिवारी 


Saturday, November 17, 2012

बाल ठाकरे नहीं रहे !!!

बाल ठाकरे 



 
बालासाहेब केशव ठाकरे
...................................आज इस व्यक्तित्व का निधन हो गया। व्यक्तिगत रूप से मैं कभी भी इनसे और इनकी नीतियों और सिद्धांतों से पूर्णतया सहमत नहीं रहा, लेकिन इस महान योद्धा के नहीं रहने पर काफी दुःख और बेचैनी महसूस कर रहा हूँ।

ईश्वर इनकी आत्मा को शांति एवं सदगति प्रदान करें।

-श्रीकांत तिवारी 
17 नवम्बर`2012
लोहरदगा, झारखण्ड 

Wednesday, November 7, 2012

सारे कुत्ते तीर्थ करने चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा ?

ख़ास-विशेष मौकों पर अमीरों की फितरत है कि ये अपने स्टाफ को, चाहे वो किसी भी ओहदे का हो, बड़ी ही शिद्द्त (यतन) के साथ हमेशा ये याद दिलाते रहना, ये एहसास करते रहना कि "- तुम महसूस करो कि तुम निकृष्ट, निम्न, छोटे, और नौकरों की जामात के प्राणी हो, अपनी औकात में रहो-"...काफी अखरता है।

 दुःख तब और बढ जाता है जब उस गरीब की मामूली औकात उसके मुंह पे मारी जाती है।

 अमीरों के ऐसे रवैये से लगता है कि वो कह रहे हैं कि : "-सारे कुत्ते तीर्थ करने चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा!? -यही न!?

- श्रीकांत 

Sunday, October 21, 2012

ओह! यश जी!!!

ओह! यश जी!!!

आज यश चोपड़ा का दुखद निधन हो गया!'

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और सदगति प्रदान करें!
Yash Chopra
यश जी भुलाए न भूलेंगे!!!!
वक़्त,  दाग़, दीवार ...

...जब तक है जाँ !!!

श्रीकांत तिवारी 
21,अक्तूबर`2012

Friday, October 12, 2012

TCS फतह !!!

12/10/2012 शुक्रवार, लोहरदगा                    समय : रात्रि 11:45

जिम्मी ने TCS जीत लिया!
अभी-अभी जिम्मी ने फ़ोन कर ये जानकारी मुझे दी।
मैं अपने बेटे की इस कामयाबी पर उसे हार्दिक बधाई और अपना आशीर्वाद देता हूँ।






ईश्वर का कोटि-कोटि धन्यवाद।
ये बाबूजी का आशीर्वाद है!
13 तारिख दिन शनिवार, अक्तूबर 2012 को यह शुभ संवाद प्रसारित हुआ है, इसे कैसे मनहूस कहा जा सकता है!

-श्रीकांत तिवारी 

जिम्मी !

जिम्मी ! न रो बेटा !

           10/10/2012 को जिम्मी की आकांक्षाओं पर अप्रत्याशित आघात से मैं, वीणा, कमल, हम सभी दहल गए हैं! 
           न जाने क्या होने वाला है ...!?
           13 तारीख को तो वैसे ही बहुत मनहूस माना जाता है, और इसी दिन, जिम्मी के कहने के अनुसार, जो फैसला आने वाला है उस पर हमारे परिवार का भविष्य निर्भर है!  
           जिम्मी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ। अब उसी के मुख से शुभ सुनने की इच्छा है। जब भी फ़ोन की घंटी बजती है प्रत्याशा से मन भर आता है। आज पूजा में शंख की ध्वनि में मेरी आकांक्षाओं ने शब्द का रूप लिया और आंसू बन बह निकला। 
           शनिवार 13 तारीख 2012 _सुनने में ही भयावह लगता है! यह दिन हमारे जीवन का एक हर्षपूर्ण दिन बनेगा या गहन अवसाद का? एक-एक पल डर के साए में बीत रहा है।
           पर सौरभ की राय में बहुत सुखद संवाद की अपेक्षा है। सन्नी का भी यही मानना है।

- श्रीकांत तिवारी